Bihar Board Class 10th Science (विज्ञान) Chapter 14 उर्जा के स्रोत) Solutions

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Bihar Board Class 10th Science (विज्ञान) Chapter 14 उर्जा के स्रोत) Solutions

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प्रश्न 1. जीवाश्मी ईंधन क्या है ?

जीवाश्मी ईंधन वे ईंधन हैं जो लाखों वर्ष पहले पृथ्वी के गर्भ में दबे मृत पौधों और जीवों के अवशेषों से बने हैं। इन पर उच्च दाब और ताप का प्रभाव पड़ने से ये कार्बनिक पदार्थ ईंधन में परिवर्तित हो गए। इनके उदाहरण हैं – कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस। ये ईंधन अनवीकरणीय स्रोत हैं क्योंकि इनके बनने में बहुत लंबा समय लगता है और इनका भंडार सीमित है।

प्रश्न 2. जैव मात्रा तथा जैव गैस में अन्तर स्पष्ट करें।

जैव मात्रा (बायोमास) जैव गैस (बायोगैस)
जैव मात्रा से तात्पर्य पौधों एवं जानवरों के कच्चे पदार्थ जैसे लकड़ी, फसल अवशेष, गोबर आदि से है, जिनका उपयोग ईंधन के रूप में किया जा सकता है। जैव गैस, जैव मात्रा के अवायवीय अपघटन (बिना ऑक्सीजन के सड़ने) से उत्पन्न होने वाली गैसों का मिश्रण है।
इसे सीधे जलाकर ऊष्मा ऊर्जा प्राप्त की जाती है, लेकिन इससे धुआँ और प्रदूषण होता है। यह मुख्यतः मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड और थोड़ी मात्रा में हाइड्रोजन सल्फाइड गैसों का मिश्रण होती है।
इसका ऊर्जा रूपांतरण दक्षता कम होती है और इसमें नमी की मात्रा अधिक होती है। यह एक स्वच्छ ईंधन है जिसका दहन प्रदूषण रहित होता है और इससे प्राप्त कीचड़ (स्लरी) उत्तम जैविक खाद है।

प्रश्न 3. ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्रोत क्या हैं ?

ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्रोत वे स्रोत हैं जिनका उपयोग पारंपरिक रूप से बहुत अधिक नहीं किया गया है, लेकिन आधुनिक तकनीक के कारण अब इन्हें महत्व मिल रहा है। ये स्रोत प्रायः नवीकरणीय और पर्यावरण के लिए अनुकूल होते हैं। इनमें शामिल हैं:

  • सौर ऊर्जा: सूर्य के प्रकाश और ऊष्मा से प्राप्त ऊर्जा।
  • पवन ऊर्जा: हवा की गतिज ऊर्जा का उपयोग करके बिजली उत्पन्न करना।
  • ज्वारीय ऊर्जा: समुद्री ज्वार-भाटा की गति से प्राप्त ऊर्जा।
  • भूतापीय ऊर्जा: पृथ्वी के आंतरिक भाग से प्राप्त गर्मी से उत्पन्न ऊर्जा।
  • समुद्री तरंग ऊर्जा: समुद्र की लहरों की ऊर्जा का दोहन।

प्रश्न 4. सौर कुकर के क्या लाभ हैं ?

सौर कुकर के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं:

  1. ईंधन की बचत: इसमें खाना पकाने के लिए कोयला, गैस, केरोसिन या लकड़ी जैसे ईंधन की आवश्यकता नहीं होती, जिससे ईंधन का खर्च बचता है।
  2. प्रदूषण मुक्त: इससे धुआँ या हानिकारक गैसें नहीं निकलतीं, इसलिए यह वायु प्रदूषण नहीं करता और रसोई को धुएँ से मुक्त रखता है।
  3. स्वास्थ्य के लिए लाभदायक: धुएँ के अभाव में आँखों और फेफड़ों से संबंधित बीमारियों का खतरा कम हो जाता है।
  4. पोषक तत्वों का संरक्षण: सौर कुकर में खाना धीरे-धीरे पकता है, जिससे भोजन के पोषक तत्व बने रहते हैं।
  5. उपयोग में सुरक्षा: इसमें आग लगने या जलने का खतरा नहीं होता और इसे बिना निगरानी के भी छोड़ा जा सकता है।

प्रश्न 5. ऊर्जा के उत्तम स्रोत के लक्षण लिखें।

ऊर्जा का एक उत्तम स्रोत निम्नलिखित लक्षणों से युक्त होना चाहिए:

  • प्रति एकक अधिक कार्य करने की क्षमता: अर्थात, उसकी कैलोरीफिक मान (calorific value) उच्च होनी चाहिए ताकि कम मात्रा में अधिक ऊर्जा मिल सके।
  • सस्ता और सुलभ: वह सस्ता हो और आसानी से उपलब्ध हो सके।
  • भंडारण एवं परिवहन में सुविधाजनक: उसे स्टोर करना और एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना आसान हो।
  • सुरक्षित: उसका उपयोग करना सुरक्षित हो, आग या विस्फोट का खतरा न हो।
  • पर्यावरण हितैषी: उसके उपयोग से वायु, जल या भूमि प्रदूषण नहीं होना चाहिए।
  • नवीकरणीय: वह स्रोत समाप्त होने वाला न हो, बल्कि प्रकृति में लगातार पुनः उत्पन्न होता रहे।

प्रश्न 6. बायोगैस संयंत्र का नामांकित चित्र बनाइए।

बायोगैस संयंत्र का सचित्र वर्णन:

बायोगैस संयंत्र मुख्यतः एक भूमिगत डाइजेस्टर टैंक, एक गैस होल्डर और निवेश/उत्पाद निकासी पाइपों से बना होता है।

मुख्य भाग:

  1. मिक्सिंग टैंक: जहाँ गोबर व पानी को मिलाकर स्लरी बनाई जाती है।
  2. डाइजेस्टर (किण्वक टैंक): यह एक बंद भूमिगत टैंक होता है जहाँ अवायवीय जीवाणु स्लरी का अपघटन करके बायोगैस उत्पन्न करते हैं।
  3. गैस होल्डर: यह एक उल्टा बर्तननुमा संरचना होती है जो डाइजेस्टर के ऊपर तैरती रहती है और उत्पन्न गैस को एकत्र करती है।
  4. गैस आउटलेट पाइप: गैस होल्डर से जुड़ा पाइप जो गैस को चूल्हे या अन्य उपकरणों तक पहुँचाता है।
  5. अवशिष्ट निकास: डाइजेस्टर से कीचड़ (स्लरी) बाहर निकलने का रास्ता, जिसका उपयोग उत्तम खाद के रूप में किया जाता है।

(ध्यान दें: यहाँ चित्र का वर्णन किया गया है। वास्तविक नामांकित चित्र बनाने के लिए छात्र उपरोक्त भागों को दर्शाते हुए एक भूमिगत टैंक और उसके ऊपर तैरते गैस होल्डर का चित्र बना सकते हैं।)

प्रश्न 7. सौर सेल क्या है ?

सौर सेल (या फोटोवोल्टाइक सेल) एक ऐसी युक्ति है जो सूर्य के प्रकाश (फोटॉन) को सीधे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करती है। यह अर्धचालक पदार्थ जैसे सिलिकॉन से बना होता है। जब सूर्य का प्रकाश इस सेल पर पड़ता है, तो अर्धचालक में इलेक्ट्रॉन गति करने लगते हैं, जिससे विद्युत धारा उत्पन्न होती है। अकेला सौर सेल कम वोल्टेज देता है, इसलिए इन्हें श्रृंखला में जोड़कर सौर पैनल बनाया जाता है, जो अधिक शक्ति प्रदान कर सकता है। इसका उपयोग कैलकुलेटर, स्ट्रीट लाइट, उपग्रह और सौर ऊर्जा संयंत्रों में किया जाता है।

प्रश्न 8. निम्नलिखित में से सही विकल्प चुनें-
(i) निम्नलिखित में से कौन नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है ?
(क) कोयला
(ख) पेट्रोलियम
(ग) जल
(घ) प्राकृतिक गैस
(ii) निम्नलिखित में से कौन जीवाश्मी ईंधन नहीं है ?
(क) कोयला
(ख) लकड़ी
(ग) पेट्रोलियम
(घ) प्राकृतिक गैस
(iii) बायोगैस का मुख्य अवयव है-
(क) हाइड्रोजन
(ख) मीथेन
(ग) ऑक्सीजन
(घ) नाइट्रोजन
(iv) सौर कुकर में किस प्रकार के दर्पण का प्रयोग किया जाता है ?
(क) समतल दर्पण
(ख) उत्तल दर्पण
(ग) अवतल दर्पण
(घ) इनमें से कोई नहीं
(v) ऊर्जा का सबसे स्वच्छ स्रोत है-
(क) कोयला
(ख) डीजल
(ग) सूर्य
(घ) पेट्रोल

उत्तर:

  1. (ग) जल
  2. (ख) लकड़ी
  3. (ख) मीथेन
  4. (ग) अवतल दर्पण
  5. (ग) सूर्य

प्रश्न 2.

निम्नलिखित में से कौन जैवमात्रा ऊर्जा स्रोत का उदाहरण बहीं है? (9) लकड़ी

(०) गोबर गैस

(८) नाभिकीय ऊर्जा

(१) कोयला

उत्तर:

(८) नाभिकीय ऊर्जा
व्याख्या: जैवमात्रा ऊर्जा स्रोत वे हैं जो पौधों या जंतुओं से प्राप्त होते हैं, जैसे लकड़ी, गोबर गैस और कोयला। नाभिकीय ऊर्जा का स्रोत परमाणु नाभिक का विखंडन है, जो जैविक सामग्री से नहीं आता। इसलिए, यह जैवमात्रा ऊर्जा स्रोत नहीं है।

प्रश्न 3.

जितने ऊर्जा स्रोत हम उपयोग में लाते हैं उनमें से अधिकांश सौर ऊर्जा को निरूपित करते हैं। निम्नलिखित में से कौन-सा ऊर्जा स्रोत अंततः सौर ऊर्जा से व्युत्पन्न नहीं है?

(9) भूतापीय ऊर्जा

(०) पवन ऊर्जा

(८) नाभिकीय ऊर्जा

(०५) जैवमात्रा

उत्तर:

(८) नाभिकीय ऊर्जा
व्याख्या: पवन ऊर्जा, जैवमात्रा और यहाँ तक कि जीवाश्म ईंधन भी अप्रत्यक्ष रूप से सूर्य की ऊर्जा से उत्पन्न होते हैं। भूतापीय ऊर्जा पृथ्वी के आंतरिक भाग की गर्मी से आती है। केवल नाभिकीय ऊर्जा का स्रोत परमाणु नाभिक में संचित ऊर्जा है, जो सूर्य से संबंधित नहीं है।

प्रश्न 4,

ऊर्जा स्रोत के रूप में जीवाश्मी ईंधनों तथा सूर्य की तुलबा कीजिए और उनमें अंतर लिखिए।

उत्तर:

क्र. सं. जीवाश्मी ईंधन सूर्य (सौर ऊर्जा)
1. यह एक परंपरागत तथा अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है। यह एक अपरंपरागत तथा नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है।
2. इनके भंडार सीमित हैं और लाखों वर्षों में बनते हैं। यह एक अक्षय स्रोत है, जिसका भंडार असीमित माना जाता है।
3. इनके जलने से हानिकारक गैसें (CO₂, SO₂) निकलती हैं, जो वायु प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग का कारण बनती हैं। इसके उपयोग से कोई प्रदूषण नहीं होता, यह एक स्वच्छ ऊर्जा स्रोत है।
4. इन्हें खरीदना पड़ता है और इनकी लागत अधिक होती है। सूर्य की ऊर्जा मुफ्त में उपलब्ध है, केवल प्रौद्योगिकी (जैसे सोलर पैनल) पर खर्च आता है।
5. इनका उपयोग कभी भी (दिन या रात) किया जा सकता है। इसका उपयोग केवल दिन के समय और साफ मौसम में ही संभव है।

प्रश्न 5.

जैव मात्रा तथा ऊर्जा स्रोत के रूप में जल विद्युत की तुलना कीजिए और उनमें अंतर लिखिए।

उत्तर:

क्र. सं. जैव मात्रा जल विद्युत
1. यह एक नवीकरणीय एवं परंपरागत ऊर्जा स्रोत है। यह भी एक नवीकरणीय एवं परंपरागत ऊर्जा स्रोत है।
2. इसमें रासायनिक ऊर्जा संचित रहती है, जो दहन के समय मुक्त होती है। इसमें बहते जल की गतिज ऊर्जा को टरबाइन द्वारा विद्युत ऊर्जा में बदला जाता है।
3. इसके दहन से धुआँ और गैसें निकलती हैं, जिससे वायु प्रदूषण होता है। यह ऊर्जा का एक प्रदूषण-मुक्त स्रोत है, बिजली उत्पादन के दौरान कोई धुआँ नहीं निकलता।
4. इसके उपयोग से आमतौर पर पारिस्थितिकीय असंतुलन नहीं होता। बड़े बाँध बनाने से भूमि जलमग्न होती है, वन्यजीव प्रभावित होते हैं और पारिस्थितिक असंतुलन हो सकता है।
5. यह एक सस्ता ऊर्जा स्रोत है (उदाहरण: लकड़ी, गोबर)। बाँध और पनबिजली संयंत्र बनाना अधिक खर्चीला होता है।

प्रश्न 6.

निम्नलिखित से ऊर्जा निष्कर्षित करने की सीमाएँ लिखिए

(9) पवनें

(0०) तरंगें

(८) ज्वार-भाठा

उत्तर:

क्र. सं. ऊर्जा स्रोत सीमाएँ
1. पवन ऊर्जा
  • पवन ऊर्जा का उपयोग हर समय और हर स्थान पर नहीं किया जा सकता।
  • विद्युत उत्पादन के लिए पवन का न्यूनतम वेग लगभग 15 किमी/घंटा होना आवश्यक है।
  • पवन चक्कियाँ (विंडमिल) लगाने के लिए बड़े भू-क्षेत्र की आवश्यकता होती है।
  • यह एक अनिश्चित स्रोत है, हवा का वेग बदलता रहता है।
2. तरंग ऊर्जा
  • तरंगें हर समय विद्युत उत्पादन के लिए पर्याप्त शक्तिशाली नहीं होतीं।
  • तरंग ऊर्जा को विद्युत में बदलने वाले उपकरण समुद्र तट पर स्थापित करना बहुत महँगा होता है।
  • खारे पानी और तूफानी मौसम से उपकरणों को नुकसान होने का खतरा रहता है।
3. ज्वार-भाठा ऊर्जा
  • ज्वारीय ऊर्जा संयंत्र (बैराज) बनाना अत्यधिक खर्चीला होता है।
  • बाँध बनाने के लिए उपयुक्त स्थान (जहाँ ज्वार की ऊँचाई में काफी अंतर हो) बहुत सीमित हैं।
  • इससे समुद्री जीवन और तटीय पारिस्थितिकी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
  • बिजली उत्पादन केवल दिन में दो बार ज्वार आने-जाने के समय ही हो पाता है।

प्रश्न 7.

ऊर्जा स्रोतों का वर्गीकरण निम्नलिखित वर्गों में किस आधार पर करेंगे?

(9) नवीकरणीय तथा अनवीकरणीय

(७) समाप्य तथा अक्षय

कया

(a) तथा

(०) के विकल्प समान हैं?

उत्तर:

(a) नवीकरणीय तथा अनवीकरणीय:
इस वर्गीकरण का आधार ऊर्जा स्रोत के पुनः प्राप्त होने या न होने की क्षमता है।

  • नवीकरणीय स्रोत: वे स्रोत जो प्रकृति में लगातार पुनःपूर्ति होते रहते हैं और बार-बार उपयोग किए जा सकते हैं। जैसे- सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल ऊर्जा, जैवमात्रा।
  • अनवीकरणीय स्रोत: वे स्रोत जिनके भंडार सीमित हैं और एक बार उपयोग के बाद लाखों वर्षों में ही फिर से बनते हैं। जैसे- कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस।

(०) समाप्य तथा अक्षय:
इस वर्गीकरण का आधार ऊर्जा स्रोत के समय के साथ समाप्त होने या न होने की प्रकृति है।

  • समाप्य स्रोत: वे स्रोत जिनका भंडार सीमित है और भविष्य में एक दिन खत्म हो जाएंगे। उदाहरण: सभी अनवीकरणीय स्रोत (कोयला, पेट्रोल)।
  • अक्षय स्रोत: वे स्रोत जो प्रकृति में लगातार उपलब्ध रहते हैं और कभी खत्म नहीं होंगे। उदाहरण: सभी नवीकरणीय स्रोत (सूरज, हवा, पानी)।

क्या (a) तथा (०) के विकल्प समान हैं?
हाँ, (a) और (०) के विकल्प मूल रूप से समान हैं। "नवीकरणीय" स्रोत ही "अक्षय" स्रोत हैं और "अनवीकरणीय" स्रोत ही "समाप्य" स्रोत हैं। दोनों वर्गीकरण एक ही अवधारणा को अलग-अलग शब्दों में व्यक्त करते हैं।

प्रश्न 8.

ऊर्जा के आदर्श स्रोत में क्या गुण होते हैं?

उत्तर:

ऊर्जा का एक आदर्श स्रोत वह होता है जो निम्नलिखित गुणों से युक्त हो:

  1. उच्च कैलोरीफिक मान: प्रति इकाई द्रव्यमान या आयतन से अधिकतम ऊर्जा प्राप्त होनी चाहिए, ताकि कम मात्रा में अधिक कार्य किया जा सके।
  2. सहज उपलब्धता: स्रोत प्रकृति में आसानी से और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होना चाहिए।
  3. सुविधाजनक भंडारण एवं परिवहन: ऊर्जा को स्टोर करना और एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना सुरक्षित और सरल होना चाहिए।
  4. आर्थिक रूप से व्यवहार्य: स्रोत का मूल्य सस्ता होना चाहिए ताकि आम लोग इसका उपयोग कर सकें।
  5. पर्यावरण के अनुकूल: इसके उपयोग से न्यूनतम या शून्य प्रदूषण होना चाहिए, ताकि पर्यावरण और स्वास्थ्य को नुकसान न पहुँचे।
  6. सुरक्षित: इसका उपयोग करना जोखिम-मुक्त होना चाहिए, आग या विस्फोट का खतरा नहीं होना चाहिए।

प्रश्न 9.

सौर कुकर का उपयोग करने के क्या लाभ तथा हानियाँ हैं? क्या ऐसे भी क्षेत्र हैं जहाँ सौर कुकरों की सीमित उपयोगिता है?

उत्तर:

सौर कुकर के उपयोग के लाभ:

  1. प्रदूषण मुक्त: यह बिना किसी धुएँ, गैस या राख के भोजन पकाता है, इसलिए यह पर्यावरण के अनुकूल है।
  2. किफायती: इसमें ईंधन (सूर्य का प्रकाश) मुफ्त में मिलता है, केवल एक बार उपकरण खरीदने का खर्च आता है।
  3. सुरक्षित एवं रख-रखाव में आसान: इसमें आग लगने या जलने का खतरा नहीं होता और इसकी देखभाल करना आसान है।
  4. पोषक तत्वों का संरक्षण: धीमी गति से पकाने के कारण भोजन के पोषक तत्व बरकरार रहते हैं।

सौर कुकर के उपयोग की हानियाँ या सीमाएँ:

  1. मौसम पर निर्भरता: इसका उपयोग केवल धूप वाले दिन ही किया जा सकता है। बादल छाए रहने या बरसात के मौसम में यह काम नहीं करता। रात में तो इसका उपयोग हो ही नहीं सकता।
  2. अधिक समय लेना: भोजन पकाने में सामान्य चूल्हे की तुलना में अधिक समय लगता है।
  3. निरंतर समायोजन की आवश्यकता: सूर्य की स्थिति बदलने के साथ ही सौर कुकर के परावर्तक (रिफ्लेक्टर) की दिशा बदलनी पड़ती है, जो थोड़ा असुविधाजनक है।
  4. सीमित क्षमता: एक साथ बहुत अधिक मात्रा में भोजन पकाने के लिए उपयुक्त नहीं है।

सीमित उपयोगिता वाले क्षेत्र:
हाँ, कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ सौर कुकर की उपयोगिता बहुत सीमित है:

  • ध्रुवीय क्षेत्र: जहाँ सर्दियों में लगातार कई महीनों तक रात (पोलर नाइट) रहती है और सूरज नहीं दिखता।
  • अत्यधिक वर्षा वाले या बादल छाए रहने वाले क्षेत्र: जैसे चेरापूंजी, जहाँ धूप के दिन बहुत कम होते हैं।
  • घने जंगल या ऊँची इमारतों से घिरे शहरी इलाके: जहाँ सीधी धूप पर्याप्त नहीं मिल पाती।
  • बहुत अधिक ठंडे क्षेत्र: जहाँ तापमान इतना कम होता है कि सौर कुकर का ताप भोजन पकाने के लिए पर्याप्त नहीं हो पाता।

प्रश्न 10.

ऊर्जा की बढ़ती माँग के पर्यावरणीय परिणाम कया हैं? ऊर्जा की खपत को कम करने के उपाय लिखिए।

उत्तर:

ऊर्जा की बढ़ती माँग के पर्यावरणीय परिणाम:

  1. वायु प्रदूषण में वृद्धि: जीवाश्म ईंधनों के अधिक दहन से कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) और धूल के कण निकलते हैं, जिससे स्मॉग, अम्लीय वर्षा और सांस की बीमारियाँ बढ़ती हैं।
  2. ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन: CO₂ और मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसों की अधिकता से पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ रहा है, जिससे ग्लेशियर पिघलना, समुद्र का जलस्तर बढ़ना और मौसम चक्र में गड़बड़ी हो रही है।
  3. प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन: कोयला, पेट्रोलियम जैसे अनवीकरणीय संसाधन तेजी से खत्म हो रहे हैं। इनके खनन से भूमि क्षरण, वनों की कटाई और जैव विविधता का नुकसान होता है।
  4. जल प्रदूषण: ताप विद्युत संयंत्रों से निकलने वाला गर्म पानी और खनन से निकलने वाले रसायन नदियों और भूजल को प्रदूषित करते हैं, जलीय जीवन को नष्ट करते हैं।
  5. पारिस्थितिक असंतुलन: बड़े बाँधों और खनन परियोजनाओं से पूरे इलाके का पारिस्थितिकी तंत्र बदल जाता है, जानवरों का आवास नष्ट होता है।

ऊर्जा की खपत कम करने के उपाय:

  1. ऊर्जा दक्ष उपकरणों का उपयोग: घर और उद्योगों में स्टार रेटेड एलईडी बल्ब, पंखे, एयर कंडीशनर आदि का इस्तेमाल करें जो कम बिजली में अधिक काम करते हैं।
  2. आदतों में सुधार: बिना जरूरत के लाइट, पंखे, कंप्यूटर बंद करना; प्राकृतिक रोशनी और हवा का अधिक से अधिक उपयोग करना।
  3. सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता: निजी वाहनों के बजाय बस, मेट्रो, कारपूलिंग का उपयोग करने से ईंधन की बचत होगी और प्रदूषण कम होगा।
  4. नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा: घरों और संस्थानों में सोलर पैनल, सोलर वॉटर हीटर लगाना तथा सरकार द्वारा पवन और जल ऊर्जा परियोजनाओं को बढ़ावा देना।
  5. पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग): कागज, प्लास्टिक, धातु आदि का रीसाइक्लिंग करने से नए उत्पाद बनाने में लगने वाली ऊर्जा की बचत होती है।
  6. जागरूकता एवं शिक्षा: लोगों को ऊर्जा संरक्षण के महत्व और तरीकों के बारे में शिक्षित करना।

प्रश्न 1. जीवाश्म ईंधन क्या है?

जीवाश्म ईंधन वे प्राकृतिक ईंधन हैं जो लाखों वर्ष पहले पृथ्वी की सतह के नीचे दबे मृत पौधों और जीवों के अपघटन से बने हैं। इनमें मुख्य रूप से कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस शामिल हैं। इनके जलने पर भारी मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है, लेकिन साथ ही प्रदूषणकारी गैसें भी निकलती हैं।

प्रश्न 2. जैवमात्रा तथा जैव गैस में अंतर स्पष्ट कीजिए।

जैवमात्रा (Biomass): यह कार्बनिक पदार्थों जैसे पौधों, पशुओं के अपशिष्ट, कृषि अवशेष, लकड़ी आदि से प्राप्त होती है। इसे सीधे जलाकर ऊष्मा ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है या इसे जैव ईंधन में परिवर्तित किया जा सकता है।

जैव गैस (Biogas): यह जैवमात्रा के अवायवीय अपघटन (बिना ऑक्सीजन के सड़ने) से उत्पन्न होने वाली गैसों का मिश्रण है। इसमें मुख्य रूप से मीथेन (50-75%), कार्बन डाइऑक्साइड और थोड़ी मात्रा में अन्य गैसें होती हैं। यह एक स्वच्छ ईंधन है जिसका उपयोग खाना पकाने, प्रकाश करने और बिजली बनाने में किया जाता है।

प्रश्न 3. ऊर्जा के गैर-परंपरागत स्रोत क्या हैं?

ऊर्जा के गैर-परंपरागत स्रोत वे स्रोत हैं जो प्रकृति में लगातार पुनः भरते रहते हैं और पर्यावरण के लिए हानिकारक नहीं हैं। ये स्रोत नवीकरणीय (Renewable) हैं और इनका उपयोग परंपरागत जीवाश्म ईंधनों के विकल्प के रूप में किया जाता है। इनमें शामिल हैं: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल विद्युत ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा, समुद्री ऊर्जा और जैवमात्रा ऊर्जा।

प्रश्न 4. सौर कुकर के क्या लाभ हैं?

सौर कुकर के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं:

  1. इसमें ईंधन (जैसे एलपीजी, कोयला, लकड़ी) की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए यह बिल्कुल मुफ्त ऊर्जा से चलता है।
  2. यह प्रदूषण मुक्त है, क्योंकि इसमें कोई धुआँ या हानिकारक गैस नहीं निकलती।
  3. खाना पकाते समय इससे आग लगने का कोई खतरा नहीं होता।
  4. यह उन क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जहाँ बिजली या पारंपरिक ईंधन की कमी है।
  5. इसका रखरखाव आसान और लागत कम है।

प्रश्न 5. नाभिकीय ऊर्जा क्या है?

नाभिकीय ऊर्जा वह प्रचंड ऊर्जा है जो परमाणु के नाभिक (केंद्रक) में होने वाली अभिक्रियाओं से मुक्त होती है। यह ऊर्जा दो प्रक्रियाओं द्वारा प्राप्त की जा सकती है:

  1. नाभिकीय विखंडन (Nuclear Fission): इसमें एक भारी परमाणु (जैसे यूरेनियम-235 या प्लूटोनियम) के नाभिक को न्यूट्रॉन से टकराकर दो हल्के नाभिकों में तोड़ा जाता है, जिससे विशाल मात्रा में ऊर्जा निकलती है।
  2. नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion): इसमें दो हल्के नाभिक (जैसे हाइड्रोजन) मिलकर एक भारी नाभिक (जैसे हीलियम) बनाते हैं और ऊर्जा मुक्त करते हैं। सूर्य की ऊर्जा इसी प्रक्रिया से आती है।
नाभिकीय ऊर्जा संयंत्रों में विखंडन प्रक्रिया का उपयोग बिजली उत्पादन के लिए किया जाता है।

प्रश्न 6. निम्नलिखित में से सही विकल्प का चयन कीजिए-
(i) निम्नलिखित में से कौन जीवाश्म ईंधन नहीं है?
(A) कोयला
(B) पेट्रोलियम गैस
(C) बायोगैस
(D) प्राकृतिक गैस

(ii) गोबर गैस का मुख्य संघटक है-
(A) एथेन
(B) मीथेन
(C) प्रोपेन
(D) ब्यूटेन

(iii) सौर सेल बनाने के लिए प्रयुक्त पदार्थ है-
(A) कार्बन
(B) सिलिकॉन
(C) सोडियम
(D) मैग्नीशियम

(iv) पवन चक्की द्वारा उत्पादित ऊर्जा का मुख्य स्रोत है-
(A) सूर्य
(B) प्राकृतिक गैस
(C) पवन
(D) जैवमात्रा

(i) सही उत्तर: (C) बायोगैस
व्याख्या: बायोगैस (जैव गैस) एक नवीकरणीय ईंधन है जो जैविक कचरे के अपघटन से ताजा उत्पादित होती है, जबकि कोयला, पेट्रोलियम गैस और प्राकृतिक गैस जीवाश्म ईंधन हैं जो प्राचीन जैविक पदार्थों से लाखों वर्षों में बने हैं।

(ii) सही उत्तर: (B) मीथेन
व्याख्या: गोबर गैस या बायोगैस का मुख्य और ऊर्जादायक घटक मीथेन गैस (CH₄) होता है, जो लगभग 50-75% तक होती है। शेष भाग में मुख्य रूप से कार्बन डाइऑक्साइड और थोड़ी मात्रा में हाइड्रोजन सल्फाइड आदि होते हैं।

(iii) सही उत्तर: (B) सिलिकॉन
व्याख्या: सौर सेल या फोटोवोल्टाइक सेल सूर्य के प्रकाश को सीधे विद्युत ऊर्जा में बदलते हैं। इन्हें बनाने के लिए अर्धचालक पदार्थ सिलिकॉन (Si) का सबसे अधिक उपयोग किया जाता है क्योंकि यह प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है और इसकी विद्युत गुणधर्म सौर ऊर्जा रूपांतरण के लिए उपयुक्त हैं।

(iv) सही उत्तर: (C) पवन
व्याख्या: पवन चक्की (विंडमिल) चलती हवा (पवन) की गतिज ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में और फिर जनरेटर की सहायता से विद्युत ऊर्जा में बदलती है। इसलिए इसकी ऊर्जा का प्रत्यक्ष स्रोत पवन ही है। हालाँकि पवन के चलने का मूल कारण सूर्य द्वारा वायु का असमान तापन है।

प्रश्न 5.

व्यावसायिक स्तर पर पवन ऊर्जा का दोहन करने हेतु पहला चरण कया है? संक्षेप में समझाइए।

उत्तर:

व्यावसायिक स्तर पर पवन ऊर्जा का दोहन करने का पहला और सबसे महत्वपूर्ण चरण 'पवन ऊर्जा मानचित्र' (Wind Energy Map) बनाना है। इस मानचित्र को बनाने के लिए किसी विशेष स्थान पर पूरे एक वर्ष तक लगातार पवन की गति और दिशा का अध्ययन किया जाता है।

  1. ये मानचित्र विभिन्न क्षेत्रों में पवन की वार्षिक औसत गति को दर्शाते हैं। साथ ही, ये जनवरी (जब हवा सबसे धीमी होती है) और जुलाई (जब हवा सबसे तेज होती है) जैसे महीनों में पवन की औसत गति भी दिखाते हैं।
  2. ये मानचित्र आमतौर पर जमीन से लगभग 10 मीटर की ऊंचाई पर, प्रति वर्ग मीटर क्षेत्र में उपलब्ध पवन ऊर्जा की मात्रा को किलोवाट-घंटे (kWh) में बताते हैं। इस जानकारी के आधार पर ही यह तय किया जाता है कि किस स्थान पर पवन चक्की (विंड टरबाइन) लगाना आर्थिक रूप से लाभदायक होगा।

प्रश्न 6.

भारत में पवन ऊर्जा के उपयोग हेतु बनाई गई योजनाएं क्या हैं? या भारत में पवन ऊर्जा से विद्युत उत्पादन किस प्रदेश में होता है? इनकी उत्पादन क्षमता क्या है?

उत्तर:

भारत में पवन ऊर्जा की विशाल क्षमता का दोहन करने के लिए सरकार द्वारा कई योजनाएं बनाई गई हैं और कई परियोजनाएं लागू भी की गई हैं। भारत में पवन ऊर्जा से विद्युत उत्पादन मुख्य रूप से तटीय और पहाड़ी राज्यों जैसे गुजरात, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, राजस्थान और कर्नाटक में होता है।

प्रारंभिक और प्रमुख परियोजनाओं में शामिल हैं:

  1. गुजरात का ओखा संयंत्र: यह भारत के शुरुआती पवन ऊर्जा संयंत्रों में से एक है, जिसकी उत्पादन क्षमता 1 मेगावाट (1 MW) थी।
  2. गुजरात का लांबा (पोरबंदर) संयंत्र: यह 200 एकड़ से अधिक भूमि में फैला एक बड़ा पवन फार्म है। इसमें 50 पवन टरबाइन लगी हैं, जो लगभग 20 मेगावाट बिजली पैदा करने की क्षमता रखती हैं, जो करोड़ों यूनिट बिजली के बराबर है।

वर्तमान में, तमिलनाडु में स्थित पवन फार्म देश में सबसे बड़ी क्षमता वाले हैं।

प्रश्न 7.

पृथ्वी पर ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत कया है? ऊर्जा के इस स्रोत को व्यापारिक स्तर पर उपयोग करने की क्‍यों आवश्यकता हुई?

उत्तर:

पृथ्वी पर ऊर्जा का सबसे विशाल और मौलिक स्रोत सूर्य है। सूर्य से प्राप्त इस ऊर्जा को सौर ऊर्जा कहते हैं। एक अनुमान के अनुसार, पृथ्वी पर प्रतिदिन पहुंचने वाली सौर ऊर्जा की मात्रा, दुनिया के सभी देशों द्वारा एक पूरे वर्ष में उपयोग की जाने वाली कुल ऊर्जा से हजारों गुना अधिक है।

इस स्रोत को व्यापारिक स्तर पर उपयोग करने की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से पड़ी:

  1. जीवाश्म ईंधनों की कमी: कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधन सीमित मात्रा में हैं और तेजी से खत्म हो रहे हैं। ये कुछ ही दशकों में समाप्त हो सकते हैं।
  2. प्रदूषण मुक्त ऊर्जा: जीवाश्म ईंधनों के जलने से वायु प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है, जबकि सौर ऊर्जा एक स्वच्छ और हरित ऊर्जा स्रोत है।
  3. नवीकरणीय स्रोत: सौर ऊर्जा एक नवीकरणीय स्रोत है, जो कभी खत्म नहीं होगी। ऊर्जा संकट से निपटने और भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए इसका दोहन जरूरी है।

प्रश्न 8.

बॉक्सनुमा सौर-कुकर तथा संकेन्द्रक सौर-ऊष्मक में अन्तर बताइए। या बॉक्सनुमा सौर-कुकर तथा गोलीय परावर्तक-युक्त सौर- कुकर में अन्तर बताइए।

उत्तर:

क्र. सं. बॉक्सनुमा सौर-कुकर संकेन्द्रक सौर-ऊष्मक (गोलीय परावर्तक युक्त)
1. इसमें समतल दर्पण (परावर्तक) का उपयोग होता है, जो सूर्य की किरणों को इकट्ठा तो करता है, लेकिन उन्हें एक बिंदु पर केंद्रित नहीं कर पाता। इसमें अवतल दर्पण या परवलयिक दर्पण का उपयोग होता है, जो सूर्य की सभी किरणों को एक छोटे से बिंदु या क्षेत्र पर केंद्रित कर देता है।
2. इसमें प्राप्त होने वाला तापमान अपेक्षाकृत कम (लगभग 100-140°C) होता है। इसमें बहुत अधिक तापमान (300°C या अधिक) प्राप्त किया जा सकता है।
3. यह उन खाद्य पदार्थों को पकाने के लिए उपयुक्त है, जिन्हें धीमी आंच और लंबे समय की आवश्यकता होती है; जैसे दाल, चावल, सब्जियां उबालना। यह उन खाद्य पदार्थों को पकाने के लिए उपयुक्त है, जिन्हें तीव्र आंच की आवश्यकता होती है; जैसे तेल में तलना या त्वरित भूनना।
4. इसमें रोटी सेंकना या अंडा तलना जैसे काम आसानी से नहीं किए जा सकते। इसमें रोटी सेंकी जा सकती है और अंडा तला जा सकता है क्योंकि यह तेज आंच प्रदान करता है।

प्रश्न 9.

OTEC शक्ति संयन्त्र क्या है? ये किस प्रकार कार्य करते हैं?

उत्तर:

OTEC (Ocean Thermal Energy Conversion) शक्ति संयंत्र वे संयंत्र हैं जो महासागरों की सतह और गहराई के बीच के तापांतर (Temperature Difference) का उपयोग करके विद्युत ऊर्जा उत्पन्न करते हैं।

कार्य प्रणाली:

  1. समुद्र की गर्म सतही परत के पानी का उपयोग एक विशेष वाष्पशील द्रव (जैसे अमोनिया) को वाष्पित करने के लिए किया जाता है। यह द्रव कम तापमान पर ही उबल जाता है।
  2. इससे बनी वाष्प का दबाव एक टरबाइन (Turbine) को घुमाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
  3. टरबाइन से जुड़ा विद्युत जनित्र (Generator) घूमता है और बिजली पैदा करता है।
  4. टरबाइन से गुजरने के बाद, वाष्प को समुद्र की गहरी, ठंडी परत के पानी से ठंडा करके फिर से द्रव में बदल दिया जाता है, और यह चक्र लगातार चलता रहता है।

प्रश्न 10.

नाभिकीय रिऐक्टरों के प्रमुख उद्देश्यों की सूची बनाइए। इनमें से कौन-से उद्देश्य लोगों की व्यापक भलाई के लिए महत्त्वपूर्ण हैं?

उत्तर:

नाभिकीय रिएक्टर विभिन्न उद्देश्यों से बनाए जाते हैं, जिनमें से प्रमुख हैं:

  1. विद्युत ऊर्जा का उत्पादन: यह नाभिकीय रिएक्टरों का सबसे प्रमुख और व्यापक उद्देश्य है। यूरेनियम के विखंडन से उत्पन्न ऊष्मा से बिजली बनाई जाती है।
  2. नए विखंडनीय पदार्थों का उत्पादन: कुछ विशेष रिएक्टर, जिन्हें ब्रीडर रिएक्टर (Breeder Reactor) कहते हैं, बिजली बनाने के साथ-साथ उपयोग किए गए ईंधन से नया विखंडनीय पदार्थ (जैसे प्लूटोनियम-239) भी पैदा करते हैं।
  3. तीव्रगामी न्यूट्रॉनों का उत्सर्जन: रिएक्टर में उत्पन्न तेज न्यूट्रॉनों का उपयोग वैज्ञानिक अनुसंधान, नए तत्वों के निर्माण और अन्य नाभिकीय अध्ययनों के लिए किया जाता है।
  4. कृत्रिम रेडियोआइसोटोपों का उत्पादन: रिएक्टरों में विभिन्न तत्वों के रेडियोएक्टिव आइसोटोप बनाए जाते हैं, जिनका उपयोग चिकित्सा (कैंसर उपचार, एक्स-रे), कृषि, उद्योग और जीव विज्ञान में होता है।

उपरोक्त उद्देश्यों में से विद्युत ऊर्जा का उत्पादन और कृत्रिम रेडियोआइसोटोपों का उत्पादन ये दो उद्देश्य सीधे तौर पर लोगों की व्यापक भलाई और विकास के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं।

प्रश्न 11.

यूरेनियम के विखण्डन को समीकरण से समझाइए।

उत्तर:

यूरेनियम का विखंडन एक नाभिकीय अभिक्रिया है, जिसमें एक भारी यूरेनियम नाभिक न्यूट्रॉन की टक्कर से दो मध्यम भार वाले नाभिकों में टूट जाता है और साथ में विशाल ऊर्जा तथा कुछ नए न्यूट्रॉन मुक्त होते हैं। यूरेनियम-235 (U-235) इसके लिए सामान्य रूप से प्रयुक्त होता है।

समीकरण के साथ व्याख्या:
जब एक मंदगामी न्यूट्रॉन (10n) यूरेनियम-235 (23592U) के नाभिक से टकराता है, तो वह उसमें अवशोषित होकर अस्थायी यूरेनियम-236 (23692U) बनाता है। यह नाभिक अत्यंत अस्थायी होता है और तुरंत दो छोटे नाभिकों (जैसे बेरियम और क्रिप्टन) में विखंडित हो जाता है, साथ ही अतिरिक्त न्यूट्रॉन और ऊर्जा मुक्त करता है।

23592U + 10n → 23692U → 14156Ba + 9236Kr + 3 10n + ऊर्जा

(ध्यान दें: विखंडन उत्पाद हर बार अलग-अलग हो सकते हैं। बेरियम और क्रिप्टन के अलावा भी कई अन्य तत्व बन सकते हैं।)

प्रश्न 12.

यूरेनियम के विखण्डन उत्पाद क्या हैं?

उत्तर:

यूरेनियम के विखंडन से कोई एक निश्चित उत्पाद नहीं बनता। जब यूरेनियम-235 का नाभिक न्यूट्रॉन से टकराकर टूटता है, तो वह दो अलग-अलग मध्यम भार वाले नाभिकों में बंट जाता है। ये उत्पाद हर बार भिन्न-भिन्न हो सकते हैं।

विखंडन उत्पादों के उदाहरण:

  • बेरियम (Ba) और क्रिप्टन (Kr)
  • स्ट्रोंशियम (Sr) और ज़ेनॉन (Xe)
  • आयोडीन (I) और यिट्रियम (Y)
  • सेरियम (Ce) और ज़िरकोनियम (Zr)

इन ठोस उत्पादों के अलावा, विखंडन की प्रक्रिया में 2 या 3 तीव्रगामी न्यूट्रॉन और भारी मात्रा में ऊर्जा (विकिरण और ऊष्मा के रूप में) भी मुक्त होती है। यही मुक्त न्यूट्रॉन श्रृंखला अभिक्रिया को जारी रखते हैं, और यही ऊर्जा नाभिकीय रिएक्टर में बिजली बनाने के काम आती है।

प्रश्न 1. जीवाश्म ईंधन क्या है ?

जीवाश्म ईंधन वे प्राकृतिक ईंधन हैं जो लाखों वर्षों पहले भूगर्भ में दबे मृत पौधों और जीवों के अवशेषों से बने हैं। इनमें कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस शामिल हैं। इनके जलने पर ऊष्मा ऊर्जा प्राप्त होती है, जिसका उपयोग विभिन्न कार्यों में किया जाता है।

प्रश्न 2. जैव मात्रा एवं जैव गैस में क्या अंतर है ?

जैव मात्रा: यह कार्बनिक पदार्थों जैसे पौधों, जानवरों के अपशिष्ट, कृषि अवशेष आदि का सामूहिक नाम है, जिनका उपयोग ईंधन या ऊर्जा उत्पादन के लिए किया जा सकता है।
जैव गैस: यह जैव मात्रा के अवायवीय अपघटन (बिना ऑक्सीजन के सड़ने) से उत्पन्न होने वाली एक गैसीय ईंधन है, जिसमें मुख्यतः मीथेन गैस होती है।

प्रश्न 3. ऊर्जा के दो उत्तम स्रोत कौन-कौन से हैं ?

ऊर्जा के दो उत्तम स्रोत हैं:
1. सौर ऊर्जा: यह नवीकरणीय, प्रदूषण रहित और लगभग असीमित है।
2. पवन ऊर्जा: यह भी नवीकरणीय है, पर्यावरण के अनुकूल है और संचालन लागत कम है।

प्रश्न 4. सौर कुकर के दो लाभ लिखिए।

1. यह निःशुल्क एवं नवीकरणीय सौर ऊर्जा का उपयोग करता है, जिससे ईंधन की बचत होती है।
2. इससे वायु प्रदूषण नहीं होता क्योंकि इसमें कोई ईंधन नहीं जलता।

प्रश्न 5. ऊर्जा स्रोत के रूप में जल विद्युत की क्या हानियाँ हैं ?

जल विद्युत की प्रमुख हानियाँ हैं:
1. बड़े बाँधों के निर्माण से विस्तृत क्षेत्र डूब जाता है, जिससे वनस्पति, जीव-जंतु और मानव आबादी विस्थापित होती है।
2. परियोजना लागत बहुत अधिक होती है और निर्माण में कई वर्ष लग जाते हैं।

प्रश्न 6. नाभिकीय ऊर्जा क्या है ?

नाभिकीय ऊर्जा वह प्रचंड ऊर्जा है जो किसी भारी परमाणु (जैसे यूरेनियम या प्लूटोनियम) के नाभिक के विखंडन या हल्के नाभिकों के संलयन की प्रक्रिया के दौरान मुक्त होती है। इस ऊर्जा का उपयोग बिजली उत्पादन के लिए किया जाता है।

प्रश्न 7. निम्नलिखित में से कौन नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है ?
(क) कोयला
(ख) पेट्रोलियम
(ग) जल
(घ) प्राकृतिक गैस

(ग) जल
कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जीवाश्म ईंधन हैं जो समाप्त होने वाले हैं, जबकि जल चक्र के कारण जल एक नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है।

प्रश्न 8. सौर सेल का कार्य सिद्धांत क्या है ?

सौर सेल का कार्य सिद्धांत प्रकाश-विद्युत प्रभाव पर आधारित है। जब सूर्य का प्रकाश (फोटॉन) अर्धचालक पदार्थ (जैसे सिलिकॉन) से बने सौर सेल पर पड़ता है, तो यह फोटॉन से ऊर्जा ग्रहण करके इलेक्ट्रॉनों को मुक्त कर देता है। इन मुक्त इलेक्ट्रॉनों की गति से विद्युत धारा उत्पन्न होती है।

प्रश्न 9. जैव गैस संयंत्र का नामांकित चित्र बनाइए।

[यहाँ एक स्पष्ट नामांकित चित्र बनेगा। चित्र में निम्नलिखित भाग दिखाए जाएँगे: 1. गैस आउटलेट, 2. डाइजेस्टर (किण्वन टैंक), 3. स्लरी इनलेट पाइप, 4. निक्षेपण टैंक और 5. उर्वरक निकास।]

प्रश्न 10. पवन ऊर्जा क्या है ? पवन ऊर्जा के दो दोष लिखिए।

पवन ऊर्जा: वायु की गतिज ऊर्जा को पवन चक्कियों की सहायता से यांत्रिक या विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करने पर प्राप्त ऊर्जा को पवन ऊर्जा कहते हैं।
दोष:
1. पवन ऊर्जा उत्पादन के लिए निरंतर एवं तीव्र हवा की आवश्यकता होती है, जो हर स्थान पर उपलब्ध नहीं है।
2. पवन चक्कियों को स्थापित करने के लिए बहुत अधिक भूमि की आवश्यकता होती है और ये शोर भी उत्पन्न करती हैं।

प्रश्न 11. सौर कुकर का सिद्धांत लिखिए।

सौर कुकर का मुख्य सिद्धांत सूर्य के प्रकाश को ऊष्मा में परिवर्तित करना है। यह निम्न प्रक्रियाओं पर कार्य करता है:
1. प्रकाश संग्रहण: शीशे की सतह सूर्य की किरणों को आकर्षित करती है और कुकर के अंदर प्रवेश करने देती है।
2. हरित गृह प्रभाव: अंदर प्रवेश करने वाली ऊष्मा किरणें बाहर नहीं निकल पातीं, जिससे कुकर के अंदर का तापमान बढ़ जाता है और खाना पक जाता है।

प्रश्न 12. जीवाश्मी ईंधन के दोष लिखिए।

जीवाश्मी ईंधन के प्रमुख दोष हैं:
1. ये अनवीकरणीय हैं और एक दिन समाप्त हो जाएँगे।
2. इनके जलने से हानिकारक गैसें (जैसे CO₂, SO₂) निकलती हैं, जो वायु प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग का कारण बनती हैं।
3. इनके निष्कर्षण और परिवहन में दुर्घटनाओं (जैसे तेल रिसाव) का खतरा रहता है, जो पर्यावरण को नुकसान पहुँचाती हैं।

प्रश्न 3,
चित्र की सहायता से बॉक्सनुमा सौर-कुकर की संरचना व कार्य-विधि का वर्णन कीजिए।
या सौर-ऊर्जा क्या है? सोलर-कुकर का सिद्धान्त एवं कार्य-विधि समझाइए। सोलर कुकर के लाभ भी लिखिए।
या सोलर कुकर के उपयोग, लाभ एवं सीमाएँ लिखिए।

उत्तर:

सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा को सौर-ऊर्जा कहते हैं। बॉक्सनुमा सोलर-कुकर एक ऐसा उपकरण है जो इसी सौर ऊर्जा का उपयोग करके भोजन पकाता है। इसे सौर चूल्हा भी कहा जाता है।

संरचना:

इसकी संरचना निम्नलिखित भागों से मिलकर बनी होती है:

  1. बाहरी बक्सा: यह लकड़ी का एक बक्सा होता है जो पूरे उपकरण को आधार प्रदान करता है।
  2. भीतरी बक्सा: बाहरी बक्से के अंदर लोहे या एल्युमीनियम की चादर का एक दूसरा बक्सा होता है। इसकी अंदरूनी दीवारों और तले को काला रंग से पोता जाता है ताकि यह अधिक से अधिक सौर ऊर्जा को सोख सके और ऊष्मा के परावर्तन को कम कर सके।
  3. ऊष्मारोधी परत: बाहरी और भीतरी बक्से के बीच के खाली स्थान में थर्मोकोल, काँच की रुई या कोई अन्य ऊष्मारोधी पदार्थ भरा जाता है। यह परत ऊष्मा को बाहर जाने से रोकती है।
  4. काँच का ढक्कन: बक्से के ऊपर एक लकड़ी के फ्रेम में मोटे काँच का एक ढक्कन लगा होता है। यह सौर प्रकाश को अंदर आने देता है लेकिन अंदर की ऊष्मा को बाहर निकलने से रोकता है।
  5. समतल दर्पण (परावर्तक): बक्से में एक समतल दर्पण लगा होता है जो सूर्य की किरणों को परावर्तित करके कुकर के अंदर केंद्रित करता है, जिससे तापमान और बढ़ जाता है।

कार्य-विधि:

  1. सबसे पहले, पकाने वाले भोजन को एक काले रंग के बर्तन (जो ऊष्मा का अच्छा अवशोषक है) में रखकर सौर-कुकर के भीतरी बक्से में रख दिया जाता है।
  2. काँच के ढक्कन को बंद कर दिया जाता है और परावर्तक दर्पण को इस तरह सेट किया जाता है कि वह सूर्य की किरणों को सीधे कुकर के अंदर परावर्तित करे।
  3. सूर्य की किरणें काँच के ढक्कन से गुजरकर कुकर के अंदर प्रवेश करती हैं और काले बर्तन व काली दीवारों द्वारा अवशोषित कर ली जाती हैं।
  4. ये किरणें ऊष्मा (इन्फ्रारेड) में बदल जाती हैं। काँच का ढक्कन एक तरफ़ से तो प्रकाश को अंदर आने देता है, लेकिन दूसरी तरफ़ अंदर की ऊष्मा को बाहर जाने से रोकता है। इस प्रभाव को "ग्रीनहाउस प्रभाव" कहते हैं।
  5. इस प्रकार, कुकर के अंदर का तापमान धीरे-धीरे बढ़कर लगभग 100°C से 140°C तक पहुँच जाता है, जो भोजन को पकाने के लिए पर्याप्त होता है। इसमें लगभग 2-3 घंटे लगते हैं।

सोलर-कुकर के लाभ:

  1. प्रदूषण मुक्त: इसमें कोई धुआँ, राख या गंध नहीं निकलती, इसलिए यह पर्यावरण के अनुकूल है।
  2. ईंधन की बचत: इसमें कोयला, गैस, केरोसिन या बिजली जैसे किसी भी पारंपरिक ईंधन की आवश्यकता नहीं होती।
  3. पोषक तत्वों की सुरक्षा: भोजन धीमी आँच पर पकता है, जिससे उसमें मौजूद विटामिन और अन्य पोषक तत्व नष्ट नहीं होते।
  4. स्वचालित: भोजन पकाते समय लगातार देखरेख की ज़रूरत नहीं पड़ती।
  5. कम लागत: एक बार बन जाने के बाद इसके संचालन में कोई खर्च नहीं आता।

सोलर-कुकर की सीमाएँ (कमियाँ):

  1. मौसम पर निर्भरता: यह केवल धूप वाले दिनों में ही काम करता है। रात में, बरसात या बादल छाए रहने पर इसका उपयोग नहीं किया जा सकता।
  2. सीमित उपयोग: इससे रोटी सेंकना या तलने का काम आसानी से नहीं किया जा सकता। यह मुख्य रूप से दाल, चावल, सब्ज़ी जैसे भोजन को धीमी आँच पर पकाने के लिए उपयुक्त है।
  3. धीमी गति: इसमें भोजन पकाने में सामान्य चूल्हे की तुलना में अधिक समय लगता है।
  4. स्थान विशेष: इसे हमेशा सीधी धूप में रखना पड़ता है, इसलिए छायादार जगहों पर यह काम नहीं करेगा।

प्रश्न 4.
सौर-सेल क्या है? सौर-सेलों के विकास तथा उपयोगों पर एक टिप्पणी लिखिए।

उत्तर:

सौर-सेल एक अर्धचालक युक्ति (सेमीकंडक्टर डिवाइस) है जो सूर्य के प्रकाश (फोटॉन) को सीधे विद्युत ऊर्जा (विद्युत धारा) में परिवर्तित कर देती है। इस परिघटना को "फोटोवोल्टाइक प्रभाव" कहते हैं।

सौर-सेल का विकास (इतिहास):

  1. प्रारंभिक खोज (1839): फ्रांसीसी भौतिकशास्त्री एडमंड बेकरेल ने सबसे पहले फोटोवोल्टाइक प्रभाव की खोज की।
  2. सेलेनियम सेल (1880 के दशक): यह पाया गया कि सेलेनियम धातु पर प्रकाश पड़ने पर उसमें विद्युत उत्पन्न होती है। हालाँकि, इसकी दक्षता बहुत कम (लगभग 0.6%) थी, इसलिए इसे व्यापक उपयोग नहीं मिला।
  3. आधुनिक सौर सेल का जन्म (1954): बेल लैबोरेटरीज के वैज्ञानिकों डेरिल चैपिन, केल्विन फुलर और जेराल्ड पियर्सन ने पहला व्यावहारिक सिलिकॉन सौर सेल बनाया, जिसकी दक्षता लगभग 6% थी। यह आधुनिक फोटोवोल्टाइक तकनीक की शुरुआत थी।
  4. अंतरिक्ष युग में उपयोग: 1958 में अमेरिकी उपग्रह वैनगार्ड-1 में सौर सेल लगाए गए, जिसने अंतरिक्ष अन्वेषण में इसकी उपयोगिता सिद्ध कर दी।
  5. निरंतर विकास: आज सौर सेलों की दक्षता लगातार बढ़ रही है और उनकी लागत घट रही है। मोनोक्रिस्टलाइन, पॉलीक्रिस्टलाइन और थिन-फिल्म जैसी विभिन्न तकनीकों से बने सौर सेल उपलब्ध हैं।

सौर-सेलों के उपयोग:

सौर सेलों के उपयोग अत्यंत विस्तृत हैं और दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं:

  1. घरेलू एवं औद्योगिक विद्युत आपूर्ति: सौर पैनल लगाकर घरों, स्कूलों, अस्पतालों और कारखानों के लिए बिजली पैदा की जा रही है।
  2. सुदूर एवं ग्रामीण क्षेत्रों में: जहाँ बिजली ग्रिड नहीं पहुँचता, वहाँ स्ट्रीट लाइट, घरेलू लाइट, पंखे, टीवी और पानी की मोटर चलाने के लिए सौर ऊर्जा का उपयोग किया जाता है।
  3. अंतरिक्ष अनुप्रयोग: उपग्रहों, अंतरिक्ष यान और अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन को बिजली देने का यह प्रमुख स्रोत है।
  4. इलेक्ट्रॉनिक उपकरण: कैलकुलेटर, घड़ियाँ, खिलौने, चार्जर और पोर्टेबल पावर बैंक में छोटे सौर सेल लगे होते हैं।
  5. पानी का शोधन एवं सिंचाई: सौर ऊर्जा से चलने वाले पंपों का उपयोग सिंचाई और पेयजल आपूर्ति के लिए किया जाता है।
  6. आपातकालीन एवं संचार प्रणाली: दूरदराज़ के टेलीफोन एक्सचेंज, रेडियो और ट्रैफिक सिग्नल को सौर ऊर्जा से चलाया जाता है।
  7. पर्यावरण संरक्षण: सौर ऊर्जा एक स्वच्छ, नवीकरणीय और हरित ऊर्जा स्रोत है जो जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता और प्रदूषण को कम करती है।

निष्कर्षतः, सौर सेल तकनीक भविष्य की ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इसके अनुसंधान और विकास पर निरंतर कार्य जारी है ताकि इसे और अधिक कुशल, सस्ता एवं सर्वसुलभ बनाया जा सके।

1. गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोत क्या है?

गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोत वे स्रोत हैं जिनका उपयोग पारंपरिक रूप से बड़े पैमाने पर नहीं किया गया है और जो प्रदूषण मुक्त या कम प्रदूषणकारी होते हैं। ये स्रोत प्रकृति में नवीकरणीय (renewable) हैं, अर्थात इनका भंडार समाप्त नहीं होता। इनमें सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा, बायोगैस तथा समुद्री तरंग ऊर्जा आदि शामिल हैं।

2. जीवाश्मी ईंधन क्या है?

जीवाश्मी ईंधन वे ईंधन हैं जो लाखों वर्ष पहले दबे हुए पेड़-पौधों एवं जीव-जंतुओं के अवशेषों से बने हैं। इनके अंतर्गत कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस आते हैं। ये ईंधन कार्बन के यौगिकों से बने होते हैं और इन्हें जलाने पर भारी मात्रा में ऊर्जा प्राप्त होती है, साथ ही प्रदूषणकारी गैसें भी निकलती हैं।

3. सौर कुकर के कोई दो लाभ लिखिए।

सौर कुकर के दो प्रमुख लाभ हैं:
1. ईंधन की बचत: इसमें खाना पकाने के लिए किसी पारंपरिक ईंधन जैसे एलपीजी, कोयला या लकड़ी की आवश्यकता नहीं होती, जिससे ईंधन का खर्च बचता है और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण होता है।
2. प्रदूषण मुक्त: सौर कुकर से खाना पकाते समय कोई धुआँ या हानिकारक गैस नहीं निकलती, इसलिए यह पर्यावरण के लिए बिल्कुल साफ-सुथरा तरीका है।

4. बायोगैस के कोई दो उपयोग लिखिए।

बायोगैस के दो महत्वपूर्ण उपयोग निम्नलिखित हैं:
1. ईंधन के रूप में: इसका उपयोग घरों में खाना पकाने, प्रकाश करने तथा छोटे इंजन चलाने के लिए ईंधन के रूप में किया जाता है।
2. जैविक खाद (स्लरी) के रूप में: बायोगैस संयंत्र से निकला हुआ अवशेष (स्लरी) एक उत्तम जैविक खाद है, जिसका उपयोग कृषि में फसलों की उपज बढ़ाने के लिए किया जाता है।

5. ऊर्जा स्रोत के रूप में सूर्य की विशेषताएँ लिखिए।

सूर्य ऊर्जा का एक आदर्श एवं नवीकरणीय स्रोत है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं:
- यह एक अक्षय स्रोत है, जो अरबों वर्षों तक ऊर्जा देता रहेगा।
- यह प्रदूषण मुक्त है, इससे कोई हानिकारक गैस या कचरा नहीं निकलता।
- सौर ऊर्जा को विद्युत, ऊष्मा आदि विभिन्न रूपों में परिवर्तित किया जा सकता है।
- यह व्यापक रूप से उपलब्ध है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ बिजली ग्रिड नहीं पहुँचता।

6. सौर सेल क्या है?

सौर सेल एक ऐसी युक्ति है जो सूर्य के प्रकाश (फोटॉन) को सीधे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करती है। यह अर्धचालक पदार्थ (जैसे सिलिकॉन) से बना होता है। जब सूर्य का प्रकाश इस पर पड़ता है तो इलेक्ट्रॉन गति करने लगते हैं और विद्युत धारा उत्पन्न होती है। इसका उपयोग सौर पैनल, कैलकुलेटर, उपग्रहों आदि में किया जाता है।

7. पवन ऊर्जा क्या है?

पवन ऊर्जा, वायु की गतिज ऊर्जा है जिसका उपयोग करके विद्युत उत्पन्न की जाती है। इसके लिए पवन चक्कियाँ (विंड टर्बाइन) लगाई जाती हैं, जिनके ब्लेड हवा के दबाव से घूमते हैं और जनरेटर को चलाकर बिजली पैदा करते हैं। यह एक स्वच्छ, नवीकरणीय तथा पर्यावरण हितैषी ऊर्जा स्रोत है।

8. ज्वारीय ऊर्जा क्या है?

ज्वारीय ऊर्जा समुद्र के ज्वार-भाटा (उठने-गिरने) के कारण उत्पन्न होने वाली ऊर्जा है। समुद्र के जल स्तर में आने वाले इस नियमित परिवर्तन की गतिज एवं स्थितिज ऊर्जा को टर्बाइन के माध्यम से विद्युत ऊर्जा में बदला जाता है। यह एक पूर्वानुमेय और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है।

9. नाभिकीय ऊर्जा क्या है?

नाभिकीय ऊर्जा परमाणु के नाभिक में संचित ऊर्जा है जो नाभिकीय अभिक्रियाओं (विखंडन या संलयन) के दौरान मुक्त होती है। विखंडन में भारी परमाणु (जैसे यूरेनियम) के नाभिक टूटते हैं, जबकि संलयन में हल्के परमाणु (जैसे हाइड्रोजन) के नाभिक जुड़ते हैं। दोनों ही प्रक्रियाओं में अत्यधिक ऊर्जा निकलती है, जिसका उपयोग बिजली बनाने में किया जाता है।

10. नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत क्या है?

नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत वे स्रोत हैं जो प्रकृति में लगातार पुनः पूर्ति होते रहते हैं और कभी समाप्त नहीं होते। इन्हें 'अक्षय ऊर्जा स्रोत' भी कहते हैं। इनमें सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल ऊर्जा, बायोमास ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा और ज्वारीय ऊर्जा शामिल हैं। ये पर्यावरण के अनुकूल हैं और प्रदूषण कम करते हैं।

बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

1. निम्नलिखित में से कौन जीवाश्मी ईंधन नहीं है?

A कोयला
B बायोगैस
C पेट्रोलियम
D प्राकृतिक गैस

उत्तर: B) बायोगैस
बायोगैस एक नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है जो जैविक कचरे के अपघटन से बनती है, जबकि कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जीवाश्मी ईंधन हैं जो प्राचीन जैविक अवशेषों से बने हैं।

2. सौर कुकर में खाना पकाने के लिए किस ऊर्जा का उपयोग होता है?

A पवन ऊर्जा
B नाभिकीय ऊर्जा
C सौर ऊर्जा
D ज्वारीय ऊर्जा

उत्तर: C) सौर ऊर्जा
सौर कुकर में सूर्य के प्रकाश को परावर्तक द्वारा एक बिंदु पर केंद्रित किया जाता है, जिससे उच्च ताप उत्पन्न होता है और इसी ऊष्मा का उपयोग खाना पकाने में किया जाता है।

3. निम्नलिखित में से कौन नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है?

A कोयला
B पेट्रोलियम
C सौर ऊर्जा
D प्राकृतिक गैस

उत्तर: C) सौर ऊर्जा
सौर ऊर्जा एक नवीकरणीय (अक्षय) स्रोत है क्योंकि सूर्य से ऊर्जा लगातार प्राप्त होती रहती है और यह कभी खत्म नहीं होगी। शेष तीनों विकल्प जीवाश्मी ईंधन हैं जो अनवीकरणीय हैं।

4. बायोगैस का मुख्य घटक क्या है?

A हाइड्रोजन
B ऑक्सीजन
C मीथेन
D कार्बन डाइऑक्साइड

उत्तर: C) मीथेन
बायोगैस में मुख्य रूप से ज्वलनशील गैस मीथेन (लगभग 50-75%) होती है, जिसके कारण यह ईंधन के रूप में जलती है। इसमें कार्बन डाइऑक्साइड और थोड़ी मात्रा में अन्य गैसें भी होती हैं।

5. पवन ऊर्जा का रूपांतरण किसमें होता है?

A ऊष्मीय ऊर्जा
B विद्युत ऊर्जा
C प्रकाश ऊर्जा
D रासायनिक ऊर्जा

उत्तर: B) विद्युत ऊर्जा
पवन चक्की (विंड टर्बाइन) हवा की गतिज ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में और फिर जनरेटर की सहायता से विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करती है।

6. नाभिकीय ऊर्जा प्राप्त करने के लिए किस अभिक्रिया का उपयोग होता है?

A संयोजन
B विखंडन
C दहन
D अपघटन

उत्तर: B) विखंडन
वर्तमान में नाभिकीय ऊर्जा संयंत्रों में यूरेनियम जैसे भारी तत्वों के नाभिक के विखंडन (टूटने) की प्रक्रिया द्वारा ही ऊर्जा प्राप्त की जाती है। संलयन अभी नियंत्रित रूप से व्यावहारिक स्तर पर उपलब्ध नहीं है।

7. सौर सेल किससे बना होता है?

A ताँबा
B सिलिकॉन
C लोहा
D एल्युमीनियम

उत्तर: B) सिलिकॉन
अधिकांश सौर सेल अर्धचालक पदार्थ सिलिकॉन से बने होते हैं, क्योंकि इसकी विद्युत गुणधर्म इसे सूर्य के प्रकाश को विद्युत में बदलने के लिए उपयुक्त बनाते हैं।

8. निम्नलिखित में से कौन गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोत है?

A कोयला
B पेट्रोलियम
C जल विद्युत
D भूतापीय ऊर्जा

उत्तर: D) भूतापीय ऊर्जा
भूतापीय ऊर्जा पृथ्वी के आंतरिक भाग की ऊष्मा से प्राप्त होती है और इसे गैर-परंपरागत (नवीकरणीय) स्रोत माना जाता है। कोयला व पेट्रोलियम परंपरागत जीवाश्म ईंधन हैं, जबकि जल विद्युत एक परंपरागत नवीकरणीय स्रोत है।

श्रृंखला अभिक्रिया किसे कहते हैं तथा यह कैसे सम्पन्न की जाती है?

उत्तर:

जब किसी भारी नाभिक (जैसे यूरेनियम-235) का विखंडन एक न्यूट्रॉन द्वारा होता है, तो यह प्रक्रिया केवल एक बार नहीं रुकती। इस विखंडन से 2-3 नए न्यूट्रॉन तथा भारी मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है। ये नए न्यूट्रॉन, यदि उचित परिस्थितियाँ हों, तो आस-पास के अन्य यूरेनियम-235 नाभिकों से टकराकर उनका भी विखंडन कर देते हैं। इन दूसरे विखंडनों से फिर नए न्यूट्रॉन निकलते हैं, जो और नाभिकों को तोड़ते हैं। इस प्रकार एक स्व-चालित, लगातार चलने वाली प्रक्रिया शुरू हो जाती है, जिसमें विखंडन की घटनाएँ एक श्रृंखला की तरह जुड़ी रहती हैं। इसे ही श्रृंखला अभिक्रिया कहते हैं।

श्रृंखला अभिक्रिया को सम्पन्न करने के लिए निम्नलिखित शर्तें आवश्यक हैं:

  1. पर्याप्त द्रव्यमान (क्रांतिक द्रव्यमान): विखंडनीय पदार्थ (जैसे U-235) का आकार इतना बड़ा होना चाहिए कि विखंडन से निकले न्यूट्रॉन बाहर भागने के बजाय दूसरे नाभिकों से टकराएँ। यदि द्रव्यमान बहुत छोटा है, तो अधिकांश न्यूट्रॉन बिना टकराए बाहर निकल जाएँगे और श्रृंखला रुक जाएगी।
  2. मंदक (Moderator) का प्रयोग: विखंडन से निकले न्यूट्रॉन बहुत तेज (उच्च ऊर्जा वाले) होते हैं, जो U-235 नाभिकों को पकड़ने के लिए उपयुक्त नहीं होते। इनकी गति कम करने के लिए हल्के नाभिक वाले पदार्थ जैसे ग्रेफाइट, भारी जल (D₂O) या साधारण जल का उपयोग मंदक के रूप में किया जाता है। ये पदार्थ न्यूट्रॉन से टकराकर उनकी गति धीमी कर देते हैं, जिससे वे अगले U-235 नाभिकों द्वारा आसानी से अवशोषित हो जाते हैं और विखंडन करते हैं।
  3. नियंत्रक छड़ें (Control Rods): श्रृंखला अभिक्रिया की गति को नियंत्रित करने के लिए कैडमियम या बोरॉन जैसे पदार्थों की छड़ों का उपयोग किया जाता है। ये पदार्थ न्यूट्रॉनों के अच्छे अवशोषक होते हैं। इन छड़ों को विखंडनीय पदार्थ के बीच में घुसाकर या बाहर निकालकर, अभिक्रिया में भाग लेने वाले न्यूट्रॉनों की संख्या को नियंत्रित किया जा सकता है। इससे अभिक्रिया को एक स्थिर दर पर चलाया जा सकता है।
  4. शुद्ध विखंडनीय पदार्थ: प्राकृतिक यूरेनियम में मुख्य रूप से U-238 (99.3%) होता है, जो मंद न्यूट्रॉनों को सोख लेता है और श्रृंखला को रोक देता है। इसलिए, श्रृंखला अभिक्रिया को कुशलतापूर्वक चलाने के लिए संवर्धित यूरेनियम (U-235 की मात्रा बढ़ाई हुई) का उपयोग किया जाता है।

श्रृंखला अभिक्रिया के दो प्रकार:

  • अनियंत्रित श्रृंखला अभिक्रिया: इसमें प्रत्येक विखंडन से उत्पन्न न्यूट्रॉनों में से औसतन एक से अधिक न्यूट्रॉन आगे विखंडन करते हैं। इससे विखंडनों की संख्या अत्यंत तीव्र गति से बढ़ती है और पल भर में भारी मात्रा में ऊर्जा विस्फोट के रूप में मुक्त होती है। परमाणु बम इसी सिद्धांत पर कार्य करता है।
  • नियंत्रित श्रृंखला अभिक्रिया: इसमें नियंत्रक छड़ों की सहायता से इस प्रकार नियंत्रण रखा जाता है कि प्रत्येक विखंडन से औसतन केवल एक ही न्यूट्रॉन आगे विखंडन करे। इससे अभिक्रिया एक स्थिर और नियंत्रित दर पर चलती रहती है और उत्पन्न ऊर्जा का शांतिपूर्ण उपयोग (जैसे बिजली उत्पादन) किया जा सकता है। नाभिकीय रिएक्टर या परमाणु भट्ठी में यही क्रिया होती है।

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