Bihar Board Class 10th Science (विज्ञान) Chapter 9 अनुवांशिकता एवं जैव विकास) Solutions
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1. मेंडल ने अपने प्रयोगों के लिए किस पौधे को चुना?
2. एक समयुग्मजी लम्बे पौधे (TT) का एक समयुग्मजी बौने पौधे (tt) के साथ संकरण कराने पर F1 पीढ़ी में प्राप्त संतति का जीन प्ररूप लिखिए।
3. निम्नलिखित में से कौन-सा संतति में पैतृक लक्षणों के संयोजन के लिए उत्तरदायी है?
(a) कोशिका विभाजन
(b) लिंग निर्धारण
(c) कोशिका विभाजन एवं युग्मक निर्माण
(d) युग्मक निर्माण
4. जीवाश्म क्या हैं? ये किस प्रकार बनते हैं?
जीवाश्म प्राचीन काल के पौधों, जानवरों और अन्य जीवों के अवशेष या छाप होते हैं, जो चट्टानों की परतों में संरक्षित पाए जाते हैं।
जीवाश्म बनने की प्रक्रिया: जीवाश्म बनने की मुख्य प्रक्रिया को शिलीभवन (पेट्रीफिकेशन) कहते हैं। यह निम्न चरणों में होता है:
- किसी जीव की मृत्यु के बाद उसका शरीर तलछट (रेत, मिट्टी, कीचड़) से ढक जाता है।
- समय के साथ, ये तलछट परत दर परत जमकर कठोर चट्टान में बदल जाती हैं।
- जीव के नरम ऊतक सड़-गल जाते हैं, लेकिन कठोर भाग जैसे हड्डियाँ, दाँत, खोल या लकड़ी बचे रहते हैं।
- धीरे-धीरे भूमिगत खनिज युक्त जल इन कठोर भागों के रिक्त स्थानों में भर जाता है और क्रिस्टल बना देता है, जिससे जीव का एक पत्थर जैसा ढाँचा बन जाता है।
- कभी-कभी जीव पूरी तरह विघटित हो जाता है और चट्टान पर केवल उसकी एक खोखली छाप (मोल्ड) या उस छाप में भरा हुआ पदार्थ (कास्ट) रह जाता है।
जीवाश्म हमें पृथ्वी के इतिहास में रहने वाले जीवों के बारे में जानकारी देते हैं और जैव विकास के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।
5. समजात अंग क्या हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
समजात अंग वे अंग होते हैं जिनकी आधारभूत संरचना एवं उद्गम समान होता है, लेकिन उनके कार्य एवं बाहरी रूप में अंतर हो सकता है। ये अंग एक ही पूर्वज से विकसित हुए हैं, लेकिन विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं के अनुसार उनमें विभिन्नताएँ आ गई हैं।
उदाहरण:
- स्तनधारियों के अग्रपाद: मनुष्य का हाथ, बिल्ली का पंजा, घोड़े का अगला पैर, चमगादड़ के पंख और व्हेल मछली की अगली पंख (फ्लिपर) की हड्डियों की मूल संरचना (ह्यूमरस, रेडियस, अल्ना, कार्पल्स, मेटाकार्पल्स और फैलेंजेस) समान है। लेकिन इनका कार्य भिन्न है – पकड़ना, दौड़ना, उड़ना और तैरना।
- पौधों के अंग: आलू का भूमिगत तना (कंद), प्याज का तना (बल्ब), और बरगद के हवाई जड़ों वाले तने की आधारभूत संरचना एक समान (तने की) है, लेकिन उनके कार्य भिन्न हैं।
1. मेंडल के एक प्रयोग में लम्बे मटर के पौधे जिनके बैंगनी पुष्प थे, का संकरण बौने पौधों जिनके सफेद पुष्प थे, से कराया गया। इनकी संतति के सभी पौधों में पुष्प बैंगनी रंग के थे परन्तु आधे बौने थे। इससे कहा जा सकता है कि लम्बे जनक पौधों की आनुवंशिक रचना निम्न थी:
(B) TTww
(C) TtWW
(D) TtWw
उत्तर: (C) TtWW
व्याख्या: मेंडल के इस प्रयोग में, लम्बापन प्रभावी लक्षण (T) तथा बौनापन अप्रभावी (t) है। इसी प्रकार बैंगनी पुष्प प्रभावी (W) तथा सफेद पुष्प अप्रभावी (w) है। चूँकि सभी संतति पौधों में बैंगनी पुष्प थे, इसका अर्थ है कि लम्बे जनक (बैंगनी पुष्प वाले) में सफेद पुष्प का अप्रभावी अलील (w) नहीं था। साथ ही, आधी संतति बौनी थी, जो दर्शाता है कि लम्बे जनक में बौनेपन का अप्रभावी अलील (t) छिपा हुआ था। अतः लम्बे बैंगनी पुष्प वाले जनक की आनुवंशिक संरचना TtWW थी, जहाँ Tt से लम्बापन (परंतु बौनेपन का अलील भी) तथा WW से शुद्ध बैंगनी पुष्प का पता चलता है।
2. समजात अंग का उदाहरण है-
(B) हमारे दाँत तथा हाथी के दाँत
(C) आलू एवं घास के उपरिभूस्तारी
(D) उपरोक्त सभी
उत्तर: (D) उपरोक्त सभी
व्याख्या: समजात अंग वे अंग होते हैं जिनकी आधारभूत संरचना एवं उत्पत्ति समान होती है, परन्तु वे भिन्न-भिन्न कार्य करते हैं। दिए गए सभी विकल्प इसकी उदाहरण हैं: (A) मानव हाथ एवं कुत्ते का अग्रपाद दोनों स्तनधारियों के अग्रपाद के रूपांतर हैं। (B) मानव दाँत एवं हाथी के दाँत दोनों दंत समजात संरचनाएँ हैं। (C) आलू का कंद (भूमिगत तना) एवं घास का उपरिभूस्तारी (रनर) दोनों तने के रूपांतर हैं। अतः सभी विकल्प समजात अंगों के उदाहरण हैं।
3. विकासीय दृष्टिकोण से हमारी किससे अधिक समानता है-
(B) चिम्पैंजी
(C) मकड़ी
(D) बैक्टीरिया
उत्तर: (A) चीन के विद्यार्थी
व्याख्या: विकासीय दृष्टिकोण से, जीवों के बीच समानता उनकी आनुवंशिक निकटता पर निर्भर करती है। मानव (हम) और चीन का विद्यार्थी दोनों एक ही जाति (Homo sapiens) के सदस्य हैं, इसलिए उनके बीच आनुवंशिक समानता लगभग 99.9% है। चिम्पैंजी हमारा निकटतम जीवित रिश्तेदार है, परन्तु फिर भी आनुवंशिक समानता लगभग 98-99% ही है। मकड़ी और बैक्टीरिया तो हमसे बहुत दूर के जीव हैं। अतः सबसे अधिक समानता निश्चित रूप से एक अन्य मानव (चीन के विद्यार्थी) से ही है।
4. मेंडल के प्रयोगों द्वारा किस बात की पुष्टि हुई?
उत्तर: मेंडल के प्रयोगों द्वारा निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातों की पुष्टि हुई:
- आनुवंशिकता की मूल इकाई 'कारक' (जिसे आज हम जीन कहते हैं) होती है, जो माता-पिता से संतति में स्थानांतरित होती है।
- प्रत्येक लक्षण के लिए दो कारक (अलील) होते हैं, जो एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से वंशागत होते हैं।
- कुछ कारक 'प्रभावी' होते हैं (जो लक्षण को व्यक्त करते हैं) तथा कुछ 'अप्रभावी' होते हैं (जो प्रभावी की उपस्थिति में छिपे रहते हैं)।
- संकरण के दौरान, ये कारक युग्मक (गैमीट) निर्माण के समय अलग-अलग हो जाते हैं और निषेचन के दौरान यादृच्छिक रूप से जुड़ते हैं। इसे 'युग्मकों की शुद्धता का नियम' कहा जाता है।
- इन प्रयोगों ने आनुवंशिकी के आधारभूत नियमों – प्रभाविता का नियम, पृथक्करण का नियम तथा स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम – की पुष्टि की।
5. उद्विकास के प्रमाण के रूप में जीवाश्म क्या सूचना देते हैं?
उत्तर: जीवाश्म उद्विकास (विकास) के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण प्रमाण प्रदान करते हैं। ये हमें निम्नलिखित सूचनाएँ देते हैं:
- प्राचीन जीवन का रिकॉर्ड: जीवाश्म हमें बताते हैं कि करोड़ों वर्ष पहले पृथ्वी पर किस प्रकार के जीव रहते थे, जो अब विलुप्त हो चुके हैं।
- क्रमिक परिवर्तन का प्रमाण: विभिन्न भूवैज्ञानिक परतों में पाए गए जीवाश्मों के अध्ययन से हम देख सकते हैं कि किसी जीव के सरल रूप से जटिल रूप की ओर क्रमिक परिवर्तन कैसे हुआ। उदाहरण के लिए, घोड़े के जीवाश्म उसके आकार, पैरों की उंगलियों की संख्या आदि में हुए परिवर्तन को दर्शाते हैं।
- जीवों के बीच संबंध: जीवाश्म यह दर्शाने में मदद करते हैं कि आधुनिक जीवों का संबंध प्राचीन जीवों से कैसे है। उदाहरण के लिए, पक्षियों के जीवाश्म (आर्कियोप्टेरिक्स) में सरीसृप और पक्षी दोनों के लक्षण हैं, जो यह सिद्ध करता है कि पक्षियों का विकास सरीसृपों से हुआ होगा।
- विलुप्ति की कहानी: जीवाश्म अचानक विलुप्ति के घटनाक्रम (जैसे डायनासोर का विलुप्त होना) को भी दर्शाते हैं, जो पर्यावरणीय परिवर्तनों के प्रभाव को समझने में सहायक है।
इस प्रकार, जीवाश्म पृथ्वी के जीवन के इतिहास की एक 'समय-रेखा' प्रस्तुत करते हैं और यह सिद्ध करते हैं कि जीवन सरल रूपों से जटिल रूपों की ओर निरंतर विकसित होता रहा है।
6. विकासीय संबंध स्थापित करने में आणविक समजातता किस प्रकार सहायक है?
उत्तर: आणविक समजातता से तात्पर्य विभिन्न जीवों में पाए जाने वाले प्रोटीन (जैसे हीमोग्लोबिन, साइटोक्रोम-C) तथा DNA के अनुक्रमों (सीक्वेंस) में समानता से है। यह विकासीय संबंध स्थापित करने में निम्न प्रकार से सहायक है:
- आनुवंशिक निकटता का माप: दो जीवों के DNA या प्रोटीन के अनुक्रम जितने अधिक समान होंगे, उनका विकासीय संबंध उतना ही निकट माना जाएगा। उदाहरण के लिए, मनुष्य और चिम्पैंजी का DNA लगभग 99% समान है, जो दर्शाता है कि हमारा एक सामान्य पूर्वज हाल ही में (विकासीय समय के पैमाने पर) रहा होगा।
- विकास के समय का अनुमान: DNA अनुक्रमों में अंतर (उत्परिवर्तन) की दर निश्चित मानी जाती है। इन अंतरों की तुलना करके वैज्ञानिक यह अनुमान लगा सकते हैं कि दो जातियाँ अपने सामान्य पूर्वज से कितने समय पहले अलग हुई होंगी।
- समजात अंगों की पुष्टि: शारीरिक समजातता (जैसे चमगादड़ का पंख और मनुष्य का हाथ) की पुष्टि आणविक स्तर पर भी होती है। इन अंगों के विकास को नियंत्रित करने वाले जीन (HOX जीन) विभिन्न जीवों में समान पाए जाते हैं।
- वर्गीकरण में सहायता: पारंपरिक वर्गीकरण (रूप-रंग के आधार पर) में उलझन पैदा करने वाले जीवों के विकासीय संबंध आणविक आंकड़ों से स्पष्ट हो जाते हैं।
अतः, आणविक समजातता जीवों के बीच विकासीय संबंधों का एक अत्यंत शक्तिशाली और सटीक प्रमाण प्रदान करती है।
7. एक प्रयोग में, F2 पीढ़ी में लम्बे एवं बौने मटर के पौधों का अनुपात 3 : 1 था। इसकी व्याख्या कीजिए।
उत्तर: यह प्रयोग मेंडल के पृथक्करण के नियम को दर्शाता है।
व्याख्या: मान लीजिए लम्बापन प्रभावी लक्षण (T) है और बौनापन अप्रभावी (t) है। शुद्ध लम्बे (TT) और शुद्ध बौने (tt) पौधों के बीच संकरण कराने पर F1 पीढ़ी के सभी पौधे लम्बे (Tt) होंगे, क्योंकि प्रभावी लक्षण (T) अप्रभावी (t) पर छा जाता है।
जब इन F1 पौधों (Tt) का स्व-परागण कराया जाता है, तो युग्मक निर्माण के समय 'T' और 't' कारक अलग-अलग हो जाते हैं। इससे दो प्रकार के युग्मक बनते हैं: आधे युग्मक 'T' लेकर और आधे 't' लेकर।
ये युग्मक यादृच्छिक रूप से संयोग करते हैं, जिससे F2 पीढ़ी में निम्न संयोजन बनते हैं:
| युग्मक | T (0.5) | t (0.5) |
|---|---|---|
| T (0.5) | TT (लम्बा) | Tt (लम्बा) |
| t (0.5) | Tt (लम्बा) | tt (बौना) |
इस पुनेट वर्ग से स्पष्ट है कि F2 पीढ़ी में:
- लम्बे पौधे: TT और Tt (कुल 3 भाग)
- बौने पौधे: केवल tt (1 भाग)
अतः लम्बे एवं बौने पौधों का अनुपात 3 : 1 प्राप्त होता है। यह अनुपात दर्शाता है कि F1 पीढ़ी में छिपा हुआ अप्रभावी कारक (t) F2 पीढ़ी में पृथक होकर पुनः व्यक्त हो जाता है।
8. जैव विकास से आप क्या समझते हैं?
उत्तर: जैव विकास (उद्विकास) वह धीमी, सतत और लंबी प्रक्रिया है जिसके द्वारा सरल संरचना वाले जीवों से, अनेक पीढ़ियों में होने वाले आनुवंशिक परिवर्तनों (उत्परिवर्तन) तथा प्राकृतिक वरण के कारण, अधिक जटिल एवं नए प्रकार के जीवों का विकास होता है।
मुख्य बिंदु:
- यह एक वंशानुक्रमिक परिवर्तन है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी जनसंख्या के आनुवंशिक लक्षणों में होता है।
- विकास का मुख्य कारण प्राकृतिक वरण है, जिसमें पर्यावरण के अनुकूल लक्षण वाले जीव जीवित रहते और प्रजनन करते हैं, जबकि प्रतिकूल लक्षण वाले समय के साथ विलुप्त हो जाते हैं।
- विकास का अर्थ केवल 'प्रगति' या 'बेहतर होना' नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण के अनुकूलन की प्रक्रिया है।
- आज पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जीव (पौधे, जंतु, सूक्ष्मजीव) अरबों वर्षों के विकास का परिणाम हैं, जिनका उद्भव एक सामान्य पूर्वज से हुआ माना जाता है।
सरल शब्दों में, जैव विकास वह प्रक्रिया है जिसने हमें एककोशिकीय जीव से लेकर आज के जटिल मानव तक के सफर में बदला है।
9. हमारे वैज्ञानिकों ने किस प्रकार से विभिन्न कृषि पौधों का विकास किया है?
उत्तर: भारतीय वैज्ञानिकों ने कृषि पौधों के विकास के लिए पारंपरिक तथा आधुनिक दोनों प्रकार की विधियों का उपयोग किया है:
- संकरण (Hybridization): दो अलग-अलग किस्मों या प्रजातियों के बीच पर-परागण कराकर नई संकर किस्में विकसित की गई हैं। इनमें उच्च उपज, रोग प्रतिरोधक क्षमता तथा पर्यावरणीय तनाव सहने की क्षमता जैसे वांछित लक्षणों का समावेश किया जाता है। उदाहरण: गेहूँ की उन्नत किस्में (जैसे सोनालिका), धान की किस्में (जैसे IR-8, जया)।
- चयनात्मक प्रजनन (Selective Breeding): कई पीढ़ियों तक केवल उन पौधों का चयन किया जाता है जिनमें वांछित लक्षण (जैसे बड़े दाने, अधिक तेल) हों, जिससे धीरे-धीरे नई किस्म बन जाती है।
- उत्परिवर्तन प्रजनन (Mutation Breeding): पौधों को रासायनिक पदार्थों या विकिरण (जैसे गामा किरणें) के संपर्क में लाकर उनके जीनोम में उत्परिवर्तन उत्पन्न किए जाते हैं। फिर इनमें से उपयोगी लक्षणों वाले पौधों का चयन किया जाता है। उदाहरण: अरहर की प्रारंभिक पकने वाली किस्में।
- जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology): आनुवंशिक इंजीनियरिंग तथा ऊतक संवर्धन जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग करके पौधों का विकास किया जाता है। उदाहरण: Bt कपास (कीट प्रतिरोधी), सुनहरे चावल (विटामिन-ए युक्त)।
- सूक्ष्म प्रवर्धन (Micropropagation): इस तकनीक द्वारा कम समय में अधिक संख्या में स्वस्थ और रोगमुक्त पौधे तैयार किए जाते हैं, जैसे केले, गन्ने और आलू में।
इन विधियों के माध्यम से वैज्ञानिकों ने देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने, किसानों की आय बढ़ाने और पोषण स्तर सुधारने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
10. समवृत्ति अंग क्या हैं? उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर: समवृत्ति अंग वे अंग होते हैं जिनका मूलभूत संरचना एवं उत्पत्ति भिन्न होती है, परन्तु वे समान कार्य करते हैं। ये अंग विकास की प्रक्रिया में अभिसारी विकास के उदाहरण हैं, जहाँ भिन्न पूर्वजों से उत्पन्न जीव समान पर्यावरणीय परिस्थितियों के कारण समान कार्य करने वाले अंग विकसित कर लेते हैं।
उदाहरण:
- पक्षियों के पंख और कीटों के पंख:
- पक्षी का पंख: अग्रपाद (हाथ) के रूपांतर से बना है। संरचना हड्डियों, मांसपेशियों और पंखों से बनी है।
- तितली का पंख: काइटिन के बने हुए पतले झिल्लीनुमा आवरण हैं, जो वक्ष से निकलते हैं।
- समानता: दोनों उड़ने का कार्य करते हैं।
- मनुष्य की आँख और ऑक्टोपस की आँख:
- दोनों देखने का कार्य करती हैं, परन्तु इनकी संरचना और विकास की प्रक्रिया पूरी तरह भिन्न है।
- मटर के पौधे की प्रतान और कैक्टस का काँटा:
- प्रतान: पत्ती का रूपांतर है जो चढ़ने में सहायता करता है।
- काँटा: पत्ती का ही रूपांतर है जो जल की कमी में वाष्पोत्सर्जन रोकता और रक्षा करता है।
- दोनों पत्ती से बने हैं (समजात), परन्तु यहाँ उदाहरण के लिए, यदि हम कैक्टस के काँटे (पत्ती से बना) और गुलाब के काँटे (तने के बाहरी उभार से बना) की तुलना करें, तो वे समवृत्ति होंगे, क्योंकि दोनों रक्षा का कार्य करते हैं पर उत्पत्ति भिन्न है।
समवृत्ति अंग यह दर्शाते हैं कि भिन्न उत्पत्ति के बावजूद, प्रकृति में समान कार्यों के लिए समान समाधान विकसित हो सकते हैं।
प्रश्न 1. मेंडल के एक प्रयोग में लम्बे मटर के पौधे जिनके बैंगनी पुष्प थे, का संकरण बौने पौधों जिनके सफेद पुष्प थे, से कराया गया। इनकी संतति के सभी पौधों में पुष्प बैंगनी रंग के थे। परन्तु उनमें से लगभग आधे बौने थे। इससे कहा जा सकता है कि लम्बे जनक पौधों की आनुवंशिक रचना निम्न थी:
(A) TTWW
(B) TTww
(C) TtWW
(D) TtWw
उत्तर: (C) TtWW
व्याख्या: इस प्रयोग में, लम्बाई (T) और पुष्प रंग (W) दोनों के लिए जनकों के जीन देखने होंगे। सभी संतति पौधों में बैंगनी पुष्प (प्रभावी लक्षण) थे, जिसका अर्थ है कि लम्बे जनक से सभी संततियों को बैंगनी पुष्प का प्रभावी एलील (W) मिला। चूँकि कोई भी संतति सफेद पुष्प वाली नहीं थी, इसलिए लम्बे जनक में सफेद पुष्प का अप्रभावी एलील (w) नहीं था। अतः लम्बे जनक का पुष्प रंग जीनोटाइप WW था। लम्बाई के लिए, लगभग आधी संतति बौनी (tt) थी, जो दर्शाता है कि लम्बे जनक में लम्बेपन का प्रभावी एलील (T) और बौनेपन का अप्रभावी एलील (t) दोनों थे, यानी वह संकर (Tt) था। इस प्रकार, लम्बे जनक की आनुवंशिक रचना TtWW थी।
प्रश्न 2. समजात अंग का उदाहरण है:
(A) हमारा हाथ तथा कुत्ते के अग्रपाद
(B) हमारे दाँत तथा हाथी के दाँत
(C) आलू एवं घास के उपरिभूस्तारी
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर: (D) उपर्युक्त सभी
व्याख्या: समजात अंग वे अंग होते हैं जिनकी आधारभूत संरचना समान होती है, क्योंकि वे एक共同的 पूर्वज से विकसित हुए हैं, लेकिन उनके कार्य भिन्न-भिन्न हो सकते हैं।
(A) मानव का हाथ और कुत्ते का अग्रपाद दोनों में हड्डियों (प्रगंडिका, अर्धप्रगंडिका, कार्पल्स, मेटाकार्पल्स, फैलेंजेस) की समान व्यवस्था है, पर कार्य अलग हैं।
(B) मानव और हाथी के दाँत भी समजात हैं, क्योंकि दोनों स्तनधारियों के दाँत हैं, हालाँकि आकार और कार्य में भिन्नता है।
(C) आलू का कंद (भोजन संग्रह) और घास का उपरिभूस्तारी (प्रकंद) दोनों तने के रूपांतर हैं, इसलिए ये भी समजात हैं।
अतः सभी विकल्प समजात अंगों के उदाहरण हैं।
प्रश्न 3. विकासीय दृष्टिकोण से हमारी किससे अधिक समानता है?
(A) चीन के विद्यार्थी
(B) चिम्पैंजी
(C) मकड़ी
(D) बैक्टीरिया
उत्तर: (A) चीन के विद्यार्थी
व्याख्या: विकासीय दृष्टिकोण से, दो जीवों के बीच समानता उनके विकासवादी इतिहास और आनुवंशिक निकटता पर निर्भर करती है। मनुष्य (होमो सेपियन्स) और चिम्पैंजी एक सामान्य पूर्वज साझा करते हैं, लेकिन वे अलग-अलग प्रजातियाँ हैं। वहीं, दुनिया के सभी मनुष्य (चाहे वे किसी भी देश के हों) एक ही प्रजाति के हैं और उनके बीच आनुवंशिक अंतर बहुत ही कम (99.9% से अधिक समानता) है। इसलिए, एक भारतीय विद्यार्थी की चीन के विद्यार्थी से आनुवंशिक और विकासवादी समानता चिम्पैंजी, मकड़ी या बैक्टीरिया की तुलना में बहुत अधिक है।
प्रश्न 4. जीवाश्म क्या है? यह किस प्रकार बनता है?
उत्तर: जीवाश्म प्राचीन काल के जीवों (पौधों या जंतुओं) के अवशेष, निशान या छाप होते हैं जो चट्टानों की परतों में संरक्षित पाए जाते हैं।
जीवाश्म बनने की प्रक्रिया: जीवाश्म बनने की सबसे सामान्य विधि शिलीभवन (Petrification) है। इस प्रक्रिया में निम्नलिखित चरण शामिल हैं:
1. दफन होना: जब कोई जीव मरता है, तो उसका शरीर तेजी से मिट्टी, रेत, गाद या कीचड़ से ढक जाता है। यह ढकना सड़न-गलन प्रक्रिया को धीमा कर देता है और शरीर को बाहरी कारकों (हवा, पानी, मांसाहारी जीव) से बचाता है।
2. खनिजीकरण: लाखों वर्षों तक दबे रहने के दौरान, भूमिगत जल उस अवशेष से होकर बहता है। यह पानी विभिन्न खनिजों (जैसे सिलिका, कैल्साइट, लौह यौगिक) से भरपूर होता है। ये खनिज धीरे-धीरे जीव के मूल कार्बनिक पदार्थ (जैसे हड्डी या लकड़ी) को प्रतिस्थापित कर देते हैं।
3. शिला में परिवर्तन: समय के साथ, वह तलछट दबकर और कठोर होकर चट्टान (जैसे अवसादी चट्टान) में बदल जाती है। खनिजीकृत अवशेष उस चट्टान का हिस्सा बन जाता है, जिसे हम जीवाश्म के रूप में खोदकर निकालते हैं।
जीवाश्म बनने की अन्य विधियों में हिमीकरण (जैसे मैमथ), एम्बर (राल) में संरक्षण और कोयले के रूप में संरक्षण (पौधों के लिए) शामिल हैं।
प्रश्न 5. मेंडल के प्रयोगों द्वारा कैसे पता चला कि लक्षण प्रभावी अथवा अप्रभावी होते हैं?
उत्तर: ग्रेगर जॉन मेंडल ने मटर के पौधों पर किए गए अपने संकरण प्रयोगों के माध्यम से यह निर्धारित किया कि कौन-सा लक्षण प्रभावी है और कौन-सा अप्रभावी। उनकी विधि इस प्रकार थी:
1. मेंडल ने शुद्ध नस्ल के विपरीत लक्षणों वाले पौधों (जैसे लम्बे vs बौने, बैंगनी पुष्प vs सफेद पुष्प) के बीच संकरण कराया। इन पौधों को Parental Generation (P) कहा गया।
2. इन संकरण से प्राप्त पहली संतति पीढ़ी को F1 पीढ़ी (First Filial Generation) कहा गया।
3. अवलोकन: मेंडल ने देखा कि F1 पीढ़ी के सभी पौधे केवल एक ही प्रकार का लक्षण दिखाते थे। उदाहरण के लिए, लम्बे और बौने पौधों के संकरण से प्राप्त सभी F1 पौधे लम्बे ही थे। बैंगनी और सफेद पुष्प वाले पौधों के संकरण से प्राप्त सभी F1 पौधों में बैंगनी पुष्प ही थे।
4. निष्कर्ष: इससे मेंडल ने यह समझा कि F1 पीढ़ी में जो लक्षण प्रकट हुआ (लम्बापन, बैंगनी पुष्प), वह प्रभावी लक्षण है। जो लक्षण F1 पीढ़ी में पूरी तरह से लुप्त हो गया (बौनापन, सफेद पुष्प), वह अप्रभावी लक्षण है।
5. पुष्टि: जब मेंडल ने F1 पीढ़ी के पौधों का आपस में स्व-परागण कराया तो F2 पीढ़ी में दोनों लक्षण (प्रभावी और अप्रभावी) फिर से प्रकट हुए। इससे पता चला कि अप्रभावी लक्षण का कारक (एलील) F1 पीढ़ी में मौजूद था, लेकिन प्रभावी एलील के कारण व्यक्त नहीं हो पा रहा था।
प्रश्न 6. जैव विकास को परिभाषित करें।
उत्तर: जैव विकास एक धीमी, सतत और स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा सरल और आदिम जीवों में लंबे समय (करोड़ों वर्षों) में होने वाले आनुवंशिक परिवर्तनों के कारण जटिल और नई प्रजातियों का उद्भव होता है।
सरल शब्दों में: यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा पृथ्वी पर जीवन समय के साथ बदलता रहा है। आज हम जो विविध जीव देखते हैं, वे सभी पहले के सरल जीवों से विकसित हुए हैं। जैव विकास का मुख्य तंत्र प्राकृतिक चयन है, जिसमें पर्यावरण के अनुकूल लक्षण वाले जीव जीवित रहने और प्रजनन में सफल होते हैं, और उनके लक्षण अगली पीढ़ियों में संचरित होते हैं।
प्रश्न 7. विकास के पक्ष में पेश की जाने वाली आनुवंशिकी के अतिरिक्त कोई दो हल प्रस्तुत करें।
उत्तर: जैव विकास के पक्ष में प्रमाण के रूप में आनुवंशिकी (DNA समानता) के अलावा निम्नलिखित दो महत्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत किए जा सकते हैं:
1. समजात अंगों का अध्ययन: विभिन्न जीवों के ऐसे अंग जिनकी आधारभूत संरचना समान है, लेकिन कार्य भिन्न-भिन्न हैं, समजात अंग कहलाते हैं। उदाहरण: मनुष्य का हाथ, बिल्ली का अग्रपाद, चमगादड़ का पंख और व्हेल का फ्लिपर - इन सभी में हड्डियों (प्रगंडिका, अर्धप्रगंडिका, कार्पल्स, मेटाकार्पल्स, फैलेंजेस) की संख्या और व्यवस्था समान है। यह समानता इस बात का प्रमाण है कि ये सभी जीव एक सामान्य पूर्वज से विकसित हुए हैं और विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुकूल होने के लिए इन अंगों के कार्य बदल गए।
2. जीवाश्म अभिलेख: पृथ्वी की विभिन्न चट्टानी परतों में पाए जाने वाले जीवाश्म, जीवन के इतिहास की एक क्रमबद्ध रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। सबसे पुरानी परतों में सरल और आदिम जीवों के जीवाश्म मिलते हैं, जबकि नई परतों में जटिल जीवों के जीवाश्म मिलते हैं। इन जीवाश्मों के क्रमिक परिवर्तन (जैसे घोड़े के पूर्वज के आकार और पैर की उंगलियों में परिवर्तन) सीधे तौर पर यह दर्शाते हैं कि जीव समय के साथ कैसे बदले और विकसित हुए।
प्रश्न 8. मेंडल के प्रयोगों से प्राप्त परिणामों को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर: मेंडल ने मटर के पौधों पर सात विपरीत लक्षणों (जैसे लम्बाई, बीज का रंग व आकार, पुष्प का रंग आदि) का अध्ययन किया। एक उदाहरण के माध्यम से उनके प्रयोगों के परिणामों को इस प्रकार समझा जा सकता है:
उदाहरण: लम्बे (T) और बौने (t) पौधों का संकरण
चरण 1 (P पीढ़ी): मेंडल ने शुद्ध लम्बे (TT) और शुद्ध बौने (tt) पौधों के बीच संकरण कराया।
चरण 2 (F1 पीढ़ी): इस संकरण से प्राप्त सभी संतति पौधे लम्बे (Tt) थे। यहाँ बौनापन प्रकट नहीं हुआ। इससे पता चला कि लम्बापन प्रभावी लक्षण है और बौनापन अप्रभावी लक्षण है।
चरण 3 (F2 पीढ़ी): जब F1 पीढ़ी के इन लम्बे पौधों (Tt) का आपस में स्व-परागण कराया गया, तो F2 पीढ़ी में लम्बे और बौने दोनों प्रकार के पौधे प्राप्त हुए।
परिणाम: F2 पीढ़ी में लम्बे और बौने पौधों का अनुपात लगभग 3:1 था। यानी हर तीन लम्बे पौधों के पीछे एक बौना पौधा था।
व्याख्या: इस 3:1 के अनुपात की व्याख्या मेंडल ने इस प्रकार की:
- F1 पीढ़ी के पौधे (Tt) दोनों प्रकार के युग्मक (T और t) बनाते हैं।
- यादृच्छिक निषेचन के कारण, F2 पीढ़ी में जीनोटाइप TT, Tt, tT और tt बनते हैं।
- TT, Tt और tT - ये तीनों लम्बे पौधे दिखाएंगे (क्योंकि T प्रभावी है)।
- केवल tt जीनोटाइप वाला पौधा बौना दिखाई देगा।
इस प्रकार, प्रभावी और अप्रभावी लक्षणों की पहचान, F1 पीढ़ी में केवल प्रभावी लक्षण का प्रकट होना, और F2 पीढ़ी में 3:1 का अनुपात मेंडल के प्रयोगों के मुख्य परिणाम थे, जिनसे आनुवंशिकी के नियम स्थापित हुए।
प्रश्न 9. लिंग सहलग्न रोग क्या हैं? दो लिंग सहलग्न रोगों के नाम लिखिए।
उत्तर: लिंग सहलग्न रोग वे आनुवंशिक रोग हैं जो लिंग गुणसूत्रों (विशेष रूप से X गुणसूत्र) पर स्थित दोषपूर्ण जीन के कारण होते हैं और लिंग-सहलग्न तरीके से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होते हैं।
दो लिंग सहलग्न रोगों के नाम:
1. वर्णान्धता (Colour Blindness): इस रोग से पीड़ित व्यक्ति कुछ विशेष रंगों (जैसे लाल और हरा) में अंतर नहीं कर पाता। यह X गुणसूत्र पर स्थित अप्रभावी जीन के कारण होता है और पुरुषों में अधिक पाया जाता है।
2. हीमोफीलिया (Haemophilia): इस रोग में रक्त का थक्का जमने की क्षमता कम हो जाती है, जिससे चोट लगने पर रक्तस्राव बहुत अधिक और लंबे समय तक होता है। यह भी X गुणसूत्र पर स्थित अप्रभावी जीन के कारण होता है और अधिकतर पुरुषों को प्रभावित करता है।
प्रश्न 10. वंशागति के नियमों की व्याख्या करें।
उत्तर: मेंडल द्वारा प्रतिपादित वंशागति (आनुवंशिकता) के मुख्य नियम निम्नलिखित हैं:
1. प्रभाविता का नियम (Law of Dominance): इस नियम के अनुसार, जब एक जोड़े के दो विपरीत (एलील) लक्षण एक साथ एक जीव में उपस्थित होते हैं, तो केवल एक ही लक्षण (प्रभावी लक्षण) स्वयं को व्यक्त करता है। दूसरा लक्षण (अप्रभावी लक्षण) छिपा रह जाता है और F1 पीढ़ी में प्रकट नहीं होता। उदाहरण: लम्बे (T) और बौने (t) पौधों के संकरण से F1 में सभी लम्बे (Tt) पौधे प्राप्त होते हैं, जहाँ लम्बापन प्रभावी है।
2. पृथक्करण का नियम (Law of Segregation): इस नियम के अनुसार, किसी भी लक्षण के लिए जिम्मेदार दोनों एलील (कारक) युग्मक निर्माण के समय एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं और अलग-अलग युग्मकों में चले जाते हैं। प्रत्येक युग्मक में उस लक्षण का केवल एक ही एलील होता है। निषेचन के समय ये युग्मक यादृच्छिक रूप से मिलकर संतति में नए जोड़े बनाते हैं। यही नियम F2 पीढ़ी में अप्रभावी लक्षण के पुनः प्रकट होने की व्याख्या करता है।
3. स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment): इस नियम के अनुसार, जब दो या दो से अधिक लक्षणों (जैसे बीज का आकार और रंग) का एक साथ अध्ययन किया जाता है, तो उनके एलील एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से अलग होते हैं और युग्मकों में स्वतंत्र रूप से संयोजित होते हैं। इससे संतति में लक्षणों के नए संयोग बनते हैं। यह नियम द्विसंकर संकरण के F2 पीढ़ी में 9:3:3:1 के अनुपात की व्याख्या करता है।
प्रश्न 12.
“केवल वे विभिन्नताएँ जो किसी एकल जीव (व्यष्टि) के लिए उपयोगी होती हैं, समष्टि में अपना अस्तित्व बनाए रखती हैं।” क्या आप इस कथन से सहमत हैं? क्यों एवं क्यों नहीं?
उत्तर:
हाँ, हम इस कथन से सहमत हैं। इसका कारण यह है कि प्रकृति में प्राकृतिक चयन की प्रक्रिया काम करती है। जो विभिन्नताएँ (लक्षण) किसी जीव को अपने वातावरण में जीवित रहने और प्रजनन करने में मदद करती हैं, वे उपयोगी होती हैं। ऐसे जीव अधिक संख्या में जीवित रहते हैं और अपने उपयोगी लक्षणों को अगली पीढ़ी में स्थानांतरित करते हैं। इस तरह, समय के साथ पूरी आबादी (समष्टि) में ये उपयोगी विभिन्नताएँ हावी हो जाती हैं और उनका अस्तित्व बना रहता है। दूसरी ओर, जो विभिन्नताएँ उपयोगी नहीं हैं या हानिकारक हैं, उनके साथ वाले जीव प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाते हैं और धीरे-धीरे उनकी संख्या कम होती जाती है।
Bihar Board Class 10 Science Additional Important Questions and Answers
बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
आनुवंशिकता के प्रयोग के लिए मेण्डल ने निम्नलिखित में से कौन-से पौधों का उपयोग किया? (2016, 18)
(a) पपीता
(b) आलू
(c) मटर
(d) अंगूर
उत्तर: (c) मटर
प्रश्न 2.
विपरीत लक्षणों के जोड़ों को कहते हैं - (2013)
(a) युग्मविकल्पी या एलिलोमॉर्फ
(b) निर्धारक
(c) समयुग्मजी
(d) समरूप
उत्तर: (a) युग्मविकल्पी या एलिलोमॉर्फ
प्रश्न 3.
मटर में बीजों का गोल आकार तथा पीला रंग दोनों होते हैं -
(a) अप्रभावी
(b) अपूर्ण प्रभावी
(c) संकर
(d) प्रभावी
उत्तर: (d) प्रभावी
प्रश्न 4.
उद्यान मटर में अप्रभावी लक्षण है - (2015, 16)
(a) लम्बे तने
(b) झुर्रीदार बीज
(c) गोल बीज
(d) फैली हुई फली
उत्तर: (b) झुर्रीदार बीज
प्रश्न 5.
एकसंकर संकरण के F2 पीढ़ी में शुद्ध तथा संकर लक्षणों वाले पौधों का अनुपात होगा
(a) 2 : 1
(b) 3 : 1
(c) 1 : 1
(d) 1 : 3
उत्तर: (c) 1 : 1
प्रश्न 6.
एक संकर क्रॉस का जीन प्रारूप अनुपात होता है -
(a) 3 : 1
(b) 1 : 2 : 1
(c) 2 : 1 : 2
(d) 9 : 3 : 3 : 1
उत्तर: (b) 1 : 2 : 1
प्रश्न 7.
मटर के लम्बे पौधों का क्रॉस बौने पौधों से कराने पर प्रथम पीढ़ी में लम्बे मटर के पौधे प्राप्त होते हैं, द्वितीय पीढ़ी में प्राप्त पौधे होंगे (2017)
(a) लम्बे तथा बौने दोनों
(b) लम्बे मटर के पौधे
(c) बौने मटर के पौधे
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर: (a) लम्बे तथा बौने दोनों
प्रश्न 8.
F2 पीढ़ी में 3 : 1 अनुपात प्राप्त होता है - (2015)
(a) एक संकर क्रॉस में
(b) द्विसंकर क्रॉस में
(c) (a) तथा (b) दोनों में
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर: (a) एक संकर क्रॉस में
प्रश्न 9.
पृथक्करण का नियम प्रस्तुत किया था - (2012, 14)
(a) चार्ल्स डार्विन ने
(b) ह्यूगो डी वीज ने
(c) जॉन ग्रेगर मेण्डल ने
(d) राबर्ट हुक ने
उत्तर: (c) जॉन ग्रेगर मेण्डल ने।
प्रश्न 10.
गुणसूत्र किस पदार्थ के बने होते हैं? (2013)
(a) प्रोटीन
(b) आर०एन०ए०
(c) डी०एन०ए०
(d) डी०एन०ए० और प्रोटीन
उत्तर: (d) डी०एन०ए० और प्रोटीन
प्रश्न 11.
मनुष्य में कौन-सा गुणसूत्र जोड़ा स्त्रीलिंग निर्धारण करता है?
(a) XY
(b) Xx
(c) XXY
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर: (b) Xx
प्रश्न 12.
सामान्य मनुष्य में गुणसूत्रों की संख्या है -
(a) 45
(b) 46
(c) 30
(d) 23
उत्तर: (b) 46
प्रश्न 13.
मनुष्य के शुक्राणु में ऑटोसोम की संख्या कितनी होती है? (2016)
(a) 22
(b) 24
(c) 42
(d) 44
उत्तर: (a) 22
प्रश्न 14.
मनुष्य में लड़का पैदा होगा जब -
(a) माँ का पोषण गर्भावस्था में अधिक पौष्टिक हो
(b) पिता माँ से अधिक शक्तिशाली हो
(c) बच्चे में XY गुणसूत्र हों
(d) बच्चे में XX गुणसूत्र हों
उत्तर: (c) बच्चे में XY गुणसूत्र हों
प्रश्न 15.
लक्षण, जिनके जीन्स गुणसूत्रों पर होते हैं, कहलाते हैं। (2011)
(a) लिंग प्रभावित
(b) लिंग सहलग्न
(c) लिंग सीमित
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर: (b) लिंग सहलग्न
प्रश्न 16.
जीवन की उत्पत्ति हुई - (2012)
(a) सागर में
(b) धरती पर
(c) वायुमण्डल में
(d) अंतरिक्ष में
उत्तर: (a) सागर में
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
आनुवंशिकता की खोज करने वाले वैज्ञानिक का पूरा नाम बताइये। या आनुवंशिकता के जनक का नाम बताइये। या आनुवंशिकता के जन्मदाता कौन थे? (2012, 13)
उत्तर:
आनुवंशिकता के जनक ग्रेगर जॉन मेण्डल थे। उन्होंने ही सबसे पहले मटर के पौधों पर प्रयोग करके आनुवंशिकता के नियमों की खोज की।
प्रश्न 2.
मेण्डल ने आनुवंशिकता का प्रयोग किस पौधे पर किया था? उसका वैज्ञानिक नाम लिखिए। (2018)
उत्तर:
मेण्डल ने अपने प्रयोग के लिए मटर के पौधे को चुना। इसका वैज्ञानिक नाम पाइसम सैटाइवम (Pisum sativum) है।
प्रश्न 3.
मेण्डल ने अपने प्रयोग के लिए मटर के पौधे को क्यों चुना? (2017)
उत्तर:
मेण्डल ने अपने प्रयोग के लिए मटर के पौधे को निम्नलिखित कारणों से चुना:
1. मटर का जीवनचक्र छोटा होता है, जिससे एक वर्ष में कई पीढ़ियों का अध्ययन किया जा सकता है।
2. इनमें स्व-परागण की प्रवृत्ति होती है, जिससे शुद्ध नस्लें आसानी से तैयार की जा सकती हैं।
3. इनमें स्पष्ट और विपरीत लक्षण (जैसे लम्बा/बौना, गोल/झुर्रीदार बीज) पाए जाते हैं, जिनका अध्ययन करना आसान है।
4. इन्हें उगाना और देखभाल करना सरल है तथा ये कम जगह में उगाए जा सकते हैं।
प्रश्न 4.
प्रभावी तथा अप्रभावी लक्षणों से आप क्या समझते हैं? (2017)
उत्तर:
प्रभावी लक्षण: वह लक्षण जो संकर (F1) पीढ़ी में स्वयं को प्रकट कर लेता है, प्रभावी लक्षण कहलाता है। उदाहरण के लिए, मटर में लम्बापन और गोल बीज प्रभावी लक्षण हैं।
अप्रभावी लक्षण: वह लक्षण जो संकर (F1) पीढ़ी में प्रकट नहीं होता, बल्कि छिपा रहता है और अगली (F2) पीढ़ी में कुछ अनुपात में दिखाई देता है, अप्रभावी लक्षण कहलाता है। उदाहरण के लिए, मटर में बौनापन और झुर्रीदार बीज अप्रभावी लक्षण हैं।
प्रश्न 5.
लक्षणरूपी 9:3:3:1 मेण्डल के किस नियम का प्रतिपादन करता है?
उत्तर:
लक्षणरूपी अनुपात 9:3:3:1, मेण्डल के स्वतंत्र अपव्यूहन के नियम (Law of Independent Assortment) का प्रतिपादन करता है। यह नियम बताता है कि दो अलग-अलग लक्षणों के जोड़े (जैसे बीज का आकार और रंग) वंशानुगत होते समय एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से व्यवहार करते हैं।
प्रश्न 6.
मनुष्य के नर तथा मादा गुणसूत्रों को प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर:
नर: 44 ऑटोसोम + XY लिंग गुणसूत्र (कुल 46 गुणसूत्र)।
मादा: 44 ऑटोसोम + XX लिंग गुणसूत्र (कुल 46 गुणसूत्र)।
प्रश्न 7.
यदि किसी जीव की कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या 20 है, तो उसकी जनन कोशिकाओं में कितने गुणसूत्र होंगे?
उत्तर:
यदि किसी जीव की दैहिक (शरीर) कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या 20 (यानी 2n = 20) है, तो उसकी जनन कोशिकाओं (युग्मकों - शुक्राणु या अंडाणु) में गुणसूत्रों की संख्या आधी यानी 10 (n = 10) होगी। ऐसा अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) की प्रक्रिया के कारण होता है, जिसमें गुणसूत्रों की संख्या आधी हो जाती है।
प्रश्न 8. प्रोकेरियोटिक कोशिकाओं में डी०एन०ए० कहाँ पाया जाता है? (2013)
प्रोकेरियोटिक कोशिकाओं (जैसे जीवाणु) में एक सुस्पष्ट केन्द्रक नहीं होता। इनमें डीएनए (आनुवंशिक पदार्थ) कोशिकाद्रव्य में ही एक लंबे, गोलाकार, बंद गुणसूत्र के रूप में स्वतंत्र रूप से पड़ा रहता है। इसे न्यूक्लियॉइड क्षेत्र कहते हैं।
प्रश्न 9. आनुवंशिक रोग किसे कहते हैं?
वे रोग जो माता-पिता से सन्तान में जीन के माध्यम से स्थानांतरित होते हैं, आनुवंशिक रोग कहलाते हैं। ये रोग गुणसूत्रों या जीनों में होने वाली असामान्यताओं (जैसे जीन में परिवर्तन, गुणसूत्रों की संख्या या संरचना में बदलाव) के कारण उत्पन्न होते हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंशानुगत हो सकते हैं। उदाहरण: वर्णान्धता, हीमोफीलिया, सिकल सेल एनीमिया।
प्रश्न 10. किस आनुवंशिक लक्षण के जीन्स x ITE Ue पाये जाते हैं? (2011)
वर्णान्धता (कलर ब्लाइंडनेस)। इस रोग के जीन्स X गुणसूत्र पर स्थित होते हैं, इसलिए यह एक लिंग-सहलग्न (X-linked) रोग है।
प्रश्न 11. यदि किसी व्यक्ति को हल्की चोट लगने पर भी रक्तस्राव नहीं रुकता तो उसे कौन-सा रोग हो सकता है?
ऐसे व्यक्ति को हीमोफीलिया नामक आनुवंशिक रोग हो सकता है। इस रोग में रक्त का थक्का जमने के लिए आवश्यक प्रोटीन (क्लॉटिंग फैक्टर) की कमी होती है, जिससे चोट लगने पर रक्तस्राव जल्दी नहीं रुकता।
प्रश्न 12. लिंग सहलग्नता से सम्बन्धित किन्हीं दो बीमारियों के नाम लिखिए। (2013, 15, 18)
लिंग सहलग्नता से सम्बन्धित दो प्रमुख बीमारियाँ हैं:
- हीमोफीलिया
- वर्णान्धता (कलर ब्लाइंडनेस)
प्रश्न 13. एक व्यक्ति हीमोफीलिया का रोगी है और उसकी पत्नी में हीमोफीलिया का एक जीन है। उस दंपत्ति के बच्चों में रोग से ग्रसित होने की संभावना क्या होगी? (2013)
हीमोफीलिया एक लिंग-सहलग्न (X गुणसूत्र पर) अप्रभावी रोग है।
पिता का जीनोटाइप: XhY (रोगी, क्योंकि उसके पास दोषपूर्ण X गुणसूत्र है)।
माता का जीनोटाइप: XHXh (वाहक, क्योंकि उसमें एक सामान्य और एक दोषपूर्ण जीन है)।
50% पुत्र: इनमें से आधे (25%) सामान्य (XHY) और आधे (25%) रोगी (XhY) होंगे।
50% पुत्रियाँ: इनमें से आधी (25%) वाहक (XHXh) और आधी (25%) रोगी (XhXh) होंगी।
अतः, कुल मिलाकर सभी बच्चों (पुत्र+पुत्री) में से 50% बच्चों के रोगी होने की संभावना है।
प्रश्न 14. यदि किसी बच्चे में 46 के स्थान पर 47 गुणसूत्र हों, तो उस बच्चे में किस प्रकार के रोग होने की सम्भावना है? या एक बच्चे में 47 गुणसूत्र हैं। उसे किस रोग की सम्भावना है?
मानव में सामान्यतः प्रत्येक कोशिका में 46 (23 जोड़े) गुणसूत्र होते हैं। यदि किसी बच्चे में 47 गुणसूत्र हैं, तो यह गुणसूत्र संख्या में अनियमितता दर्शाता है। ऐसी स्थिति में डाउन सिंड्रोम (मंगोलिज्म या मंगोली जड़ता) नामक रोग होने की प्रबल सम्भावना रहती है। यह रोग 21वें गुणसूत्र के एक अतिरिक्त होने (ट्राइसोमी-21) के कारण होता है। इस रोग से ग्रसित बच्चों में शारीरिक व मानसिक विकास मंद होता है।
प्रश्न 15. मानव आनुवंशिकी विशेषकों से क्या तात्पर्य है?
मानव आनुवंशिकी विशेषकों से तात्पर्य उन सभी लक्षणों या गुणों से है जो मनुष्य में उसके माता-पिता से जीन के द्वारा प्राप्त होते हैं और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होते रहते हैं। उदाहरण के लिए: आँखों का रंग, बालों का प्रकार, कद, रक्त समूह, तथा कुछ विशेष रोगों के प्रति संवेदनशीलता आदि।
प्रश्न 16. स्वत: जनन सिद्धान्त में विश्वास रखने वाले किसी एक वैज्ञानिक का नाम बताइये। या स्वतः जननवाद मत के प्रवर्तक का नाम लिखिये।
स्वतः जनन (अलैंगिक जनन से भिन्न) के पुराने सिद्धांत में विश्वास रखने वाले एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक बैप्टिस्ट वॉन हेलमॉन्ट (1652) थे। उनका मानना था कि गंदे कपड़ों और गेहूं के दानों से चूहे स्वतः उत्पन्न हो सकते हैं।
प्रश्न 17. मिलर ने अपने प्रयोग में कौन-कौन सी गैसों का मिश्रण लिया?
स्टेनली मिलर और हेरोल्ड यूरे ने 1953 में पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति का अनुकरण करने वाले अपने प्रसिद्ध प्रयोग में निम्नलिखित गैसों का मिश्रण लिया, जो आदिम वायुमंडल में उपस्थित मानी जाती थीं:
- मीथेन (CH4)
- अमोनिया (NH3)
- हाइड्रोजन (H2)
- जलवाष्प (H2O)
प्रश्न 18. जीवन के उद्भव का आधुनिक ओपेरिन सिद्धान्त क्या है ? (2011, 13)
रूस के जीवरसायनज्ञ ए. आई. ओपेरिन (1924) और इंग्लैंड के जे. बी. एस. हाल्डेन ने जीवन की उत्पत्ति का आधुनिक रासायनिक सिद्धांत प्रस्तुत किया, जिसे ओपेरिन-हाल्डेन सिद्धांत भी कहते हैं। इस सिद्धांत के अनुसार:
- आदिकालीन पृथ्वी के वायुमंडल में मीथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन और जलवाष्प जैसी अकार्बनिक गैसें थीं।
- विद्युत तड़ित, पराबैंगनी विकिरण और उच्च ताप जैसी ऊर्जा स्रोतों के प्रभाव से ये गैसें आपस में अभिक्रिया करके सरल कार्बनिक यौगिक (जैसे शर्करा, अमीनो अम्ल) बनाती थीं।
- ये यौगिक वर्षा के साथ समुद्र में एकत्र होते गए और लाखों वर्षों में एक "ऑर्गेनिक सूप" या "उष्ण तरल सूप" बन गया।
- इन कार्बनिक अणुओं के संयोग से बड़े अणु (प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल) और अंततः कोएसरवेट बूंदें (पृथक्कृत कोलॉइडी संरचनाएँ) बनीं, जो जीवन की प्रारंभिक इकाई मानी जाती हैं।
- धीरे-धीरे इन संरचनाओं में स्व-प्रतिकृति और चयापचय जैसे जैविक गुण विकसित हुए और अंततः सरल कोशिकाओं का निर्माण हुआ।
प्रश्न 1. आनुवंशिकता को परिभाषित कीजिए। इसकी खोज कब और किसने की? (2011, 17)
आनुवंशिकता वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा सजीवों के लक्षण या गुण (जैसे रंग-रूप, आकार, कुछ व्यवहार) माता-पिता से उनकी सन्तान में जीन के माध्यम से स्थानांतरित होते हैं। इसी के कारण प्रत्येक जीव की सन्तान उसी जाति का होता है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी समानता बनी रहती है।
आनुवंशिकता के अध्ययन की शाखा को आनुवंशिकी (Genetics) कहते हैं। इसकी नींव ग्रेगर जॉन मेंडल ने सन् 1866 में मटर के पौधों पर किए गए अपने प्रयोगों के आधार पर रखी। इसलिए उन्हें 'आनुवंशिकी का जनक' कहा जाता है।
प्रश्न 2, मानव आनुवंशिकी से आप क्या समझते हैं? इसके जनक कौन थे? इसके क्या लाभ हैं? (2013)
मानव आनुवंशिकी आनुवंशिकी की वह शाखा है जिसमें मनुष्यों में वंशागत लक्षणों, उनके स्थानांतरण के नियमों और आनुवंशिक रोगों का अध्ययन किया जाता है।
जनक: मानव आनुवंशिकी के जनक सर फ्रांसिस गाल्टन (1822-1911) माने जाते हैं।
लाभ:
- आनुवंशिक रोगों की पहचान व रोकथाम: थैलेसीमिया, हीमोफीलिया, डाउन सिंड्रोम जैसे रोगों का गर्भावस्था में ही पता लगाकर उचित परामर्श दिया जा सकता है।
- सुजननिकी (Eugenics): समाज में अच्छे आनुवंशिक गुणों को बढ़ावा देने और हानिकारक गुणों को कम करने के लिए जागरूकता फैलाना।
- वंशावली अध्ययन: परिवार में फैलने वाले रोगों के पैटर्न को समझकर भविष्य की पीढ़ियों को सुरक्षित रखना।
- फोरेंसिक विज्ञान: अपराध स्थल से प्राप्त डीएनए का विश्लेषण कर अपराधी की पहचान में सहायता करना।
- जीन थेरेपी: भविष्य में दोषपूर्ण जीन को स्वस्थ जीन से बदलकर आनुवंशिक रोगों का इलाज संभव हो सकता है।
प्रश्न 3. आनुवंशिकी के गुणसूत्र सिद्धान्त का वर्णन कीजिए। (2017)
गुणसूत्र सिद्धांत आनुवंशिकी का एक मौलिक सिद्धांत है जिसे सटन और बोवेरी ने प्रतिपादित किया। इस सिद्धांत के प्रमुख बिंदु हैं:
- जीन, आनुवंशिकता की मूल इकाइयाँ, गुणसूत्रों पर स्थित होती हैं।
- प्रत्येक जीन गुणसूत्र पर एक विशिष्ट स्थान (लोकस) पर स्थित होता है।
- गुणसूत्रों के व्यवहार (विभाजन के दौरान) से मेंडल के वंशागति के नियमों की व्याख्या की जा सकती है।
- कोशिका में गुणसूत्र जोड़े (होमोलॉगस जोड़े) के रूप में होते हैं, जिनमें से एक माता से और एक पिता से आता है।
- युग्मक निर्माण (अर्धसूत्री विभाजन) के समय गुणसूत्रों के जोड़े अलग हो जाते हैं, इसलिए प्रत्येक युग्मक में प्रत्येक गुणसूत्र-जोड़े का केवल एक-एक गुणसूत्र होता है।
- निषेचन के समय नर व मादा युग्मकों के संलयन से गुणसूत्रों के जोड़े पुनः स्थापित हो जाते हैं, जिससे सन्तान में माता-पिता दोनों के लक्षण आते हैं।
- गुणसूत्र ही वाहक हैं जो आनुवंशिक सूचना (जीन) को एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक पहुँचाते हैं।
प्रश्न 4. एकसंकर तथा द्विसंकर क्रॉस से आप क्या समझते हैं? उदाहरण देते हुए समझाइए। (2015, 17)
एकसंकर संकरण (Monohybrid Cross): जब दो जनक पौधों के बीच केवल एक ही विपर्यासी लक्षण (जैसे लम्बा vs बौना) के आधार पर संकरण कराया जाता है, तो उसे एकसंकर संकरण कहते हैं।
उदाहरण: मेंडल ने लम्बे (TT) और बौने (tt) मटर के पौधों का संकरण कराया। F1 पीढ़ी में सभी पौधे लम्बे (Tt) थे। F1 पीढ़ी के स्वपरागण से F2 पीढ़ी में 3 लम्बे : 1 बौना का अनुपात प्राप्त हुआ।
द्विसंकर संकरण (Dihybrid Cross): जब दो जनक पौधों के बीच दो विभिन्न विपर्यासी लक्षणों (जैसे बीज का आकार गोल vs झुर्रीदार और बीज का रंग पीला vs हरा) के आधार पर संकरण कराया जाता है, तो उसे द्विसंकर संकरण कहते हैं।
उदाहरण: मेंडल ने गोल-पीले बीज (RRYY) वाले और झुर्रीदार-हरे बीज (rryy) वाले पौधों का संकरण कराया। F1 पीढ़ी में सभी पौधे गोल-पीले (RrYy) थे। F1 के स्वपरागण से F2 पीढ़ी में 9 गोल-पीले : 3 गोल-हरे : 3 झुर्रीदार-पीले : 1 झुर्रीदार-हरे का अनुपात प्राप्त हुआ। यह 9:3:3:1 का द्विसंकर अनुपात है।
अध्याय 9: अनुवांशिकता एवं जैव विकास
1. मेंडल के प्रयोगों द्वारा कैसे पता चला कि लक्षण प्रभावी अथवा अप्रभावी हो सकते हैं?
मेंडल ने मटर के पौधों पर किए गए अपने प्रयोगों में विभिन्न लक्षणों (जैसे लंबाई, बीज का रंग) के जोड़े लिए। जब उन्होंने शुद्ध लंबे (TT) और शुद्ध बौने (tt) पौधों का संकरण किया, तो पहली पीढ़ी (F1) के सभी पौधे लंबे (Tt) प्राप्त हुए। इससे पता चला कि लंबापन लक्षण प्रकट हुआ, अर्थात यह प्रभावी लक्षण है। जब F1 पीढ़ी के पौधों का स्वपरागण कराया गया, तो दूसरी पीढ़ी (F2) में लंबे और बौने पौधे 3:1 के अनुपात में प्राप्त हुए। बौनापन F1 पीढ़ी में प्रकट नहीं हुआ था, लेकिन F2 में दिखाई दिया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि बौनापन अप्रभावी लक्षण था जो F1 में छिपा रहा और F2 में कुछ संतानों में प्रकट हुआ।
2. एक ‘जीन’ को परिभाषित कीजिए।
जीन डीएनए (आनुवंशिक पदार्थ) का वह खंड या इकाई है जो किसी विशिष्ट प्रोटीन के संश्लेषण के लिए आनुवंशिक सूचना रखता है। प्रत्येक जीन किसी विशेष आनुवंशिक लक्षण (जैसे आँखों का रंग, बालों का प्रकार) को नियंत्रित करने के लिए उत्तरदायी होता है। जीन गुणसूत्रों पर स्थित होते हैं और माता-पिता से संतानों में स्थानांतरित होते हैं।
3. आनुवंशिकता के अध्ययन में मेंडल के प्रयोगों का महत्त्व क्या है?
मेंडल के प्रयोग आनुवंशिकी (जेनेटिक्स) के आधार के रूप में माने जाते हैं। उनके प्रयोगों का महत्त्व इस प्रकार है:
1. उन्होंने प्रभावी और अप्रभावी लक्षणों की अवधारणा दी।
2. उन्होंने यह दिखाया कि लक्षण स्वतंत्र इकाइयों (जीन) द्वारा नियंत्रित होते हैं जो युग्मकों के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होते हैं।
3. उन्होंने संकरण के नियम, जैसे प्रभाविता का नियम और पृथक्करण का नियम प्रतिपादित किए।
4. उन्होंने गणितीय अनुपात (जैसे 3:1) का उपयोग करके आनुवंशिक परिणामों की भविष्यवाणी करने का मार्ग प्रशस्त किया।
5. उनके कार्य ने आधुनिक आनुवंशिकी की नींव रखी, भले ही उनके जीवनकाल में इसकी सराहना नहीं हुई।
4. यदि एक ‘संकर लंबे’ पौधे का परागण संकर लंबे पौधे से कराया जाए तो संतति में कौन-कौन से विभिन्न प्रकार के जीन प्ररूप और लक्षण प्ररूप बनेंगे? संतति का मेन्डेलियन अनुपात भी बताइए।
यहाँ 'संकर लंबा' पौधा जीन प्ररूप Tt (जहाँ T=लंबा, प्रभावी और t=बौना, अप्रभावी) वाला होता है।
संकरण: Tt (संकर लंबा) × Tt (संकर लंबा)
युग्मक: दोनों पौधे T और t युग्मक बनाते हैं।
संभावित संतति (पुनेट वर्ग द्वारा):
- TT (शुद्ध लंबा) – 1 भाग
- Tt (संकर लंबा) – 2 भाग
- tt (शुद्ध बौना) – 1 भाग
जीन प्ररूप अनुपात: TT : Tt : tt = 1 : 2 : 1
लक्षण प्ररूप (फीनोटाइप):
- लंबे पौधे (TT + Tt) – 3 भाग
- बौने पौधे (tt) – 1 भाग
लक्षण प्ररूप अनुपात: लंबा : बौना = 3 : 1
यह मेंडल का प्रसिद्ध F2 पीढ़ी का अनुपात है।
5. विकासीय संबंध क्या दर्शाते हैं?
विकासीय संबंध यह दर्शाते हैं कि विभिन्न जीव, चाहे वे कितने भी भिन्न दिखें, एक सामान्य पूर्वज से उत्पन्न हुए हैं। ये संबंध जीवों के बीच समानताओं और असमानताओं के आधार पर स्थापित किए जाते हैं, जैसे:
1. समजात अंग: वे अंग जो आकारिकी (संरचना) में समान होते हैं लेकिन कार्य भिन्न होते हैं (जैसे मनुष्य का हाथ, चमगादड़ का पंख, व्हेल का अग्रपंख)। ये एक सामान्य पूर्वज की ओर संकेत करते हैं।
2. समरूप अंग: वे अंग जो कार्य में समान होते हैं लेकिन संरचना एवं उद्भव में भिन्न होते हैं (जैसे तितली और पक्षी के पंख)। ये समान वातावरणीय दबाव के कारण हुए अभिसारी विकास को दर्शाते हैं।
3. जीवाश्म अभिलेख: ये पृथ्वी पर जीवन के इतिहास और विभिन्न जीवों के बीच संबंधों को दर्शाते हैं।
4. भ्रूणीय समानताएँ: विभिन्न कशेरुकी जीवों के भ्रूण प्रारंभिक अवस्था में बहुत समान दिखते हैं, जो उनके सामान्य विकासीय इतिहास को प्रमाणित करता है।
6. क्या भिन्न-भिन्न स्थानों पर पाए जाने वाले एक ही जीव के जीवाश्मों से कोई संबंध बनता है? यदि हाँ, तो कैसे?
हाँ, भिन्न-भिन्न स्थानों पर पाए जाने वाले एक ही जीव के जीवाश्मों के बीच घनिष्ठ संबंध बनता है। यह संबंध निम्न प्रकार से स्थापित होता है:
1. विकास की कड़ी: विभिन्न स्थानों से प्राप्त जीवाश्म, जब कालक्रम के अनुसार व्यवस्थित किए जाते हैं, तो वे एक जीव के विकासीय क्रम को दर्शा सकते हैं। उदाहरण के लिए, घोड़े के विभिन्न पूर्वजों के जीवाश्म विश्व के अलग-अलग हिस्सों से मिले हैं, जो उसके आकार, पैरों की संरचना आदि में हुए परिवर्तनों को दर्शाते हैं।
2. महाद्वीपीय विस्थापन: एक ही जीव के जीवाश्म अलग-अलग महाद्वीपों पर मिलना इस बात का प्रमाण हो सकता है कि कभी वे सभी भूभाग एक विशाल भूखंड (जैसे पैंजिया) का हिस्सा थे। जब महाद्वीप अलग हुए, तो जीव अलग-अलग क्षेत्रों में फैल गए और वहाँ जीवाश्म के रूप में संरक्षित हो गए।
3. पर्यावरणीय परिवर्तनों का अध्ययन: विभिन्न स्थानों के जीवाश्म बताते हैं कि कैसे जलवायु और भूगोल में परिवर्तन के साथ जीवों ने स्वयं को ढाला या विलुप्त हुए।
इस प्रकार, भौगोलिक रूप से अलग-अलग जीवाश्म एक ही विकासीय कहानी के अलग-अलग अध्यायों की तरह हैं, जो जीवन के इतिहास को जोड़ते हैं।
7. विकास के प्रमाण के रूप में जीवाश्मों का क्या महत्त्व है?
जीवाश्म विकास के सबसे मजबूत और प्रत्यक्ष प्रमाण प्रदान करते हैं। उनका महत्त्व इस प्रकार है:
1. प्राचीन जीवन का अभिलेख: जीवाश्म पृथ्वी पर करोड़ों वर्ष पहले रहने वाले जीवों के शारीरिक अवशेष या चिह्न हैं, जो हमें प्राचीन जीवन के बारे में जानकारी देते हैं।
2. विकासीय क्रम दिखाना: विभिन्न भूवैज्ञानिक परतों से प्राप्त जीवाश्म एक जीव के विकास के क्रमिक परिवर्तनों को दर्शाते हैं। उदाहरण: घोड़े के पूर्वजों के जीवाश्म उसके आकार में वृद्धि और पैर की उंगलियों की संख्या में कमी (चार से एक) का क्रम दिखाते हैं।
3. विलुप्त जीवों के बारे में जानकारी: जीवाश्म उन जीवों के बारे में बताते हैं जो आज विलुप्त हो चुके हैं, जैसे डायनासोर। यह समझने में मदद करता है कि किन कारणों से जीवों का विलोपन हुआ।
4. समयरेखा निर्धारण: जीवाश्मों की आयु निर्धारण (कार्बन डेटिंग आदि) से पृथ्वी पर जीवन के इतिहास की एक समयरेखा बनाने में मदद मिलती है।
5. अंतराल पूर्ति: कभी-कभी 'जीवाश्म कड़ियों' की कमी होती है, लेकिन नए जीवाश्मों की खोज से विकासीय पहेलियों के टुकड़े जुड़ते हैं और विकास की कहानी और स्पष्ट होती है।
8. विकास को परिभाषित कीजिए।
विकास वह धीमी, सतत और लंबी प्रक्रिया है जिसके द्वारा सरल संरचना वाले जीवों से, लाखों-करोड़ों वर्षों में, विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुकूल होते हुए, अधिक जटिल संरचना वाले जीवों का निर्माण हुआ है। दूसरे शब्दों में, यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी होने वाले आनुवंशिक परिवर्तनों का संचय है, जिसके परिणामस्वरूप जीवों की नई प्रजातियों का उद्भव होता है। विकास का मुख्य तंत्र प्राकृतिक वरण है।
9. हमारे विश्व में उपस्थित असंख्य जातियों के बारे में डार्विन के विचारों को संक्षेप में बताइए।
चार्ल्स डार्विन ने अपनी पुस्तक 'ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज' (1859) में प्राकृतिक वरण द्वारा विकास के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। विश्व की असंख्य जातियों (प्रजातियों) के बारे में उनके मुख्य विचार इस प्रकार हैं:
1. जनसंख्या में विभिन्नता: किसी भी जीवों की आबादी के सदस्य एक-दूसरे से पूर्णतः समान नहीं होते; उनमें आकार, रंग, व्यवहार आदि में विभिन्नताएँ होती हैं। ये विभिन्नताएँ आनुवंशिक होती हैं और संतानों में स्थानांतरित हो सकती हैं।
2. अस्तित्व के लिए संघर्ष: संसाधन (भोजन, स्थान, जल) सीमित होते हैं, जबकि जीवों की संख्या बढ़ने की क्षमता असीमित होती है। इससे जीवों के बीच अस्तित्व के लिए संघर्ष होता है।
3. प्राकृतिक वरण: उन विभिन्नताओं वाले जीव, जो अपने पर्यावरण के लिए सबसे अधिक अनुकूलित (फिट) होते हैं, अस्तित्व के संघर्ष में बच जाते हैं और अधिक संतान पैदा करते हैं। इस प्रकार, अनुकूल लक्षण समय के साथ आबादी में बढ़ जाते हैं। इस प्रक्रिया को प्राकृतिक वरण कहते हैं।
4. नई प्रजातियों का उद्भव: लंबे समय तक प्राकृतिक वरण की यह प्रक्रिया चलती रहने से, जीवों में इतने परिवर्तन आ जाते हैं कि वे मूल प्रजाति से भिन्न हो जाते हैं और अंततः नई प्रजातियाँ बन जाती हैं। इस प्रकार, सभी जातियाँ एक सामान्य पूर्वज से विकसित हुई हैं।
10. विकासीय उद्देश्य से हमारी क्या विशेष सोच होनी चाहिए?
विकासीय दृष्टिकोण से हमारी सोच में निम्नलिखित बातें शामिल होनी चाहिए:
1. सभी जीवों का आपसी संबंध: हमें यह समझना चाहिए कि पृथ्वी पर मौजूद सभी जीव (पौधे, जानवर, सूक्ष्मजीव) एक-दूसरे से और अपने पर्यावरण से जुड़े हुए हैं। हम सभी एक लंबे विकासीय इतिहास की उपज हैं।
2. परिवर्तन सतत प्रक्रिया है: विकास एक रुकी हुई प्रक्रिया नहीं है; यह लगातार जारी है। जीव नए पर्यावरणीय दबावों के अनुसार स्वयं को बदलते रहते हैं।
3. मानव की जिम्मेदारी: चूंकि मनुष्य ने बुद्धि और तकनीक से स्वयं को विकसित किया है, इसलिए उसकी यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वह अन्य जीवों और पारिस्थितिकी तंत्र के विकास में बाधा न डाले। हमें जैव विविधता का संरक्षण करना चाहिए।
4. वैज्ञानिक साक्ष्यों का सम्मान: विकास के सिद्धांत को समझने के लिए जीवाश्म, समजात अंग, आनुवंशिकी आदि के वैज्ञानिक प्रमाणों को महत्त्व देना चाहिए, न कि अफवाहों या गलत धारणाओं को।
5. विनम्र दृष्टिकोण: हमें यह सोचना चाहिए कि मनुष्य जैव विकास की श्रृंखला का अंतिम पड़ाव नहीं है। भविष्य में और भी परिवर्तन संभव हैं।
अध्याय 9: अनुवांशिकता एवं जैव विकास
1. मेण्डल के एक प्रयोग में लम्बे मटर के पौधे जिनके बैंगनी पुष्प थे, का संकरण बौने पौधों जिनके सफेद पुष्प थे, से कराया गया। इनकी संतति के सभी पौधों में पुष्प बैंगनी रंग के थे परन्तु आधे बौने थे। इससे कहा जा सकता है कि लम्बे जनक पौधों की आनुवंशिक रचना निम्न थी-
(a) TTWW
(b) TTww
(c) TtWW
(d) TtWw
उत्तर: (c) TtWW
व्याख्या: मेण्डल के इस प्रयोग में, लम्बापन प्रभावी लक्षण (T) और बौनापन अप्रभावी (t) है। इसी तरह, बैंगनी पुष्प प्रभावी (W) और सफेद पुष्प अप्रभावी (w) हैं। चूँकि सभी संतति पौधों में बैंगनी पुष्प थे, इसका मतलब है कि लम्बे जनक (बैंगनी पुष्प वाले) में सफेद पुष्प के लिए कोई अप्रभावी जीन (w) नहीं था। वह शुद्ध प्रभावी (WW) था। लेकिन लम्बे जनक से आधी संतति बौनी थी, जो दर्शाता है कि लम्बे जनक में लम्बेपन के लिए एक प्रभावी और एक अप्रभावी जीन (Tt) मौजूद था। इसलिए, लम्बे जनक की आनुवंशिक रचना TtWW थी।
2. समजात अंग का उदाहरण है-
(a) हमारा हाथ और कुत्ते के अग्रपाद
(b) हमारे दाँत और हाथी के दाँत
(c) आलू एवं घास के उपरिभूस्तारी
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर: (a) हमारा हाथ और कुत्ते के अग्रपाद
व्याख्या: समजात अंग वे अंग होते हैं जिनकी आधारभूत संरचना समान होती है, क्योंकि वे एक共同的 पूर्वज से विरासत में मिले होते हैं, लेकिन उनके कार्य अलग-अलग हो सकते हैं। मानव का हाथ और कुत्ते का अग्रपाद (आगे का पैर) की हड्डियों की मूल संरचना एक जैसी है, पर कार्य भिन्न हैं (पकड़ना बनाम चलना)। यह समजातता का स्पष्ट उदाहरण है। विकल्प (b) और (c) समरूप अंगों (समान कार्य, भिन्न उत्पत्ति) के उदाहरण हैं।
3. विकासीय दृष्टिकोण से हमारी किससे अधिक समानता है-
(a) चीन के विद्यार्थी
(b) चिम्पैंजी
(c) मकड़ी
(d) बैक्टीरिया
उत्तर: (a) चीन के विद्यार्थी
व्याख्या: विकासीय दृष्टिकोण से, जीवों के बीच समानता उनके विकासवादी संबंध और आनुवंशिक निकटता पर निर्भर करती है। मनुष्य (हम) और चीन का विद्यार्थी दोनों ही होमो सेपियन्स प्रजाति के हैं, इसलिए उनके बीच आनुवंशिक और शारीरिक समानता लगभग 100% है। चिम्पैंजी हमारा निकटतम जीवित रिश्तेदार है, लेकिन फिर भी आनुवंशिक समानता लगभग 98-99% ही है। मकड़ी और बैक्टीरिया तो हमसे बहुत दूर के जीव हैं। इसलिए, सबसे अधिक समानता निश्चित रूप से एक अन्य मनुष्य (चीन के विद्यार्थी) से ही है।
4. एक अध्ययन में देखा गया कि हल्के रंग की पृष्ठभूमि पर हल्के रंग की कीट पतंगें जीवित रहती हैं जबकि गहरे रंग वाली आसानी से पहचान ली जाती हैं और शिकार बन जाती हैं। गहरे रंग की पृष्ठभूमि पर यह घटना उलट जाती है। प्रकृति द्वारा कीट पतंगों के चयन की इस प्रक्रिया को कहते हैं-
(a) यादृच्छिक चयन
(b) कृत्रिम चयन
(c) प्राकृतिक चयन
(d) कीट चयन
उत्तर: (c) प्राकृतिक चयन
व्याख्या: यहाँ पर्यावरण (पृष्ठभूमि का रंग) उन कीटों का चयन कर रहा है जिनका रंग छलावरण (camouflage) प्रदान करता है और उन्हें शिकारियों से बचाता है। जो कीट परिवेश के अनुकूल नहीं हैं, वे पकड़े जाते हैं और उनकी संख्या कम हो जाती है। पर्यावरण के दबाव के कारण समय के साथ लाभकारी लक्षण (यहाँ रंग) वाले जीवों की आबादी में वृद्धि होती है। प्रकृति द्वारा इस स्वचालित और अनियोजित चयन प्रक्रिया को ही प्राकृतिक चयन कहते हैं, जो डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत का मुख्य आधार है।
5. जीवाश्म क्या हैं? ये किस प्रकार बनते हैं? किन्हीं दो जीवाश्मों के नाम लिखें।
उत्तर:
जीवाश्म क्या हैं: जीवाश्म प्राचीन काल के पौधों, जानवरों और सूक्ष्मजीवों के अवशेष, निशान या छाप होते हैं, जो चट्टानों की परतों में संरक्षित पाए जाते हैं। ये लाखों-करोड़ों वर्ष पुराने हो सकते हैं और पृथ्वी के इतिहास तथा जीवन के विकास को समझने के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रदान करते हैं।
जीवाश्म कैसे बनते हैं: जीवाश्म बनने की मुख्य प्रक्रिया निम्नलिखित है:
- किसी जीव की मृत्यु के बाद, उसका शरीर तेजी से रेत, मिट्टी या कीचड़ से ढक जाता है, जिससे सड़न-गलन रुक जाती है।
- लाखों वर्षों तक दबाव और रासायनिक परिवर्तनों के कारण, नरम ऊतक लगभग पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं, लेकिन कठोर भाग जैसे हड्डियाँ, दाँत, खोल या लकड़ी खनिजों (जैसे सिलिका, कैल्साइट) से भर जाते हैं और पत्थर में बदल जाते हैं। इस प्रक्रिया को खनिजीकरण (Petrification) कहते हैं।
- कभी-कभी पूरा जीव बर्फ या एम्बर (राल) में दब जाता है और बिना किसी बड़े बदलाव के संरक्षित रह जाता है।
- कुछ जीवाश्म पदचिह्न, अंडे के छिलके या मल के नमूने के रूप में भी मिलते हैं, जिन्हें अनुरेख जीवाश्म (Trace Fossils) कहा जाता है।
दो जीवाश्मों के नाम:
- आर्कियोप्टेरिक्स (Archaeopteryx): पक्षियों और सरीसृपों के बीच की कड़ी, यह एक पंखों वाला डायनासोर था।
- ट्राइलोबाइट (Trilobite): समुद्र में रहने वाला एक प्राचीन जीव, जो आर्थ्रोपोडा संघ से संबंधित था।
6. समजात तथा समरूप अंग में क्या अन्तर है? प्रत्येक का एक-एक उदाहरण दें।
उत्तर: समजात और समरूप अंगों में मुख्य अंतर उनकी उत्पत्ति और कार्य के आधार पर है। नीचे तुलनात्मक विवरण दिया गया है:
| आधार | समजात अंग (Homologous Organs) | समरूप अंग (Analogous Organs) |
|---|---|---|
| परिभाषा | वे अंग जिनकी मूल संरचना एवं उत्पत्ति समान होती है, लेकिन कार्य भिन्न-भिन्न होते हैं। | वे अंग जिनके कार्य समान होते हैं, लेकिन मूल संरचना एवं उत्पत्ति भिन्न होती है। |
| विकासवादी महत्व | ये सामान्य पूर्वज से विकास का संकेत देते हैं। (विविधता का सिद्धांत) | ये भिन्न पूर्वजों में समान पर्यावरणीय दबाव के कारण हुए विकास को दर्शाते हैं। (अभिसारी विकास) |
| उदाहरण 1 | मनुष्य का हाथ, घोड़े का अग्रपाद, चमगादड़ का पंख, व्हेल का फ्लिपर। इन सभी में ह्यूमरस, रेडियस-अल्ना, कार्पल्स, मेटाकार्पल्स और फैलेंजेस हड्डियाँ पाई जाती हैं, लेकिन कार्य अलग-अलग हैं।पक्षी का पंख और तितली का पंख। दोनों उड़ने का कार्य करते हैं, लेकिन पक्षी के पंख की संरचना हड्डियों और पंखों से बनी है, जबकि तितली के पंख कीटों के काइटिन के बने होते हैं। | |
| उदाहरण 2 | आलू का भूमिगत तना (कंद) और ब्रायोफिल्लम के पत्ते का किनारा। दोनों कलिकाओं द्वारा वानस्पतिक प्रवर्धन का कार्य करते हैं, लेकिन आलू का कंद तना है और ब्रायोफिल्लम का अंकुर पत्ता है। | कैक्टस का कांटा (रूपांतरित पत्ता) और बबूल का कांटा (रूपांतरित तना)। दोनों पानी की कमी वाले वातावरण में जल की हानि रोकने और सुरक्षा का कार्य करते हैं, लेकिन उनकी उत्पत्ति अलग-अलग अंगों से हुई है। |
7. लैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न संतति में विभिन्नताएँ अधिक क्यों होती हैं? व्याख्या करें।
उत्तर: लैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न संतति में विभिन्नताएँ (विविधता) अधिक होने के निम्नलिखित कारण हैं:
- दो जनकों का योगदान: लैंगिक जनन में संतति को आनुवंशिक सामग्री दो अलग-अलग जनकों (नर और मादा) से मिलती है। इन दोनों के जीन पूल अलग-अलग होते हैं, जिससे संतति में नए जीन संयोग बनते हैं।
- युग्मक निर्माण (अर्धसूत्री विभाजन): युग्मक (शुक्राणु और अंडा) बनने की प्रक्रिया में अर्धसूत्री विभाजन होता है। इस दौरान क्रॉसिंग ओवर नामक घटना होती है, जिसमें समजात गुणसूत्रों के बीच जीनों का आदान-प्रदान होता है। इससे प्रत्येक युग्मक की आनुवंशिक संरचना अद्वितीय हो जाती है।
- यादृच्छिक निषेचन: निषेचन की प्रक्रिया में, अरबों में से कोई एक शुक्राणु किसी एक अंडे से मिलता है। यह संयोग पूरी तरह से यादृच्छिक होता है। विभिन्न युग्मकों के मिलने से अनगिनत संभावित संयोग बनते हैं, जिससे हर संतति का जीनोटाइप अलग होता है।
- जीनों का पुनर्संयोजन: निषेचन के बाद, दोनों जनकों के गुणसूत्र एक साथ आते हैं, जिससे जीनों का पुनर्संयोजन होता है और नए लक्षण प्रकट हो सकते हैं।
इन सभी कारणों से लैंगिक जनन से पैदा हुए भाई-बहन (जुड़वाँ को छोड़कर) एक-दूसरे से और अपने माता-पिता से भिन्न होते हैं। यह विविधता प्रजाति के लिए फायदेमंद है, क्योंकि यह बदलते पर्यावरण में जीवों के बचे रहने (अस्तित्व) की संभावना बढ़ाती है।
8. विकास के सिद्धान्त के आधार पर बताएँ कि जीवाणु, मकड़ी, मछली और चिम्पैंजी में किसका शरीर अधिक जटिल है?
उत्तर: विकास के सिद्धांत के अनुसार, जीवन सरल रूपों से जटिल रूपों की ओर विकसित हुआ है। दिए गए जीवों को उनके विकास के क्रम (सरल से जटिल) में रखा जाए तो: जीवाणु → मकड़ी → मछली → चिम्पैंजी।
इसलिए, इनमें चिम्पैंजी का शरीर सबसे अधिक जटिल है। इसके कारण निम्नलिखित हैं:
- जीवाणु: एककोशिकीय, प्रोकैरियोटिक, कोई विशिष्ट अंग नहीं।
- मकड़ी: बहुकोशिकीय, अकशेरुकी, जटिल अंग प्रणाली (विशेष रूप से रेशम ग्रंथियाँ) लेकिन सीमित।
- मछली: कशेरुकी, जटिल अंग प्रणाली (पाचन, श्वसन, परिसंचरण, तंत्रिका तंत्र) लेकिन जलचर जीवन के अनुकूल।
- चिम्पैंजी: स्तनधारी, कशेरुकी। इसमें सबसे विकसित और जटिल तंत्रिका तंत्र (मस्तिष्क), अत्यंत विकसित संवेदी अंग, जटिल व्यवहार, सीखने की क्षमता और सामाजिक संरचना पाई जाती है। इसका शरीर स्थलीय जीवन के लिए अत्यधिक विशिष्टीकृत है।
9. आनुवंशिकता से आप क्या समझते हैं? आनुवंशिकता के नियमों का प्रतिपादन किसने किया?
उत्तर:
आनुवंशिकता का अर्थ: आनुवंशिकता वह जैविक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा माता-पिता के लक्षण (शारीरिक एवं कार्यात्मक) उनकी संतानों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानांतरित होते हैं। यह स्थानांतरण जीन्स के माध्यम से होता है, जो डीएनए (DNA) के खंड होते हैं और गुणसूत्रों पर स्थित होते हैं। आनुवंशिकता के कारण ही संतति में अपने जनकों से समानताएँ देखने को मिलती हैं, जैसे रंग-रूप, कद, आँखों का रंग आदि।
आनुवंशिकता के नियमों का प्रतिपादन: आनुवंशिकता के मूलभूत नियमों का प्रतिपादन ऑस्ट्रियाई सन्यासी एवं वैज्ञानिक ग्रेगर जोहान मेण्डल (Gregor Johann Mendel) ने किया। उन्होंने सन् 1856 से 1863 के बीच मटर के पौधों पर किए गए अपने व्यवस्थित प्रयोगों के आधार पर आनुवंशिकता के नियम प्रस्तुत किए, जिन्हें आज मेण्डल के आनुवंशिकता के नियम के नाम से जाना जाता है। इनमें प्रमुख हैं:
- प्रभाविता का नियम (Law of Dominance)
- पृथक्करण का नियम (Law of Segregation)
- स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment)
10. जैव विकास से आप क्या समझते हैं? जैव विकास के सिद्धान्त का प्रतिपादन किसने किया?
उत्तर:
जैव विकास का अर्थ: जैव विकास वह धीमी, सतत और लंबी प्रक्रिया है, जिसके द्वारा सरल संरचना वाले जीवों से, लाखों-करोड़ों वर्षों में, धीरे-धीरे परिवर्तन होकर अधिक जटिल संरचना वाले नए जीवों का निर्माण हुआ है। दूसरे शब्दों में, यह पृथ्वी पर जीवन के इतिहास में होने वाले उन क्रमिक परिवर्तनों का वर्णन करता है, जिसके फलस्वरूप आज हमें जीवों में विविधता दिखाई देती है। यह परिवर्तन पीढ़ी दर पीढ़ी जीवों की आनुवंशिक संरचना में होते हैं।
जैव विकास के सिद्धांत का प्रतिपादन: जैव विकास के सिद्धांत का मुख्य रूप से प्रतिपादन चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन (Charles Robert Darwin) ने किया। उन्होंने अपनी पुस्तक "ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज़" (1859) में प्राकृतिक वरण द्वारा विकास के सिद्धांत को विस्तार से समझाया। डार्विन के सिद्धांत के मुख्य बिंदु हैं: जनसंख्या में विभिन्नताएँ होती हैं, पर्यावरण के साथ बेहतर अनुकूलन करने वाले जीव जीवित रहते और प्रजनन करते हैं (यही प्राकृतिक चयन है), और यह प्रक्रिया लंबे समय में नई प्रजातियों के उद्भव का कारण बनती है। अल्फ्रेड रसेल वालेस (Alfred Russel Wallace) ने भी इसी समय इसी तरह के विचार प्रस्तुत किए थे।
11. पारिस्थितिक तन्त्र में जीवाणुओं की भूमिका स्पष्ट करें।
उत्तर: पारिस्थितिक तंत्र में जीवाणु (बैक्टीरिया) अत्यंत महत्वपूर्ण और बहुआयामी भूमिका निभाते हैं। उनकी प्रमुख भूमिकाएँ निम्नलिखित हैं:
- अपघटक के रूप में: यह जीवाणुओं की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है। वे मृत पौधों, जानवरों और अन्य कार्बनिक पदार्थों (जैसे गिरी हुई पत्तियाँ, मल-मूत्र) को सड़ा-गला कर सरल अकार्बनिक पदार्थों (जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, पानी, नाइट्रेट्स, फॉस्फेट्स) में तोड़ देते हैं। इस प्रक्रिया से पोषक तत्व मिट्टी में वापस मिल जाते हैं, जिन्हें पौधे फिर से उपयोग करते हैं। इस प्रकार वे पारिस्थितिकी तंत्र के पोषक चक्र (जैसे नाइट्रोजन चक्र, कार्बन चक्र) को पूरा करने में सहायक होते हैं।
- नाइट्रोजन स्थिरीकरण: कुछ जीवाणु (जैसे राइजोबियम) फलियों की जड़ों की गाँठों में रहते हैं और वायुमंडलीय नाइट्रोजन गैस को पौधों के उपयोग योग्य नाइट्रेट्स या अमोनिया में बदल देते हैं। यह मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए आवश्यक है।
- खाद्य श्रृंखला में योगदान: जीवाणु स्वयं सूक्ष्मजीवभक्षियों (जैसे प्रोटोजोआ) के लिए भोजन का काम करते हैं और इस प्रकार खाद्य श्रृंखला का आधार बनाते हैं।
- सहजीवन में सहायक: मनुष्य और अन्य जानवरों की आँत में रहने वाले जीवाणु भोजन के पाचन में मदद करते हैं और विटामिन (जैसे विटामिन K और B12) का संश्लेषण भी करते हैं।
- प्रदूषण नियंत्रण: कुछ जीवाणु तेल रिसाव और अन्य हानिकारक रसायनों को तोड़कर पर्यावरण सफाई में मदद करते हैं (बायोरेमेडिएशन)।
इस प्रकार, जीवाणु पारिस्थितिक तंत्र के अदृश्य इंजन की तरह काम करते हैं, जो पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण और जीवन की निरंतरता को सुनिश्चित करते हैं।
अनुवांशिकता एवं जैव विकास
1. मेंडल के किस प्रयोग से पता चलता है कि लक्षण प्रभावी अथवा अप्रभावी हो सकते हैं ?
मेंडल के मटर के लंबे एवं बौने पौधों के संकरण वाले प्रयोग से यह स्पष्ट होता है। जब शुद्ध लंबे (TT) और शुद्ध बौने (tt) पौधों का संकरण किया गया, तो पहली पीढ़ी (F1) में सभी पौधे लंबे (Tt) प्राप्त हुए। यह दर्शाता है कि लंबापन का लक्षण प्रभावी था और बौनापन का लक्षण अप्रभावी था। F1 पीढ़ी के पौधों के स्वपरागण से F2 पीढ़ी में लंबे और बौने पौधे 3:1 के अनुपात में प्राप्त हुए, जो प्रभावी और अप्रभावी लक्षणों की पुष्टि करता है।
2. एक संकर संतति में दोनों लक्षण क्यों दिखाई देते हैं ? उदाहरण देकर समझाइए ।
एक संकर संतति में दोनों लक्षण तब दिखाई देते हैं जब कोई लक्षण दूसरे पर पूर्ण रूप से प्रभावी नहीं होता। इसे अपूर्ण प्रभाविता कहते हैं। उदाहरण के लिए, स्नैपड्रैगन (या मीराबिलिस) के फूलों के रंग का संकरण करने पर, लाल रंग (RR) वाले और सफेद रंग (WW) वाले पौधों की F1 संतति में सभी फूल गुलाबी (RW) रंग के होते हैं। यहाँ न तो लाल और न ही सफेद रंग प्रभावी है, बल्कि दोनों के मध्यवर्ती लक्षण (गुलाबी रंग) का प्रकटन होता है, इसलिए दोनों जनकों के लक्षण मिश्रित रूप में दिखाई देते हैं।
3. निम्नलिखित में अंतर स्पष्ट कीजिए –
(क) आनुवंशिकता एवं विभिन्नता
(ख) समजात एवं समरूप अंग
(क) आनुवंशिकता एवं विभिन्नता:
आनुवंशिकता: यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा जनकों के लक्षण (जैसे रंग, आकार) उनकी संतति में पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानांतरित होते हैं। यह समानता लाती है।
विभिन्नता: यह एक ही प्रजाति के सदस्यों के बीच पाए जाने वाले मामूली अंतर होते हैं, जो आनुवंशिक पदार्थ (DNA) में परिवर्तन या लैंगिक जनन के दौरान जीनों के पुनर्संयोजन के कारण उत्पन्न होते हैं। यह विविधता लाती है।
(ख) समजात एवं समरूप अंग:
समजात अंग: ये अंग मूल संरचना में समान होते हैं लेकिन कार्य भिन्न-भिन्न होते हैं। ये सामान्य पूर्वज से विकास का संकेत देते हैं। उदाहरण: मनुष्य का हाथ, चमगादड़ का पंख, व्हेल का अग्रपंख।
समरूप अंग: ये अंग कार्य में समान होते हैं लेकिन मूल संरचना और उद्भव में भिन्न होते हैं। ये विकास की समरूपता दर्शाते हैं, न कि सामान्य पूर्वज को। उदाहरण: पक्षी का पंख और तितली का पंख (दोनों उड़ने के लिए, पर संरचना अलग)।
4. मेंडल के प्रयोगों से कैसे पता चला कि लक्षण स्वतंत्र रूप से वंशागत होते हैं ?
मेंडल ने द्विसंकर संकरण प्रयोग करके यह सिद्ध किया। उन्होंने दो लक्षणों (जैसे बीज का आकार-गोल/झुर्रीदार और बीज का रंग-पीला/हरा) वाले पौधों का संकरण किया। F2 पीढ़ी में उन्हें चार प्रकार के संयोग (गोल-पीले, गोल-हरे, झुर्रीदार-पीले, झुर्रीदार-हरे) 9:3:3:1 के नए अनुपात में प्राप्त हुए। इससे स्पष्ट हुआ कि बीज के आकार का लक्षण और बीज के रंग का लक्षण एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से वंशागत हुए थे। इस प्रकार उन्होंने स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम प्रतिपादित किया।
5. जैव विकास के प्रमाण के रूप में जीवाश्म किस प्रकार सहायक हैं ?
जीवाश्म प्राचीन जीवों के संरक्षित अवशेष या छाप हैं जो चट्टानों की परतों में पाए जाते हैं। ये जैव विकास के लिए महत्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करते हैं:
1. क्रमिक परिवर्तन दिखाते हैं: विभिन्न भू-सतहों से प्राप्त जीवाश्मों का क्रम बताता है कि सरल संरचना वाले जीव पहले अस्तित्व में आए और बाद में जटिल संरचना वाले जीव विकसित हुए।
2. विलुप्त जीवों की जानकारी: ये बताते हैं कि अतीत में कौन-से जीव रहे और कैसे कई प्रजातियाँ विलुप्त हो गईं।
3. मध्यवर्ती रूपों के साक्ष्य: कुछ जीवाश्म (जैसे आर्कियोप्टेरिक्स) दो वर्गों (सरीसृप और पक्षी) के बीच की कड़ी के रूप में पाए गए हैं, जो एक वर्ग से दूसरे वर्ग में विकास को दर्शाते हैं।
6. विकासीय संबंध स्थापित करने में आणविक समजातता किस प्रकार सहायक है ?
सभी जीवों में आनुवंशिक पदार्थ DNA होता है। विभिन्न जीवों के DNA और प्रोटीनों (जैसे हीमोग्लोबिन) की तुलना करने पर उनके बीच आणविक समजातता का पता चलता है। दो जीवों के DNA अनुक्रम या प्रोटीन संरचना में जितनी अधिक समानता होगी, उनका विकासीय संबंध उतना ही निकट माना जाएगा। उदाहरण के लिए, मनुष्य और चिम्पैंजी का DNA लगभग 99% समान है, जो दर्शाता है कि हमारा एक सामान्य पूर्वज हाल ही में (विकासिक समय में) रहा होगा। इस प्रकार, आणविक समानताएँ विकास के पेड़ (वंश वृक्ष) को समझने का एक शक्तिशाली उपकरण हैं।
7. उचित उत्तर पर सही (✓) का निशान लगाइए –
(क) मेंडल के प्रयोग में मटर के पौधे के लंबे होने का कारण है –
(A) अप्रभावी जीन
(B) प्रभावी जीन
(C) सहलग्न जीन
(D) उत्परिवर्तन
उत्तर: (B) प्रभावी जीन ✓
(ख) समजात अंग का उदाहरण है –
(A) हमारा हाथ और कुत्ते के अग्रपाद
(B) हमारे दाँत और हाथी के दाँत
(C) आलू और घास के उपरिभूस्तारी
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर: (A) हमारा हाथ और कुत्ते के अग्रपाद ✓
(ग) विकासीय दृष्टिकोण से हमारी किससे अधिक समानता है –
(A) चीन के विद्यार्थी से
(B) चिम्पैंजी से
(C) मकड़ी से
(D) बैक्टीरिया से
उत्तर: (B) चिम्पैंजी से ✓
8. रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए –
(क) मेंडल ने मटर के पौधे पर ……… वर्ष तक प्रयोग किए ।
(ख) मेंडल ने मटर के पौधे के ……… जोड़ी विपर्यासी लक्षणों का अध्ययन किया ।
(ग) मेंडल ने अपने प्रयोगों के आधार पर आनुवंशिकता के ……… नियम प्रतिपादित किए ।
(घ) जीवों के प्राचीन अवशेष ……… कहलाते हैं ।
उत्तर:
(क) मेंडल ने मटर के पौधे पर सात वर्ष तक प्रयोग किए ।
(ख) मेंडल ने मटर के पौधे के सात जोड़ी विपर्यासी लक्षणों का अध्ययन किया ।
(ग) मेंडल ने अपने प्रयोगों के आधार पर आनुवंशिकता के तीन नियम प्रतिपादित किए ।
(घ) जीवों के प्राचीन अवशेष जीवाश्म कहलाते हैं ।
9. सही जोड़ी बनाइए –
(क) मेंडल – (1) जीवाश्म
(ख) डार्विन – (2) आनुवंशिकता के नियम
(ग) प्राचीन अवशेष – (3) प्राकृतिक वरण का सिद्धांत
उत्तर:
(क) मेंडल – (2) आनुवंशिकता के नियम
(ख) डार्विन – (3) प्राकृतिक वरण का सिद्धांत
(ग) प्राचीन अवशेष – (1) जीवाश्म
10. सही कथन के सामने सही (✓) तथा गलत कथन के सामने गलत (✗) का निशान लगाइए –
(क) मेंडल ने अपने प्रयोग गेहूँ के पौधे पर किए ।
(ख) मेंडल के प्रयोगों से पता चलता है कि लक्षण स्वतंत्र रूप से वंशागत होते हैं ।
(ग) जीवाश्म जैव विकास के प्रमाण हैं ।
(घ) विकासीय दृष्टिकोण से हमारी मकड़ी से अधिक समानता है ।
उत्तर:
(क) मेंडल ने अपने प्रयोग गेहूँ के पौधे पर किए । ✗
(ख) मेंडल के प्रयोगों से पता चलता है कि लक्षण स्वतंत्र रूप से वंशागत होते हैं । ✓
(ग) जीवाश्म जैव विकास के प्रमाण हैं । ✓
(घ) विकासीय दृष्टिकोण से हमारी मकड़ी से अधिक समानता है । ✗
अध्याय 9: अनुवांशिकता एवं जैव विकास
प्रश्न 1. मेंडल के एक प्रयोग में लम्बे मटर के पौधे जिनके बैंगनी पुष्प थे, का संकरण बौने पौधों जिनके सफेद पुष्प थे, से कराया गया। इनकी संतति के सभी पौधों में पुष्प बैंगनी रंग के थे परन्तु आधे बौने थे। इससे कहा जा सकता है कि लम्बे जनक पौधों की आनुवंशिक रचना निम्न थी-
(a) TTWW
(b) TTww
(c) TtWW
(d) TtWw
उत्तर: (c) TtWW
व्याख्या: इस प्रयोग में, लम्बापन (T) बौनेपन (t) पर प्रभावी है और बैंगनी रंग (W) सफेद रंग (w) पर प्रभावी है। चूँकि सभी संतति पौधों (F1 पीढ़ी) में बैंगनी पुष्प थे, इसका मतलब है कि लम्बे जनक को बैंगनी रंग के लिए शुद्ध (WW) होना चाहिए। यदि वह Ww होता, तो कुछ सफेद पुष्प वाले पौधे भी प्राप्त हो सकते थे। लेकिन आधे पौधे बौने थे, जो दर्शाता है कि लम्बे जनक की लम्बाई के लिए आनुवंशिक संरचना विषमयुग्मजी (Tt) थी। इसलिए, लम्बे जनक की आनुवंशिक रचना TtWW थी।
प्रश्न 2. समजात अंग का एक उदाहरण है-
(a) हमारा हाथ और कुत्ते के अग्रपाद
(b) हमारे दाँत और हाथी के दाँत
(c) आलू एवं घास के उपरिभूस्तारी
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर: (a) हमारा हाथ और कुत्ते के अग्रपाद
व्याख्या: समजात अंग वे अंग होते हैं जिनकी मूल संरचना समान होती है, क्योंकि वे एक共同的 पूर्वज से विरासत में मिले होते हैं, लेकिन विभिन्न कार्यों के लिए अनुकूलित होने के कारण उनकी बाहरी आकृति और कार्य अलग-अलग हो जाते हैं। मानव का हाथ, कुत्ते का अग्रपाद, चमगादड़ का पंख और ह्वेल का फ्लिपर सभी में एक ही मूल अस्थि व्यवस्था (ह्यूमरस, रेडियस-अल्ना, कार्पल्स, मेटाकार्पल्स और फैलेंजेस) पाई जाती है। यह समजातता का स्पष्ट प्रमाण है। विकल्प (b) और (c) समरूप अंगों के उदाहरण हैं, जिनकी संरचना भिन्न होती है लेकिन कार्य समान होते हैं।
प्रश्न 3. विकासीय दृष्टिकोण से हमारी किससे अधिक समानता है?
(a) चीन के विद्यार्थी
(b) चिम्पैंजी
(c) मकड़ी
(d) बैक्टीरिया
उत्तर: (a) चीन के विद्यार्थी
व्याख्या: जैव विकास के सिद्धांत के अनुसार, सभी जीव एक सामान्य पूर्वज से विकसित हुए हैं। दो जीवों के बीच आनुवंशिक समानता उनकी विकासीय निकटता को दर्शाती है। मनुष्यों की आपस में (चाहे वह भारत के हों या चीन के) आनुवंशिक समानता लगभग 99.9% होती है। जबकि मनुष्य और चिम्पैंजी के बीच यह समानता लगभग 98-99% है। मकड़ी और बैक्टीरिया से हमारी समानता और भी कम है। इसलिए, विकासीय दृष्टि से हमारी सबसे अधिक समानता दूसरे मनुष्य (चीन के विद्यार्थी) से है।
प्रश्न 4. एक अध्ययन से ज्ञात हुआ कि हल्के रंग के पतंगे (light coloured moths) गहरे रंग के पतंगों (dark coloured moths) की तुलना में प्रदूषित क्षेत्र में जीवित रहने के लिए बुरी तरह अनुकूलित थे। क्या आप इसका कारण बता सकते हैं?
उत्तर: हाँ, इसका कारण प्राकृतिक चयन (Natural Selection) की प्रक्रिया है। औद्योगिक क्रांति से पहले, इंग्लैंड में हल्के रंग के पतंगे (जैसे पेपर्ड मॉथ) हल्के रंग की लाइकेन-ढकी छाल वाले पेड़ों पर अच्छी तरह छिप जाते थे, जिससे शिकारी पक्षी उन्हें आसानी से नहीं देख पाते थे। गहरे रंग के पतंगे आसानी से दिख जाते थे और शिकार हो जाते थे। इससे हल्के पतंगों का अनुकूलन बेहतर था। लेकिन औद्योगिक प्रदूषण के कारण पेड़ों की छाल पर सूट (कालिख) जम गई और लाइकेन नष्ट हो गए। अब गहरे रंग के पतंगे गहरे रंग की छाल पर छिपने में सफल होने लगे, जबकि हल्के पतंगे स्पष्ट दिखाई देने लगे और पक्षियों द्वारा अधिक शिकार किए जाने लगे। इस प्रकार, प्रदूषित वातावरण में गहरे रंग एक लाभकारी विशेषता बन गई और प्राकृतिक चयन ने गहरे रंग के पतंगों की आबादी को बढ़ावा दिया।
प्रश्न 5. आनुवंशिकता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर: आनुवंशिकता (Heredity) वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा माता-पिता (जनक) अपनी आनुवंशिक सूचना (जीन्स के रूप में) अपनी संतति (बच्चों) में स्थानांतरित करते हैं। इसके परिणामस्वरूप संतति में जनकों के समान शारीरिक लक्षण (जैसे रंग-रूप, कद, आँखों का रंग) और कुछ व्यवहारिक गुण दिखाई देते हैं। आनुवंशिकता का आधार जीन होते हैं, जो डीएनए (DNA) के खंड हैं और गुणसूत्रों (Chromosomes) पर स्थित होते हैं। यह प्रक्रिया जैव विविधता के बीच पीढ़ी-दर-पीढ़ी समानता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
प्रश्न 6. जैव विकास से आप क्या समझते हैं?
उत्तर: जैव विकास (Organic Evolution) वह धीमी, निरंतर और लंबी प्रक्रिया है जिसके द्वारा सरल और आदिम जीवों से, असंख्य पीढ़ियों में होने वाले परिवर्तनों के फलस्वरूप, अधिक जटिल और नए प्रकार के जीवों का विकास हुआ है। यह परिवर्तन आनुवंशिक स्तर पर होते हैं और प्राकृतिक चयन, आनुवंशिक विचलन, उत्परिवर्तन जैसी क्रियाओं द्वारा संचालित होते हैं। जैव विकास का सिद्धांत बताता है कि आज पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जीव एक सामान्य पूर्वज से उत्पन्न हुए हैं और समय के साथ उनमें विविधता आती गई। यह प्रक्रिया जीवों को बदलते पर्यावरण के अनुकूल ढलने में मदद करती है।
प्रश्न 7. मेंडल के प्रयोगों द्वारा कैसे पता चला कि लक्षण प्रभावी अथवा अप्रभावी हैं?
उत्तर: ग्रेगर जॉन मेंडल ने मटर के पौधों पर किए गए अपने संकरण प्रयोगों में विभिन्न विपरीत लक्षणों (जैसे लम्बा/बौना, पीला बीज/हरा बीज) वाले पौधों का संकरण कराया। उन्होंने देखा कि पहली संतति पीढ़ी (F1 पीढ़ी) में केवल एक ही प्रकार का लक्षण प्रकट हुआ। उदाहरण के लिए, लम्बे और बौने पौधों के संकरण से प्राप्त सभी F1 पौधे लम्बे थे। इससे पता चला कि लम्बापन, बौनेपन पर प्रभावी (Dominant) लक्षण है, क्योंकि यह F1 पीढ़ी में स्वयं को व्यक्त कर दिया। बौनापन, जो F1 पीढ़ी में दिखाई नहीं दिया, अप्रभावी (Recessive) लक्षण कहलाया। अप्रभावी लक्षण तभी व्यक्त होता है जब उसके जीन के दोनों युग्मक (एलील) अप्रभावी हों। मेंडल ने F1 पीढ़ी के पौधों का स्वपरागण कराकर F2 पीढ़ी प्राप्त की, जहाँ प्रभावी और अप्रभावी लक्षण का अनुपात लगभग 3:1 था, जिससे इनकी पहचान और पुष्टि हुई।
प्रश्न 8. किसी जीव द्वारा अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए किए गए प्रयास को आप क्या कहेंगे?
उत्तर: किसी जीव द्वारा अपने अस्तित्व को बनाए रखने और सफलतापूर्वक प्रजनन करने के लिए किए गए प्रयासों और अनुकूलनों को अस्तित्व के लिए संघर्ष (Struggle for Existence) कहा जाता है। चार्ल्स डार्विन के अनुसार, जनसंख्या में वृद्धि की प्रवृत्ति होती है, लेकिन संसाधन (भोजन, स्थान, जल) सीमित हैं। इसलिए, एक ही प्रजाति के सदस्यों के बीच, विभिन्न प्रजातियों के बीच तथा पर्यावरणीय कठिनाइयों के विरुद्ध निरंतर संघर्ष चलता रहता है। यह संघर्ष ही प्राकृतिक चयन की प्रक्रिया को चलाता है, जिसमें वे जीव जो अपने पर्यावरण के लिए बेहतर अनुकूलित होते हैं, जीवित रहने और अपने जीन आगे बढ़ाने में सफल होते हैं।
प्रश्न 9. जीवाश्म क्या हैं? ये किस प्रकार बनते हैं? ये जैव विकास के प्रमाण कैसे देते हैं?
उत्तर:
जीवाश्म क्या हैं: जीवाश्म (Fossils) प्राचीन काल के जीवों (पौधों या जंतुओं) के अवशेष, निशान या छाप होते हैं जो चट्टानों, बर्फ या अन्य पदार्थों में संरक्षित रह जाते हैं।
बनने की प्रक्रिया: जीवाश्म निम्नलिखित प्रक्रियाओं से बनते हैं:
- जब कोई जीव मरकर जलाशय की तली में दब जाता है।
- धीरे-धीरे रेत, मिट्टी और खनिज उसके ऊपर जमा होते जाते हैं, जिससे वह दबाव में सख्त चट्टान में बदल जाता है।
- जीव का नरम भाग सड़-गल जाता है, लेकिन कठोर भाग (जैसे हड्डियाँ, दाँत, खोल) खनिजों द्वारा प्रतिस्थापित होकर पत्थर के समान बन जाते हैं। कभी-कभी पूरा जीव बर्फ या एम्बर (राल) में सुरक्षित रह जाता है।
जैव विकास के प्रमाण: जीवाश्म जैव विकास के सबसे मजबूत प्रमाण प्रदान करते हैं:
- क्रमिक परिवर्तन दिखाते हैं: विभिन्न भू-सतहों (परतों) से प्राप्त जीवाश्मों का अध्ययन करने पर पता चलता है कि सरल जीव पहले पाए जाते थे और जटिल जीव बाद में विकसित हुए।
- विलुप्त जीवों की जानकारी: ये बताते हैं कि अतीत में कई ऐसे जीव थे जो आज नहीं हैं, जैसे डायनासोर।
- अंतरवर्ती जीवाश्म (Transitional Fossils): कुछ जीवाश्म (जैसे आर्कियोप्टेरिक्स) दो अलग-अलग समूहों (सरीसृप और पक्षी) के बीच की कड़ी दिखाते हैं, जो सिद्ध करते हैं कि नई प्रजातियाँ पुरानी प्रजातियों से विकसित हुई हैं।
- वंशावली का पता लगाना: जीवाश्म अभिलेख से किसी जीव के पूर्वजों और उनमें समय के साथ हुए परिवर्तनों का पता चलता है।
प्रश्न 10. समजात तथा समरूप अंगों में क्या अंतर है? उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर: समजात और समरूप अंगों में मुख्य अंतर निम्नलिखित हैं:
| आधार | समजात अंग (Homologous Organs) | समरूप अंग (Analogous Organs) |
|---|---|---|
| परिभाषा | वे अंग जिनकी मूल संरचना एवं उद्गम समान होता है, लेकिन कार्य भिन्न होते हैं। | वे अंग जिनकी मूल संरचना एवं उद्गम भिन्न होता है, लेकिन कार्य समान होते हैं। |
| विकास | एक सामान्य पूर्वज से विरासत में मिले हैं। | विभिन्न पूर्वजों से विकसित हुए हैं, पर्यावरणीय अनुकूलन के कारण। |
| कार्य | भिन्न-भिन्न | समान |
| उदाहरण | मनुष्य का हाथ, बिल्ली का अग्रपाद, चमगादड़ का पंख, ह्वेल का फ्लिपर। इन सभी में ह्यूमरस, रेडियस-अल्ना, कार्पल्स, मेटाकार्पल्स व फैलेंजेस पाए जाते हैं, लेकिन कार्य क्रमशः पकड़ना, चलना, उड़ना और तैरना है। | पक्षी का पंख और तितली का पंख। दोनों उड़ने का कार्य करते हैं, लेकिन पक्षी के पंख की संरचना अस्थियों व पंखों से बनी है, जबकि तितली के पंख काइटिन की पतली झिल्ली से। |
| विकास का प्रमाण | विविधता में एकता (Divergence/विकिरण विकास) का प्रमाण देते हैं। | अभिसारी विकास (Convergent Evolution) का प्रमाण देते हैं। |
अनुवांशिकता एवं जैव विकास
1. मेंडल ने अपने प्रयोगों के लिए किस पौधे को चुना और क्यों?
मेंडल ने अपने प्रयोगों के लिए मटर के पौधे (वानस्पतिक नाम: Pisum sativum) को चुना। इसके पीछे कई महत्वपूर्ण कारण थे:
- स्पष्ट विपर्यासी लक्षण: मटर के पौधे में ऊँचाई, बीज का रंग व आकार, फूल का रंग जैसे स्पष्ट और विपरीत लक्षण पाए जाते थे (जैसे लम्बा/बौना, पीला/हरा बीज)।
- स्वपरागण की क्षमता: मटर के फूल में स्वपरागण होता है, जिससे वे शुद्ध नस्ल के होते हैं। मेंडल इच्छानुसार इनका पर-परागण भी करा सकते थे।
- अल्प जीवनचक्र: इनका जीवनचक्र छोटा होता है, इसलिए एक वर्ष में कई पीढ़ियों का अध्ययन किया जा सकता था।
- अधिक संतति उत्पादन: एक बार परागण से बहुत अधिक संख्या में बीज प्राप्त हो जाते हैं, जिससे सांख्यिकीय विश्लेषण आसान हो जाता है।
2. एक संकर संतति क्या है? यह कैसे तैयार की जाती है?
वह संतति जो दो आनुवंशिक रूप से भिन्न (विपर्यासी लक्षणों वाले) शुद्ध जनकों के संयोग से उत्पन्न होती है, संकर संतति कहलाती है।
इसे तैयार करने की विधि:
- दो शुद्ध नस्ल के पौधे चुनें जिनमें विपरीत लक्षण हों (जैसे लम्बा पौधा और बौना पौधा)।
- एक पौधे (मादा) के परागकोषों को समय रहते हटा दें ताकि स्वपरागण न हो। इसे व्यंजन कहते हैं।
- दूसरे पौधे (नर) के परागकण लेकर व्यंजित पौधे के वर्तिकाग्र पर सावधानीपूर्वक स्थानांतरित करें। इसे कृत्रिम पर-परागण कहते हैं।
- इस प्रक्रिया से प्राप्त बीजों को बोने पर जो पौधे उगते हैं, वे सभी संकर (F1 पीढ़ी) होते हैं। उदाहरण के लिए, लम्बे और बौने पौधे के संकरण से प्राप्त सभी F1 पीढ़ी के पौधे लम्बे होंगे।
3. एक समयुग्मजी एवं विषमयुग्मजी जीनोटाइप में अंतर बताइए।
| समयुग्मजी (Homozygous) | विषमयुग्मजी (Heterozygous) |
|---|---|
| इसमें किसी विशेष लक्षण के लिए जोड़ी के दोनों जीन (एलील) समान होते हैं। | इसमें किसी विशेष लक्षण के लिए जोड़ी के दोनों जीन (एलील) भिन्न होते हैं। |
| उदाहरण: लम्बापन के लिए TT या बौनेपन के लिए tt। | उदाहरण: लम्बापन के लिए Tt (जहाँ T लम्बा और t बौना एलील है)। |
| यह शुद्ध नस्ल उत्पन्न करता है और स्वपरागण पर समान लक्षण वाली संतति देता है। | यह शुद्ध नस्ल नहीं होती और स्वपरागण पर विभिन्न लक्षण वाली संतति दे सकती है। |
| इससे प्रभावी या अप्रभावी, किसी भी प्रकार का लक्षण प्रकट हो सकता है। | इसमें प्रभावी एलील का लक्षण प्रकट होता है, जबकि अप्रभावी एलील छिपा रहता है। |
4. जीन क्या है? यह डी.एन.ए. के किस भाग में पाया जाता है?
जीन आनुवंशिकता की मूलभूत कार्यात्मक एवं भौतिक इकाई है। यह वह खंड है जो किसी विशेष प्रोटीन के संश्लेषण के लिए आनुवंशिक सूचना को वहन करता है और इस प्रकार एक विशिष्ट लक्षण को नियंत्रित करता है।
जीन डी.एन.ए. (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल) के अणु पर स्थित होते हैं। डी.एन.ए. गुणसूत्रों में पाया जाता है, जो कोशिका के केंद्रक में होते हैं। प्रत्येक जीन डी.एन.ए. अणु के एक विशिष्ट अनुक्रम (न्यूक्लियोटाइड्स का क्रम) से बना होता है। यह अनुक्रम ही यह निर्धारित करता है कि कौन-सा प्रोटीन बनेगा और अंततः कोशिका का कार्य एवं जीव का लक्षण क्या होगा।
5. मेंडल के प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्षों का वर्णन कीजिए।
मेंडल के मटर के पौधों पर किए गए संकरण प्रयोगों से प्राप्त मुख्य निष्कर्ष निम्नलिखित हैं:
- प्रभाविता का नियम (Law of Dominance): जब दो विपर्यासी लक्षणों वाले शुद्ध जनकों का संकरण कराया जाता है, तो F1 पीढ़ी में केवल एक ही लक्षण प्रकट होता है। इस प्रकट होने वाले लक्षण को प्रभावी लक्षण तथा छिप जाने वाले लक्षण को अप्रभावी लक्षण कहते हैं।
- पृथक्करण का नियम (Law of Segregation): किसी लक्षण के लिए उत्तरदायी जीन (एलील) जोड़े में होते हैं। ये जीन युग्मक (शुक्राणु/अंडाणु) निर्माण के समय एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं, ताकि प्रत्येक युग्मक में लक्षण के लिए केवल एक ही जीन जाए। निषेचन के समय ये युग्मक यादृच्छिक रूप से मिलकर फिर जोड़ी बना लेते हैं।
- स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment): दो या दो से अधिक लक्षणों के संकरण में, एक लक्षण के जीनों का वितरण दूसरे लक्षण के जीनों के वितरण से स्वतंत्र होता है। यह युग्मक निर्माण के समय होता है और इससे नई जीन संयोजन वाली संतति उत्पन्न होती है।
6. लिंग-निर्धारण की विधि का वर्णन कीजिए।
मनुष्य में लिंग का निर्धारण गुणसूत्रों द्वारा होता है। मानव कोशिका में 23 जोड़े (कुल 46) गुणसूत्र होते हैं। इनमें से 22 जोड़े अलिंग सूत्र (ऑटोसोम) होते हैं जो सामान्य शारीरिक लक्षण नियंत्रित करते हैं। 23वाँ जोड़ा लिंग गुणसूत्र (सेक्स क्रोमोसोम) कहलाता है, जो लिंग का निर्धारण करता है।
महिला में दो X गुणसूत्र होते हैं (XX)। पुरुष में एक X और एक Y गुणसूत्र होता है (XY)।
निर्धारण की विधि:
- महिला (XX) के सभी अंडाणु में केवल X गुणसूत्र ही होता है।
- पुरुष (XY) दो प्रकार के शुक्राणु उत्पन्न करता है – आधे शुक्राणु X गुणसूत्र लेकर और आधे Y गुणसूत्र लेकर।
- निषेचन के समय:
- यदि X वाला शुक्राणु अंडाणु (X) से मिलता है, तो युग्मनज XX होगा और संतान लड़की होगी।
- यदि Y वाला शुक्राणु अंडाणु (X) से मिलता है, तो युग्मनज XY होगा और संतान लड़का होगी।
इस प्रकार, संतान का लिंग पिता के शुक्राणु द्वारा निर्धारित होता है, क्योंकि माँ केवल X गुणसूत्र ही दे सकती है।
7. विकासीय अध्ययन में जीवाश्मों का क्या महत्व है?
जीवाश्म (Fossils) भूगर्भीय चट्टानों में संरक्षित प्राचीन जीवों के अवशेष या छाप होते हैं। जैव विकास के अध्ययन में इनका अत्यधिक महत्व है:
- क्रमिक परिवर्तन का प्रमाण: जीवाश्म विभिन्न भूगर्भीय कालों में जीवों के रूप में होने वाले क्रमिक परिवर्तनों को दर्शाते हैं, जो विकास का सबसे ठोस प्रमाण है।
- विलुप्त जीवों की जानकारी: ये उन असंख्य जीवों के बारे में बताते हैं जो आज पृथ्वी पर नहीं हैं, जिससे जीवन के इतिहास को समझने में मदद मिलती है।
- जीवों के बीच संबंध: जीवाश्म अध्ययन से पता चलता है कि कैसे सरल जीवों से जटिल जीवों का विकास हुआ और विभिन्न जीवों के बीच क्या संबंध रहे होंगे।
- काल निर्धारण: जीवाश्मों की परतों के अध्ययन से उनकी आयु का पता लगाया जा सकता है, जिससे विकास की समयरेखा बनाने में सहायता मिलती है। उदाहरण: घोड़े, पक्षी (आर्कियोप्टेरिक्स) और मानव के जीवाश्म।
8. विकास के लिए उत्तरदायी कारकों का उल्लेख कीजिए।
जैव विकास एक धीमी और सतत प्रक्रिया है जो निम्नलिखित कारकों के कारण घटित होती है:
- आनुवंशिक विविधता: जनन के दौरान डी.एन.ए. प्रतिकृति में यादृच्छिक परिवर्तन (उत्परिवर्तन) और लैंगिक जनन के दौरान जीनों का पुनर्संयोजन, जनसंख्या में आनुवंशिक विविधता उत्पन्न करता है। यह विकास की कच्ची सामग्री है।
- प्राकृतिक वरण (Natural Selection): चार्ल्स डार्विन का यह मुख्य सिद्धांत है। पर्यावरण में जो जीव अपने अनुकूल लक्षण रखते हैं, वे जीवित रहने और प्रजनन के लिए बेहतर होते हैं। इस प्रकार अनुकूल लक्षण अगली पीढ़ियों में अधिक होते जाते हैं और प्रतिकूल लक्षण कम हो जाते हैं।
- जीन प्रवाह (Gene Flow): जब विभिन्न जनसंख्या के सदस्यों के बीच प्रजनन होता है, तो जीनों का आदान-प्रदान होता है, जिससे नए लक्षण आते हैं।
- आनुवंशिक प्रवाह (Genetic Drift): छोटी जनसंख्या में यादृच्छिक घटनाओं (बाढ़, महामारी आदि) के कारण कुछ जीनों की आवृत्ति में अचानक परिवर्तन हो सकता है, जो विकास को प्रभावित करता है।
- भौगोलिक पृथक्करण: पर्वत, नदी, समुद्र आदि के कारण जनसंख्या के अलग हो जाने पर उनका विकास अलग-अलग दिशाओं में हो सकता है, जिससे नई प्रजातियाँ उत्पन्न होती हैं।
9. निम्नलिखित में से सही विकल्प चुनें-
(i) मेंडल ने अपने प्रयोग के लिए निम्नलिखित में से किस पौधे को चुना?
(क) आम
(ख) गेंदा
(ग) मटर
(घ) गुलाब
(ग) मटर
(ii) मेंडल के प्रयोग में लम्बे पौधे जिनका जीन प्ररूप TT है, कहलाते हैं-
(क) समयुग्मजी
(ख) विषमयुग्मजी
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
(क) समयुग्मजी
(iii) मानव में लिंग निर्धारण कैसे होता है?
(क) पिता के गुणसूत्रों द्वारा
(ख) माता के गुणसूत्रों द्वारा
(ग) दोनों के गुणसूत्रों द्वारा
(घ) इनमें से कोई नहीं
(क) पिता के गुणसूत्रों द्वारा (क्योंकि पिता X या Y गुणसूत्र वाला शुक्राणु देता है, जो भ्रूण का लिंग तय करता है।)
(iv) जीवाश्म किसके अध्ययन से संबंधित है?
(क) पुरातत्व
(ख) भूगर्भशास्त्र
(ग) जीव विज्ञान
(घ) उपर्युक्त सभी
(घ) उपर्युक्त सभी (जीवाश्म अध्ययन एक अंतःविषय क्षेत्र है जिसमें जीव विज्ञान, भूविज्ञान और पुरातत्व सभी शामिल हैं।)
(v) विकास का सिद्धांत किसने दिया?
(क) मेंडल
(ख) डार्विन
(ग) लैमार्क
(घ) इनमें से कोई नहीं
(ख) डार्विन (चार्ल्स डार्विन ने 'प्राकृतिक वरण द्वारा विकास' का सिद्धांत दिया।)
अध्याय 9: अनुवांशिकता एवं जैव विकास
प्रश्न 1. लैमार्कवाद की व्याख्या कीजिए।
लैमार्कवाद फ्रांसीसी प्रकृतिवादी जीन-बैप्टिस्ट लैमार्क द्वारा प्रतिपादित जैव विकास का एक सिद्धांत है। इस सिद्धांत के दो मुख्य स्तंभ हैं:
1. अंगों का उपयोग एवं अनुपयोग: लैमार्क के अनुसार, किसी जीव के जीवनकाल में किसी अंग के अधिक उपयोग से वह अधिक विकसित, बड़ा और मजबूत हो जाता है। इसके विपरीत, किसी अंग के लगातार अनुपयोग से वह कमजोर होता जाता है और अंततः लुप्त हो सकता है।
2. उपार्जित लक्षणों की वंशागति: लैमार्क का मानना था कि जीव के जीवनकाल में उपयोग/अनुपयोग के कारण जो लक्षण (जैसे मजबूत मांसपेशियाँ या लंबी गर्दन) प्राप्त होते हैं, वे अगली पीढ़ी में स्थानांतरित हो जाते हैं। इस प्रकार, धीरे-धीरे ये लक्षण स्थायी हो जाते हैं और नई जातियों के विकास का कारण बनते हैं।
उदाहरण के लिए, लैमार्क ने जिराफ की लंबी गर्दन का स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि उसके पूर्वजों ने ऊँचे पेड़ों की पत्तियाँ खाने के लिए लगातार गर्दन खींची, जिससे गर्दन लंबी हुई और यह लक्षण बाद की पीढ़ियों में चला गया।
प्रश्न 2. लैमार्कवाद की आलोचना कीजिए।
लैमार्क के सिद्धांत की मुख्य रूप से निम्नलिखित आधारों पर आलोचना की गई है:
1. उपार्जित लक्षण वंशागत नहीं होते: आधुनिक आनुवंशिकी के अनुसार, किसी जीव के जीवनकाल में अर्जित लक्षण (जैसे लोहार की मजबूत बाँहें या किसी अंग का क्षय) उसके जनन कोशिकाओं (शुक्राणु या अंडाणु) के डीएनए में परिवर्तन नहीं करते। केवल जनन कोशिकाओं के डीएनए में होने वाले परिवर्तन ही अगली पीढ़ी में स्थानांतरित हो सकते हैं। इसलिए, उपार्जित लक्षण वंशागत नहीं होते।
2. प्रयोगात्मक प्रमाण का अभाव: वैज्ञानिकों ने लैमार्क के सिद्धांत को प्रयोगों द्वारा सिद्ध नहीं पाया। जर्मन जीवविज्ञानी अगस्त वीजमान ने एक प्रसिद्ध प्रयोग किया, जिसमें उन्होंने लगातार 22 पीढ़ियों तक चूहों की पूँछें काटीं, लेकिन हर नई पीढ़ी में चूहे पूँछ सहित ही पैदा हुए। लैमार्क के सिद्धांत के अनुसार तो अंत में बिना पूँछ वाले चूहे पैदा होने चाहिए थे, जो नहीं हुआ।
3. तर्कसंगत दोष: इस सिद्धांत के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति जन्म से अंधा है, तो उसकी संतान भी अंधी होनी चाहिए, जो कि सत्य नहीं है। इसी प्रकार, पीढ़ियों से खेती करने वाले के हाथों में आई मजबूती उसके बच्चे में स्वतः नहीं आती।
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