Bihar Board Class 12th Hindi (हिन्दी) Chapter 9 प्रगीत और समाज) Solutions
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प्रगीत और समाज
प्रगीत और समाज वस्तुनिष्ठ प्रश्न निम्नलिखित प्रश्नों के बहुवैकल्पिक उत्तरों में से सही उत्तर बताएँ
प्रश्न 1.
प्रगीत और समाज के लेखक हैं (क) बालकृष्ण भट्ट
(ख) जयप्रकाश नारायण
(ग) नामवर सिंह
(घ) उदय प्रकाश
उत्तर: (ग) नामवर सिंह। प्रगीत और समाज नामक निबंध के लेखक प्रसिद्ध आलोचक एवं साहित्यकार नामवर सिंह हैं।
प्रश्न 2.
नामवर सिंह किस पत्रिका के संपादक थे? (क) आलोचना
(ख) समन्वय
(ग) गंगा
(घ) माधुरी
उत्तर: (क) आलोचना। नामवर सिंह ने हिंदी की प्रतिष्ठित आलोचनात्मक पत्रिका 'आलोचना' का संपादन किया था।
प्रश्न 3.
'सूर सागर' क्या है? (क) प्रबंध काव्य (ख) गीति काव्य (ग) चंपू काव्य (घ) खंड काव्य
उत्तर: (ख) गीति काव्य। सूरदास द्वारा रचित 'सूर सागर' एक विशाल गीति काव्य है, जिसमें भगवान कृष्ण की लीलाओं का वर्णन है।
प्रश्न 4.
कामायनी किनकी महाकृति है? (क) बच्चन
(ख) श्यामनारायण पाण्डेय (ग) नागार्जुन
(घ) जयशंकर प्रसाद
उत्तर: (घ) जयशंकर प्रसाद। 'कामायनी' छायावाद युग के प्रमुख कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित एक प्रसिद्ध महाकाव्य है।
प्रश्न 5.
नामवर सिंह द्वारा लिखित 'प्रगीत और समाज' क्या है? (क) आलोचना
(ख) निबंध
(ग) एकांकी
(घ) आत्मकथा
उत्तर: (ख) निबंध। 'प्रगीत और समाज' नामवर सिंह का एक महत्वपूर्ण आलोचनात्मक निबंध है, जो हिंदी कविता में प्रगीत की भूमिका पर चर्चा करता है।
प्रश्न 6.
“राम की शक्तिपूजा” किनका आख्यानक काव्य है? (क) मोहनलाल महतो 'वियोगी'
(ख) दिनकर
(ग) बच्चन
(घ) निराला
उत्तर: (घ) निराला। "राम की शक्तिपूजा" छायावादी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित एक प्रसिद्ध आख्यानक (कथा प्रधान) काव्य है।
रिक्त स्थानों की पूर्ति करें
प्रश्न 1.
नामवर सिंह का जन्म स्थान ......... वाराणसी, उत्तर प्रदेश है।
उत्तर: जीयनपुर। नामवर सिंह का जन्म वाराणसी (उत्तर प्रदेश) के निकट जीयनपुर नामक गाँव में हुआ था।
प्रश्न 2.
नामवर सिंह काशी वि. वि. में अस्थायी ......... थे।
उत्तर: व्याख्याता। नामवर सिंह ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बी.एच.यू.) में हिंदी के अस्थायी व्याख्याता के रूप में कार्य किया था।
प्रश्न 3.
नामवर सिंह का जन्म स्थान 28 जुलाई ......... हुआ था।
उत्तर: 1927 ई. को। प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह का जन्म 28 जुलाई, सन् 1927 को हुआ था।
प्रश्न 4.
नामवर सिंह को 'कविता के नए प्रतिमान' कृति पर साहित्य ......... पुरस्कार मिला था।
उत्तर: अकादमी। नामवर सिंह को उनकी प्रसिद्ध आलोचनात्मक कृति 'कविता के नए प्रतिमान' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
प्रश्न 5.
नामवर सिंह के पिता जी एक ........... थे।
उत्तर: शिक्षक। नामवर सिंह के पिता श्री चंद्रभली सिंह एक शिक्षक थे।
प्रश्न 6.
नामवर सिंह की माता जी ............. हैं।
उत्तर: वानेशरी देवी। नामवर सिंह की माता का नाम वानेशरी देवी था।
प्रगीत और समाज अति लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
'शेर सिंह का शस्त्र-समर्पण' किनका आख्यानक काव्य है?
उत्तर: जयशंकर प्रसाद। 'शेर सिंह का शस्त्र-समर्पण' छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित एक आख्यानक (कथा प्रधान) काव्य है।
प्रश्न 2.
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के काव्य सिद्धान्त के आदर्श क्या थे?
उत्तर: प्रबंध काव्य। आचार्य रामचंद्र शुक्ल काव्य के क्षेत्र में प्रबंध काव्य (महाकाव्य या खंडकाव्य) को सर्वोच्च आदर्श मानते थे, क्योंकि इसमें जीवन का समग्र चित्रण होता है।
प्रश्न 3.
किस काव्य में मानव जीवन का एक पूर्ण दृश्य होता है?
उत्तर: प्रबंध काव्य। प्रबंध काव्य (जैसे महाकाव्य) में घटनाओं का स्वाभाविक क्रम, चरित्र-चित्रण और जीवन के विविध पक्षों का विस्तृत वर्णन होने के कारण मानव जीवन का एक पूर्ण दृश्य उपस्थित होता है।
प्रश्न 4.
हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योगदान किनकी कृति है?
उत्तर: डॉ. त्रिभुवन सिंह। 'हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योगदान' डॉ. त्रिभुवन सिंह द्वारा लिखित एक शोधपूर्ण एवं महत्वपूर्ण कृति है।
प्रश्न 5.
नामवर सिंह का जन्म कब हुआ था?
उत्तर: 28 जुलाई, 1927 ई. को। नामवर सिंह का जन्म 28 जुलाई, सन् 1927 को वाराणसी (उत्तर प्रदेश) के जीयनपुर गाँव में हुआ था।
प्रगीत और समाज पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर
प्रश्न 1.
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के काव्य-आदर्श क्या थे, पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।
उत्तर: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के काव्य-सिद्धान्त का मुख्य आदर्श प्रबंध काव्य था। उनका मानना था कि प्रबंध काव्य (जैसे महाकाव्य) में ही मानव जीवन का पूर्ण और सुसंगत चित्रण संभव है। इसमें घटनाओं की एक क्रमबद्ध श्रृंखला, स्वाभाविक विकास और हृदय को छू लेने वाले प्रसंग होते हैं। प्रबंध काव्य का उद्देश्य केवल कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्रेम, जातीय भावना, धर्म और आदर्श जीवन की प्रेरणा देना भी होता है। चूंकि इसकी कथा यथार्थ जीवन पर आधारित होती है, इसलिए इसमें काल्पनिक चमत्कार के बजाय जीवन के विविध पक्षों का स्वाभाविक चित्रण मिलता है। शुक्ल जी को 'सूरसागर' इसलिए सीमित लगा क्योंकि वह मुख्यतः गीति काव्य है। उन्हें आधुनिक कविता से यह शिकायत थी कि 'कला कला के लिए' के सिद्धांत के चलते छोटे प्रगीतों (लिरिक्स) का ही बोलबाला हो गया और जीवन के विस्तृत प्रसंगों वाले आख्यानक काव्यों की उपेक्षा होने लगी। इसीलिए जब प्रसाद की 'कामायनी' या निराला की 'राम की शक्तिपूजा' जैसे आख्यानक काव्य सामने आए, तो शुक्ल जी ने संतोष व्यक्त किया।
प्रश्न 2.
'कला-कला के लिए' सिद्धान्त क्या है?
उत्तर: 'कला कला के लिए' एक साहित्यिक एवं कलात्मक सिद्धांत है, जिसके अनुसार कला का एकमात्र उद्देश्य सौंदर्य की सृष्टि करना और रसानुभूति कराना है। इस सिद्धांत के समर्थकों का मानना है कि कला पर किसी बाहरी उद्देश्य (जैसे समाज सुधार, नैतिक शिक्षा या राजनीतिक प्रचार) का बोझ नहीं होना चाहिए। इसी विचारधारा के प्रभाव में यूरोप में प्रगीतों (लिरिक्स) और मुक्तक कविताओं का प्रचलन बढ़ा। हिंदी में भी यह तर्क दिया जाने लगा कि आधुनिक व्यस्त जीवन में लंबी, कथा प्रधान कविताओं को पढ़ने की किसी के पास फुरसत नहीं है। ऐसी कविताएँ जिनमें कथातत्व (इतिवृत्त) भी शामिल हो, उबाऊ लगती हैं। इसलिए शुद्ध काव्यानुभूति और भाव-सौंदर्य देने वाले संक्षिप्त प्रगीत ही उचित हैं।
प्रश्न 3.
प्रगीत को आप किस रूप में परिभाषित करेंगे? इसके बारे में क्या धारणा प्रचलित रही है?
उत्तर: प्रगीत (लिरिक) काव्य की वह कोटि है जो अत्यंत वैयक्तिक और आत्मपरक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति करती है। हिंदी में गीत और मुक्तक के मिश्रित रूप को प्रगीत कहा जाता है।
इसके बारे में प्रचलित सामान्य धारणा यह रही है कि प्रगीतधर्मी कविताएँ केवल कवि की निजी भावनाओं, प्रेम, विरह, दुःख, आनंद आदि की अभिव्यक्ति मात्र हैं। इनसे सामाजिक यथार्थ के चित्रण या व्यापक सामाजिक संदर्भों की अपेक्षा नहीं की जाती थी। माना जाता था कि ये कविताएँ समाज से कटी हुई और केवल भावुकता पर केंद्रित होती हैं। इसके विपरीत, लंबी कथात्मक या नाटकीय कविताओं को ही समाज का यथार्थ दिखाने वाला माना जाता था। पाठ में बताया गया है कि आधुनिक समय में यह धारणा बदल रही है और प्रगीत के माध्यम से भी गहन सामाजिक यथार्थ को अभिव्यक्त किया जा सकता है।
प्रश्न 4.
वस्तुपरक नाट्यधर्मी कविताओं से क्या तात्पर्य है? आत्मपरक प्रगीत और नाट्यधर्मी कविताओं की यथार्थ-व्यंजना में क्या अन्तर है?
उत्तर: वस्तुपरक नाट्यधर्मी कविताएँ वे हैं जिनमें बाहरी दुनिया, समाज, घटनाओं और चरित्रों का एक नाटकीय ढंग से वस्तुनिष्ठ चित्रण होता है। इनमें जीवन का समग्र और बहुआयामी दृश्य उपस्थित किया जाता है।
यथार्थ-व्यंजना में अंतर:
1. आत्मपरक प्रगीत यथार्थ को कवि की आंतरिक भावनाओं, संवेदनाओं और व्यक्तिगत अनुभव के फ़िल्टर से देखकर अभिव्यक्त करता है। यहाँ यथार्थ का सीधा चित्रण न होकर, उससे उपजी भावनात्मक प्रतिक्रिया का चित्रण होता है। जैसे, प्रेम का दुःख या प्रकृति का सौंदर्यबोध।
2. नाट्यधर्मी कविताएँ यथार्थ को एक दृश्य, कथानक या संवाद के माध्यम से सीधे प्रस्तुत करने का प्रयास करती हैं। इनमें बाहरी घटनाओं, संघर्षों और सामाजिक परिस्थितियों का एक वस्तुनिष्ठ नाटकीय ढाँचे में चित्रण होता है।
पाठ में गजानन माधव मुक्तिबोध की कविताओं का उदाहरण दिया गया है, जो इस भेद को स्पष्ट करता है। मुक्तिबोध की लंबी कविताएँ वस्तुपरक और नाटकीय ढाँचे में लिखी गई हैं, लेकिन उनका केंद्रीय स्वर आत्मसंघर्ष और आंतरिक भावों की गतिमयता है। इस प्रकार, उनकी कविताएँ दिखने में नाट्यधर्मी हैं, परंतु उनकी मूल भूमि प्रगीतधर्मी ही बनी रहती है। अर्थात, नाटकीयता केवल एक बाहरी ढाँचा है, जिसके भीतर आत्मपरक यथार्थ की अभिव्यक्ति हो रही है।
प्रगीत और समाज
प्रश्न 5. हिन्दी कविता के इतिहास में प्रगीतों का क्या स्थान है सोदाहरण स्पष्ट करें।
उत्तर-
हिंदी कविता के इतिहास में प्रगीतों का स्थान बहुत महत्वपूर्ण और विशिष्ट रहा है। प्रगीत को अक्सर व्यक्तिगत भावनाओं और आत्मपरक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति माना जाता है, लेकिन इसकी भूमिका इससे कहीं अधिक व्यापक है। छायावादी युग में भी, जहाँ प्रगीत की धारणा प्रबल थी, कवियों ने इसे केवल व्यक्तिगत सीमा तक सीमित नहीं रखा। उदाहरण के लिए, जयशंकर प्रसाद की 'शेरसिंह का शस्त्रसमर्पण', 'पेथोला की प्रतिध्वनि' और 'कामायनी' जैसी रचनाएँ, तथा सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की 'राम की शक्तिपूजा' और 'तुलसीदास' जैसी कविताएँ प्रगीत के रूप में होते हुए भी सामाजिक-ऐतिहासिक आख्यान को समेटे हुए हैं।
आगे चलकर नई कविता के दौर में मुक्तिबोध, नागार्जुन और शमशेर बहादुर सिंह जैसे कवियों ने प्रगीत को एक नया आयाम दिया। मुक्तिबोध के प्रगीत, जैसे 'ब्रह्मराक्षस', आत्मसंघर्ष से उपजे हैं, लेकिन उनमें गहरी सामाजिक चेतना और यथार्थबोध भी निहित है। इसी तरह, त्रिलोचन ने सॉनेट और गीतों के माध्यम से प्रकृति और जीवन के सूक्ष्म चित्र प्रस्तुत किए, जो प्रगीत की सीमा में रहते हुए भी विशाल जनजीवन का बिंब प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार, प्रगीत हिंदी कविता का वह सशक्त माध्यम रहा है जिसने व्यक्ति के अंतर्मन के साथ-साथ समूचे समाज के यथार्थ को भी अभिव्यक्त किया है और काव्य-इतिहास में अपना एक स्वतंत्र एवं गौरवशाली स्थान बनाया है।
प्रश्न 6. आधुनिक प्रगीत-काव्य किन अर्थों में भक्ति काव्य से भिन्न एवं गुप्तजी के आदि के प्रबंध काव्य से विशिष्ट है? क्या आप आलोचक से सहमत हैं? अपने विचार
उत्तर-
आधुनिक प्रगीत काव्य भक्ति काव्य और मैथिलीशरण गुप्त जैसे कवियों के प्रबंध काव्य से कई मायनों में भिन्न और विशिष्ट है:
- भक्ति काव्य से भिन्नता: भक्ति काव्य की मूल भावभूमि ईश्वर के प्रति आत्मसमर्पण, भक्ति और आध्यात्मिक तल्लीनता है। वहाँ व्यक्ति का 'आत्म' परमात्मा में लीन हो जाता है। जबकि आधुनिक प्रगीत का केंद्र 'व्यक्ति' स्वयं है। इसमें एक नया व्यक्तिवाद है, जहाँ व्यक्ति समाज से अलगाव या संघर्ष के बीच भी अपनी पहचान तलाशता है। इनमें भक्ति काव्य जैसी तन्मयता नहीं, बल्कि आत्ममंथन और आत्मविडंबना अधिक है।
- प्रबंध काव्य से विशिष्टता: मैथिलीशरण गुप्त के प्रबंध काव्य (जैसे 'साकेत', 'यशोधरा') सीधे-सीधे राष्ट्रीय, नैतिक और ऐतिहासिक विषयों का वृहद् वर्णन करते हैं। उनमें कथात्मकता और वर्णन प्रधान है। दूसरी ओर, आधुनिक प्रगीत (जैसे मुक्तिबोध की 'ब्रह्मराक्षस' या निराला की 'राम की शक्तिपूजा') भले ही लंबी कविताएँ हों, लेकिन वे 'मितकथन' यानी संक्षिप्तता और प्रतीकात्मकता के साथ गहन अर्थ प्रस्तुत करती हैं। उनमें नाटकीयता और आत्मसंघर्ष प्रमुख है, जबकि गुप्त के प्रबंध में सामाजिक संघर्ष सीधे प्रस्तुत होता है।
प्रश्न 7. “कविता जो कुछ कह रही है उसे सिर्फ वही समझ सकता है जो इसके एकाकीपन में मानवता की आवाज सुन सकता है।” इस कथन का आशय स्पष्ट करें। सांथ ही किसी उपयुक्त उदाहरण से अपने उत्तर की पुष्टि करें।
उत्तर-
इस कथन का आशय यह है कि सच्ची प्रगीतात्मक कविता सतही तौर पर व्यक्ति के एकाकीपन, निराशा या वैयक्तिक पीड़ा की अभिव्यक्ति प्रतीत हो सकती है। लेकिन उसके गहन अर्थ तक वही पाठक पहुँच सकता है, जो इस सतही 'एकाकीपन' के पार देखकर, उसमें छिपी सार्वभौमिक मानवीय संवेदना और सामाजिक सच्चाई की आवाज़ को पहचान सके। दूसरे शब्दों में, कवि का व्यक्तिगत संघर्ष समाज के बड़े संघर्ष का प्रतिनिधित्व करता है।
उदाहरण: मुक्तिबोध की कविता 'ब्रह्मराक्षस' को लें। कविता सतह पर एक ब्रह्मराक्षस (एक प्रेतात्मा) और एक बच्चे के बीच के वार्तालाप और आत्मकथा जैसी लगती है, जो अकेलेपन और अस्तित्वगत पीड़ा से भरी है। लेकिन जो पाठक इस एकाकीपन में 'मानवता की आवाज' सुनने का प्रयास करता है, वह देखता है कि यह ब्रह्मराक्षस दरअसल एक ऐसे बौद्धिक का प्रतीक है जो सामाजिक व्यवस्था और अपने ही अंतर्विरोधों में फँसकर त्रस्त है। उसकी पीड़ा सिर्फ उसकी निजी पीड़ा नहीं, बल्कि एक पूरे वर्ग या चिंतनशील मन की सामाजिक-ऐतिहासिक विडंबना है। इस प्रकार, कविता का वास्तविक संदेश उसके 'एकाकीपन' के भीतर ही छिपी सामूहिक मानवीय चेतना में निहित है।
प्रश्न 8. मुक्तिबोध की कविताओं पर पुनर्विचार की आवश्यकता क्यों है? आलोचक के इस विषय में क्या निष्कर्ष है?
उत्तर-
मुक्तिबोध की कविताओं पर पुनर्विचार की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से है:
- सामाजिक सार्थकता की पुनर्खोज: मुक्तिबोध की कविताओं को प्रारंभ में अत्यधिक जटिल, आत्मपरक और निजी संघर्ष की कविताएँ माना गया। पुनर्विचार से यह स्पष्ट होता है कि उनकी आत्मपरकता के गर्भ में गहन सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ और ऐतिहासिक चेतना छिपी हुई है। उनके आत्मसंघर्ष में ही सामूहिक संघर्ष की गूँज है।
- एकांगी काव्यसिद्धांत को चुनौती: नई कविता के दौर में एक धारणा बन गई थी कि आत्मपरक प्रगीत समाज से कटे हुए या सीमित सामाजिक अर्थ रखते हैं। मुक्तिबोध की कविताएँ इस एकांगी धारणा को तोड़ती हैं और सिद्ध करती हैं कि आत्मपरकता और सामाजिकता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हो सकते हैं।
- व्यापक काव्य सिद्धांत के निर्माण हेतु: मुक्तिबोध की कविताओं का गहन अध्ययन एक अधिक समावेशी और व्यापक काव्य-सिद्धांत के निर्माण में मदद कर सकता है, जो केवल वस्तुपरकता या केवल आत्मपरकता तक सीमित न रहकर दोनों के समन्वय को समझ सके।
आलोचक का निष्कर्ष: आलोचक का निष्कर्ष यह है कि मुक्तिबोध की कविताएँ नई कविता की उस प्रवृत्ति के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप हैं, जो प्रगीत को केवल वैयक्तिक अभिव्यक्ति मानती थी। उनकी कविताओं में आत्मपरकता एक 'शक्ति' है, न कि सीमा। यह शक्ति कविता को गति और ऊर्जा देती है और उसे समाज के गहन सत्यों तक ले जाती है। इसलिए, उन पर पुनर्विचार करके हम हिंदी कविता की समझ को और अधिक समृद्ध एवं बहुआयामी बना सकते हैं।
प्रगीत और समाज - Bihar Board Class 12 Hindi Solutions
1. प्रगीत किसे कहते हैं?
उत्तर: प्रगीत वह काव्य-रचना है जिसे गाया जा सके। यह गीत की एक विशेष शैली है जो समाज के सामूहिक भावों, आकांक्षाओं और संघर्षों को अभिव्यक्त करती है। प्रगीत में लय, ताल और संगीतात्मकता का विशेष महत्व होता है, जिसके कारण यह जनसाधारण में आसानी से लोकप्रिय हो जाता है और सामाजिक चेतना जगाने का कार्य करता है।
2. प्रगीत और गीत में क्या अंतर है?
उत्तर: प्रगीत और गीत में मुख्य अंतर उनके विषयवस्तु और उद्देश्य में है। सामान्य गीत व्यक्तिगत प्रेम, वियोग, प्रकृति आदि भावनात्मक विषयों पर केंद्रित होता है। वहीं, प्रगीत का संबंध सामाजिक, राजनीतिक और सामूहिक विषयों से होता है। प्रगीत में समाज के उत्थान, शोषण के विरुद्ध आवाज, क्रांति और सामूहिक संघर्ष की भावना प्रमुख होती है, जबकि गीत अधिकतर निजी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति है।
3. प्रगीत के कोई दो लक्षण लिखिए।
उत्तर: प्रगीत के दो प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं:
(क) सामाजिक चेतना: प्रगीत का प्रमुख लक्षण सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव है। यह समाज में फैली कुरीतियों, असमानता और शोषण के विरुद्ध आवाज उठाता है तथा जनचेतना जगाने का कार्य करता है।
(ख) संगीतात्मकता एवं लयबद्धता: प्रगीत की रचना इस प्रकार की जाती है कि उसे सामूहिक रूप से गाया जा सके। इसमें आकर्षक लय, ताल और संगीत के तत्व मौजूद होते हैं, जो इसे जनसाधारण के बीच प्रभावशाली और प्रचार-योग्य बनाते हैं।
4. प्रगीत समाज को कैसे प्रभावित करता है?
उत्तर: प्रगीत समाज को गहराई से प्रभावित करने वाली शक्ति है। यह सामूहिक गायन के माध्यम से लोगों को एकजुट करता है, उनमें एक नई ऊर्जा और उत्साह का संचार करता है। शोषण और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष के लिए प्रेरित करके, प्रगीत सामाजिक परिवर्तन का वाहक बनता है। यह केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि जनजागरण और चेतना फैलाने का एक प्रभावी हथियार है।
5. बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ): प्रगीत का मुख्य उद्देश्य क्या है?
A. केवल मनोरंजन करना
B. व्यक्तिगत प्रेम को व्यक्त करना
C. सामाजिक चेतना जगाना
D. प्रकृति का वर्णन करना
सही उत्तर: C. सामाजिक चेतना जगाना। प्रगीत का प्राथमिक उद्देश्य समाज में फैली विषमताओं के प्रति लोगों को जागरूक करना, उन्हें संगठित करना और सकारात्मक बदलाव के लिए प्रेरित करना है।
6. बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ): 'प्रगीत और समाज' पाठ के अनुसार, प्रगीत की भाषा कैसी होनी चाहिए?
A. क्लिष्ट और दुरूह
B. अत्यंत संस्कृतनिष्ठ
C. सरल और बोधगम्य
D. केवल अंग्रेजी में
सही उत्तर: C. सरल और बोधगम्य। प्रगीत जनसाधारण के लिए होता है, इसलिए इसकी भाषा सरल, स्पष्ट और आम बोलचाल की होनी चाहिए ताकि हर वर्ग के लोग इसे आसानी से समझ सकें और उससे जुड़ाव महसूस कर सकें।
नोट: ये समाधान छात्रों की समझ को सरल और स्पष्ट बनाने के लिए तैयार किए गए हैं। परीक्षा में लिखते समय अपने शब्दों में उत्तर देना याद रखें।
प्रगीत और समाज
1. प्रगीत क्या है?
प्रगीत एक प्रकार की कविता है जो गीतात्मक शैली में लिखी जाती है और जिसे गाया जा सकता है। यह सामाजिक चेतना, प्रगतिशील विचारों और मानवीय मूल्यों को व्यक्त करने वाला गीत है। प्रगीत का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाना और जन-जागरण करना है। यह व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठकर सामूहिक अनुभूतियों और सामाजिक यथार्थ को अपना विषय बनाता है।
2. प्रगीत और गीत में क्या अंतर है?
गीत मुख्य रूप से व्यक्तिगत भावनाओं जैसे प्रेम, वियोग, हर्ष-शोक आदि को व्यक्त करने वाली रचना है। इसका लक्ष्य सौंदर्यबोध और भावात्मक अनुभूति है।
प्रगीत गीत का ही एक विशेष रूप है, लेकिन यह व्यक्तिगत भावनाओं से आगे बढ़कर सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों को उठाता है। इसका उद्देश्य समाज में चेतना फैलाना और प्रगतिशील परिवर्तन के लिए प्रेरित करना है। सरल शब्दों में, गीत हृदय से संबंधित है, जबकि प्रगीत हृदय और समाज दोनों से जुड़ा हुआ है।
3. प्रगीत के कोई दो लक्षण लिखिए।
1. सामाजिक चेतना: प्रगीत का प्रमुख लक्षण सामाजिक यथार्थ और जन-जीवन की समस्याओं को चित्रित करना है। यह शोषण, असमानता, गरीबी और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाता है।
2. गेयता एवं संगीतात्मकता: प्रगीत गीत की तरह ही संगीतात्मक और गेय होता है। इसमें लय, ताल और छंद का प्रयोग होता है, जिससे यह आसानी से गाया जा सकता है और लोगों तक प्रभावी ढंग से पहुँच सकता है।
4. प्रगीत के विकास में निराला की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' हिंदी साहित्य में प्रगीत के विकास के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। उन्होंने गीत की परंपरागत सीमाओं को तोड़कर उसमें नए सामाजिक और दार्शनिक आयाम जोड़े। निराला के प्रगीतों में रहस्यवाद, क्रांति की भावना और मानवीय मुक्ति का स्वर मुखर हुआ है। उन्होंने 'वह तोड़ती पत्थर', 'जागो फिर एक बार' जैसी कविताओं के माध्यम से सामान्य जन के श्रम और संघर्ष को गौरवान्वित किया। इस प्रकार, निराला ने प्रगीत को केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति न रखकर उसे सामाजिक परिवर्तन का शक्तिशाली माध्यम बना दिया।
5. प्रगीत के कोई दो उद्देश्य लिखिए।
1. सामाजिक जागरण: प्रगीत का प्राथमिक उद्देश्य समाज में फैली कुरीतियों, अन्याय और शोषण के प्रति लोगों को जागरूक करना है। यह निष्क्रियता को तोड़कर सक्रियता और विद्रोह की भावना पैदा करता है।
2. सांस्कृतिक पुनर्जागरण: प्रगीत लोक-संस्कृति और राष्ट्रीय मूल्यों को सँजोने और उन्हें नए युग के अनुरूप विकसित करने का कार्य भी करता है। यह सामूहिक अस्मिता और गौरव की भावना को मजबूत करता है।
6. प्रगीत के विकास में दिनकर की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
रामधारी सिंह 'दिनकर' ओजस्वी और वीर रस के कवि के रूप में प्रसिद्ध हैं। प्रगीत के क्षेत्र में उनका योगदान राष्ट्रीय चेतना और क्रांतिकारी भावनाओं को मुखर करना रहा है। उनके प्रगीतों में देशप्रेम, स्वतंत्रता की ललक और सामाजिक न्याय की माँग प्रबल स्वर में उभरी है। 'कुरुक्षेत्र', 'रश्मिरथी' जैसे उनके महाकाव्यात्मक गीतों में भी प्रगीत का तत्व विद्यमान है। दिनकर ने प्रगीत को वीरता और शौर्य का प्रतीक बनाया, जो युवाओं को राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित करता था।
7. प्रगीत के विकास में नागार्जुन की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
बाबा नागार्जुन हिंदी के जनकवि थे, जिन्होंने प्रगीत को जन-जन की भाषा और उनकी समस्याओं से जोड़ा। उनके प्रगीत सीधे-सादे, मुहावरेदार भाषा में लिखे गए हैं, जो आम आदमी के दुःख-दर्द, उसके संघर्ष और उम्मीदों को व्यक्त करते हैं। नागार्जुन ने किसानों, मजदूरों और वंचित वर्गों के हितों को अपने गीतों का केंद्र बनाया। 'युगधारा', 'प्यासी पथराई आँखें' जैसे उनके संग्रहों में प्रगीत की शक्ति स्पष्ट दिखती है। उन्होंने प्रगीत को राजनीतिक चेतना और व्यंग्य का प्रभावी हथियार बना दिया।
8. प्रगीत के विकास में केदारनाथ अग्रवाल की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
केदारनाथ अग्रवाल ने प्रगीत को जनपदीय चेतना और प्रकृति के साथ गहरे जोड़कर प्रस्तुत किया। उनके प्रगीतों में बुन्देलखंड की माटी की सुगंध, वहाँ के किसानों का जीवन और प्रकृति का मानवीकरण मिलता है। उन्होंने सामान्य जन के श्रम और उनकी सृजनशीलता को काव्य का विषय बनाया। 'फूल नहीं रंग बोलते हैं', 'युग की गंगा' जैसे उनके संग्रहों में प्रगीत का नया रूप देखने को मिलता है, जो सौंदर्यबोध और सामाजिक सरोकारों के बीच सुंदर सामंजस्य स्थापित करता है। केदारनाथ अग्रवाल ने प्रगीत को भूमि और लोकजीवन से जुड़ी एक ठोस आधारभूमि प्रदान की।
9. प्रगीत के विकास में शमशेर बहादुर सिंह की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
शमशेर बहादुर सिंह ने प्रगीत को एक नए सौंदर्यशास्त्र और कलात्मक परिष्कार से समृद्ध किया। उनके प्रगीतों में प्रयोगवादी चेतना के साथ-साथ गहरी मानवीय संवेदना भी मिलती है। उन्होंने व्यक्तिगत अनुभूतियों को सामाजिक संदर्भों में पिरोकर प्रस्तुत किया। शमशेर की भाषा बिंबात्मक और संगीतमयी है, जो प्रगीत को एक उच्च कलात्मक स्तर पर ले जाती है। 'कुछ कविताएँ', 'कुछ और कविताएँ' जैसे उनके संग्रहों में प्रगीत का यह नया, सघन और बौद्धिक रूप देखा जा सकता है। उन्होंने प्रगीत को भावुकता से ऊपर उठाकर एक सूक्ष्म काव्यानुभूति का माध्यम बनाया।
10. प्रगीत के विकास में त्रिलोचन की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
त्रिलोचन ने प्रगीत को अत्यंत सरल, सहज और लोक-निकट भाषा में ढाला। उनके प्रगीतों में गाँव, खेत, नदी, मजदूर और किसान का जीवन सजीव रूप में उपस्थित है। उन्होंने छंद और लय के नए प्रयोग किए, जिससे उनके गीत लोकगीतों जैसी सहजता प्राप्त करते हैं। त्रिलोचन ने प्रगीत को जनसाधारण की वाणी बनाया और उसमें मानवीय गरिमा और सामाजिक न्याय का स्वर भरा। उनकी कविता 'ताप के ताए हुए दिन' इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। इस प्रकार, उन्होंने प्रगीत को एक लोकतांत्रिक और मानवीय अभिव्यक्ति का रूप दिया।
11. प्रगीत के विकास में मुक्तिबोध की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
गजानन माधव मुक्तिबोध ने प्रगीत को बौद्धिक गहराई और वैचारिक जटिलता प्रदान की। उनके प्रगीत केवल भावनात्मक आवेग नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ के विश्लेषण और मानवीय चेतना के अंतर्द्वंद्व को व्यक्त करने वाले माध्यम हैं। उन्होंने प्रगीत को आधुनिक जीवन की विसंगतियों, अकेलेपन और आत्मसंघर्ष से जोड़ा। 'चाँद का मुँह टेढ़ा है' जैसे उनके काव्य संग्रह में प्रगीत का यह नया, आंतरिक और विचारप्रधान रूप मिलता है। मुक्तिबोध ने प्रगीत को एक गहन दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक आयाम दिया।
12. प्रगीत के विकास में धूमिल की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
धूमिल (सुदामा पांडेय) ने प्रगीत को आक्रोश, विद्रोह और कटु यथार्थ की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। उनके प्रगीतों में समकालीन राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था के प्रति गहरा असंतोष और तीखा व्यंग्य है। उन्होंने परंपरागत छंद और मधुरता को तोड़कर एक खुरदुरी, आम बोलचाल की भाषा में प्रगीत लिखे। 'संसद से सड़क तक' जैसे उनके संग्रह में प्रगीत सत्ता के विरुद्ध एक जनपक्षीय आवाज बनकर उभरता है। धूमिल ने प्रगीत को एक ऐसा हथियार बना दिया, जो व्यवस्था के ढोंग और झूठ को बेध सकता है।
प्रगीत और समाज
1. प्रगीतात्मकता का पहला उद्भव किस भाषा में हुआ?
उत्तर: प्रगीतात्मकता का पहला उद्भव लोकभाषा में हुआ। यह एक साफ-सुथरी और सरल प्रगीतात्मकता का प्रारंभ था, जिसे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण घटना माना जाता है। इसने गीतों के माध्यम से काव्य की नई संभावनाओं को जन्म दिया।
2. प्रगीतात्मकता का दूसरा उद्भव किसके साथ हुआ?
उत्तर: प्रगीतात्मकता का दूसरा उद्भव रोमैंटिक उत्थान के साथ हुआ। इस दौर के प्रगीतों में एक नए प्रकार के व्यक्तिवाद को महत्व मिला, जहाँ व्यक्ति समाज से अलग होकर भी अपनी सामाजिक पहचान स्थापित करने का प्रयास करता था। इन गीतों में आत्मीयता और इंद्रियबोध की अभिव्यक्ति प्रबल थी।
3. रोमैंटिक प्रगीतों की क्या विशेषता थी?
उत्तर: रोमैंटिक प्रगीतों की मुख्य विशेषता आत्मीयता और ऐंद्रियता का प्रबल होना था। इन गीतों में व्यक्ति के निजी अनुभव, भावनाएँ और संवेदनाएँ केंद्र में थीं। इनमें एक प्रकार का विद्रोही स्वर भी था, जहाँ व्यक्ति समाज के विरुद्ध खड़ा होकर अपनी अलग पहचान बनाता था, जिसे 'एकांत संगीत' या 'अकेले कंठ की पुकार' कहा गया।
4. सच्चे अर्थों में प्रगीतात्मकता का आरंभ किसे माना जाता है?
उत्तर: आलोचकों की दृष्टि में सच्चे अर्थों में प्रगीतात्मकता का आरंभ रोमैंटिक प्रगीतात्मकता से माना जाता है। इसका मूल आधार समाज के विरुद्ध व्यक्ति की स्थिति थी। इस चरण में कवि ने अपने अंदर के संघर्ष, आत्मविडंबना और गहन आत्मपरकता को अभिव्यक्त किया, जिससे प्रगीत की एक नई परिभाषा बनी।
5. समाज पर आधारित काव्य की क्या स्थिति हुई?
उत्तर: जब कविता पूरी तरह से समाज पर आधारित हो गई और उसने जनता की स्थितियों को ही एकमात्र विषय बना लिया, तो वह कवित्व से वंचित होने लगी। ऐसी कविता में कलात्मक सौंदर्य और व्यक्तिगत भाव-बोध का अभाव हो गया। बाद में, कुछ कवियों ने व्यवस्था के विरोध में ढेर सारी सामाजिक कविताएँ लिखीं, लेकिन यह दौर अधिक समय तक नहीं चला।
6. नई प्रगीतात्मकता की क्या विशेषताएँ हैं?
उत्तर: नई प्रगीतात्मकता की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
(क) संतुलित दृष्टि: आज का कवि न तो केवल अपने अंदर झाँकने से हिचकता है और न ही बाहरी यथार्थ का सामना करने से। उसकी दृष्टि संतुलित है।
(ख) सूक्ष्म अवलोकन: उसकी नजर छोटी-से-छोटी घटना, वस्तु या भीतर उठने वाली सूक्ष्म लहर पर है, जिसे वह शब्दों में बाँध लेता है।
(ग) संबंधों की खोज: कवि अपने व्यक्तिगत स्व और समाज के बीच के रिश्ते को समझने व साधने का प्रयास कर रहा है।
(घ) नई अभिव्यक्ति शैली: इन कविताओं से यह सिद्ध होता है कि मितकथन (कम बोलना) में अतिकथन (अधिक बोलने) से अधिक शक्ति होती है और कभी-कभी एक ठंडे, संयत स्वर का प्रभाव अधिक गहरा और 'गर्म' होता है। यह एक नए ढंग की प्रगीतात्मकता का संकेत है।
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