Bihar Board Class 10th Science (विज्ञान) Chapter 13 विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव) Solutions
Bihar Board Class 10th Science (विज्ञान) Chapter 13 विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव) Solutions
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प्रश्न 1. विद्युत धारा के चुम्बकीय प्रभाव की खोज किसने की?
उत्तर: विद्युत धारा के चुम्बकीय प्रभाव की खोज हैन्स क्रिश्चियन ओर्स्टेड ने सन् 1820 में की थी। उन्होंने देखा कि जब किसी चालक तार में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो उसके पास रखी चुम्बकीय सुई विक्षेपित हो जाती है। यह प्रयोग सिद्ध करता है कि विद्युत धारा एक चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है।
प्रश्न 2. ताँबे के तार की एक आयताकार कुंडली किसी चुम्बकीय क्षेत्र में घूर्णी गति कर रही है। इस कुंडली में प्रेरित विद्युत धारा की दिशा में कितने परिभ्रमण के पश्चात् परिवर्तन होता है?
उत्तर: जब कोई आयताकार कुंडली एक पूर्ण चक्कर (360°) घूमती है, तो उसमें प्रेरित विद्युत धारा की दिशा दो बार बदलती है। कुंडली का प्रत्येक आधा चक्कर (180°) पूरा करने पर धारा की दिशा उलट जाती है। इस प्रकार, एक पूर्ण चक्कर में धारा की दिशा में दो बार परिवर्तन होता है।
प्रश्न 3. विद्युत मोटर में विभक्त वलय की क्या भूमिका है?
उत्तर: विद्युत मोटर में विभक्त वलय (या कम्यूटेटर) एक बहुत ही महत्वपूर्ण भाग है। इसकी प्रमुख भूमिकाएँ हैं:
1. यह ब्रशों के माध्यम से धारा को घूमने वाले आर्मेचर कुंडली तक पहुँचाता है।
2. यह प्रत्येक आधे चक्कर के बाद कुंडली में विद्युत धारा की दिशा को स्वचालित रूप से उलट देता है।
3. धारा की दिशा में यह नियमित उत्क्रमण ही आर्मेचर को एक ही दिशा में लगातार घूमने के लिए बलाघूर्ण प्रदान करता है।
प्रश्न 4. विद्युत जनित्र तथा विद्युत मोटर की कार्यविधि में क्या अंतर है?
उत्तर: विद्युत जनित्र और विद्युत मोटर की कार्यविधि में मूलभूत अंतर ऊर्जा के रूपांतरण में है:
विद्युत मोटर: यह विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में बदलता है। इसमें विद्युत धारा डालने पर आर्मेचर चुम्बकीय क्षेत्र में घूमने लगता है।
विद्युत जनित्र (डायनेमो): यह यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलता है। इसमें कुंडली को चुम्बकीय क्षेत्र में यांत्रिक रूप से घुमाया जाता है, जिससे उसमें विद्युत धारा प्रेरित होती है।
प्रश्न 5. किसी विद्युत परिपथ में लघुपथन कब होता है?
उत्तर: किसी विद्युत परिपथ में लघुपथन तब होता है जब फेज (जीवित) तार और न्यूट्रल तार आपस में सीधे संपर्क में आ जाते हैं, बिना किसी उपकरण (जैसे बल्ब, पंखा) के प्रतिरोध के। इस स्थिति में परिपथ का कुल प्रतिरोध बहुत कम हो जाता है, जिससे परिपथ में बहुत अधिक मात्रा में विद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है। यह अत्यधिक ताप उत्पन्न कर सकता है और आग का कारण बन सकता है।
प्रश्न 6. निम्नलिखित में से कौन चुम्बकीय क्षेत्र को परिभाषित करने के लिए सम्भव दिशा प्रदान नहीं करता?
(A) चुम्बकीय क्षेत्र रेखा पर किसी बिन्दु पर खींची गई स्पर्श रेखा
(B) स्वतंत्रतापूर्वक निलंबित चुम्बकीय सुई का उत्तर ध्रुव
(C) चुम्बकीय क्षेत्र रेखा पर किसी बिन्दु पर लगने वाला बल
(D) स्वतंत्रतापूर्वक निलंबित चुम्बकीय सुई का दक्षिण ध्रुव
उत्तर: (C) चुम्बकीय क्षेत्र रेखा पर किसी बिन्दु पर लगने वाला बल
व्याख्या: चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा को परिभाषित करने के लिए हम किसी बिंदु पर स्पर्श रेखा (A) या स्वतंत्र चुम्बकीय सुई के ध्रुवों (B और D) की दिशा का उपयोग करते हैं। लेकिन चुम्बकीय क्षेत्र रेखा पर किसी बिंदु पर लगने वाला बल (C) एक निश्चित दिशा प्रदान नहीं करता, क्योंकि बल की दिशा उस बिंदु पर रखे आवेश या धारा तत्व की प्रकृति पर निर्भर करती है।
प्रश्न 7. किसी धारावाही सीधी लम्बी परिनालिका के भीतर चुम्बकीय क्षेत्र-
(A) शून्य होता है
(B) इसके सिरे की ओर जाने पर बढ़ता है
(C) इसके सिरे की ओर जाने पर घटता है
(D) सभी बिन्दुओं पर समान रहता है
उत्तर: (D) सभी बिन्दुओं पर समान रहता है
व्याख्या: एक लम्बी, सीधी धारावाही परिनालिका (सोलेनॉइड) के भीतरी भाग में चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ समान्तर और सीधी होती हैं। इस क्षेत्र का परिमाण लगभग एकसमान (समान) होता है। चुम्बकीय क्षेत्र का मान केवल सिरों के पास कम होने लगता है।
प्रश्न 8. दो समान्तर धारावाही चालकों के बीच आकर्षण बल कब लगता है?
(A) धाराएँ विपरीत दिशा में प्रवाहित होती हैं
(B) धाराएँ समान दिशा में प्रवाहित होती हैं
(C) धाराएँ लम्बवत् दिशा में प्रवाहित होती हैं
(D) धाराएँ प्रवाहित नहीं होती हैं
उत्तर: (B) धाराएँ समान दिशा में प्रवाहित होती हैं
व्याख्या: जब दो समान्तर चालकों में विद्युत धारा समान दिशा में प्रवाहित होती है, तो उनके चुम्बकीय क्षेत्र एक-दूसरे को कमजोर करते हैं और चालकों के बीच एक आकर्षण बल उत्पन्न होता है। यदि धाराएँ विपरीत दिशा में हों, तो प्रतिकर्षण बल लगता है।
प्रश्न 9. विद्युत परिपथों तथा साधित्रों में सामान्यतः उपयोग होने वाला सुरक्षा उपकरण क्या है?
(A) विद्युत मोटर
(B) मिनिएचर सर्किट ब्रेकर (MCB)
(C) जनित्र
(D) विद्युत मीटर
उत्तर: (B) मिनिएचर सर्किट ब्रेकर (MCB)
व्याख्या: आधुनिक विद्युत परिपथों और साधित्रों में सुरक्षा के लिए सबसे अधिक मिनिएचर सर्किट ब्रेकर (MCB) का उपयोग किया जाता है। यह फ्यूज की तरह ही काम करता है लेकिन अधिक सुविधाजनक है। जब परिपथ में अत्यधिक धारा (ओवरलोड या लघुपथन के कारण) प्रवाहित होती है, तो MCB स्वचालित रूप से परिपथ को तोड़ देता है और सुरक्षा प्रदान करता है।
प्रश्न 10. किसी चालक में विद्युत धारा प्रवाहित होने पर उसके चारों ओर एक चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है। इस चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा ज्ञात करने का नियम कौन-सा है?
(A) कूलॉम का नियम
(B) ओम का नियम
(C) फ्लेमिंग का दायें हाथ का नियम
(D) मैक्सवेल का दायें हाथ का अंगुष्ठ नियम
उत्तर: (D) मैक्सवेल का दायें हाथ का अंगुष्ठ नियम
व्याख्या: किसी सीधे धारावाही चालक के चारों ओर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा ज्ञात करने के लिए मैक्सवेल का दायें हाथ का अंगुष्ठ नियम प्रयोग किया जाता है। इस नियम के अनुसार, यदि दायें हाथ से तार को इस प्रकार पकड़ें कि अंगूठा धारा की दिशा (धनात्मक से ऋणात्मक) की ओर संकेत करे, तो लिपटी हुई उंगलियाँ चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा बताएँगी।
प्रश्न 3,
प्रत्यावर्ती विद्युत धारा उत्पन्न करने वाले स्रोतों के नाम लिखिए।
प्रत्यावर्ती विद्युत धारा (AC) उत्पन्न करने वाले प्रमुख स्रोत निम्नलिखित हैं:
- AC जनित्र (Alternator): यह यांत्रिक ऊर्जा को प्रत्यावर्ती विद्युत ऊर्जा में बदलता है।
- ताप विद्युत संयंत्र: कोयला, गैस आदि जलाकर उत्पन्न ताप से भाप बनाई जाती है, जो टरबाइन घुमाकर AC जनित्र चलाती है।
- जल विद्युत संयंत्र: बाँध से गिरते पानी की गतिज ऊर्जा से टरबाइन घूमती है, जो AC जनित्र को चलाती है।
- नाभिकीय रिएक्टर: नाभिकीय विखंडन से उत्पन्न ताप से भाप बनती है, जो टरबाइन और AC जनित्र चलाती है।
इनके अलावा पवन चक्कियाँ (विंड मिल्स) और सौर ऊर्जा संयंत्र (इन्वर्टर के माध्यम से) भी AC धारा के स्रोत हैं।
प्रश्न 4.
सही विकल्प का चयन कीजिए ताँबे के तार की एक आयताकार कुंडली किसी चुंबकीय क्षेत्र में घूर्णन गति कर रही है। इस कुंडली में प्रेरित विद्युत धारा की दिशा में कितने परिभ्रमण के पश्चात परिवर्तन होता है?
(a) दो (b) एक (c) आधे (d) चौथाई
(c) आधे
स्पष्टीकरण: जब एक आयताकार कुंडली चुंबकीय क्षेत्र में घूमती है, तो उसमें प्रेरित विद्युत धारा की दिशा फ्लेमिंग के दाएँ हाथ के नियम द्वारा निर्धारित होती है। कुंडली का प्रत्येक आधा चक्कर (180° घूर्णन) पूरा करने पर, कुंडली की भुजाएँ चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के सापेक्ष गति की दिशा विपरीत कर देती हैं। इस कारण प्रेरित धारा की दिशा भी बदल जाती है। इस प्रकार, प्रत्येक आधे परिभ्रमण के बाद धारा की दिशा परिवर्तित होती है।
प्रश्न 1. विद्युत परिपथों तथा साधित्रों में सामान्यतः उपयोग होने वाले दो सुरक्षा उपायों के नाम लिखिए।
विद्युत परिपथों तथा उपकरणों को क्षति से बचाने और आग तथा बिजली के झटके से सुरक्षा के लिए सामान्यतः उपयोग किए जाने वाले दो सुरक्षा उपाय हैं:
- विद्युत फ्यूज (Electric Fuse): यह एक पतला तार होता है जिसका गलनांक कम होता है। परिपथ में धारा का मान सुरक्षित सीमा से अधिक होने पर यह तार गर्म होकर पिघल जाता है और परिपथ को तोड़ देता है, जिससे बाकी के उपकरण सुरक्षित रहते हैं।
- भू-संपर्कन (Earthing): विद्युत उपकरण के धात्विक आवरण को भूमिगत ताँबे की प्लेट से जोड़ दिया जाता है। यदि किसी कारण से लाइव तार आवरण से छू जाए, तो धारा सीधे भूमि में चली जाती है, जिससे उपकरण को छूने वाले व्यक्ति को गंभीर झटका नहीं लगता।
प्रश्न 2.
2 kW शक्ति अनुमतांक का एक विद्युत तंदूर किसी घरेलू विद्युत परिपथ (220 V) में प्रचालित किया जाता है जिसका विद्युत धारा अनुमतांक 5 A है, इससे आप किस परिणाम की अपेक्षा करते हैं? स्पष्ट कीजिए।
दिया है:
तंदूर की शक्ति (P) = 2 kW = 2000 W
वोल्टता (V) = 220 V
परिपथ में लगे फ्यूज की धारा क्षमता = 5 A
गणना:
हम जानते हैं, शक्ति (P) = वोल्टता (V) × धारा (I)
इसलिए, तंदूर द्वारा ली जाने वाली धारा, I = P / V
I = 2000 W / 220 V ≈ 9.09 A
परिणाम की व्याख्या:
तंदूर लाइन से लगभग 9.09 एम्पियर की धारा लेगा, जो परिपथ में लगे 5 A के फ्यूज की क्षमता से कहीं अधिक है। ऐसी स्थिति में फ्यूज का तार अत्यधिक गर्म होकर पिघल (गल) जाएगा और परिपथ टूट जाएगा। इससे तंदूर बंद हो जाएगा और बाकी के परिपथ व उपकरण अतिभारण से सुरक्षित रहेंगे।
प्रश्न 3.
घरेलू विद्युत परिपथों में अतिभारण से बचाव के लिए क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
घरेलू विद्युत परिपथों में अतिभारण (जब परिपथ में प्रवाहित धारा उसकी डिज़ाइन क्षमता से अधिक हो जाती है) से बचाव के लिए निम्नलिखित सावधानियाँ बरतनी चाहिए:
- एक सॉकेट से अधिक उपकरण न जोड़ें: किसी एक विद्युत सॉकेट या एक्सटेंशन बोर्ड में बहुत अधिक शक्तिशाली उपकरण (जैसे हीटर, इस्त्री, रेफ्रिजरेटर, गीज़र) एक साथ नहीं लगाने चाहिए।
- उचित क्षमता के फ्यूज का प्रयोग करें: परिपथ में हमेशा उचित रेटिंग वाला फ्यूज लगाएँ। कभी भी फ्यूज को मोटे तार से बायपास न करें या उसकी जगह सीधा तार न लगाएँ।
- तारों की मोटाई पर ध्यान दें: घर की वायरिंग उचित मोटाई (गेज) के तारों से करवाएँ जो सभी उपकरणों के एक साथ चलने पर भी धारा वहन कर सकें।
- उपकरणों का बारी-बारी से उपयोग: जहाँ तक संभव हो, उच्च शक्ति वाले उपकरणों को एक साथ न चलाकर बारी-बारी से चलाएँ।
प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन किसी लंबे विद्युत धारावाही तार के निकट चुंबकीय क्षेत्र का सही वर्णन करता है?
(a) चुंबकीय क्षेत्र की क्षेत्र रेखाएँ तार के लम्बवत् होती हैं।
(b) चुंबकीय क्षेत्र की क्षेत्र रेखाएँ तार के समांतर होती हैं।
(c) चुंबकीय क्षेत्र की क्षेत्र रेखाएँ अरीय होती हैं जिनका उद्भव तार से होता है।
(d) चुंबकीय क्षेत्र की संकेंद्री क्षेत्र रेखाओं का केंद्र तार होता है।
(d) चुंबकीय क्षेत्र की संकेंद्री क्षेत्र रेखाओं का केंद्र तार होता है।
स्पष्टीकरण: ओर्स्टेड के प्रयोग से पता चलता है कि एक सीधे धारावाही चालक के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है। इस क्षेत्र की क्षेत्र रेखाएँ संकेंद्रीय वृत्तों के रूप में होती हैं, जिनका केंद्र तार स्वयं होता है। ये वृत्त तार के लंबवत तल में स्थित होते हैं। क्षेत्र की दिशा तार में प्रवाहित धारा की दिशा पर निर्भर करती है और दाएँ हाथ के अंगूठे के नियम से ज्ञात की जा सकती है।
प्रश्न 2.
वैद्युत-चुंबकीय प्रेरण की परिघटना -
(a) किसी वस्तु को आवेशित करने की प्रक्रिया है।
(b) किसी कुंडली में विद्युत धारा प्रवाहित होने के कारण चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करने की प्रक्रिया है।
(c) कुंडली तथा चुंबक के बीच आपेक्षिक गति के कारण कुंडली में प्रेरित विद्युत धारा उत्पन्न करना है।
(d) किसी विद्युत मोटर की कुंडली को घूर्णन कराने की प्रक्रिया है।
(c) कुंडली तथा चुंबक के बीच आपेक्षिक गति के कारण कुंडली में प्रेरित विद्युत धारा उत्पन्न करना है।
स्पष्टीकरण: माइकल फैराडे द्वारा खोजी गई वैद्युत-चुंबकीय प्रेरण की परिघटना में, जब किसी कुंडली और चुंबक के बीच सापेक्ष गति होती है (चाहे चुंबक गतिमान हो और कुंडली स्थिर, या कुंडली गतिमान हो और चुंबक स्थिर), तो कुंडली से गुजरने वाला चुंबकीय फ्लक्स बदलता है। इस बदलते चुंबकीय फ्लक्स के कारण कुंडली में एक प्रेरित विद्युत धारा उत्पन्न हो जाती है। यही मूल सिद्धांत जनित्र (जेनरेटर) का आधार है।
प्रश्न 3,
विद्युत धारा उत्पन्न करने की युक्ति को कहते हैं -
(a) जनित्र
(b) गैल्वेनोमीटर
(c) ऐमीटर
(d) मोटर
(a) जनित्र
स्पष्टीकरण:
- जनित्र (Generator): यह यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलने की युक्ति है। यह वैद्युत-चुंबकीय प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है और विद्युत धारा उत्पन्न करता है।
- गैल्वेनोमीटर और ऐमीटर विद्युत धारा का पता लगाने और मापने के उपकरण हैं।
- विद्युत मोटर विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में बदलता है, यह धारा उत्पन्न नहीं करता।
प्रश्न 4.
किसी AC जनित्र तथा DC जनित्र में एक मूलभूत अंतर यह है कि -
(a) AC जनित्र में विद्युत चुंबक होता है जबकि DC जनित्र में स्थायी चुंबक होता है।
(b) AC जनित्र उच्च वोल्टता का जनन करता है।
(c) DC जनित्र उच्च वोल्टता का जनन करता है।
(d) AC जनित्र में सी वलय होते हैं जबकि DC जनित्र में दिक्परिवर्तक होता है।
(d) AC जनित्र में सी वलय होते हैं जबकि DC जनित्र में दिक्परिवर्तक होता है।
स्पष्टीकरण: AC और DC जनित्र दोनों का मूल सिद्धांत (वैद्युत-चुंबकीय प्रेरण) एक ही है। इनमें मुख्य संरचनात्मक अंतर बाह्य परिपथ से संपर्क कराने वाले उपकरण में होता है।
- AC जनित्र में दो पूर्ण सी वलय (Slip Rings) होते हैं जो घूर्णन कर रहे आर्मेचर कुंडली के सिरों को स्थिर ब्रशों से जोड़ते हैं। यह व्यवस्था प्रेरित प्रत्यावर्ती धारा (AC) को बिना दिशा बदले बाहरी परिपथ में भेज देती है।
- DC जनित्र में एक दिक्परिवर्तक (Split Ring Commutator) होता है जो एक बेलन के दो अलग-अलग हिस्सों से बना होता है। यह प्रत्येक आधे चक्कर के बाद कुंडली के सिरों के संपर्क को उलट देता है, जिससे बाह्य परिपथ में एकदिशीय धारा (DC) प्रवाहित होती है।
प्रश्न 5.
लघुपथन के समय परिपथ में विद्युत धारा का मान -
(a) बहुत कम हो जाता है।
(b) परिवर्तित नहीं होता।
(c) बहुत अधिक बढ़ जाता है।
(d) निरंतर परिवर्तित होता है।
(c) बहुत अधिक बढ़ जाता है।
स्पष्टीकरण: लघुपथन (Short Circuit) तब होता है जब किसी दोष के कारण फेज (लाइव) तार और न्यूट्रल तार सीधे एक-दूसरे से संपर्क में आ जाते हैं, बिना किसी उपकरण (प्रतिरोध) के। ऐसी स्थिति में, परिपथ का कुल प्रतिरोध (R) अचानक बहुत कम हो जाता है। ओम के नियम (I = V/R) के अनुसार, वोल्टता (V) स्थिर रहने पर, यदि प्रतिरोध R लगभग शून्य के बराबर हो जाए, तो परिपथ में प्रवाहित धारा (I) का मान अत्यधिक बढ़ जाता है। यह अतिधारा तारों को अत्यधिक गर्म कर सकती है, जिससे आग लगने का खतरा होता है। इसी से बचाव के लिए फ्यूज लगाए जाते हैं।
प्रश्न 6.
निम्नलिखित प्रकथनों में कौन-सा सही है तथा कौन-सा गलत है? इसे प्रकथन के सामने अंकित कीजिए।
(a) विद्युत मोटर यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में रूपांतरित करता है।
(b) विद्युत जनित्र वैद्युतचुंबकीय प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है।
(c) किसी लंबी वृत्ताकार विद्युत धारावाही कुंडली के केंद्र पर चुंबकीय क्षेत्र समांतर सीधी क्षेत्र रेखाएँ होता है।
(d) हरे विद्युतरोधन वाला तार प्राय: विद्युत्मय तार होता है।
(a) असत्य – विद्युत मोटर विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में रूपांतरित करता है।
(b) सत्य – विद्युत जनित्र (जेनरेटर) वैद्युत-चुंबकीय प्रेरण के सिद्धांत पर ही कार्य करता है।
(c) सत्य – एक लंबी परिनालिका (सोलेनॉइड) के अंदर, विशेषकर केंद्र पर, चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ लगभग समानांतर और सीधी होती हैं, जो एक समान चुंबकीय क्षेत्र दर्शाती हैं।
(d) सत्य – विद्युत वायरिंग में, हरे रंग के विद्युतरोधन वाला तार भू-संपर्कन (अर्थिंग) के लिए प्रयोग किया जाता है, जो सुरक्षा के लिए होता है और सामान्य परिस्थितियों में विद्युत्मय (लाइव) नहीं होता। हालाँकि, दोष की स्थिति में इसमें धारा प्रवाहित हो सकती है।
प्रश्न 7.
चुंबकीय क्षेत्र को उत्पन्न करने के तीन तरीकों की सूची बनाइए।
चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करने के तीन प्रमुख तरीके निम्नलिखित हैं:
- स्थायी चुंबक (Permanent Magnet): लोहा, कोबाल्ट, निकल या इनके मिश्र धातुओं से बने स्थायी चुंबक अपने आस-पास सदैव एक चुंबकीय क्षेत्र बनाए रखते हैं।
- विद्युत धारा (Electric Current): जब किसी चालक तार में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो उसके चारों ओर एक चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। यह प्रभाव वैद्युतचुंबक (इलेक्ट्रोमैग्नेट) और परिनालिका का आधार है।
- गतिमान आवेश (Moving Charge): कोई भी गतिमान आवेश (जैसे इलेक्ट्रॉनों का पुंज या आयन) अपने साथ एक चुंबकीय क्षेत्र लेकर चलता है। वास्तव में, चालक में विद्युत धारा भी गतिमान आवेश (इलेक्ट्रॉन) के कारण ही होती है।
प्रश्न 8.
परिनालिका चुंबक की भाँति कैसे व्यवहार करती है? क्या आप किसी छड़ चुंबक की सहायता से किसी विद्युत धारावाही परिनालिका के उत्तर ध्रुव तथा दक्षिण ध्रुव का निर्धारण कर सकते हैं?
परिनालिका का चुंबक की तरह व्यवहार: जब किसी परिनालिका (सोलेनॉइड) में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो यह एक दंड चुंबक की तरह व्यवहार करती है। इसके एक सिरे पर उत्तरी ध्रुव (N) और दूसरे सिरे पर दक्षिणी ध्रुव (S) बन जाते हैं। परिनालिका के भीतर एक शक्तिशाली और एकसमान चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है, जिसकी क्षेत्र रेखाएँ एक सिरे से दूसरे सिरे तक समानांतर होती हैं।
ध्रुवों का निर्धारण: हाँ, हम एक छड़ चुंबक की सहायता से धारावाही परिनालिका के ध्रुवों का निर्धारण कर सकते हैं।
- यदि छड़ चुंबक का उत्तरी ध्रुव (N) परिनालिका के किसी सिरे की ओर आकर्षित होता है, तो वह सिरा दक्षिणी ध्रुव (S) है (विपरीत ध्रुव आकर्षित करते हैं)।
- यदि छड़ चुंबक का उत्तरी ध्रुव परिनालिका के किसी सिरे से प्रतिकर्षित होता है, तो वह सिरा उत्तरी ध्रुव (N) है (समान ध्रुव प्रतिकर्षित करते हैं)।
इसी प्रकार छड़ चुंबक के दक्षिणी ध्रुव का उपयोग करके भी ध्रुवों की पहचान की जा सकती है।
प्रश्न 9.
किसी चुंबकीय क्षेत्र में स्थित विद्युत धारावाही चालक पर आरोपित बल कब अधिकतम होता है?
किसी चुंबकीय क्षेत्र में रखे धारावाही चालक पर लगने वाले बल (F) का सूत्र है:
F = I L B sinθ
जहाँ:
I = चालक में प्रवाहित धारा
L = चालक की लंबाई
B = चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता
θ = चालक की दिशा और चुंबकीय क्षेत्र की दिशा के बीच का कोण
इस सूत्र के अनुसार, बल F का मान sinθ के मान पर निर्भर करता है। sinθ का अधिकतम मान 1 होता है, जब θ = 90° होता है।
निष्कर्ष: अतः चुंबकीय क्षेत्र में स्थित धारावाही चालक पर आरोपित बल अधिकतम तब होता है जब चालक चुंबकीय क्षेत्र की दिशा के लंबवत (90° पर) होता है।
प्रश्न 10.
मान लीजिए आप किसी चैंबर में अपनी पीठ को किसी एक दीवार से लगाकर बैठे हैं। कोई इलेक्ट्रॉन पुंज आपके पीछे की दीवार से सामने वाली दीवार की ओर क्षैतिजतः गमन करते हुए किसी प्रबल चुंबकीय क्षेत्र द्वारा आपके दाई ओर विक्षेपित हो जाता है। चुंबकीय क्षेत्र की दिशा क्या है?
चुंबकीय क्षेत्र की दिशा: ऊर्ध्वाधरतः नीचे की ओर (या सीधे फर्श की ओर)।
स्पष्टीकरण: इस प्रश
प्रश्न 12. ऐसी कुछ युक्तियों के नाम लिखिए जिनमें विद्युत मोटर उपयोग किए जाते हैं।
उत्तर:
विद्युत मोटर का उपयोग बहुत सारे घरेलू और औद्योगिक उपकरणों में किया जाता है। कुछ मुख्य युक्तियाँ निम्नलिखित हैं:
- विद्युत पंखा
- कूलर
- वाशिंग मशीन
- मिक्सर ग्राइंडर
- एयर कंडीशनर
- पानी का पंप
- कंप्यूटर के सीडी/डीवीडी ड्राइव और हार्ड डिस्क
- खिलौना कार या रिमोट कंट्रोल वाले वाहन
- विद्युत दरवाजा या गेट ऑपरेटर
प्रश्न 13, कोई विद्युतरोधी ताँबे के तार की कुंडली किसी गैल्वेनोमीठर से संयोजित है। क्या होगा यदि कोई छड़ चुंबक -
1. कुंडली में घकेला जाता है।
2. कुंडली के भीतर से बाहर खींचा जाता है।
3. कुंडली के भीतर स्थिर रखा जाता है।
उत्तर:
- कुंडली में घकेला जाता है: जब छड़ चुंबक को कुंडली की ओर घकेला जाता है, तो कुंडली से गुजरने वाली चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की संख्या में परिवर्तन होता है। इस परिवर्तन के कारण कुंडली में प्रेरित विद्युत धारा उत्पन्न होती है। यह धारा गैल्वेनोमीटर से होकर बहती है, जिससे गैल्वेनोमीटर का सूई विक्षेपित हो जाता है।
- कुंडली के भीतर से बाहर खींचा जाता है: जब छड़ चुंबक को कुंडली के अंदर से बाहर की ओर खींचा जाता है, तो फिर से कुंडली से गुजरने वाली चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की संख्या में परिवर्तन होता है। इससे कुंडली में फिर से प्रेरित धारा उत्पन्न होती है। हालाँकि, इस बार चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन की दिशा पहले के विपरीत होती है, इसलिए प्रेरित धारा की दिशा भी विपरीत होगी। परिणामस्वरूप, गैल्वेनोमीटर का सूई विपरीत दिशा में विक्षेपित होगा।
- कुंडली के भीतर स्थिर रखा जाता है: जब छड़ चुंबक कुंडली के अंदर स्थिर रखा जाता है, तो कुंडली से गुजरने वाली चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की संख्या में कोई परिवर्तन नहीं होता। चुंबकीय फ्लक्स स्थिर रहता है। विद्युत चुंबकीय प्रेरण के नियम के अनुसार, चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन ही प्रेरित धारा उत्पन्न करता है। चूँकि यहाँ कोई परिवर्तन नहीं है, इसलिए कुंडली में कोई प्रेरित धारा उत्पन्न नहीं होती और गैल्वेनोमीटर का सूई शून्य विक्षेप दिखाता है (कोई विक्षेप नहीं होता)।
प्रश्न 14. दो वृत्ताकार कुंडली A तथा B एक-दूसरे के निकट स्थित हैं। यदि कंडली A में विद्युत धारा में कोई परिवर्तन करें तो क्या कुंडली B में कोई विद्युत धार प्रेरित होगी? कारण लिखिए।
उत्तर:
हाँ, कुंडली A में विद्युत धारा में परिवर्तन करने पर कुंडली B में प्रेरित विद्युत धारा उत्पन्न होगी।
कारण: जब कुंडली A में विद्युत धारा प्रवाहित होती है, तो उसके चारों ओर एक चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। चूँकि कुंडली B, कुंडली A के बहुत निकट स्थित है, यह चुंबकीय क्षेत्र कुंडली B से भी गुजरता है। जब हम कुंडली A में धारा का मान बढ़ाते या घटाते हैं (धारा में परिवर्तन करते हैं), तो उसके द्वारा उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र की प्रबलता भी बदल जाती है। इसका मतलब है कि कुंडली B से गुजरने वाले चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है। विद्युत चुंबकीय प्रेरण के फैराडे के नियम के अनुसार, जब किसी बंद कुंडली से संबद्ध चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है, तो उस कुंडली में एक प्रेरित विद्युत वाहक बल (emf) उत्पन्न हो जाता है। यदि कुंडली B एक बंद परिपथ से जुड़ी है, तो इस प्रेरित emf के कारण उसमें प्रेरित धारा बहने लगती है।
प्रश्न 15. निम्नलिखित की दिशा को निर्धारित करने वाला नियम लिखिए -
1. किसी विद्युत धारावाही सीधे चालक के चारों ओर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र
2. किसी चुंबकीय क्षेत्र में, क्षेत्र के लंबवत् स्थित, विद्युत धारावाही सीधे चालक पर आरोपित बल तथा
3. किसी चुंबकीय क्षेत्र में किसी कुंडली के घूर्णन करने पर उस कुंडली में उत्पन्न प्रेरित विद्युत घारा।
उत्तर:
- दक्षिण-हस्त अंगुष्ठ नियम (मैक्सवेल का दाएँ हाथ का नियम): इस नियम का उपयोग किसी सीधे धारावाही चालक के चारों ओर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र की दिशा ज्ञात करने के लिए किया जाता है।
विधि: दाएँ हाथ से चालक को इस प्रकार पकड़िए कि अंगूठा चालक में प्रवाहित विद्युत धारा की दिशा (निम्न विभव से उच्च विभव की ओर) को इंगित करे। तब चालक को पकड़ने वाली अंगुलियों की मुड़ी हुई दिशा चालक के चारों ओर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा बताती है। - फ्लेमिंग का वाम-हस्त नियम: इस नियम का उपयोग किसी चुंबकीय क्षेत्र में रखे धारावाही चालक पर लगने वाले बल की दिशा ज्ञात करने के लिए किया जाता है।
विधि: अपने बाएँ हाथ की तर्जनी, मध्यमा और अंगूठे को एक-दूसरे के परस्पर लंबवत फैलाइए (जैसा चित्र में दिखाया गया है)।
- तर्जनी (Forefinger) चुंबकीय क्षेत्र की दिशा (उत्तर से दक्षिण) की ओर इंगित करे।
- मध्यमा (Middle finger) चालक में प्रवाहित विद्युत धारा की दिशा की ओर इंगित करे।
- फ्लेमिंग का दक्षिण-हस्त नियम: इस नियम का उपयोग किसी चुंबकीय क्षेत्र में गतिशील चालक (या घूमती हुई कुंडली) में उत्पन्न प्रेरित धारा की दिशा ज्ञात करने के लिए किया जाता है।
विधि: अपने दाएँ हाथ की तर्जनी, मध्यमा और अंगूठे को एक-दूसरे के परस्पर लंबवत फैलाइए।
- तर्जनी (Forefinger) चुंबकीय क्षेत्र की दिशा (उत्तर से दक्षिण) की ओर इंगित करे।
- अंगूठा (Thumb) चालक (या कुंडली) की गति की दिशा की ओर इंगित करे।
प्रश्न 16. नामांकित आरेख खींचकर किसी विद्युत जनित्र का मूल सिद्धांत तथा कार्यविधि स्पष्ट कीजिए। इसमें ब्रशों का कया कार्य है? । (2009, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18)
उत्तर:
विद्युत जनित्र (डायनेमो): विद्युत जनित्र एक ऐसा यंत्र है जो यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है। यह विद्युत चुंबकीय प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है।
मूल सिद्धांत: जब किसी बंद चालक कुंडली (या कुंडली के एक भाग) को किसी शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र में तेजी से घुमाया जाता है, तो कुंडली से संबद्ध चुंबकीय फ्लक्स में लगातार परिवर्तन होता रहता है। फैराडे के नियम के अनुसार, चुंबकीय फ्लक्स में यह परिवर्तन कुंडली में एक प्रेरित विद्युत वाहक बल (emf) उत्पन्न कर देता है। यदि कुंडली एक बाह्य परिपथ से जुड़ी हो, तो इस प्रेरित emf के कारण परिपथ में प्रेरित विद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है। इस प्रकार, कुंडली को घुमाने में लगाई गई यांत्रिक ऊर्जा विद्युत ऊर्जा में बदल जाती है।
(यहाँ विद्युत जनित्र का एक नामांकित आरेख होना चाहिए। चूंकि यहाँ आरेख खींचना संभव नहीं है, इसलिए इसके मुख्य भागों का वर्णन किया जा रहा है।)
मुख्य भाग एवं कार्यविधि: एक सरल प्रत्यावर्ती धारा (AC) जनित्र में निम्नलिखित मुख्य भाग होते हैं:
- क्षेत्र चुंबक (Field Magnet): यह एक शक्तिशाली चुंबक (स्थायी या विद्युत चुंबक) होता है जो दो ध्रुवों (उत्तर N और दक्षिण S) के बीच एक प्रबल चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करता है।
- आर्मेचर (Armature): यह ताँबे के विद्युतरोधी तार की एक आयताकार कुंडली ABCD होती है, जिसे एक नर्म लोहे के क्रोड पर लपेटा जाता है। इस कुंडली को चुंबकीय क्षेत्र के बीच एक क्षैतिज अक्ष पर रखकर बाहरी स्रोत (जैसे पानी का टरबाइन, डीजल इंजन) द्वारा घुमाया जाता है।
- सर्पी वलय एवं ब्रश (Slip Rings and Brushes): कुंडली के दोनों सिरे दो अलग-अलग धातु के वलयों (R1 और R2) से जुड़े होते हैं, जिन्हें सर्पी वलय कहते हैं। ये वलय कुंडली के साथ घूमते हैं। दो कार्बन की पट्टियाँ, जिन्हें ब्रश (B1 और B2) कहते हैं, इन सर्पी वलयों पर हल्का दबाव बनाए रखती हैं। ये ब्रश स्थिर रहते हैं और बाह्य परिपथ (जैसे बल्ब) से जुड़े होते हैं।
कार्यविधि: जब आर्मेचर कुंडली को चुंबकीय क्षेत्र में घुमाया जाता है, तो कुंडली की भुजाएँ AB और CD चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं को काटती हैं। इससे कुंडली में प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है। कुंडली के घूमने के साथ-साथ, चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन की दर बदलती रहती है, जिसके कारण प्रेरित emf और धारा की दिशा एवं परिमाण भी बदलता रहता है। एक पूर्ण घूर्णन के दौरान धारा की दिशा दो बार उलट जाती है, जिससे प्रत्यावर्ती धारा (AC) प्राप्त होती है। यह प्रेरित धारा सर्पी वलयों और ब्रशों के माध्यम से बाह्य परिपथ में प्रवाहित होती है।
ब्रशों का कार्य: ब्रशों का मुख्य कार्य घूमती हुई कुंडली (सर्पी वलयों के माध्यम से) और स्थिर बाह्य परिपथ के बीच विद्युत संपर्क स्थापित करना है। वे सर्पी वलयों पर हल्का दबाव बनाए रखते हैं, जिससे कुंडली में उत्पन्न प्रेरित धारा निर्बाध रूप से बाह्य परिपथ में प्रवाहित हो सके। ब्रश कार्बन के बने होते हैं क्योंकि कार्बन एक अच्छा चालक है और घर्षण के कारण आसानी से घिसता नहीं है।
प्रश्न 17.
किसी विद्युत परिपथ में लघुपथन कब होता है?
उत्तर देखें
लघुपथन तब होता है जब किसी विद्युत परिपथ में फेज (जीवित) तार और न्यूट्रल (उदासीन) तार सीधे एक-दूसरे से संपर्क में आ जाते हैं। ऐसा तारों के इन्सुलेशन के क्षतिग्रस्त होने, ढीले कनेक्शन, या किसी दोषपूर्ण उपकरण के कारण हो सकता है। इस सीधे संपर्क के कारण परिपथ का प्रतिरोध लगभग शून्य हो जाता है, जिससे ओम के नियम (I = V/R) के अनुसार धारा का मान बहुत अधिक (अनंत के करीब) हो जाता है। यह अत्यधिक धारा तारों को गर्म कर सकती है, जिससे आग लगने या विद्युत उपकरणों को क्षति पहुँचने का खतरा रहता है।
प्रश्न 18.
भूसंपर्क तार का क्या कार्य है? धातु के आवरण वाले विद्युत साधित्रों को भूसंपर्कित करना क्यों आवश्यक है?
उत्तर देखें
भूसंपर्क तार एक सुरक्षात्मक तार होता है जो विद्युत उपकरण के धात्विक आवरण (बॉडी) को पृथ्वी (ग्राउंड) से जोड़ता है। इसका मुख्य कार्य उपयोगकर्ता को बिजली के झटके से बचाना है।
धातु के आवरण वाले उपकरणों (जैसे रेफ्रिजरेटर, वॉशिंग मशीन, आयरन) को भूसंपर्कित करना इसलिए आवश्यक है क्योंकि अगर किसी कारण (जैसे तार का इन्सुलेशन टूटना, भीतरी शॉर्ट सर्किट) से उपकरण के धात्विक आवरण में विद्युत धारा आ जाती है, तो वह धारा कम प्रतिरोध वाले भूसंपर्क तार के रास्ते सीधे पृथ्वी में चली जाएगी। इससे उपकरण का आवरण विद्युत-विभव पर नहीं रहेगा और कोई व्यक्ति उसे छू ले तो उसे खतरनाक झटका नहीं लगेगा। यह तार एक सुरक्षा वाल्व का काम करता है जो अतिरिक्त धारा को सुरक्षित रूप से पृथ्वी में भेज देता है।
Bihar Board Class 10 Science अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
एक गतिमान आवेशित कण उत्पन्न करता है - (2013, 14, 16)
(a) केवल चुम्बकीय क्षेत्र
(b) केवल विद्युत क्षेत्र
(c) चुम्बकीय व विद्युत क्षेत्र दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर देखें
(c) चुम्बकीय व विद्युत क्षेत्र दोनों
एक आवेशित कण, चाहे वह गतिमान हो या स्थिर, अपने चारों ओर एक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करता है। जब यही आवेशित कण गति करता है, तो यह एक चुम्बकीय क्षेत्र भी उत्पन्न करता है। इस प्रकार, एक गतिमान आवेशित कण दोनों प्रकार के क्षेत्रों का स्रोत होता है।
प्रश्न 2.
चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता का मात्रक है - (2012, 13)
(a) न्यूटन/ऐम्पियर-मी?
(b) न्यूटन/ऐम्पियर-मी (टेस्ला)
(c) न्यूटन-ऐम्पियर-मी
(d) न्यूटन/ऐम्पियर-मी
उत्तर देखें
(b) न्यूटन/ऐम्पियर-मी (टेस्ला)
चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता (B) का SI मात्रक टेस्ला (T) है। इसे मूल मात्रकों में न्यूटन प्रति ऐम्पियर-मीटर (N/A·m) के रूप में भी व्यक्त किया जाता है। यह मात्रक इस बात को दर्शाता है कि 1 मीटर लंबे चालक पर, जिसमें 1 ऐम्पियर धारा प्रवाहित हो रही है, 1 टेस्ला के चुम्बकीय क्षेत्र में 1 न्यूटन का बल लगेगा।
प्रश्न 3.
कौन-सा चुम्बकीय क्षेत्र का मात्रक नहीं है? (2012, 17, 18)
(a) वेबर/मीटर²
(b) टेस्ला
(c) गौस
(d) न्यूटन/ऐम्पियर²
उत्तर देखें
(d) न्यूटन/ऐम्पियर²
चुम्बकीय क्षेत्र के मात्रक हैं: टेस्ला (T), गौस (G, जहाँ 1 T = 10⁴ G), और वेबर/मीटर² (Wb/m², क्योंकि चुम्बकीय फ्लक्स घनत्व B = Φ/A)। न्यूटन/ऐम्पियर² (N/A²) चुम्बकीय क्षेत्र का मात्रक नहीं है; यह चुम्बकशीलता (पर्मिएबिलिटी) के मात्रक के रूप में प्रयुक्त हो सकता है।
प्रश्न 4.
'वेबर' किस राशि का मात्रक है? (2018)
(a) चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता
(b) चुम्बकीय फ्लक्स
(c) चुम्बकीय फ्लक्स घनत्व
(d) विद्युत क्षेत्र की तीव्रता
उत्तर देखें
(b) चुम्बकीय फ्लक्स
वेबर (Wb) चुम्बकीय फ्लक्स (Φ) का SI मात्रक है। चुम्बकीय फ्लक्स किसी दिए गए सतह क्षेत्र से गुजरने वाली चुम्बकीय बल रेखाओं की कुल संख्या का माप है। 1 वेबर = 1 टेस्ला × 1 मीटर²।
प्रश्न 5.
1 टेसला बराबर होता है - (2015)
(a) 1 वेबर/मी²
(b) 1 गॉस
(c) 10⁷ वेबर/मीटर²
(d) 10⁻⁷ गॉस
उत्तर देखें
(a) 1 वेबर/मी²
चुम्बकीय फ्लक्स घनत्व (B) की परिभाषा के अनुसार, B = Φ/A, जहाँ Φ फ्लक्स है और A क्षेत्रफल है। इसलिए, इसका मात्रक वेबर प्रति वर्ग मीटर (Wb/m²) होता है, जिसे टेस्ला (T) कहते हैं। अतः, 1 टेस्ला = 1 वेबर/मीटर²।
प्रश्न 6.
चुम्बकीय क्षेत्र में गतिमान आवेश पर लगने वाले बल की दिशा ज्ञात की जाती है - (2012, 13)
(a) दाहिने हाथ के अंगठे के नियम से
(b) फ्लेमिंग के दाएँ हाथ के नियम से
(c) फ्लेमिंग के बायें हाथ के नियम से
(d) ऐम्पियर के नियम से
उत्तर देखें
(c) फ्लेमिंग के बायें हाथ के नियम से
फ्लेमिंग के बाएँ हाथ का नियम चुम्बकीय क्षेत्र में रखे धारावाही चालक पर लगने वाले बल की दिशा ज्ञात करने के लिए प्रयोग किया जाता है। इसे गतिमान आवेश (जो धारा का ही एक रूप है) पर लगने वाले बल की दिशा ज्ञात करने के लिए भी लागू किया जा सकता है। इस नियम में बाएँ हाथ के अंगूठे, तर्जनी और मध्यमा को परस्पर लंबवत रखा जाता है: तर्जनी चुम्बकीय क्षेत्र (B), मध्यमा धारा (I) की दिशा, और अंगूठा बल (F) की दिशा बताता है।
प्रश्न 7.
एक इलेक्ट्रॉन वेग v से एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र B के लम्बवत् गति कर रहा है। इलेक्ट्रॉन पर लगने वाला बल होगा - (2011, 13)
(a) ev²B
(b) evB
(c) eB / v
(d) e / vB
उत्तर देखें
(b) evB
चुम्बकीय क्षेत्र में गतिमान आवेशित कण पर लगने वाले बल (लॉरेंज बल) का सूत्र F = q(v × B) है। जब वेग (v) और चुम्बकीय क्षेत्र (B) परस्पर लंबवत (90°) होते हैं, तो बल का परिमाण F = q v B sin90° = q v B होता है। इलेक्ट्रॉन पर आवेश e होता है, इसलिए उस पर लगने वाला बल F = e v B होगा।
प्रश्न 8.
किसी धारावाही चालक में बहने वाली धारा I और लम्बाई l को लम्बवत् B तीव्रता वाले चुम्बकीय क्षेत्र में रखा गया है। उस पर लगने वाला बल है (2014, 17)
(a) I / B l
(b) B / I l
(c) I B l
(d) I B / l
उत्तर देखें
(c) I B l
जब लंबाई l का एक सीधा चालक, जिसमें धारा I प्रवाहित हो रही है, एक समान चुम्बकीय क्षेत्र B में रखा जाता है और चालक, धारा की दिशा एवं चुम्बकीय क्षेत्र परस्पर लंबवत होते हैं, तो चालक पर लगने वाले चुम्बकीय बल का परिमाण F = I l B होता है। यह सूत्र फ्लेमिंग के बाएँ हाथ के नियम से प्राप्त होता है।
प्रश्न 9.
B, A और Φ क्रमशः चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता, क्षेत्रफल व फ्लक्स के संकेत हैं। इनके बीच सम्बन्ध है - (2016)
(a) Φ = B . A
(b) B = Φ . A
(c) A = B Φ
(d) A B Φ = 1
उत्तर देखें
(a) Φ = B . A
चुम्बकीय फ्लक्स (Φ) की परिभाषा से, यह चुम्बकीय क्षेत्र (B) और उस क्षेत्र के लंबवत सतह के क्षेत्रफल (A) के गुणनफल के बराबर होता है। अतः सही संबंध Φ = B × A है, बशर्ते कि चुम्बकीय क्षेत्र सतह के लंबवत हो। यदि नहीं, तो Φ = B A cosθ, जहाँ θ क्षेत्र और सतह के अभिलंब के बीच का कोण है।
प्रश्न 10.
विद्युत मोटर परिवर्तित करता है।
(a) विद्युत ऊर्जा को ध्वनि ऊर्जा में
(b) विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में
(c) यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में
(d) रासायनिक ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में
उत्तर देखें
(b) विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में
विद्युत मोटर एक ऐसी युक्ति है जो विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में बदलती है। यह चुम्बकीय क्षेत्र में धारावाही कुंडली पर लगने वाले बल के सिद्धांत पर काम करती है, जिससे कुंडली घूमने लगती है और इस घूर्णन गति का उपयोग पंखे, पानी के पंप, मिक्सर आदि चलाने के लिए किया जाता है।
प्रश्न 11.
विद्युत चुम्बकीय प्रेरण में एक कुण्डली में प्रेरित विद्युत वाहक बल अनुक्रमानुपाती होता है -
(a) चुम्बकीय फ्लक्स के
(b) परिपथ के प्रतिरोध के
(c) चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन के
(d) चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन की दर के
उत्तर देखें
(d) चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन की दर के
फैराडे के विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के नियम के अनुसार, किसी कुंडली में प्रेरित विद्युत वाहक बल (emf) का परिमाण, उस कुंडली से गुजरने वाले चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन की दर के अनुक्रमानुपाती होता है। गणितीय रूप में, ε = -N (ΔΦ/Δt), जहाँ N फेरों की संख्या है। यह फ्लक्स के केवल मान पर नहीं, बल्कि उसके समय के साथ बदलने की दर पर निर्भर करता है।
प्रश्न 12.
विद्युत धारा उत्पन्न करने की युक्ति है - (2016)
(a) जनित्र
(b) गैल्वेनोमीटर
(c) अमीटर
(d) मोटर
उत्तर देखें
(a) जनित्र
जनित्र (Generator) वह युक्ति है जो यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलकर विद्युत धारा उत्पन्न करती है। यह विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है। गैल्वेनोमीटर और अमीटर धारा का पता लगाने और मापने के लिए होते हैं, जबकि मोटर विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में बदलती है।
प्रश्न 13.
डायनमो उत्पन्न करता है - (2016)
(a) आवेश
(b) विद्युत वाहक बल
(c) विद्युत क्षेत्र
(d) चुम्बकीय क्षेत्र
उत्तर देखें
(b) विद्युत वाहक बल
डायनमो (Dynamo), जो एक प्रकार का जनित्र ही है, यांत्रिक घूर्णन ऊर्जा का उपयोग करके एक कुंडली में विद्युत वाहक बल (emf) उत्पन्न करता है। यह emf ही बंद परिपथ में विद्युत धारा प्रवाहित करने का कारण बनता है। डायनमो स्वयं आवेश या चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न नहीं करता, बल्कि चुम्बकीय क्षेत्र में कुंडली के घूमने से emf प्रेरित करता है।
प्रश्न 14.
डायनमो परिवर्तित करता है - (2018)
(a) रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में
(b) ध्वनि ऊर्जा को चुम्बकीय ऊर्जा में
(c) यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में
(d) यांत्रिक ऊर्जा को प्रकाश ऊर्जा में
उत्तर देखें
(c) यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में
डायनमो एक ऊर्जा परिवर्तक युक्ति है। यह साइकिल के पहिए, पानी का टरबाइन, या हाथ से घुमाने जैसे स्रोतों से प्राप्त यांत्रिक ऊर्जा (घूर्णन गति) को लेकर उसे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित कर देता है। यह सेल या बैटरी के विपरीत है, जो रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलते हैं।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
धारा की दिशा बदलने पर परिनालिका की ध्रुवता पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर देखें
धारा की दिशा बदलने पर परिनालिका के चुम्बकीय ध्रुव (उत्तरी और दक्षिणी) उलट जाते हैं। यदि धारा की दिशा उलट दी जाए, तो पहले जो सिरा उत्तरी ध्रुव था, वह दक्षिणी ध्रुव बन जाएगा और जो दक्षिणी ध्रुव था, वह उत्तरी ध्रुव बन जाएगा। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि परिनालिका का चुम्बकीय क्षेत्र उसमें प्रवाहित धारा की दिशा पर निर्भर करता है, जिसे दाहिने हाथ के अंगूठे के नियम से ज्ञात किया जा सकता है।
प्रश्न 2.
चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता का मात्रक S.I. पद्धति में बताइए। (2011, 16)
उत्तर देखें
अंतर्राष्ट्रीय मात्रक पद्धति (S.I. पद्धति) में चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता (चुम्बकीय फ्लक्स घनत्व) का मात्रक टेस्ला (T) है।
1 टेस्ला को मूल मात्रकों में 1 वेबर प्रति वर्ग मीटर (1 Wb/m²) या 1 न्यूटन प्रति ऐम्पियर-मीटर (1 N/A·m) के रूप में भी व्यक्त किया जाता है।
प्रश्न 3.
अनन्त लम्बाई के सीधे धारावाही चालक के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता का सूत्र लिखिए। (2012, 14)
उत्तर देखें
अनंत लंबाई के सीधे धारावाही चालक के कारण, उससे r दूरी पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता (B) का सूत्र है:
B = चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता (टेस्ला में)
μ₀ = निर्वात की चुम्बकशीलता (4π × 10⁻⁷ T m/A)
I = चालक में प्रवाहित धारा (ऐम्पियर में)
r = चालक से बिंदु की लंबवत दूरी (मीटर में)
इस सूत्र से स्पष्ट है कि चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता धारा (I) के अनुक्रमानुपाती और दूरी (r) के व्युत्क्रमानुपाती होती है।
प्रश्न 1. किसी चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित विद्युत धारावाही चालक पर लगने वाले बल की दिशा किस नियम से प्राप्त की जाती है?
किसी चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित विद्युत धारावाही चालक पर लगने वाले बल की दिशा फ्लेमिंग के बायें हाथ का नियम से प्राप्त की जाती है।
इस नियम के अनुसार, यदि हम अपने बाएँ हाथ के अंगूठे, तर्जनी और मध्यमा को एक-दूसरे के लंबवत फैलाएँ, तो:
- तर्जनी चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा (उत्तर से दक्षिण) बताती है।
- मध्यमा चालक में प्रवाहित विद्युत धारा की दिशा बताती है।
- अंगूठा चालक पर लगने वाले बल की दिशा बताता है।
प्रश्न 2. विद्युत मोटर का क्या सिद्धान्त है?
विद्युत मोटर का सिद्धान्त यह है कि जब किसी धारावाही चालक को चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है, तो उस पर एक यांत्रिक बल लगता है, जिसके कारण चालक में गति उत्पन्न होती है।
इस सिद्धान्त का उपयोग करके विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में बदला जाता है। मोटर में एक आयताकार कुंडली को शक्तिशाली चुम्बक के ध्रुवों के बीच रखा जाता है। जब कुंडली में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो फ्लेमिंग के बाएँ हाथ के नियम के अनुसार उस पर एक बल-युग्म लगता है, जो कुंडली को घुमा देता है। कम्यूटेटर (दिक्परिवर्तक) धारा की दिशा को आवश्यकतानुसार बदलता रहता है, जिससे कुंडली का निरंतर घूर्णन जारी रहता है।
प्रश्न 3. विद्युत मोटर में विभक्त वलय (split ring) का क्या कार्य है?
विद्युत मोटर में विभक्त वलय (split ring) या दिक्परिवर्तक (commutator) का मुख्य कार्य कुंडली में प्रवाहित विद्युत धारा की दिशा को प्रत्येक आधे घूर्णन के बाद उलट देना है।
जब कुंडली आधा चक्कर लगा लेती है, तो उस पर लगने वाला बल उसे विपरीत दिशा में घुमाने लगता है, जिससे कुंडली रुक सकती है। विभक्त वलय इस समस्या का समाधान करता है। यह दो अर्धवृत्ताकार टुकड़ों से बना होता है जो कुंडली के सिरों से जुड़े होते हैं। जैसे ही कुंडली आधा चक्कर पूरा करती है, विभक्त वलय ब्रशों के संपर्क को बदल देता है, जिससे कुंडली में धारा की दिशा उलट जाती है और कुंडली पर लगने वाला बल उसे उसी दिशा में घुमाता रहता है। इस प्रकार कुंडली का निरंतर घूर्णन संभव हो पाता है।
प्रश्न 4. किसी कुण्डली में विद्युत धारा प्रेरित करने के विभिन्न ढंग स्पष्ट कीजिए।
किसी कुण्डली में विद्युत धारा प्रेरित करने के दो मुख्य ढंग निम्नलिखित हैं:
- चुम्बक और कुण्डली के बीच सापेक्ष गति कराना: जब किसी चुम्बक को कुण्डली के समीप लाया जाता है या दूर ले जाया जाता है, अर्थात् चुम्बकीय क्षेत्र में परिवर्तन होता है, तो कुण्डली में विद्युत धारा प्रेरित हो जाती है।
- दो कुण्डलियों के बीच सापेक्ष गति: यदि एक कुण्डली (प्राथमिक कुण्डली) में बहने वाली विद्युत धारा के मान में परिवर्तन किया जाए, तो उसके पास रखी दूसरी कुण्डली (द्वितीयक कुण्डली) से संबद्ध चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं में परिवर्तन होता है, जिससे द्वितीयक कुण्डली में विद्युत धारा प्रेरित हो जाती है।
दोनों ही स्थितियों में, कुण्डली से गुजरने वाली चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं की संख्या में परिवर्तन ही प्रेरित धारा का कारण बनता है। इसे विद्युत चुम्बकीय प्रेरण का सिद्धान्त कहते हैं।
प्रश्न 5. विद्युत जनित्र का सिद्धान्त लिखिए।
विद्युत जनित्र (जनरेटर) का सिद्धान्त विद्युत चुम्बकीय प्रेरण पर आधारित है। इस सिद्धान्त के अनुसार, जब किसी चालक (जैसे कुण्डली) को किसी शक्तिशाली चुम्बकीय क्षेत्र में घुमाया जाता है, तो चालक से गुजरने वाली चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं में लगातार परिवर्तन होता रहता है। इस परिवर्तन के कारण चालक (कुण्डली) में विद्युत वाहक बल (emf) प्रेरित हो जाता है, जिससे परिपथ पूरा होने पर विद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है।
दूसरे शब्दों में, जनित्र यांत्रिक ऊर्जा (कुण्डली को घुमाने में लगी ऊर्जा) को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करने का उपकरण है।
प्रश्न 6. किसी विद्युत परिपथ में लघुपथन (short circuit) कब होता है?
किसी विद्युत परिपथ में लघुपथन (short circuit) तब होता है जब फेज (जीवित) तार और न्यूट्रल (उदासीन) तार आपस में सीधे संपर्क में आ जाते हैं, बिना किसी उपकरण (जैसे बल्ब, पंखा आदि) के प्रतिरोध के।
ऐसा तारों के इन्सुलेशन के क्षतिग्रस्त होने, ढीले कनेक्शन, या किसी दुर्घटना के कारण हो सकता है। लघुपथन के कारण परिपथ का कुल प्रतिरोध अचानक बहुत कम हो जाता है, जिससे परिपथ में बहुत अधिक मात्रा में विद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है। यह अत्यधिक धारा तारों को अत्यधिक गर्म कर सकती है, जिससे आग लगने या विद्युत झटका लगने का खतरा होता है। इससे बचने के लिए फ्यूज या सर्किट ब्रेकर का उपयोग किया जाता है।
प्रश्न 7. फ्यूज क्या है और इसका क्या कार्य है?
फ्यूज एक सुरक्षा उपकरण है जो किसी विद्युत परिपथ का एक महत्वपूर्ण अंग होता है। यह एक पतले टिन-ताँबे के तार का टुकड़ा होता है जिसका गलनांक कम होता है।
फ्यूज का कार्य: फ्यूज का मुख्य कार्य परिपथ और विद्युत उपकरणों को अत्यधिक धारा (जो लघुपथन या अतिभार के कारण उत्पन्न होती है) से बचाना है। जब परिपथ में सामान्य से अधिक धारा प्रवाहित होती है, तो फ्यूज का तार अत्यधिक ऊष्मा के कारण पिघल (गल) जाता है और परिपथ को तोड़ देता है। इससे विद्युत धारा का प्रवाह रुक जाता है और आग लगने या उपकरणों के खराब होने का खतरा टल जाता है। फ्यूज को हमेशा फेज (जीवित) तार में लगाया जाता है।
प्रश्न 8. निम्नलिखित के कारण स्पष्ट कीजिए-
(क) विद्युत हीटर या इस्तरी (प्रेस) में चमकने वाला तत्व मैंगनीन या नाइक्रोम का बना होता है।
(ख) विद्युत लैम्पों के तन्तु (फिलामेन्ट) comparatively पतले होते हैं।
(ग) धारा वाहक तारों में एक साथ कई पतले तारों का बंडल उपयोग किया जाता है।
(क) विद्युत हीटर या इस्तरी में चमकने वाला तत्व मैंगनीन या नाइक्रोम का बनाया जाता है क्योंकि:
- इन मिश्र धातुओं का प्रतिरोध अधिक होता है, जिससे विद्युत ऊर्जा का ऊष्मा ऊर्जा में प्रभावी रूपांतरण होता है।
- इनका गलनांक बहुत उच्च होता है, इसलिए अधिक तापमान पर भी ये पिघलते नहीं हैं।
- ये उपचयन (जंग) के प्रति प्रतिरोधी होते हैं, जिससे उनकी आयु लंबी होती है।
(ख) विद्युत लैम्पों के तन्तु (फिलामेन्ट) comparatively पतले होते हैं क्योंकि:
- किसी चालक का प्रतिरोध उसकी मोटाई (अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल) के व्युत्क्रमानुपाती होता है। पतले तन्तु का प्रतिरोध अधिक होता है।
- जब इस अधिक प्रतिरोध वाले पतले तन्तु में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो यह बहुत अधिक गर्म हो जाता है (लगभग 2500°C) और चमकने लगता है, जिससे प्रकाश उत्पन्न होता है।
- तन्तु टंगस्टन के बने होते हैं जिसका गलनांक बहुत अधिक होता है, ताकि यह इतने उच्च ताप पर भी पिघले नहीं।
(ग) धारा वाहक तारों में एक साथ कई पतले तारों का बंडल (लचीला तार) उपयोग किया जाता है क्योंकि:
- कई पतले तारों से बने बंडल का कुल अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल एक मोटे ठोस तार के बराबर हो सकता है, जिससे प्रतिरोध वही रहता है।
- यह बंडल अधिक लचीला होता है, जिससे इसे मोड़ना, घुमाना और विभिन्न आकृतियों में लगाना आसान होता है।
- यह टूटने के प्रति अधिक मजबूत होता है। एक मोटे ठोस तार में बार-बार मोड़ने से एक ही स्थान पर दरार आ सकती है, जबकि बंडल में यह खतरा कम होता है।
प्रश्न 9. निम्नलिखित में से कौन-सा चुम्बकीय क्षेत्र के लिए सही है?
(a) चुम्बकीय क्षेत्र रेखा एक संवृत वक्र होती है।
(b) चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ एक-दूसरे को काट सकती हैं।
(c) चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर निर्देशित होती हैं।
(d) किसी बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र रेखा की स्पर्श रेखा उस बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा बताती है।
सही कथन हैं: (a) और (d)
(a) चुम्बकीय क्षेत्र रेखा एक संवृत वक्र होती है। – यह सही है। चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ हमेशा एक संवृत पाश बनाती हैं; वे चुम्बक के उत्तरी ध्रुव से निकलकर दक्षिणी ध्रुव में प्रवेश करती हैं और चुम्बक के अंदर से होकर वापस उत्तरी ध्रुव तक पहुँचती हैं।
(d) किसी बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र रेखा की स्पर्श रेखा उस बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा बताती है। – यह भी सही है। चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा किसी बिंदु पर उस बिंदु से गुजरने वाली क्षेत्र रेखा की स्पर्श रेखा द्वारा निर्धारित होती है।
(b) गलत है क्योंकि चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ एक-दूसरे को कभी नहीं काटतीं। यदि वे काटेंगी तो कटान बिंदु पर क्षेत्र की दो दिशाएँ होंगी, जो असंभव है।
(c) गलत है क्योंकि चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ चुम्बक के उत्तरी ध्रुव से बाहर निकलकर दक्षिणी ध्रुव की ओर जाती हैं (बाहर में), न कि उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर।
प्रश्न 10. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?
(a) विद्युत मोटर विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के सिद्धान्त पर कार्य करता है।
(b) विद्युत जनित्र फ्लेमिंग के दायें हाथ के नियम पर कार्य करता है।
(c) ए.सी. जनित्र ए.सी. विद्युत धारा देता है।
(d) डी.सी. जनित्र में विभक्त वलय होते हैं।
सही कथन हैं: (b), (c), और (d)
(b) विद्युत जनित्र फ्लेमिंग के दायें हाथ के नियम पर कार्य करता है। – यह सही है। फ्लेमिंग के दाएँ हाथ के नियम का उपयोग प्रेरित धारा की दिशा ज्ञात करने के लिए किया जाता है।
(c) ए.सी. जनित्र ए.सी. विद्युत धारा देता है। – यह सही है। प्रत्यावर्ती धारा (AC) जनित्र में सर्पी वलय होते हैं, जो प्रत्येक अर्धचक्र के बाद धारा की दिशा स्वयं बदल देते हैं, जिससे आउटपुट AC प्राप्त होता है।
(d) डी.सी. जनित्र में विभक्त वलय होते हैं। – यह सही है। दिष्ट धारा (DC) जनित्र में दिक्परिवर्तक (विभक्त वलय) लगे होते हैं, जो प्रेरित प्रत्यावर्ती धारा को दिष्ट धारा में बदल देते हैं।
(a) गलत है क्योंकि विद्युत मोटर चुम्बकीय क्षेत्र में धारावाही चालक पर लगने वाले बल के सिद्धान्त (फ्लेमिंग के बाएँ हाथ के नियम) पर कार्य करता है, न कि विद्युत चुम्बकीय प्रेरण पर। विद्युत चुम्बकीय प्रेरण का सिद्धान्त जनित्र (जनरेटर) के कार्य का आधार है।
प्रश्न 6.
किसी चुम्बकीय क्षेत्र में गतिशील आवेशित कण पर लगने वाला बल किन-किन कारकों पर निर्भर करता है? इस बल के लिए आवश्यक सूत्र लिखिए। (2017)
उत्तर:
चुम्बकीय क्षेत्र में गतिशील आवेशित कण पर लगने वाला बल निम्नलिखित चार कारकों पर निर्भर करता है:
- आवेशित कण के आवेश (q) के परिमाण पर।
- कण के वेग (v) के परिमाण पर।
- चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता (B) पर।
- कण के वेग की दिशा और चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा के बीच बने कोण (θ) पर।
- F = चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा आवेशित कण पर लगाया गया बल (न्यूटन में)
- B = चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता (न्यूटन/ऐम्पियर-मीटर में)
- q = आवेशित कण का आवेश (कूलॉम में)
- v = आवेशित कण का वेग (मीटर/सेकंड में)
- θ = वेग (v) और चुम्बकीय क्षेत्र (B) की दिशा के बीच का कोण
प्रश्न 7.
SAHA HT BTA 1.6 x 10719 कूलॉम है। यह 1000 न्यूटन/ऐम्पियर-मीटठर के चुम्बकीय क्षेत्र से 30" के कोण पर 5 १10९ मी/ से के वेग से गति कर रहा है। इलेक्ट्रॉन पर आरोपित चुम्बकीय बल की गणना कीजिए। (2011, 13, 14, 16)
हल:
प्रश्नानुसार,
- आवेश, q = 1.6 × 10-19 कूलॉम
- चुम्बकीय क्षेत्र, B = 1000 न्यूटन/ऐम्पियर-मीटर
- वेग, v = 5 × 106 मीटर/सेकंड
- कोण, θ = 30°
मान रखने पर,
प्रश्न 8.
1 मीठर लम्बे विद्युत चाज्षक में 2.0 ऐम्पियर की धारा बह रही है। चालक को 2.5 न्यूटन/ऐम्पियर-मीटर तीव्रता वाले चुम्बकीय क्षेत्र में 30" के कोण पर रखा जाता है। चालक पर लगने वाले चुम्बकीय बल की गणना कीजिए। (2009, ॥ 12, 14, 15, 16, 17, 18) ect:
हल:
प्रश्नानुसार,
- चालक की लम्बाई, l = 1 मीटर
- धारा, i = 2.0 ऐम्पियर
- चुम्बकीय क्षेत्र, B = 2.5 न्यूटन/ऐम्पियर-मीटर
- कोण, θ = 30°
मान रखने पर,
प्रश्न 9,
1 मीठर लम्बे तार में कितनी धारा प्रवाहित की जाये कि उसे 1.2 न्यूटन प्रति ऐम्पियर-मीटर के चुम्बकीय क्षेत्र में लम्बवत् रखने से उस पर 0.128 न्यूटन का बल उत्पन्न हो सके? (2012)
हलः
प्रश्नानुसार,
- चुम्बकीय बल, F = 0.128 न्यूटन
- चालक की लम्बाई, l = 1 मीटर
- चुम्बकीय क्षेत्र, B = 1.2 न्यूटन/ऐम्पियर-मीटर
- कोण, θ = 90° (चूँकि चालक क्षेत्र के लम्बवत् है)
प्रश्न 10.
1.5 मीटर लम्बे तार में 0.5 ऐम्पियर की धारा बह रही है। यह तार 3.0 न्यूटन/ऐम्पियर-मीठर की तीव्रता वाले समरूप चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत् रखा जाता है। उस चालक पर लगने वाले बल की गणना कीजिए। (2014, 15, 17, 18)
हल;
प्रश्नानुसार,
- चालक की लम्बाई, l = 1.5 मीटर
- धारा, i = 0.5 ऐम्पियर
- चुम्बकीय क्षेत्र, B = 3.0 न्यूटन/ऐम्पियर-मीटर
- कोण, θ = 90° (लम्बवत्)
प्रश्न 11.
चुम्बकीय फ्लक्स से क्या तात्पर्य है? इसका मात्रक बताइए। (2009)
उत्तर:
चुम्बकीय फ्लक्स किसी दिए गए क्षेत्रफल से लम्बवत् गुजरने वाली चुम्बकीय बल रेखाओं की कुल संख्या को कहते हैं। इसे प्रायः ग्रीक अक्षर Φ (फाई) से दर्शाया जाता है।
- Φ = चुम्बकीय फ्लक्स
- B = चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता (फ्लक्स घनत्व)
- A = क्षेत्रफल
- θ = चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा और क्षेत्रफल के अभिलम्ब के बीच का कोण
1 वेबर = 1 टेस्ला × 1 मीटर2 (T m2)
इसे न्यूटन-मीटर प्रति ऐम्पियर (N m A-1) के रूप में भी व्यक्त किया जा सकता है।
प्रश्न 12.
एक 0.2 मीटर लम्बे तार में 2 ऐम्पियर की धारा प्रवाहित हो रही है। तार के 0.5 मीटर दूर बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात कीजिए। (५८10० * न्यूटन/ऐम्पियर)
हल:
प्रश्नानुसार,
- धारा, i = 2 ऐम्पियर
- चालक की लम्बाई, l = 0.2 मीटर
- दूरी, r = 0.5 मीटर
- कोण, θ = 90° (माना गया)
- μ0/4π = 10-7 न्यूटन/ऐम्पियर2
प्रश्न 13,
एक लम्बे सीधे तार में 3.0 ऐम्पियर विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। तार से 50 सेमी दूर स्थित बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता (चुम्बकीय फ्लक्स घनत्व) ज्ञात कीजिए। (2009, 1, 12, 15, 16, 17)
हल:
प्रश्नानुसार,
- धारा, i = 3.0 ऐम्पियर
- तार से दूरी, r = 50 सेमी = 0.5 मीटर
- μ0 = 4π × 10-7 न्यूटन/ऐम्पियर2
प्रश्न 14,
50 फेरों वाली एवं 0.5 मीटर क्षेत्रफल वाली तार की एक कुण्डली को 2 ५10 * न्यूटन/ऐम्पियर-मीटर के समचुम्बकीय क्षेत्र में रखने पर कुण्डली से सम्बद्ध फ्लक्स कितना होगा? यदि कुण्डली का तल क्षेत्र के - 1. लम्बवत् हो 2. अनुदिश हो तथा 3. 30” का कोण बनाता है।
हल:
प्रश्नानुसार,
- फेरों की संख्या, N = 50
- क्षेत्रफल, A = 0.5 मी2
- चुम्बकीय क्षेत्र, B = 2 × 10-2 न्यूटन/ऐम्पियर-मीटर = 0.02 T (टेस्ला)
- जब कुण्डली का तल क्षेत्र के लम्बवत् है:
इस स्थिति में क्षेत्र रेखाएँ कुण्डली के तल के समान्तर होंगी, अतः क्षेत्रफल सदिश और चुम्बकीय क्षेत्र के बीच कोण θ = 90° होगा।
Φ = N B A cos90° = 50 × 0.02 × 0.5 × 0 = 0 वेबर (क्योंकि cos90° = 0) - जब कुण्डली का तल क्षेत्र के अनुदिश है:
इस स्थिति में क्षेत्र रेखाएँ कुण्डली के तल के लम्बवत् होंगी, अतः θ = 0° होगा।
Φ = N B A cos0° = 50 × 0.02 × 0.5 × 1 = 0.5 वेबर
उत्तर: 0.5 वेबर - जब कुण्डली का तल क्षेत्र से 30° का कोण बनाता है:
θ = 30°
Φ = N B A cos30° = 50 × 0.02 × 0.5 × (√3/2)
√3/2 ≈ 0.866
Φ = 50 × 0.02 × 0.5 × 0.866 = 0.5 × 0.866 = 0.433 वेबर
उत्तर: लगभग 0.43 वेबर
प्रश्न 15.
1000 फेरों वाली एक वृत्ताकार कुण्डली 0.32 वेबर प्रति मीटर वाले चुम्बकीय क्षेत्र में स्थापित है। इसे 0.2 सेकण्ड के अन्तराल में क्षेत्र से बाहर कर दिया जाता है। कुण्डली से सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन की गणना कीजिए तथा इससे उत्पन्न विद्युत वाहक बल की भी गणना कीजिए। कुण्डली का क्षेत्रफल 0.09 वर्ग मीठर है। (2015, 16)
हल:
प्रश्नानुसार,
- फेरों की संख्या, N = 1000
- चुम्बकीय क्षेत्र, B = 0.32 वेबर/मी2 (या टेस्ला)
- क्षेत्रफल, A = 0.09 मी2
- समय, Δt = 0.2 सेकंड
जब कुण्डली चुम्बकीय क्षेत्र में है, तो उससे सम्बद्ध कुल फ्लक्स (मानते हुए कि कुण्डली का तल क्षेत्र के लम्बवत् है, cosθ=1):
Φप्रारम्भिक = N B A = 1000 × 0.32 × 0.09 = 28.8 वेबर
चरण 2: अन्तिम चुम्बकीय फ्लक्स
जब कुण्डली को क्षेत्र से बाहर कर दिया जाता है, तो उससे सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स शून्य हो जाता है।
Φअन्तिम = 0 वेबर
चरण 3: फ्लक्स परिवर्तन
ΔΦ = Φअन्तिम - Φप्रारम्भिक = 0 - 28.8 = -28.8 वेबर
परिवर्तन का परिमाण = 28.8 वेबर
चरण 4: प्रेरित विद्युत वाहक बल (emf) की गणना
फैराडे के नियमानुसार, प्रेरित emf = -N (ΔΦ/Δt)
परिमाण में, emf = N (|ΔΦ| / Δt) = 1000 × (28.8 / 0.2)
प्रश्न 16.
वैद्युत मोटर व वैद्युत जनित्र के बीच क्या अन्तर है? (2014, 17)
उत्तर:
| आधार | विद्युत मोटर | विद्युत जनित्र (डायनमो) |
|---|---|---|
| कार्य सिद्धान्त | यह फ्लेमिंग के बाएँ हाथ के नियम पर कार्य करता है। चुम्बकीय क्षेत्र में धारावाही चालक पर बल लगता है। | यह विद्युत चुम्बकीय प्रेरण (फैराडे का नियम) के सिद्धान्त पर कार्य करता है। चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन से emf प्रेरित होता है। |
| ऊर्जा रूपान्तरण | विद्युत ऊर्जा को यान्त्रिक ऊर्जा (घूर्णन गति) में बदलता है। | यान्त्रिक ऊर्जा (घूर्णन गति) को विद्युत ऊर्जा में बदलता है। |
| इनपुट / आउटपुट | इनपुट: विद्युत धारा आउटपुट: घूर्णी गति (यान्त्रिक कार्य) |
इनपुट: यान्त्रिक घूर्णन (टरबाइन, इंजन द्वारा) आउटपुट: विद्युत धारा |
| उपयोग | पंखे, वाशिंग मशीन, कार के विंडस्क्रीन वाइपर, लिफ्ट आदि को चलाने में। | बिजलीघरों में, साइकिल डायनमो में, वाहनों के अल्टरनेटर में बिजली उत्पन्न करने के लिए। |
| मुख्य भाग | आर्मेचर (घूमने वाली कुण्डली), ब्रश, स्प्लिट रिंग (दिक्परिवर्तक), स्थायी चुम्बक या विद्युत चुम्बक। | आर्मेचर (घूमने वाली कुण्डली), ब्रश, स्लिप रिंग (प्रत्यावर्ती धारा के लिए) या दिक्परिवर्तक (दिष्ट धारा के लिए), चुम्बक। |
प्रश्न 1. विद्युत धारा के चुम्बकीय प्रभाव की खोज किसने की?
विद्युत धारा के चुम्बकीय प्रभाव की खोज सन् 1820 में डेनमार्क के वैज्ञानिक हेन्स क्रिश्चियन ओर्स्टेड ने की थी। उन्होंने देखा कि जब किसी चालक तार से विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो उसके पास रखी चुम्बकीय सुई विक्षेपित हो जाती है। इस प्रयोग से यह सिद्ध हुआ कि विद्युत धारा एक चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है।
प्रश्न 2. ताँबे के तार की एक आयताकार कुंडली किसी चुम्बकीय क्षेत्र में घूर्णन कर रही है। इस कुंडली में प्रेरित विद्युत धारा की दिशा में कितने परिभ्रमण के पश्चात् परिवर्तन होता है?
ताँबे की आयताकार कुंडली जब चुम्बकीय क्षेत्र में घूमती है, तो प्रेरित विद्युत धारा की दिशा प्रत्येक आधे घूर्णन (180° घूमने) के बाद बदल जाती है। जब कुंडली का एक चक्कर पूरा होता है (360°), तो दिशा में दो बार परिवर्तन हो चुका होता है। यही कारण है कि इस प्रकार के जनित्र से प्रत्यावर्ती धारा (AC) प्राप्त होती है।
प्रश्न 3. विद्युत मोटर में विभक्त वलय की क्या भूमिका है?
विद्युत मोटर में विभक्त वलय (स्प्लिट रिंग) का मुख्य कार्य आर्मेचर कुंडली में प्रवाहित विद्युत धारा की दिशा को प्रत्येक आधे घूर्णन पर बदलना है। यह दिक्परिवर्तक (कम्यूटेटर) के रूप में कार्य करता है। जब आर्मेचर आधा चक्कर लगा लेता है, तो विभक्त वलय ब्रशों के संपर्क को बदल देता है, जिससे कुंडली में धारा की दिशा उलट जाती है। इस प्रक्रिया के कारण आर्मेचर पर लगने वाला बलाघूर्ण हमेशा एक ही दिशा में रहता है और मोटर लगातार एक ही दिशा में घूमती रहती है।
प्रश्न 4. विद्युत जनित्र तथा विद्युत मोटर की कार्यविधि में क्या अंतर है?
| विद्युत जनित्र (Generator) | विद्युत मोटर (Motor) |
|---|---|
| कार्य सिद्धान्त: यह यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलता है। | कार्य सिद्धान्त: यह विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में बदलता है। |
| कार्यविधि: इसमें कुंडली को चुम्बकीय क्षेत्र में घुमाया जाता है, जिससे कुंडली में विद्युत धारा प्रेरित होती है (विद्युत चुम्बकीय प्रेरण)। | कार्यविधि: इसमें चुम्बकीय क्षेत्र में रखी धारावाही कुंडली पर बल आघूर्ण लगता है, जिससे कुंडली घूमने लगती है (चुम्बकीय प्रभाव)। |
| फ्लेमिंग का नियम: फ्लेमिंग के दायें हाथ का नियम इसमें प्रेरित धारा की दिशा ज्ञात करने के लिए प्रयोग किया जाता है। | फ्लेमिंग का नियम: फ्लेमिंग के बायें हाथ का नियम इसमें गति की दिशा ज्ञात करने के लिए प्रयोग किया जाता है। |
प्रश्न 5. किसी कुंडली में विद्युत धारा की प्रबलता में निरंतर परिवर्तन करने पर उससे सम्बद्ध चुम्बकीय बल रेखाओं की संख्या में भी परिवर्तन होता है। इसके कारण कुंडली में ही एक विद्युत वाहक बल प्रेरित हो जाता है। इस परिघटना को क्या कहते हैं?
इस परिघटना को स्वप्रेरण (Self Induction) कहते हैं। जब किसी कुंडली से प्रवाहित धारा में समय के साथ परिवर्तन होता है, तो उसके स्वयं के चुम्बकीय क्षेत्र में भी परिवर्तन होता है। यह परिवर्तित चुम्बकीय क्षेत्र कुंडली में ही एक विद्युत वाहक बल (emf) प्रेरित कर देता है। प्रेरित यह वाहक बल हमेशा उस धारा परिवर्तन का विरोध करने की दिशा में होता है, जिस कारण से यह उत्पन्न हुआ था।
प्रश्न 6. विद्युत परिपथों तथा साधित्रों में सामान्यतः उपयोग होने वाले दो सुरक्षा उपायों के नाम लिखिए।
विद्युत परिपथों तथा साधित्रों में आग और बिजली के झटके से बचाने के लिए सामान्यतः उपयोग होने वाले दो सुरक्षा उपाय हैं:
- विद्युत फ्यूज (Electric Fuse): यह एक पतला तार होता है जिसका गलनांक कम होता है। परिपथ में अत्यधिक धारा प्रवाहित होने पर यह तार पिघलकर टूट जाता है और परिपथ को तोड़ देता है, जिससे उपकरण सुरक्षित रहते हैं।
- अर्थिंग (Earthing) या भू-संपर्कन: इसमें विद्युत उपकरण के धातु के आवरण को भूमि में गाड़े गए धातु के प्लेट से जोड़ दिया जाता है। यदि किसी कारण से लाइव तार आवरण से छू जाए और करंट आ जाए, तो वह धारा सीधे भूमि में चली जाती है, जिससे उपयोगकर्ता को करंट का झटका नहीं लगता।
प्रश्न 7. घरेलू विद्युत परिपथों में अतिभारण से बचाव के लिए क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
घरेलू विद्युत परिपथों में अतिभारण (ओवरलोडिंग) से बचाव के लिए निम्नलिखित सावधानियाँ बरतनी चाहिए:
- एक सॉकेट या एक्सटेंशन बोर्ड से बहुत अधिक उपकरण एक साथ नहीं चलाने चाहिए।
- परिपथ में उचित मान का फ्यूज लगाना चाहिए ताकि अधिक धारा बहने पर वह स्वयं टूट जाए।
- विद्युत तारों की मोटाई (अर्थात उनकी धारा वहन क्षमता) घर में लगे उपकरणों की कुल बिजली खपत के अनुसार होनी चाहिए।
- समय-समय पर तारों और स्विचों की जाँच करते रहना चाहिए कि कहीं ढीलापन या खराबी तो नहीं है।
- उचित शक्ति (वाट) के उपकरण ही उपयोग करने चाहिए, जो परिपथ की क्षमता के अनुरूप हों।
तथा प्रेरित विद्युत वाहक बल का सत्र लिखिए। (2009, 1)
या फ्लेमिंग के दाएँ हाथ का नियम लिखिए। (2015, 16)
फैराडे के विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के नियम:
फैराडे के विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के दो नियम निम्नलिखित हैं:
प्रथम नियम: जब किसी बंद कुंडली से गुजरने वाली चुंबकीय बल रेखाओं (चुंबकीय फ्लक्स) की संख्या में परिवर्तन होता है, तो उस कुंडली में एक प्रेरित विद्युत वाहक बल (emf) उत्पन्न हो जाता है। यह प्रेरित वाहक बल केवल तभी तक बना रहता है, जब तक चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता रहता है।
द्वितीय नियम: किसी कुंडली में उत्पन्न प्रेरित विद्युत वाहक बल का परिमाण, उस कुंडली से गुजरने वाले चुंबकीय फ्लक्स के परिवर्तन की दर के समानुपाती होता है।
गणितीय रूप में, यदि एक कुंडली से गुजरने वाला चुंबकीय फ्लक्स Δt समय में Φ₁ से बदलकर Φ₂ हो जाता है, तो प्रेरित वाहक बल (e) इस प्रकार व्यक्त किया जाता है:
e = - (Φ₂ - Φ₁) / Δt या e = - (ΔΦ/Δt)
यहाँ ऋणात्मक चिह्न लेंज़ के नियम को दर्शाता है, जो बताता है कि प्रेरित धारा की दिशा हमेशा उस कारण का विरोध करती है, जिससे वह उत्पन्न हुई है।
फ्लेमिंग का दायाँ हाथ नियम:
यह नियम किसी चालक में चुंबकीय क्षेत्र में गति कराने पर उत्पन्न प्रेरित धारा की दिशा ज्ञात करने के लिए प्रयोग किया जाता है।
नियम: अपने दाएँ हाथ की तर्जनी, मध्यमा और अंगूठे को इस प्रकार फैलाइए कि वे एक-दूसरे के परस्पर लंबवत हों (जैसा चित्र में दिखाया गया है)।
- तर्जनी (Index Finger): चुंबकीय क्षेत्र की दिशा (उत्तर से दक्षिण) की ओर संकेत करे।
- अंगूठा (Thumb): चालक की गति की दिशा की ओर संकेत करे।
- मध्यमा (Middle Finger): प्रेरित विद्युत धारा की दिशा की ओर संकेत करेगी।
| अंगुली | दिशा दर्शाती है |
|---|---|
| तर्जनी | चुंबकीय क्षेत्र (B) |
| अंगूठा | गति (v) |
| मध्यमा | प्रेरित धारा (I) |
प्रश्न 6.
दिष्ट धारा जनित्र की क्रिया-विधि का सचित्र वर्णन करें। इसकी रचना एवं सिद्धान्त का भी उल्लेख करें। (2013, 17)
या दिष्ट धारा जनित्र का सिद्धान्त स्पष्ट कीजिए तथा इसकी संरचना व कार्य-प्रणाली दिष्ट धारा जा का सचित्र वर्णन कीजिए। (2009, 12, 13, 14, 16:17, 18)
दिष्ट धारा जनित्र (डायनेमो):
यह एक ऐसी युक्ति है जो यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलती है और दिष्ट धारा (DC) उत्पन्न करती है।
संरचना (रचना): एक दिष्ट धारा जनित्र के मुख्य भाग निम्नलिखित हैं:
- क्षेत्र चुंबक (Field Magnet): यह एक शक्तिशाली स्थायी चुंबक या विद्युत चुंबक होता है जो एक सशक्त चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करता है। इसके ध्रुव खंड (Pole Pieces) N और S होते हैं।
- आर्मेचर (Armature): यह एक नर्म लोहे के कोर पर ताँबे के विद्युतरोधी तार की अनेक फेरों वाली कुंडली होती है। यह कुंडली चुंबकीय क्षेत्र में तेजी से घूमती है।
- विभक्त वलय दिक्परिवर्तक (Split Ring Commutator): यह ताँबे के एक खोखले बेलन को दो भागों में काटकर बनाया जाता है। कुंडली के दोनों सिरे इन्हीं दो अलग-अलग अर्धवलयों से जुड़े होते हैं।
- कार्बन ब्रश (Carbon Brushes): ये दो कार्बन की पट्टियाँ (B1 और B2) होती हैं जो विभक्त वलयों पर हल्का दबाव बनाए रखती हैं और घूमते हुए आर्मेचर से बाहरी परिपथ में धारा ले जाती हैं।
सिद्धांत: दिष्ट धारा जनित्र विद्युत चुंबकीय प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है। जब किसी चालक (आर्मेचर कुंडली) को चुंबकीय क्षेत्र में घुमाया जाता है, तो उससे गुजरने वाले चुंबकीय फ्लक्स में लगातार परिवर्तन होता है। इस फ्लक्स परिवर्तन के कारण कुंडली में एक प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है, जिससे परिपथ पूरा होने पर प्रेरित धारा बहने लगती है।
कार्य-विधि (क्रिया-विधि):
- जब आर्मेचर कुंडली को चुंबकीय क्षेत्र में घड़ी की दिशा में घुमाया जाता है, तो फ्लक्स में परिवर्तन के कारण कुंडली में प्रेरित धारा उत्पन्न होती है।
- प्रारंभ में, मान लीजिए ब्रश B2 धनात्मक (+) और ब्रश B1 ऋणात्मक (-) है। बाह्य परिपथ में धारा B2 से B1 की ओर बहती है।
- जब कुंडली आधा चक्कर पूरा कर लेती है, तो उसमें प्रेरित धारा की दिशा स्वयं उलट जाती है। अब कुंडली का वह सिरा जो पहले धनात्मक था, ऋणात्मक हो जाता है और इसके विपरीत।
- यहाँ विभक्त वलय दिक्परिवर्तक का महत्वपूर्ण कार्य होता है। कुंडली के घूमने के साथ-साथ ये अर्धवलय भी घूमते हैं और आधे चक्कर के बाद ब्रशों का संपर्क बदल जाता है। जो ब्रश पहले धनात्मक अर्धवलय से जुड़ा था, वह अब दूसरे (अब धनात्मक बने) अर्धवलय से जुड़ जाता है।
- इस प्रकार, बाह्य परिपथ से जुड़े ब्रशों की ध्रुवता स्थिर रहती है। ब्रश B2 सदैव धनात्मक और B1 सदैव ऋणात्मक रहता है। परिणामस्वरूप, बाह्य परिपथ में धारा हमेशा एक ही दिशा (B2 से B1) में बहती रहती है। यही दिष्ट धारा (DC) है।
नोट: साधारण एकल-कुंडली जनित्र से प्राप्त धारा का परिमाण स्थिर नहीं होता; यह घूर्णन के साथ बदलता रहता है और एक दिष्टातरक धारा (Pulsating DC) देता है। इसे और अधिक स्थिर (समतल) बनाने के लिए आर्मेचर पर अनेक कुंडलियाँ लगाई जाती हैं और दिक्परिवर्तक में अनेक विभक्त खंड बनाए जाते हैं।
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