Bihar Board Class 11th Physics (भौतिक विज्ञान) Chapter 10 (तरलों के यांत्रिक गुण) Solutions
Here we have provided Solution for Chapter 10 (तरलों के यांत्रिक गुण) of Physics (भौतिक विज्ञान) subject for Class 11th students of Bihar Board of Secondary Education. There are various chapters in this Physics (भौतिक विज्ञान) such as Chapter 1 (भौतिक जगत), Chapter 2 (मात्रक तथा मापन), Chapter 3 (सरल रेखा में गति), Chapter 4 (समतल में गति), Chapter 5 (गणित के नियम), Chapter 6 (कार्य, उर्जा तथा शक्ति), Chapter 7 (कणों के नियम तथा घूर्णी गति), Chapter 8 (गुरुत्वाकर्षण), Chapter 9 (ठोसों के यांत्रिक गुण), Chapter 10 (तरलों के यांत्रिक गुण), Chapter 11 (द्रव्य के तापीय गुण), Chapter 12 (उष्मागतिकी), Chapter 13 (अणुगति सिद्धांत), Chapter 14 (दोलन) and Chapter 15 (तरंगें). Summary of the same is given below:
| Board Name | Bihar Board of Secondary Education |
| Class | Class 11th |
| Content Type | Solution |
| Solution for | Class 11th students |
| Subject | Physics (भौतिक विज्ञान) |
| Chapter Name | Chapter 10 (तरलों के यांत्रिक गुण) |
| Total Number of Chapter in this Subject | 15 |
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Bihar Board Class 11th Physics (भौतिक विज्ञान) Chapter 10 (तरलों के यांत्रिक गुण) Solutions
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प्रश्न 1. स्पष्ट कीजिए क्यों? (a) मस्तिष्क की अपेक्षा मानव का पैरों पर रक्त चाप अधिक होता है। (0) 6 5० ऊँचाई पर वायुमण्डलीय दाब समुद्र तल पर वायुमण्डलीय दाब का लगभग i हो जाता है, यद्यपि वायुमण्डल का विस्तार 100 ;४७ से भी अधिक ऊँचाई तक । (० यद्यपि दाब, प्रति एकांक क्षेत्रफल पर लगने वाला बल होता है तथापि द्रवस्थैतिक दाब एक अदिश राशि है।
हल:
(a) द्रवस्थैतिक दाब का सूत्र P = hρg है, जहाँ h गहराई, ρ घनत्व और g गुरुत्वीय त्वरण है। इसका अर्थ है कि किसी द्रव स्तंभ का दाब उसकी गहराई के साथ बढ़ता है। मानव शरीर में, पैरों के स्तर पर रक्त स्तंभ की ऊँचाई (h) मस्तिष्क के स्तर की तुलना में अधिक होती है क्योंकि पैर हृदय से नीचे स्थित होते हैं। इसलिए, पैरों में रक्त दाब मस्तिष्क की तुलना में अधिक होता है।
(b) वायुमंडलीय दाब वायु के घनत्व पर निर्भर करता है। पृथ्वी की सतह के पास वायु का घनत्व सबसे अधिक होता है और ऊँचाई बढ़ने के साथ यह घनत्व तेजी से घटता है। लगभग 6-7 किमी की ऊँचाई पर, वायु का घनत्व समुद्र तल के घनत्व का लगभग आधा रह जाता है, जिसके कारण दाब भी लगभग आधा हो जाता है। हालाँकि वायुमंडल 100 किमी से भी अधिक ऊँचाई तक फैला है, लेकिन उच्च ऊँचाई पर वायु अत्यंत विरल हो जाती है, इसलिए दाब में कमी की दर बहुत तेज होती है।
(c) दाब को प्रति इकाई क्षेत्रफल पर लगने वाले बल के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो एक सदिश राशि (बल) से प्राप्त होता है। हालाँकि, जब द्रव पर बल लगाया जाता है, तो पास्कल के नियम के अनुसार यह दाब द्रव के भीतर सभी दिशाओं में समान रूप से संचारित हो जाता है। चूँकि द्रवस्थैतिक दाब की कोई विशिष्ट दिशा नहीं होती (यह हर दिशा में समान होता है), इसे एक अदिश राशि माना जाता है।
प्रश्न 2. स्पष्ट कीजिए क्यों?
(a) UR ar काँच के साथ स्पर्श कोण अधिक कोण होता है जबकि जल का काँच के साथ स्पर्श कोण न्यूनकोण होता है।
0) काँच के स्वच्छ समतल पृष्ठ पर जल फैलने का प्रयास करता है जबकि पारा उसी पृष्ठ पर बूँदें बनाने का प्रयास करता है। (दूसरे शब्दों में जल काँच को गीला कर देता है जबकि पारा ऐसा नहीं करता है।)
(० किसी द्रव का पृष्ठ तनाव पृष्ठ के क्षेत्रफल पर निर्भर नहीं करता है।
(०) जल में घुले अपमार्जकों के स्पर्श कोणों का मान कम होना चाहिए।
(०) यदि किसी बाहय बल का प्रभाव न हो, तो द्रव बूँद की आकृति सदैव गोलाकार होती है।
हल:
(a) स्पर्श कोण (θ) ठोस-द्रव अंतरापृष्ठ तनाव (γSL), ठोस-वायु अंतरापृष्ठ तनाव (γSA) और द्रव-वायु अंतरापृष्ठ तनाव (γLA) के बीच संबंध द्वारा निर्धारित होता है: γSA = γSL + γLA cosθ।
पारे (मरकरी) के लिए, γSA < γSL होता है, जिससे cosθ ऋणात्मक आता है और θ > 90° (अधिक कोण) प्राप्त होता है।
जल के लिए, γSA > γSL होता है, जिससे cosθ धनात्मक आता है और θ < 90° (न्यून कोण) प्राप्त होता है।
(b) उपरोक्त स्पर्श कोण के सिद्धांत के आधार पर, पारे के लिए अधिक कोण बनने की प्रवृत्ति के कारण यह काँच पर बूँद बनाता है और फैलता नहीं है। जल के लिए न्यून कोण बनने की प्रवृत्ति के कारण यह काँच पर फैल जाता है और उसे गीला कर देता है।
(c) पृष्ठ तनाव द्रव के पृष्ठ पर खींची गई काल्पनिक रेखा की प्रति इकाई लंबाई पर लगने वाला बल है। यह द्रव का एक गुणधर्म है जो अंतर-आणविक बलों पर निर्भर करता है, न कि पृष्ठ के कुल क्षेत्रफल पर। इसलिए, यह पृष्ठ के क्षेत्रफल से स्वतंत्र होता है।
(d) अपमार्जक (डिटर्जेंट) जल के पृष्ठ तनाव को कम करते हैं और स्पर्श कोण को घटाते हैं। छोटे स्पर्श कोण का मतलब है cosθ का मान बड़ा होगा। केशिकत्व के सूत्र h = (2S cosθ)/(rρg) के अनुसार, यह कपड़ों के सूक्ष्म रेशों (केशिकाओं) में जल के चढ़ने की ऊँचाई (h) को बढ़ा देता है। इससे गंदगी के कण आसानी से बह जाते हैं और सफाई बेहतर होती है।
(e) पृष्ठ तनाव द्रव के पृष्ठ क्षेत्रफल को न्यूनतम करने का प्रयास करता है। किसी दिए गए आयतन के लिए, गोले का पृष्ठीय क्षेत्रफल सबसे कम होता है। इसलिए, गुरुत्व जैसे किसी बाह्य बल की अनुपस्थिति में, द्रव बूँद अपने पृष्ठ तनाव के कारण गोलाकार आकार ग्रहण कर लेती है।
प्रश्न 3. प्रत्येक प्रकथन के साथ संलग्न सूची में से उपयुक्त शब्द छाँटकर उस प्रकथन के रिक्त स्थान की पूर्ति कीजिए
(७) व्यापक रूप में द्रवों का पृष्ठ तनाव ताप बढ़ने पर ....... है। (बढ़ता/घटता)
() गैसों की श्यानता ताप बढ़ने पर है, जबकि द्रबों की श्यानता ताप बढ़ने पर
(० दृढ्वता प्रत्यास्थता गुणांक वाले ठोसों के लिए अपरूपण प्रतिबल
अनुक्रमानुपाती होता है, जबकि द्रवों के लिए वह ....... के अनुक्रमानुपाती होता है। . (अपरूपण विकृति/अपरूपण विकृति की दर) |
(०) किसी: तरल, के अपरिवर्ती प्रवाह में आए किसी संकीर्णन पर प्रवाह की चाल में वृद्धि में का अनुसरण हांता है। (संहति का संरक्षण/बरनौली सिद्धांत)
(०) किसी वायु सुरंग में किसी वायुयान के मॉडल में प्रक्षोम की चाल वास्तविक वायुयान के प्रक्षोेम के लिए क्रांतिक चाल की तुलना में होती है। (अधिक/कम)
हल:
(a) घटता
(b) बढ़ती है, घटती है
(c) अपरूपण विकृति, अपरूपण विकृति की दर
(d) द्रव्यमान संरक्षण, बरनौली सिद्धांत
(e) अधिक
प्रश्न 4. निम्नलिखित के कारण स्पष्ट कौजिए
(a) किसी कागज की पट्टी को क्षैतिज रखने के लिए आपको उस कागज पर ऊपर की ओर हवा फूँकनी चाहिए, नीचे की ओर नहीं।
(७) जब हम किसी जल टोंटी को अपनी उँगलियों द्वारा बन्द करने का प्रयास करते हैं, तो उँगलियों के बीच की खाली जगह से तीव्र जल धाराएँ फूट निकलती हैं।
(० इंजेक्शन लगाते समय डॉक्टर के अँगूठे द्वारा आरोपित दाब की अपेक्षा सुईं का आकार दवाईँ की बहिःप्रवाही धारा कों अधिक अच्छा नियंत्रित करता है।
(१) किसी पात्र के बारीक छिद्र से निकलने बाला तरल उस पर पीछे की ओर प्रणोद आरोपित करता है।
(७) कोई प्रचक्रमान क्रिकेट की गेंद वायु में परवलीय प्रपथ का अनुसरण नहीं करती।
हल:
(a) बरनौली के सिद्धांत के अनुसार, किसी प्रवाहित द्रव में, वेग बढ़ने पर दाब घटता है। जब हम कागज के ऊपर की ओर हवा फूँकते हैं, तो कागज के ऊपरी सतह पर हवा का वेग बढ़ जाता है और दाब कम हो जाता है। कागज के नीचे की सतह पर वायुमंडलीय दाब अपेक्षाकृत अधिक रहता है। इस दाबांतर के कारण कागज पर एक ऊपर की ओर उत्थापन बल लगता है जो उसे क्षैतिज रखने में सहायता करता है।
(b) यह निरंतरता के समीकरण (A1v1 = A2v2) के कारण होता है। जब उँगलियों से टोंटी को बंद करने का प्रयास किया जाता है, तो जल के प्रवाह का अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल (A) बहुत कम (उँगलियों के बीच की संकरी जगह) हो जाता है। प्रवाह की दर स्थिर रहने के लिए, क्षेत्रफल कम होने पर वेग (v) बहुत अधिक (तीव्र) हो जाना चाहिए। इसलिए पतली तेज धाराएँ निकलती हैं।
(c) बरनौली के समीकरण P + (1/2)ρv² = नियतांक से स्पष्ट है कि प्रवाह वेग (v) का प्रभाव दाब (P) की तुलना में अधिक होता है क्योंकि v का वर्ग होता है। इंजेक्शन की सुई का आकार प्रवाह के वेग को निर्धारित करता है (छोटे व्यास से उच्च वेग), जबकि अँगूठे का दबाव केवल दाब को नियंत्रित करता है। चूँकि वेग का प्रभाव प्रवाह पर अधिक महत्वपूर्ण है, इसलिए सुई का आकार दवा के प्रवाह को बेहतर ढंग से नियंत्रित करता है।
(d) जब तरल बारीक छिद्र से तेजी से बाहर निकलता है, तो उसका संवेग बदलता है। न्यूटन के गति के तीसरे नियम के अनुसार, जिस बल के साथ तरल आगे बढ़ता है, उसके बराबर और विपरीत बल (प्रतिक्रिया बल) पात्र पर पीछे की ओर लगता है। इसी कारण से, पानी से भरी बाल्टी में छेद करने पर उसे पकड़ने में कठिनाई होती है क्योंकि यह प्रतिक्रिया बल उसे आगे की ओर धकेलने का प्रयास करता है।
(e) एक प्रचक्रमान (स्पिन करती हुई) गेंद अपने साथ वायु की परतों को भी घुमाती है। इसके कारण, गेंद के एक ओर वायु का प्रवाह गेंद की घूर्णन दिशा में होता है जबकि दूसरी ओर विपरीत दिशा में होता है। बरनौली के सिद्धांत के अनुसार, वायु के वेग में इस अंतर के कारण दाब में अंतर उत्पन्न होता है, जिससे गेंद पर एक पार्श्विक बल (मैग्नस प्रभाव) लगता है। यह बल गेंद को परवलयिक पथ से विचलित कर देता है, जिससे वह सीधे परवलय का अनुसरण नहीं कर पाती।
प्रश्न 5. ऊँची एड़ी के जूते पहने 50 ४४ संहति की कोई बालिका अपने शरीर को 1.0 ८ हा एक ही वृत्ताकार एड़ी पर संतुलित किए हुए है। क्षितिज फर्श पर एड़ी द्वारा आरोपित दाब क्या है?
दिया गया है:
लड़की का द्रव्यमान (m) = 50 kg
वृत्ताकार एड़ी का व्यास = 1.0 cm
अतः एड़ी की त्रिज्या (r) = 0.5 cm = 0.5 × 10⁻² m = 5 × 10⁻³ m
एड़ी का क्षेत्रफल (A) = πr²
A = 3.14 × (5 × 10⁻³)² m²
A = 3.14 × 25 × 10⁻⁶ m²
A = 78.5 × 10⁻⁶ m²
एड़ी पर लगने वाला बल (F) = लड़की का भार = m × g
F = 50 kg × 9.8 m/s² = 490 N
दाब (P) = बल / क्षेत्रफल = F / A
P = 490 N / (78.5 × 10⁻⁶ m²)
P = (490 / 78.5) × 10⁶ Pa
P ≈ 6.24 × 10⁶ Pa
अतः, एड़ी द्वारा फर्श पर आरोपित दाब लगभग 6.24 × 10⁶ पास्कल है।
प्रश्न 6. टॉरिसेली के बायुदाबमापी में पारे का उपयोग किया गया था। पास्कल ने ऐसा ही वायुदाबमापी 984 ॥४ट7“ घनत्व की फ्रेंच शराब का उपयोग करके बनाया। सामान्य बायुमंडलीय दाब के लिए शराब-स्तम्भ की ऊँचाई ज्ञात कीजिए।
हम जानते हैं कि द्रव स्तंभ द्वारा उत्पन्न दाब: P = hρg
जहाँ, h = द्रव स्तंभ की ऊँचाई, ρ = द्रव का घनत्व, g = गुरुत्वीय त्वरण
दिया गया है:
सामान्य वायुमंडलीय दाब (P) = 1.013 × 10⁵ Pa
फ्रेंच शराब का घनत्व (ρ) = 984 kg/m³
g = 9.8 m/s²
सूत्र में मान रखने पर:
1.013 × 10⁵ = h × 984 × 9.8
h = (1.013 × 10⁵) / (984 × 9.8)
h ≈ (101300) / (9643.2)
h ≈ 10.5 m
अतः, सामान्य वायुमंडलीय दाब के लिए शराब स्तंभ की ऊँचाई लगभग 10.5 मीटर होगी।
प्रश्न 7. समुद्र तट से दूर कोई ऊर्ध्बाधर संरतना 10? 9४ के अधिकतम प्रतिबल को सहन करने के लिए बनाई गई है। क्या यह संरचना किसी महासागर के भीतर किसी तेल कूप के शिखर पर रखे जाने के लिए उपयुक्त है? महासागर की गहराई लगभग 3 ४:०9 है। समुद्री धाराओं की उपेक्षा कीजिए।
दिया गया है:
समुद्र की अनुमानित गहराई (h) = 3 km = 3000 m
समुद्री जल का घनत्व (ρ) = 10³ kg/m³ (लगभग)
g = 9.8 m/s²
संरचना द्वारा सहन किया जा सकने वाला अधिकतम प्रतिबल = 10⁷ Pa
इस गहराई पर जल स्तंभ द्वारा उत्पन्न दाब:
P = hρg
P = 3000 × 10³ × 9.8
P = 2.94 × 10⁷ Pa
तुलना:
संरचना का अधिकतम सहन प्रतिबल = 10⁷ Pa = 1.0 × 10⁷ Pa
समुद्र तल पर दाब = 2.94 × 10⁷ Pa
चूँकि समुद्र तल का दाब (2.94 × 10⁷ Pa) संरचना के अधिकतम सहन प्रतिबल (1.0 × 10⁷ Pa) से अधिक है।
अतः, यह संरचना महासागर के भीतर तेल कूप के शिखर पर रखे जाने के लिए उपयुक्त नहीं है।
प्रश्न 8, किसी द्रवचालित ऑटोमोबाइल लिफ्ट की संरचना अधिकतम 3000 7६ संहति की कारों को उठाने लिए की गई है। बोझ को उठाने वाले पिस्टन की अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल 425 ००2 है। छोटे पिस्टन को कितना अधिकतम दाब सहन करना होगा?
दिया गया है:
उठाई जाने वाली अधिकतम संहति (द्रव्यमान), m = 3000 kg
बड़े पिस्टन का क्षेत्रफल, A = 425 cm² = 425 × 10⁻⁴ m² = 0.0425 m²
g = 9.8 m/s²
बड़े पिस्टन पर अधिकतम बल (F) = भार = m × g
F = 3000 × 9.8 = 29400 N
बड़े पिस्टन पर अधिकतम दाब (P) = F / A
P = 29400 N / 0.0425 m²
P ≈ 691764.7 Pa ≈ 6.92 × 10⁵ Pa
पास्कल के नियम के अनुसार, द्रव पर लगाया गया दाब सभी दिशाओं में समान रूप से संचरित होता है।
अतः, छोटे पिस्टन को भी इतना ही अधिकतम दाब सहन करना होगा, जो लगभग 6.92 × 10⁵ पास्कल है।
प्रश्न 9. किसी ए-नली की दोनों भुजाओं में भरे जल तथा मेथेलेटिड स्पिरिट को पारा एक-दूसरे से पृथक् करता है। जब जल तथा पारे के स्तम्भ क्रमशः 10 ८०० तथा 12.5 ८४ ऊँचे हैं, तो दोनों भुजाओं में पारे का स्तर समान है। स्पिरिट का आपेक्षिक घनत्व ज्ञात कीजिए।
दिया गया है:
जल स्तंभ की ऊँचाई, h₁ = 10 cm
स्पिरिट स्तंभ की ऊँचाई, h₂ = 12.5 cm
जल का घनत्व, ρ₁ = 1 g/cm³
स्पिरिट का घनत्व = ρ₂ (ज्ञात करना है)
चूँकि दोनों भुजाओं में पारे का स्तर समान है, इसलिए दोनों ओर का दाब समान होगा।
दाब संतुलन से:
जल स्तंभ का दाब = स्पिरिट स्तंभ का दाब
h₁ρ₁g = h₂ρ₂g
10 × 1 = 12.5 × ρ₂
ρ₂ = 10 / 12.5 = 0.8 g/cm³
आपेक्षिक घनत्व = पदार्थ का घनत्व / जल का घनत्व
स्पिरिट का आपेक्षिक घनत्व = 0.8 / 1 = 0.8
प्रश्न 10. यदि प्रश्न 9 की समस्या में, ए-नली की दोनों भुजाओं में इन्हीं दोनों द्रबों को और उड़ेल कर दोनों द्रवों के स्तम्भों की ऊँचाई 15.0 ८० और बढ़ा दी जाएँ, तो दोनों भुजाओं में पारे के स्तरों में क्या अंतर होगा? (पारे का आपेक्षिक घनत्व - 136)।
प्रारंभिक ऊँचाई में 15.0 cm की वृद्धि करने पर:
नई जल स्तंभ ऊँचाई, h₁' = 10 + 15 = 25 cm
नई स्पिरिट स्तंभ ऊँचाई, h₂' = 12.5 + 15 = 27.5 cm
दिया गया है:
जल का घनत्व, ρ₁ = 1 g/cm³
स्पिरिट का घनत्व, ρ₂ = 0.8 g/cm³ (प्रश्न 9 से)
पारे का घनत्व, ρₘ = 13.6 g/cm³ (आपेक्षिक घनत्व 136 का अर्थ 13.6 g/cm³)
माना दोनों भुजाओं में पारे के स्तर का अंतर 'h' cm है।
अब, दाब संतुलन के नए बिंदु (एक ही क्षैतिज तल पर) पर:
जल स्तंभ का दाब = स्पिरिट स्तंभ का दाब + पारे के स्तंभ (ऊँचाई h) का दाब
h₁'ρ₁g = h₂'ρ₂g + hρₘg
(25 × 1) = (27.5 × 0.8) + (h × 13.6)
25 = 22 + 13.6h
13.6h = 25 - 22 = 3
h = 3 / 13.6 ≈ 0.221 cm
अतः, दोनों भुजाओं में पारे के स्तरों का अंतर लगभग 0.221 सेंटीमीटर होगा।
प्रश्न 11. क्या बरनौली समीकरण का उपयोग किसी नदी की किसी क्षिप्रिका के जल-प्रवाह का विवरण देने के लिए किया जा सकता है? स्पष्ट कीजिए।
नहीं, बरनौली समीकरण का उपयोग नदी की क्षिप्रिका (तेज बहाव वाले स्थान) के जल-प्रवाह का सटीक विवरण देने के लिए नहीं किया जा सकता।
कारण: बरनौली का प्रमेय केवल धारारेखीय प्रवाह के लिए मान्य है। क्षिप्रिका में जल का प्रवाह अत्यधिक तीव्र, अशांत और घुमावदार होता है, जो धारारेखीय प्रवाह की शर्तों को पूरा नहीं करता। ऐसे अशांत प्रवाह में ऊर्जा का काफी हिस्सा घर्षण के कारण व्यय हो जाता है, जिसे बरनौली समीकरण में सरलता से नहीं रखा जा सकता।
प्रश्न 12. बरनौली समीकरण के अनुप्रयोग यदि निरपेक्ष दाब के स्थान पर प्रमापी द्वाब (गेज दाब) का प्रयोग करें तो क्या इससे कोई अंतर पड़ेगा? स्पष्ट कीजिए।
नहीं, सामान्यतः कोई अंतर नहीं पड़ेगा, बशर्ते कि विचाराधीन दोनों बिंदु एक ही वायुमंडलीय दाब के अधीन हों।
स्पष्टीकरण: बरनौली समीकरण P + ½ρv² + ρgh = नियतांक में दाब (P) निरपेक्ष दाब होता है। गेज दाब, निरपेक्ष दाब एवं वायुमंडलीय दाब का अंतर होता है (P_gauge = P_abs - P_atm)। यदि हम गेज दाब का प्रयोग करते हैं, तो समीकरण के दोनों ओर से वायुमंडलीय दाब (P_atm) का मान घट जाएगा और समीकरण का रूप वही रहेगा। इसलिए, गणना के परिणाम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
प्रश्न 13. किसी 1.5 ० लम्बी 1.0 ८७ त्रिज्या की क्षैतिज नली से ग्लिसरीन का अपरिवर्ती प्रवाह हो रहा है। यदि नली के एक सिरे पर प्रतिं सेकंड एकत्र होने वाली ग्लिसरीन का परिमाण 4.0: 10 2:8/& है, तो नली के दोनों सिरों के बीच दाबान्तर ज्ञात कीजिए। (ग्लिसरीन का घनत्व + 1.39 100 ४४/०“ तथा ग्लिसरीन की श्यानता - 083 ९-४ आप यह भी जाँच करना चाहेंगे कि क्या इस नली में स्तरीय प्रवाह की परिकल्पना सही है?
चरण 1: दिए गए आँकड़े
नली की लंबाई (l) = 1.5 m
नली की त्रिज्या (r) = 1.0 cm = 0.01 m
ग्लिसरीन का द्रव्यमान प्रवाह दर (dm/dt) = 4.0 × 10⁻³ kg/s
ग्लिसरीन का घनत्व (ρ) = 1.3 × 10³ kg/m³
ग्लिसरीन की श्यानता गुणांक (η) = 0.83 Pa s
चरण 2: आयतन प्रवाह दर ज्ञात करना
आयतन प्रवाह दर (V) = (द्रव्यमान प्रवाह दर) / (घनत्व)
V = (4.0 × 10⁻³) / (1.3 × 10³) = (4.0 / 1.3) × 10⁻⁶ ≈ 3.077 × 10⁻⁶ m³/s
चरण 3: प्वाइजुइल के सूत्र से दाबांतर ज्ञात करना
प्वाइजुइल का सूत्र: V = (π P r⁴) / (8 η l)
जहाँ P दाबांतर है।
इसलिए, P = (8 η l V) / (π r⁴)
मान रखने पर:
P = (8 × 0.83 × 1.5 × 3.077 × 10⁻⁶) / (3.14 × (0.01)⁴)
P = (8 × 0.83 × 1.5 × 3.077 × 10⁻⁶) / (3.14 × 10⁻⁸)
P ≈ (30.64 × 10⁻⁶) / (3.14 × 10⁻⁸) ≈ 975.8 Pa
अतः दाबांतर (P) ≈ 976 Pa
चरण 4: प्रवाह की प्रकृति जाँचना (रेनॉल्ड्स संख्या)
रेनॉल्ड्स संख्या (Rₑ) = (ρ v d) / η
जहाँ, v प्रवाह का औसत वेग है, और d नली का व्यास है (d = 2r = 0.02 m)।
औसत वेग (v) = आयतन प्रवाह दर / अनुप्रस्थ क्षेत्रफल = V / (πr²)
v = (3.077 × 10⁻⁶) / (3.14 × (0.01)²) ≈ 0.0098 m/s
अब, Rₑ = (1.3 × 10³ × 0.0098 × 0.02) / 0.83
Rₑ ≈ (0.2548) / 0.83 ≈ 0.307
चूँकि रेनॉल्ड्स संख्या (0.307) क्रांतिक मान (2000) से बहुत कम है।
अतः, नली में ग्लिसरीन का प्रवाह निश्चित रूप से स्तरीय (लैमिनर) है।
प्रश्न 1. किसी तरल का पृष्ठ तनाव क्या है? इसकी विमा लिखिए।
किसी तरल का पृष्ठ तनाव वह गुण है जिसके कारण तरल की मुक्त सतह सिकुड़कर न्यूनतम क्षेत्रफल ग्रहण करने की कोशिश करती है। इसे तरल की सतह पर खींची गई एक काल्पनिक रेखा की प्रति इकाई लम्बाई पर कार्यरत बल के रूप में परिभाषित किया जाता है। इस बल की दिशा सतह के समतल में और रेखा के लम्बवत होती है।
विमा: [ML⁰T⁻²] या जूल/मीटर²
प्रश्न 2. पृष्ठ तनाव का मात्रक एवं विमीय सूत्र लिखें।
मात्रक: अंतर्राष्ट्रीय पद्धति (SI) में पृष्ठ तनाव का मात्रक न्यूटन प्रति मीटर (N/m) है।
विमीय सूत्र: पृष्ठ तनाव = बल/लम्बाई। बल का विमीय सूत्र [MLT⁻²] और लम्बाई का [L] है। अतः पृष्ठ तनाव का विमीय सूत्र [MLT⁻²]/[L] = [ML⁰T⁻²] होता है।
प्रश्न 3. पृष्ठ तनाव पर ताप का क्या प्रभाव पड़ता है?
पृष्ठ तनाव ताप पर निर्भर करता है। सामान्यतः ताप बढ़ने पर पृष्ठ तनाव का मान घटता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ताप बढ़ने पर अणुओं की गतिज ऊर्जा बढ़ जाती है, जिससे अंदर के अणुओं और सतह पर स्थित अणुओं के बीच आकर्षण बल कमजोर पड़ जाता है। एक निश्चित ताप (क्रांतिक ताप) पर पृष्ठ तनाव शून्य हो जाता है।
प्रश्न 4. पृष्ठ तनाव का C.G.S. मात्रक क्या है?
पृष्ठ तनाव का C.G.S. मात्रक डाइन प्रति सेंटीमीटर (dyne/cm) है।
प्रश्न 5. पृष्ठ तनाव का मात्रक लिखें।
पृष्ठ तनाव के दो प्रमुख मात्रक हैं:
1. एस.आई. (SI) मात्रक: न्यूटन प्रति मीटर (N/m)
2. सी.जी.एस. (CGS) मात्रक: डाइन प्रति सेंटीमीटर (dyne/cm)
इनके अलावा, इसे जूल प्रति वर्ग मीटर (J/m²) के रूप में भी व्यक्त किया जा सकता है।
प्रश्न 6. पृष्ठ तनाव की परिभाषा लिखें।
पृष्ठ तनाव तरल पदार्थों का वह विशेष गुण है जिसके कारण उनकी मुक्त सतह एक प्रत्यास्थ झिल्ली की तरह व्यवहार करती है और न्यूनतम क्षेत्रफल प्राप्त करने के लिए सिकुड़ने का प्रयास करती है। इसे संख्यात्मक रूप से तरल की सतह पर खींची गई काल्पनिक रेखा की प्रति इकाई लम्बाई पर लगने वाले स्पर्शरेखीय बल के रूप में मापा जाता है।
प्रश्न 7. पृष्ठ तनाव का विमीय सूत्र लिखें।
पृष्ठ तनाव (γ) = बल (F) / लम्बाई (L)
बल का विमीय सूत्र = [M L T⁻²]
लम्बाई का विमीय सूत्र = [L]
अतः, पृष्ठ तनाव का विमीय सूत्र = [M L T⁻²] / [L] = [M L⁰ T⁻²]
प्रश्न 8. पृष्ठ तनाव का S.I. मात्रक लिखें।
पृष्ठ तनाव का अंतर्राष्ट्रीय मात्रक (S.I. मात्रक) न्यूटन प्रति मीटर (N/m) है।
प्रश्न 9. पृष्ठ तनाव का मात्रक एवं विमीय सूत्र लिखें।
मात्रक:
• एस.आई. (SI) पद्धति: न्यूटन/मीटर (N/m)
• सी.जी.एस. (CGS) पद्धति: डाइन/सेंटीमीटर (dyne/cm)
विमीय सूत्र: [M L⁰ T⁻²] या [M T⁻²]
प्रश्न 10. पृष्ठ तनाव का CGS मात्रक लिखें।
पृष्ठ तनाव का CGS पद्धति में मात्रक डाइन प्रति सेंटीमीटर (dyne/cm) है।
प्रश्न 11. पृष्ठ तनाव का SI मात्रक लिखें।
पृष्ठ तनाव का SI मात्रक न्यूटन प्रति मीटर (N/m) है।
प्रश्न 12. पृष्ठ तनाव का विमीय सूत्र लिखें।
पृष्ठ तनाव (γ) को बल प्रति इकाई लम्बाई के रूप में परिभाषित किया जाता है।
विमीय विश्लेषण:
बल (F) का विमीय सूत्र = [M L T⁻²]
लम्बाई (L) का विमीय सूत्र = [L]
∴ γ = F/L = [M L T⁻²] / [L] = [M L⁰ T⁻²]
प्रश्न 13. पृष्ठ तनाव का मात्रक लिखें।
पृष्ठ तनाव के विभिन्न पद्धतियों में मात्रक निम्नलिखित हैं:
• SI मात्रक: न्यूटन/मीटर (N/m)
• CGS मात्रक: डाइन/सेंटीमीटर (dyne/cm)
• इसे ऊर्जा प्रति इकाई क्षेत्रफल के रूप में भी व्यक्त किया जा सकता है, जिसका मात्रक जूल/मीटर² (J/m²) होता है।
प्रश्न 23. दो पात्रों के आधारों के क्षेत्रफल समान हैं परंतु आकृतियाँ भिन्न-भिन्न हैं। पहले पात्र में दूसरे पात्र की अपेक्षा किसी ऊँचाई तक भरने पर दोगुना जल आता है। क्या दोनों प्रकरणों में पात्रों के आधारों पर आरोपित बल समान हैं। यदि ऐसा है तो भार मापने की मशीन पर रखे एक ही ऊँचाई तक जल से भरे दोनों पात्रों के पाद्यांक भिन्न-भिन्न क्यों होते हैं?
हल: द्रव द्वारा आधार पर लगने वाला दाब केवल द्रव स्तम्भ की ऊँचाई पर निर्भर करता है, पात्र के आकार या कुल द्रव की मात्रा पर नहीं। चूँकि दोनों पात्रों में जल की ऊँचाई समान है, इसलिए दोनों के आधार पर दाब समान होगा। आधार का क्षेत्रफल भी समान है, अतः दाब × क्षेत्रफल से प्राप्त आधार पर लगने वाला कुल बल भी दोनों पात्रों में समान होगा।
हालाँकि, भार मशीन का पाठ्यांक पूरे पात्र के कुल भार को मापता है, जिसमें आधार पर लगने वाला बल और पात्र की झुकी हुई दीवारों पर द्रव द्वारा लगाए गए बलों का ऊर्ध्वाधर घटक भी शामिल होता है। पहले पात्र (जिसमें अधिक जल है) की दीवारें अधिक झुकी होंगी, जिससे द्रव द्वारा दीवारों पर लगने वाले बल का ऊपर की ओर ऊर्ध्वाधर घटक कम होगा। न्यूटन के तीसरे नियम के अनुसार, दीवार भी द्रव पर उतना ही बल नीचे की ओर लगाएगी। इस प्रकार, अधिक झुकी दीवारों वाले पात्र में द्रव का दीवारों पर अधिक नीचे की ओर बल लगेगा, जिससे भार मशीन का कुल पाठ्यांक अधिक होगा। यही कारण है कि समान ऊँचाई के जल के बावजूद दोनों पात्रों के भार पाठ्यांक भिन्न-भिन्न होते हैं।
प्रश्न 24. रुधिर-आधान के समय किसी शिरा में, जहाँ दाब 2000 7०५ है, एक सुईं धँसाई जाती है। रुधिर के पात्र को किस ऊँचाई पर रखा जाना चाहिए ताकि शिरा में रक्त ठीक-ठीक प्रवेश कर सके। (सम्पूर्ण रुधिर का घनत्व सारणी 10.1 में दिया गया है।) STP Ot कुल तरल के घनत्व z= Lipo). पानी 1.00x 108 समुद्री पानी 1.03 x 108 मरकरी 1.36 x 108 ईथाइल एल्कोहॉल | 0.806 x 10° रक्त 1.06 x 10° हवा 1.29 ऑक्सीजन 1.43 हाइड्रोजन 9.0 x 1072 आन्तरिक दूरी = 107
हल: दिया है:
शिरा में गेज दाब, P = 2000 Pa (यह दाब रक्त को शिरा में प्रवेश करने से रोकता है)
रक्त का घनत्व, ρ = 1.06 × 10³ kg/m³
गुरुत्वीय त्वरण, g = 9.8 m/s²
रक्त के पात्र को इतनी ऊँचाई पर रखना होगा कि रक्त स्तम्भ के दाब से उत्पन्न गेज दाब, शिरा के अंदर के गेज दाब (2000 Pa) के बराबर हो जाए।
द्रव स्तम्भ दाब सूत्र से: P = hρg
∴ आवश्यक ऊँचाई, h = P / (ρg)
h = 2000 / (1.06 × 10³ × 9.8)
h = 2000 / (10388)
h ≈ 0.1925 m या लगभग 19.25 cm
अतः रक्त के पात्र को शिरा के स्तर से लगभग 0.192 m (19.25 cm) ऊपर रखना चाहिए ताकि रक्त शिरा में ठीक से प्रवेश कर सके।
प्रश्न 25. बरनौली समीकरण व्युत्पन्न करने में हमने नली में भरे तरल पर किए गए कार्य को तरल की गतिज तथा स्थितिज ऊर्जाओं में परिवर्तन के बराबर माना था। (७) यदि क्षयकारी बल उपस्थित है, तब नली के अनुदिश तरल में गति करने पर दाब में परिवर्तन किस प्रकार होता है? (0) क्या तरल का वेग बढ़ने पर क्षयकारी बल अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं? गुणात्मक रूप में चर्चा कीजिए।
हल:
(a) बरनौली समीकरण ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत पर आधारित है और यह मानता है कि तरल असंपीड्य तथा अश्यान (गैर-श्यान) है। यदि क्षयकारी बल (जैसे श्यानता बल या घर्षण बल) उपस्थित हैं, तो तरल की यांत्रिक ऊर्जा (दाब ऊर्जा, गतिज ऊर्जा तथा स्थितिज ऊर्जा) का कुछ भाग ऊष्मा या अन्य रूपों में क्षय हो जाता है। इस स्थिति में, नली के अनुदिश बहते हुए तरल में दाब में कमी, आदर्श बरनौली स्थिति की तुलना में अधिक होती है। दाब प्रवणता का एक हिस्सा श्यान बलों के विरुद्ध कार्य करने में खर्च हो जाता है।
(b) हाँ, तरल का वेग बढ़ने पर क्षयकारी बल अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं। श्यान बल तरल की परतों के बीच सापेक्ष वेग (वेग प्रवणता) पर निर्भर करते हैं। वेग बढ़ने पर यह वेग प्रवणता बढ़ती है, जिससे श्यान बल में वृद्धि होती है। परिणामस्वरूप, ऊर्जा क्षय की दर (जो श्यान बल और वेग के गुणनफल के समानुपाती होती है) वेग में वृद्धि के साथ तेजी से बढ़ती है। इसीलिए उच्च वेग पर, श्यानता के प्रभाव को नगण्य नहीं माना जा सकता और बरनौली समीकरण में संशोधन की आवश्यकता होती है।
प्रश्न 26. (a) रक्त की किसी धमनी में रुधिर का प्रवाह पटलीय प्रवाह ही बनाए रखना है तो 2» 10“ त्रिज्या की किसी धमनी में रुधिर की अधिकतम चाल क्या होनी चाहिए? (0) तदनुरूपी प्रवाह-दर क्या है? (रुचिर की श्यानता 2.084 ५ 10% 7-४ लीजिए।)
हल: दिया है:
धमनी की त्रिज्या, r = 2 × 10⁻³ m
∴ व्यास, D = 2r = 4 × 10⁻³ m
रक्त का घनत्व, ρ = 1.06 × 10³ kg/m³
रक्त की श्यानता, η = 2.084 × 10⁻³ Pa-s
पटलीय प्रवाह के लिए रेनॉल्ड्स संख्या का क्रांतिक मान, NR = 2000
(a) पटलीय प्रवाह बनाए रखने के लिए अधिकतम चाल (क्रांतिक चाल) vc रेनॉल्ड्स संख्या सूत्र से ज्ञात करते हैं:
NR = ρ vc D / η
⇒ vc = (NR × η) / (ρ × D)
vc = (2000 × 2.084 × 10⁻³) / (1.06 × 10³ × 4 × 10⁻³)
vc = (4.168) / (4.24)
vc ≈ 0.983 m/s
अतः रक्त की अधिकतम चाल लगभग 0.98 m/s होनी चाहिए।
(b) संगत प्रवाह दर (आयतन प्रवाह दर) Q = अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल × चाल
A = πr² = 3.14 × (2 × 10⁻³)² = 3.14 × 4 × 10⁻⁶ = 1.256 × 10⁻⁵ m²
∴ Q = A × vc = (1.256 × 10⁻⁵) × 0.983
Q ≈ 1.235 × 10⁻⁵ m³/s
अतः प्रवाह दर लगभग 1.24 × 10⁻⁵ m³/s है।
प्रश्न 27. कोई वायुयान किसी निश्चित ऊँचाई पर किसी नियत चाल से आकाश में उड़ रहा है तथा इसके दोनों पंखों में प्रत्येक का क्षेत्रफल 25 7४2 है। यदि वायु की चाल पंख के निचले पृष्ठ पर 180 ४४)/४७ तथा ऊपरी पृष्ठ पर 234 5४710 है, तो वायुयान की संहति ज्ञात कीजिए। (वायु Tl GACT 1 kg/m? लीजिए)।
हल: दिया है:
प्रत्येक पंख का क्षेत्रफल = 25 m²
∴ दोनों पंखों का कुल क्षेत्रफल, A = 2 × 25 = 50 m²
वायु का घनत्व, ρ = 1 kg/m³
पंख के ऊपरी पृष्ठ पर वायु की चाल, v₁ = 234 km/h = 234 × (5/18) = 65 m/s
पंख के निचले पृष्ठ पर वायु की चाल, v₂ = 180 km/h = 180 × (5/18) = 50 m/s
बरनौली समीकरण के अनुसार, पंख के ऊपर और नीचे के दाब में अंतर:
P₂ - P₁ = (1/2)ρ (v₁² - v₂²)
P₂ - P₁ = (1/2) × 1 × (65² - 50²)
P₂ - P₁ = (1/2) × (4225 - 2500)
P₂ - P₁ = (1/2) × 1725 = 862.5 Pa
यह दाब अंतर पंखों पर एक उत्थापन बल (उत्प्लावन बल) उत्पन्न करता है:
उत्थापन बल, F = (P₂ - P₁) × A = 862.5 × 50 = 43125 N
चूँकि वायुयान एक नियत ऊँचाई पर उड़ रहा है, यह उत्थापन बल वायुयान के भार को संतुलित करता है।
अतः, mg = F
वायुयान का द्रव्यमान, m = F / g = 43125 / 9.8
m ≈ 4400.5 kg
अतः वायुयान की संहति लगभग 4400 kg है।
प्रश्न 28. मिलिकन तेल बूँद प्रयोग में, 2.0 10° m Free TeM 1.2 x 1023 kg/m? BAA की किसी बूँद की सीमान्त चाल कया है? प्रयोग के ताप पर वायु की श्यानता 1.8८ 107 78-8 लीजिए। इस चाल पर बूँद पर श्यान बल कितना है? (वायु के कारण बूँद पर उत्प्लावन बल की उपेक्षा कीजिए)।
हल: दिया है:
बूँद की त्रिज्या, r = 2.0 × 10⁻⁶ m
तेल का घनत्व, ρ = 1.2 × 10³ kg/m³
वायु की श्यानता, η = 1.8 × 10⁻⁵ Pa-s
गुरुत्वीय त्वरण, g = 9.8 m/s²
जब बूँद सीमान्त (टर्मिनल) वेग प्राप्त कर लेती है, तो उस पर लगने वाला श्यान बल उसके भार के बराबर हो जाता है (उत्प्लावन बल उपेक्षणीय है)।
स्टोक्स के नियमानुसार, श्यान बल F = 6πηrv
भार, W = (4/3)πr³ρg
सीमान्त वेग v के लिए: 6πηrv = (4/3)πr³ρg
इससे सीमान्त वेग का सूत्र प्राप्त होता है: v = (2r²ρg) / (9η)
मान रखने पर:
v = [2 × (2.0 × 10⁻⁶)² × 1.2 × 10³ × 9.8] / [9 × 1.8 × 10⁻⁵]
v = [2 × 4.0 × 10⁻¹² × 1.2 × 10³ × 9.8] / [1.62 × 10⁻⁴]
v = [2 × 4.0 × 1.2 × 9.8 × 10⁻⁹] / [1.62 × 10⁻⁴] (10⁻¹² × 10³ = 10⁻⁹)
v = [94.08 × 10⁻⁹] / [1.62 × 10⁻⁴]
v = 58.07 × 10⁻⁵ ≈ 5.8 × 10⁻⁴ m/s
अतः सीमान्त चाल लगभग 5.8 × 10⁻⁴ m/s है।
इस चाल पर श्यान बल, F = 6πηrv
F = 6 × 3.14 × 1.8 × 10⁻⁵ × 2.0 × 10⁻⁶ × 5.8 × 10⁻⁴
F ≈ 6 × 3.14 × 1.8 × 2.0 × 5.8 × 10⁻¹⁵
F ≈ 393 × 10⁻¹⁵ N = 3.93 × 10⁻¹³ N
(ध्यान दें: यह बल बूँद के भार के बराबर ही होगा।)
प्रश्न 29. सोडा काँच के साथ पारे का स्पर्श कोण 140" है। यदि पारे से भरी द्रोणिका में 1.00 190 त्रिज्या की काँच की किसी नली का एक सिरा डुबोया जाता है, तो पारे के बाहरी पृष्ठ के स्तर की तुलना में नली के भीतर पारे का स्तर कितना नीचे चला जाता है? (पारे का TACT = 136 x 10° kg/m?)
हल: दिया है:
स्पर्श कोण, θ = 140°
नली की त्रिज्या, r = 1.00 mm = 1.00 × 10⁻³ m
पारे का पृष्ठ तनाव, S = 0.465 N/m (सामान्य मान)
पारे का घनत्व, ρ = 13.6 × 10³ kg/m³
g = 9.8 m/s²
किसी केशिका नली में द्रव के अवनमन या उन्नयन का सूत्र: h = (2S cosθ) / (rρg)
चूँकि पारे के लिए स्पर्श कोण 140° है (जो 90° से अधिक है), cosθ ऋणात्मक होगा और h भी ऋणात्मक आएगा, जो द्रव के अवनमन को दर्शाता है।
h = [2 × 0.465 × cos(140°)] / [1.00 × 10⁻³ × 13.6 × 10³ × 9.8]
cos(140°) = cos(180° - 40°) = -cos(40°) ≈ -0.7660
∴ h = [2 × 0.465 × (-0.7660)] / [1.00 × 10⁻³ × 13.6 × 10³ × 9.8]
h = [-0.712] / [0.13328] (हर का मान: 10⁻³ × 10³ = 1, 13.6 × 9.8 = 133.28)
h ≈ -0.712 / 0.13328 ≈ -5.34 × 10⁻³ m
h ≈ -5.34 mm
ऋणात्मक चिह्न दर्शाता है कि नली के अंदर पारे का स्तर बाहरी स्तर से नीचे है।
अतः अवनमन लगभग 5.34 mm है।
प्रश्न 30. 3.0 ऋए तथा-6.0 ऋ४ व्यास की दो संकीर्ण नलियों-को एक-साथ जोड़कर दोनों सिरों से खुली एक ए:आकार की नली बनाई जाती है। यदि इस नली में जल भरा है, तो इस नली की दोनों भुजाओं में भरे जल के स्तरों में क्या अंतर है? प्रयोग के ताप पर जल का पृष्ठ तनाव 7.3.x 10 1५/क है। स्पर्श कोण शून्य लीजिए तथा जल का घनत्व 10 ५८ 10% 5४/ण२ लीजिए। (g = 98m/s”)
हल: दिया है:
जल का पृष्ठ तनाव, S = 7.3 × 10⁻² N/m
जल का घनत्व, ρ = 1.0 × 10³ kg/m³
g = 9.8 m/s²
स्पर्श कोण, θ = 0° ∴ cosθ = 1
पहली नली का व्यास = 3.0 mm ∴ त्रिज्या r₁ = 1.5 mm = 1.5 × 10⁻³ m
दूसरी नली का व्यास = 6.0 mm ∴ त्रिज्या r₂ = 3.0 mm = 3.0 × 10⁻³ m
केशिका उन्नयन सूत्र h = (2S cosθ)/(rρg) के अनुसार, त्रिज्या कम होने पर उन्नयन अधिक होता है।
पहली नली (संकरी) में जल स्तंभ की ऊँचाई: h₁ = (2S cosθ)/(r₁ρg)
दूसरी नली (चौड़ी) में जल स्तंभ की ऊँचाई: h₂ = (2S cosθ)/(r₂ρg)
दोनों भुजाओं में जल स्तरों का अंतर, Δh = h₁ - h₂ = (2S cosθ)/(ρg) × [1/r₁ - 1/r₂]
मान रखने पर:
Δh = [2 × 7.3 × 10⁻² × 1] / [1.0 × 10³ × 9.8] × [1/(1.5 × 10⁻³) - 1/(3.0 × 10⁻³)]
Δh = [0.146] / [9800] × [ (1/0.0015) - (1/0.003) ]
Δh = [1.4898 × 10⁻⁵] × [666.67 - 333.33]
Δh = 1.4898 × 10⁻⁵ × 333.34
Δh ≈ 4.966 × 10⁻³ m ≈ 4.97 × 10⁻³ m
अतः दोनों भुजाओं के जल स्तरों का अंतर लगभग 4.97 mm है। संकरी नली में जल का स्तर चौड़ी नली की तुलना में लगभग 5 mm ऊपर होगा।
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