Bihar Board Class 10th Science (विज्ञान) Chapter 6 जैव प्रक्रम) Solutions
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प्रश्न 1.
हमारे जैसे बहुकोशिकीय जीवों में ऑक्सीजन की आवश्यकता पूरी करने मेंविसरण क्यों अपर्याप्त है?
बहुकोशिकीय जीवों में शरीर की अधिकांश कोशिकाएँ सीधे बाहरी वातावरण के संपर्क में नहीं होती हैं। साधारण विसरण एक धीमी प्रक्रिया है जो केवल छोटी दूरी के लिए प्रभावी होती है। हमारे शरीर में लाखों-करोड़ों कोशिकाओं तक ऑक्सीजन पहुँचाने के लिए विसरण पर्याप्त नहीं है। इसलिए, श्वसन तंत्र और रक्त परिसंचरण तंत्र जैसी विशेष प्रणालियों की आवश्यकता होती है जो ऑक्सीजन का कुशलतापूर्वक वहन कर सकें।
प्रश्न 2.
कोई वस्तु सजीव है, इसका निर्धारण करने के लिए हम किस मापदंड का उपयोग करेंगे?
किसी वस्तु के सजीव होने का निर्धारण करने के लिए हम सजीवों के विशिष्ट लक्षणों को मापदंड के रूप में उपयोग करते हैं। ये लक्षण हैं: श्वसन (गैसों का आदान-प्रदान), पोषण, वृद्धि, उत्सर्जन, प्रतिक्रिया (उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया), गति (स्थान परिवर्तन या अंगों की गति), जनन तथा समस्थिति (शरीर के आंतरिक वातावरण का संतुलन)।
प्रश्न 3.
किसी जीव द्वारा किन कच्ची सामग्रियों का उपयोग किया जाता है?
जीव अपने जीवन प्रक्रियाओं को चलाने के लिए विभिन्न कच्ची सामग्रियों का उपयोग करते हैं। मुख्य रूप से इनमें कार्बन डाइऑक्साइड, जल, ऑक्सीजन, खनिज लवण तथा भोजन (कार्बनिक पदार्थ) शामिल हैं। उदाहरण के लिए, पौधे प्रकाश संश्लेषण के लिए कार्बन डाइऑक्साइड, जल और सूर्य के प्रकाश का उपयोग करते हैं।
प्रश्न 4.
जीवन के अनुरक्षण के लिए आप किन प्रक्रमों को आवश्यक मानेंगे?
जीवन को बनाए रखने के लिए निम्नलिखित प्रक्रम आवश्यक हैं:
- पोषण: ऊर्जा और शरीर निर्माण हेतु पदार्थों का ग्रहण।
- श्वसन: भोजन से ऊर्जा मुक्त करने की प्रक्रिया।
- परिवहन: शरीर में पदार्थों का संवहन।
- उत्सर्जन: शरीर से हानिकारक अपशिष्ट पदार्थों का निष्कासन।
- जनन: अपने समान नई सन्तति उत्पन्न करना।
- अनुक्रिया: पर्यावरणीय परिवर्तनों के प्रति प्रतिक्रिया।
स्वयंपोषी पोषण तथा विषमपोषी पोषण में कया अंतर है?
| स्वयंपोषी पोषण | विषमपोषी पोषण |
|---|---|
| इसमें जीव अपना भोजन स्वयं सरल अकार्बनिक पदार्थों (जैसे CO₂, जल) से सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में तैयार करते हैं। | इसमें जीव अपना भोजन अन्य जीवों या उनसे प्राप्त जटिल कार्बनिक पदार्थों से प्राप्त करते हैं। |
| यह प्रक्रिया प्रकाश संश्लेषण कहलाती है। | यह प्रक्रिया भोजन के अंतर्ग्रहण और पाचन पर आधारित है। |
| उदाहरण: सभी हरे पौधे, कुछ जीवाणु। | उदाहरण: मनुष्य, जानवर, कवक, अधिकांश जीवाणु। |
प्रश्न 2.
प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक कच्ची सामग्री पौधा कहाँ से प्राप्त करता है?
पौधे प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक कच्ची सामग्री विभिन्न स्रोतों से प्राप्त करते हैं:
- कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂): वायुमंडल से, पत्तियों के रंध्रों द्वारा।
- जल (H₂O): मिट्टी से, जड़ों द्वारा अवशोषित करके।
- प्रकाश ऊर्जा: सूर्य के प्रकाश से।
- क्लोरोफिल: पत्तियों के हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट) में उपस्थित होता है।
- खनिज लवण: मिट्टी से जल में घुलकर जड़ों द्वारा।
प्रश्न 3.
हमारे आमाशय में अम्ल की भूमिका क्या है?
आमाशय में उपस्थित हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) निम्नलिखित महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाता है:
- अम्लीय माध्यम उत्पन्न करना: यह आमाशय में अम्लीय pH उत्पन्न करता है जो प्रोटीन पाचक एंजाइम पेप्सिन की क्रिया के लिए अनुकूल होता है (पेप्सिन क्षारीय या उदासीन माध्यम में कार्य नहीं करता)।
- रोगाणुनाशक: भोजन के साथ आने वाले हानिकारक जीवाणुओं और सूक्ष्मजीवों को नष्ट करके हमें संक्रमण से बचाता है।
- प्रोटीन का विखंडन: अम्ल प्रोटीन के जटिल अणुओं को सरल रूप में तोड़ने में सहायता करता है, जिससे पेप्सिन उन्हें आसानी से पचा सके।
प्रश्न 4.
पाचक एंजाइमों का क्या कार्य है?
पाचक एंजाइम जैव उत्प्रेरक हैं जो भोजन के जटिल, बड़े अणुओं को सरल, छोटे और शरीर द्वारा अवशोषित होने योग्य अणुओं में तोड़ने का कार्य करते हैं। इनका विशिष्ट कार्य इस प्रकार है:
- एमाइलेज: स्टार्च (जटिल कार्बोहाइड्रेट) को माल्टोज और ग्लूकोज (सरल शर्करा) में परिवर्तित करता है।
- पेप्सिन/ट्रिप्सिन: प्रोटीन को पेप्टाइड्स और फिर अमीनो अम्ल में तोड़ते हैं।
- लाइपेज: वसा (लिपिड) को वसीय अम्ल और ग्लिसरॉल में परिवर्तित करता है।
प्रश्न 5.
पचे हुए भोजन को अवशोषित करने के लिए क्षुद्रांत्र को कैसे अभिकल्पित किया गया है?
क्षुद्रांत्र पचे हुए भोजन के अवशोषण के लिए अत्यधिक विशिष्ट संरचना रखता है:
- विशाल सतह क्षेत्र: इसकी आंतरिक दीवार पर असंख्य अंगुली के समान प्रवर्ध होते हैं, जिन्हें दीर्घरोम (Villi) कहते हैं। प्रत्येक दीर्घरोम पर सूक्ष्मतर प्रवर्ध सूक्ष्मांकुर (Microvilli) होते हैं। ये संरचनाएँ अवशोषण सतह का क्षेत्रफल बहुत अधिक बढ़ा देती हैं।
- रक्त वाहिकाओं का जाल: प्रत्येक दीर्घरोम के भीतर रक्त केशिकाओं और लसीका वाहिकाओं (लैक्टील) का सघन जाल होता है। ये ग्लूकोज, अमीनो अम्ल आदि को अवशोषित कर शरीर के सभी भागों तक पहुँचाते हैं।
- पतली भित्ति: दीर्घरोम की भित्ति केवल एक कोशिका मोटी होती है, जिससे पचे हुए पोषक तत्व आसानी से रक्त में प्रवेश कर जाते हैं।
प्रश्न 1.
श्रसन के लिए ऑक्सीजन प्राप्त करने की दिशा में एक जलीय जीव की अपैक्षा स्थलीय जीव किस प्रकार लाभप्रद है?
स्थलीय जीव, जलीय जीवों की तुलना में श्वसन के लिए ऑक्सीजन प्राप्त करने में लाभप्रद स्थिति में होते हैं, क्योंकि:
- वायुमंडल में ऑक्सीजन की सांद्रता (लगभग 21%) जल में घुली ऑक्सीजन की सांद्रता की तुलना में बहुत अधिक होती है। जल में ऑक्सीजन की मात्रा बहुत कम और परिवर्तनशील होती है।
- वायु में ऑक्सीजन का विसरण दर जल की तुलना में लगभग 10,000 गुना तेज होता है। इससे स्थलीय जीवों को ऑक्सीजन आसानी और तेजी से मिल जाती है।
- इसलिए, जलीय जीवों (जैसे मछली) को समान मात्रा में ऑक्सीजन प्राप्त करने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है, जिससे उनकी श्वसन दर (गिल फ्लैप्स की संख्या) स्थलीय जीवों की श्वसन दर से अधिक होती है।
प्रश्न 2,
ग्लूकोज़ के ऑक्सीकरण से भिन्न जीवों में ऊर्जा प्राप्त करने के विभिन्न पथ क्या हैं?
विभिन्न परिस्थितियों में जीव ग्लूकोज के ऑक्सीकरण से ऊर्जा प्राप्त करने के लिए तीन मुख्य पथ अपनाते हैं:
- वायवीय श्वसन (ऑक्सीजन की उपस्थिति में): यह सबसे कुशल पथ है। इसमें ग्लूकोज का पूर्ण ऑक्सीकरण होकर कार्बन डाइऑक्साइड, जल और अधिकतम ऊर्जा (38 ATP) मुक्त होती है। यह मनुष्यों और अधिकांश जीवों में होता है।
ग्लूकोज + ऑक्सीजन → कार्बन डाइऑक्साइड + जल + ऊर्जा (अधिक) - अवायवीय श्वसन (ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में): यह कुछ जीवाणु और यीस्ट में होता है। इसमें ग्लूकोज का अपूर्ण विखंडन होता है, जिससे एथेनॉल, कार्बन डाइऑक्साइड और कम ऊर्जा (2 ATP) प्राप्त होती है।
ग्लूकोज → एथेनॉल + कार्बन डाइऑक्साइड + ऊर्जा (कम) - लैक्टिक अम्ल उत्पादन (ऑक्सीजन की कमी में): यह मानव की मांसपेशियों में भारी व्यायाम के दौरान होता है, जब ऑक्सीजन की आपूर्ति कम हो जाती है। इसमें ग्लूकोज लैक्टिक अम्ल में टूटता है और कम ऊर्जा मिलती है, जिससे मांसपेशियों में थकान होती है।
ग्लूकोज → लैक्टिक अम्ल + ऊर्जा (कम)
प्रश्न 3.
मनुष्यों में ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन कैसे होता है?
मनुष्यों में गैसों का परिवहन रक्त द्वारा होता है:
- ऑक्सीजन का परिवहन: फेफड़ों की वायुकोशिकाओं (एल्वियोली) में ऑक्सीजन रक्त में उपस्थित लाल रक्त कणिकाओं के वर्णक हीमोग्लोबिन से बंधकर ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाती है। यह ऑक्सीहीमोग्लोबिन धमनियों द्वारा शरीर के सभी ऊतकों तक पहुँचाया जाता है, जहाँ ऑक्सीजन कोशिकाओं को मुक्त कर देती है।
- कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन: कोशिकाओं में श्वसन से उत्पन्न CO₂ को रक्त तीन प्रकार से फेफड़ों तक ले जाता है:
- रक्त प्लाज्मा में घुलकर (लगभग 7%)।
- हीमोग्लोबिन से बंधकर कार्बामिनोहीमोग्लोबिन बनाकर (लगभग 20-25%)।
- जल में घुलकर बाइकार्बोनेट आयन (HCO₃⁻) के रूप में (लगभग 70%)।
प्रश्न 4.
गैसों के विनिमय के लिए मानव-फुफ्फुस में अधिकतम क्षेत्रफल को कैसे अभिकल्पित किया है?
मानव फेफड़े गैस विनिमय के लिए अधिकतम सतह क्षेत्र प्रदान करने हेतु अद्भुत रूप से अभिकल्पित हैं:
- वायुकोशिकाएँ (एल्वियोली): फेफड़ों के अंत में अंगूर के गुच्छे जैसी लाखों सूक्ष्म, पतली भित्ति वाली थैलीनुमा संरचनाएँ होती हैं, जिन्हें एल्वियोली कहते हैं। ये गैस विनिमय का वास्तविक स्थल हैं।
- विशाल सतह क्षेत्र: इन असंख्य एल्वियोली के कारण फेफड़ों का कुल गैस विनिमय सतह क्षेत्रफल एक टेनिस कोर्ट (लगभग 70-100 वर्ग मीटर) के बराबर हो जाता है।
- पतली भित्ति: एल्वियोली की भित्ति केवल एक कोशिका मोटी होती है और इनके चारों ओर रक्त केशिकाओं का सघन जाल होता है। यह पतली झिल्ली ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड के आदान-प्रदान को तीव्र और कुशल बनाती है।
- लचीलापन: एल्वियोली की दीवारें लचीली होती हैं, जो श्वास लेने पर फैलती हैं और छोड़ने पर सिकुड़ती हैं, जिससे गैसों का निरंतर आदान-प्रदान होता रहता है।
प्रश्न 1.
मानव में वहन तंत्र के घटक कौन-से हैं? इन घटकों के क्या कार्य हैं?
मानव में वहन तंत्र (परिसंचरण तंत्र) के मुख्य घटक और उनके कार्य निम्नलिखित हैं:
| घटक | कार्य |
|---|---|
| हृदय | यह एक पंप की तरह कार्य करता है जो संकुचन और शिथिलन द्वारा ऑक्सीजनित रक्त को शरीर में और विऑक्सीजनित रक्त को फेफड़ों में पंप करता है। |
| रक्त | यह तरल संयोजी ऊतक है जो ऑक्सीजन, पोषक तत्व, हॉर्मोन, CO₂ और अपशिष्ट पदार्थों का वहन करता है। इसमें लाल रक्त कणिकाएँ, श्वेत रक्त कणिकाएँ, प्लेटलेट्स और प्लाज्मा होते हैं। |
रक्त वाहिकाएँ
|
|
| लसीका तंत्र | यह एक सहायक वहन तंत्र है जो अतिरिक्त ऊतक द्रव (लसीका) को वापस रक्त में लाता है, वसा के अवशोषण में सहायता करता है और रोगाणुओं से लड़ने में मदद करता है। |
प्रश्न 2.
स्तनधारी तथा पक्षियों में ऑक्सीजनित तथा विऑक्सीजनित रुधिर को अलग करना क्यों आवश्यक है?
स्तनधारी और पक्षियों में ऑक्सीजनित और विऑक्सीजनित रक्त को अलग रखना इसलिए अत्यंत आवश्यक है क्योंकि:
- इन जीवों को शरीर का तापमान स्थिर रखने (समतापी होने) के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा केवल वायवीय श्वसन से ही प्राप्त हो सकती है, जिसके लिए ऑक्सीजन की अधिक मात्रा चाहिए।
- यदि दोनों प्रकार का रक्त मिल जाए, तो शरीर की कोशिकाओं को शुद्ध ऑक्सीजन युक्त रक्त नहीं मिल पाएगा, जिससे ऊर्जा उत्पादन कम हो जाएगा और शरीर का ताप नियंत्रण बिगड़ जाएगा।
- चार-कक्षीय हृदय (दो अलिंद और दो निलय) इस कार्य को पूरा करता है। बाएँ भाग में केवल ऑक्सीजनित और दाएँ भाग में केवल विऑक्सीजनित रक्त रहता है। इससे शरीर को उच्च दक्षता के साथ अधिकतम ऑक्सीजन की आपूर्ति होती है।
प्रश्न 3.
उच्च संगठित पादप में वहन तंत्र के घटक क्या हैं?
उच्च संगठित पादपों (जैसे फूल वाले पौधे) में वहन तंत्र के दो मुख्य घटक होते हैं, जो संवहनी बंडल बनाते हैं:
- जाइलम (Xylem): यह एक जटिल ऊतक है जो मुख्य रूप से जड़ों से पत्तियों तक जल और घुले हुए खनिज लवणों का ऊपर की ओर वहन करता है। इसके वाहिकाएँ मृत कोशिकाओं की बनी होती हैं।
- फ्लोएम (Phloem): यह भी एक जटिल ऊतक है जो पत्तियों में तैयार भोजन (ग्लूकोज जैसे कार्बनिक पदार्थ) का पौधे के सभी भागों- जड़, तना, फल, फूल आदि में द्वि-दिशीय वहन करता है। इसकी कोशिकाएँ जीवित होती हैं।
प्रश्न 4.
पादप में जल और खनिज लवण का वहन कैसे होता है?
पादप में जल और खनिज लवणों का वहन जाइलम ऊतक द्वारा जड़ों से पत्तियों तक ऊपर की ओर होता है। यह वहन निम्नलिखित बलों के संयुक्त प्रभाव से होता है:
- मूल दाब (Root Pressure): जड़ों की कोशिकाओं द्वारा खनिज लवण सक्रिय रूप से अवशोषित कर लिए जाते हैं, जिससे जड़ों में एक दाब उत्पन्न होता है जो
प्रश्न 1. मनुष्य में वृक्क एक तंत्र का भाग है जो सम्बन्धित है-
(a) पोषण
(b) श्वसन
(c) उत्सर्जन
(d) परिवहनव्याख्या: मनुष्य में वृक्क (गुर्दे) उत्सर्जन तंत्र का मुख्य अंग हैं। इनका प्रमुख कार्य रक्त से अपशिष्ट पदार्थों, जैसे यूरिया और अतिरिक्त लवणों व जल को छानकर मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकालना है। यह शरीर में जल व लवणों का संतुलन भी बनाए रखता है।
प्रश्न 2. पादप में जाइलम उत्तरदायी है-
(a) जल का वहन
(b) भोजन का वहन
(span style="color: #FF0000; font-weight: bold;">(c) अमीनो अम्ल का वहन
(d) ऑक्सीजन का वहनव्याख्या: पादपों में जाइलम एक संवहनी ऊतक है जो मुख्य रूप से जड़ों द्वारा अवशोषित जल और खनिज लवणों का वहन पत्तियों तक करता है। यह एकतरफा ऊपर की ओर वहन करता है। भोजन का वहन दूसरे संवहनी ऊतक फ्लोएम द्वारा होता है।
प्रश्न 3. स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक है-
(a) कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल
(b) क्लोरोफिल
(c) सूर्य का प्रकाश
(d) उपर्युक्त सभीव्याख्या: स्वपोषी पोषण (प्रकाश संश्लेषण) के लिए तीन मुख्य घटक अनिवार्य हैं: कार्बन डाइऑक्साइड और जल कच्चे पदार्थ के रूप में, पत्तियों में उपस्थित क्लोरोफिल प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित करने के लिए, और सूर्य का प्रकाश ऊर्जा का स्रोत। इन सभी की उपस्थिति में ही पौधे अपना भोजन स्वयं बना पाते हैं।
प्रश्न 4. पायरुवेट के विखंडन से यह कार्बन डाइऑक्साइड, जल तथा ऊर्जा देता है और यह क्रिया होती है-
(a) कोशिका द्रव्य
(b) माइटोकॉन्ड्रिया
(c) हरित लवक
(d) केन्द्रकव्याख्या: पायरुवेट का पूर्ण विखंडन (श्वसन) जिसमें कार्बन डाइऑक्साइड, जल और अधिक मात्रा में ऊर्जा (ATP) मुक्त होती है, कोशिका के माइटोकॉन्ड्रिया नामक कोशिकांग में होता है। माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का शक्ति गृह कहा जाता है।
प्रश्न 5. हमारे शरीर में वसा का पाचन कैसे होता है? यह प्रक्रम कहाँ होता है?
उत्तर: हमारे शरीर में वसा का पाचन निम्नलिखित चरणों में होता है:
- मुखगुहा: यहाँ केवल वसा का यांत्रिक विखंडन (चबाने) होता है। कोई रासायनिक पाचन नहीं होता।
- छोटी आंत: यह वसा पाचन का मुख्य स्थान है।
- यकृत (लीवर) द्वारा निर्मित पित्त रस छोटी आंत में आता है। पित्त रस वसा के बड़े गोलिकाओं को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ देता है (इमल्सीफिकेशन), जिससे पाचक एंजाइमों के लिए क्रिया सतह बढ़ जाती है।
- अग्न्याशय (पैंक्रियास) से स्रावित लाइपेज एंजाइम इन छोटे वसा कणों पर क्रिया करके उन्हें फैटी अम्ल और ग्लिसरॉल में विघटित कर देता है।
इस प्रकार, वसा का रासायनिक पाचन मुख्य रूप से छोटी आंत में होता है।
प्रश्न 6. भोजन के पाचन में पित्त रस की क्या भूमिका है?
उत्तर: पित्त रस, जो यकृत (लीवर) में बनता और पित्ताशय में संग्रहित होता है, भोजन पाचन में एक महत्वपूर्ण उत्प्रेरक की भूमिका निभाता है, विशेषकर वसा के पाचन में। इसकी भूमिकाएँ हैं:
- वसा का इमल्सीफिकेशन: पित्त रस में उपस्थित पित्त लवण बड़ी वसा की बूंदों को छोटी-छोटी बूंदों में तोड़ देते हैं। इससे वसा का सतही क्षेत्रफल बहुत बढ़ जाता है, जिस पर लाइपेज एंजाइम आसानी से क्रिया कर सकता है।
- अम्लीय माध्यम का उदासीनीकरण: आमाशय से आया भोजन अम्लीय होता है। पित्त रस क्षारीय प्रकृति का होता है, जो इस अम्लीय माध्यम को उदासीन करके आंतों में कार्यरत अन्य एंजाइमों (जो क्षारीय माध्यम में सक्रिय होते हैं) के लिए अनुकूल वातावरण बनाता है।
- विषाक्त पदार्थों का निष्कासन: यह शरीर के कुछ अपशिष्ट उत्पादों, जैसे बिलीरुबिन, को बाहर निकालने में भी सहायता करता है।
प्रश्न 7. उन पादपों का नाम बताएँ जिनमें प्रकाश संश्लेषण के लिए पर्णहरिम (क्लोरोफिल) नहीं होता। उन पादपों में प्रकाश संश्लेषण कैसे होता है?
उत्तर: कुछ पादपों, जैसे अमरबेल (कस्कुटा/Cuscuta), में अपना स्वयं का क्लोरोफिल नहीं होता। ये परजीवी पौधे होते हैं।
प्रकाश संश्लेषण कैसे होता है: चूँकि इनमें क्लोरोफिल नहीं होता, ये अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते। ये पौधे अन्य पौधों (पोषक पौधे) के तने पर चिपककर छोटे-छोटे अवशोषक अंग (हस्टोरिया) द्वारा उनसे जल एवं पोषक तत्व सीधे चूस लेते हैं। इस प्रकार, ये परजीवी पोषण द्वारा जीवित रहते हैं, स्वपोषी पोषण (प्रकाश संश्लेषण) द्वारा नहीं।
प्रश्न 8. मनुष्य में दोहरा परिसंचरण का क्या अर्थ है? यह क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
दोहरा परिसंचरण का अर्थ: मनुष्य के हृदय में रक्त पूरे शरीर में दो अलग-अलग परिपथों से होकर प्रवाहित होता है, इसलिए इसे दोहरा परिसंचरण कहते हैं।
- फुफ्फुसीय परिसंचरण: हृदय का दायाँ निलय → फेफड़ों की धमनियाँ → फेफड़े (ऑक्सीजन लेने के लिए) → फेफड़ों की शिराएँ → हृदय का बायाँ अलिंद।
- सिस्टमिक परिसंचरण: हृदय का बायाँ निलय → महाधमनी → शरीर के सभी अंगों को ऑक्सीजन युक्त रक्त पहुँचाना → शिराएँ → हृदय का दायाँ अलिंद।
आवश्यकता क्यों है:
- ऑक्सीजन युक्त और विहीन रक्त का पृथक्करण: यह सुनिश्चित करता है कि शरीर के विभिन्न अंगों को केवल ऑक्सीजन युक्त रक्त ही मिले, जिससे श्वसन की दक्षता बढ़ती है।
- उच्च दबाव बनाए रखना: फेफड़ों से ऑक्सीजन लेकर आया रक्त हृदय में वापस आता है और फिर से पंप होकर पूरे शरीर में जाता है। इस दोहरे पंपिंग से रक्त को शरीर के दूरस्थ भागों तक पहुँचाने के लिए पर्याप्त दबाव बना रहता है।
- चयापचय की उच्च दर को बनाए रखना: गर्म रक्त वाले प्राणियों (स्तनधारी और पक्षी) को ऊर्जा की अधिक आवश्यकता होती है। दोहरा परिसंचरण ऊतकों को लगातार अधिक मात्रा में ऑक्सीजन और पोषक तत्व पहुँचाकर उनकी उच्च ऊर्जा आवश्यकता को पूरा करता है।
प्रश्न 9. जाइलम तथा फ्लोएम में पदार्थों के वहन में क्या अंतर है?
आधार जाइलम (Xylem) फ्लोएम (Phloem) वहित पदार्थ जल और घुले हुए खनिज लवण (अकार्बनिक पदार्थ)। प्रकाश संश्लेषण द्वारा निर्मित भोजन (सुक्रोज, अमीनो अम्ल आदि कार्बनिक पदार्थ)। वहन की दिशा एकदिशीय (एक ही दिशा में) – जड़ों से पत्तियों की ओर (ऊपर की ओर)। द्विदिशीय (दोनों दिशाओं में) – पत्तियों से जड़ों की ओर और जड़ों से नई पत्तियों/फलों की ओर। वहन का बल मुख्यतः वाष्पोत्सर्जन खिंचाव (Transpiration Pull) द्वारा। सक्रिय वहन (Active Transport) और दाब प्रवाह परिकल्पना (Pressure Flow Hypothesis) के अनुसार होता है। संरचनात्मक इकाई ट्रैकीड्स और वाहिनिकाएँ (मृत कोशिकाएँ)। चालनी नलिकाएँ, सहचर कोशिकाएँ (जीवित कोशिकाएँ)। प्रश्न 10. उत्सर्जी उत्पाद से बचने के लिए पादप किन विधियों का उपयोग करते हैं?
उत्तर: पादपों में एक विकसित उत्सर्जन तंत्र नहीं होता, फिर भी वे अपने चयापचय से उत्पन्न अपशिष्ट पदार्थों को निम्नलिखित विधियों से निपटाते हैं:
- वाष्पोत्सर्जन द्वारा: अतिरिक्त जल को पत्तियों की सतह पर स्थित रंध्रों द्वारा जलवाष्प के रूप में उत्सर्जित कर देते हैं।
- संचयन द्वारा: कई अपशिष्ट पदार्थों को हानिरहित रूप में परिवर्तित करके पौधे के विभिन्न भागों में जमा कर लेते हैं।
- पत्तियों में: कुछ विषैले पदार्थ पत्तियों में जमा हो जाते हैं, जो पत्तियों के गिरने के साथ ही पौधे से अलग हो जाते हैं।
- बीजों एवं फलों की छाल में: रेजिन, गोंद, टैनिन आदि पदार्थ जमा हो जाते हैं।
- कोशिका रिक्तिका में: कुछ कार्बनिक अम्ल जमा होते हैं।
- स्रावण द्वारा: कुछ पौधे अपशिष्ट पदार्थों को विशेष संरचनाओं, जैसे दूधिया रस (लेटेक्स) के रूप में या रंध्रों से बाहर निकाल देते हैं। उदाहरण: अफीम का पौधा।
- पुनः उपयोग द्वारा: श्वसन में उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड का पुनः प्रकाश संश्लेषण में उपयोग कर लेते हैं। ऑक्सीजन को श्वसन के लिए या वातावरण में मुक्त कर देते हैं।
प्रश्न 13.
फुफ्फुस में कूपिकाओं की तथा वृक्क में वृक्काणु (नेफ्रॉन) की रचना तथा क्रियाविधि की तुलना कीजिए।
क्र०सं० फुफ्फुस कूपिका वृक्काणु (नेफ्रॉन) 1. संरचना यह महीन दीवारों वाले गुब्बारे या थैली के समान संरचना होती है। इसकी संरचना एक कप के समान होती है, जिसे बोमैन संपुट कहते हैं, जिससे एक लंबी नलिका जुड़ी होती है। 2. केशिका जाल इसकी दीवारों पर रक्त केशिकाओं का सघन जाल बिछा होता है जो गैसों के आदान-प्रदान का काम करता है। बोमैन संपुट के अंदर केशिकाओं का एक गुच्छा होता है जिसे ग्लोमेरूलस कहते हैं। यह रक्त को छानने (फिल्टरेशन) का कार्य करता है। 3. पृष्ठ क्षेत्रफल गैसों के आदान-प्रदान के लिए यह अपना पृष्ठ क्षेत्रफल बहुत अधिक बढ़ा लेती है। रक्त के छनने और पुनरावशोषण के लिए नेफ्रॉन की नलिकाएँ भी पृष्ठ क्षेत्रफल बढ़ा लेती हैं। 4. मुख्य कार्य इसका एकमात्र कार्य फेफड़ों में वायु से O2 और CO2 का आदान-प्रदान करना है। इसका कार्य रक्त को छानकर अपशिष्ट पदार्थों को हटाना, उपयोगी पदार्थों का पुनरावशोषण करना और अंत में मूत्र बनाकर मूत्राशय तक पहुँचाना है।
बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
पौधों में प्रकाश-संश्लेषण द्वारा भोजन का निर्माण होता है - (2015)
(a) जड़ में
(b) पत्ती में
(c) तने में
(d) फल मेंउत्तर: (b) पत्ती में
व्याख्या: पत्तियों में उपस्थित क्लोरोफिल (हरित लवक) सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड और जल से भोजन (ग्लूकोज) का निर्माण करता है।प्रश्न 2.
प्रकाश-संश्लेषण क्रिया में ऑक्सीजन गैस निकलती है - (2012, 16)
(a) कार्बन डाइ-ऑक्साइड से
(b) जल से
(c) वायु से
(d) पर्ण हरित के विघटन सेउत्तर: (b) जल से
व्याख्या: प्रकाश-संश्लेषण की प्रकाशिक अभिक्रिया के दौरान जल के फोटोलिसिस (प्रकाश-अपघटन) से ऑक्सीजन गैस मुक्त होती है।प्रश्न 3.
प्रकाश अभिक्रिया होती है - (2016)
(a) माइटोकॉण्ड्रिया में
(b) हरित लवक के ग्रेना में
(c) राइबोसोम में
(d) हरित लवक के स्ट्रोमा मेंउत्तर: (b) हरित लवक के ग्रेना में
व्याख्या: हरित लवक के अंदर थाइलैकॉइड झिल्लियों के ढेर को ग्रेना कहते हैं। यहीं प्रकाश ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा (ATP व NADPH) में बदलने की प्रक्रिया होती है।प्रश्न 4.
क्लोरोप्लास्ट के ग्रेनन में बनते हैं - (2018)
(a) शर्करा तथा NAD.2H
(b) शर्करा तथा ग्लूकोज
(c) ATP तथा NADP.2H
(d) उपर्युक्त सभीउत्तर: (c) ATP तथा NADP.2H
व्याख्या: ग्रेना (थाइलैकॉइड) में प्रकाशिक अभिक्रिया के दौरान ऊर्जा युक्त अणु ATP और अपचायक शक्ति NADPH (NADP.2H) का निर्माण होता है, जिनका उपयोग अंधेरी अभिक्रिया में होता है।प्रश्न 5.
हरितलवक के स्ट्रोमा में कौन-सी क्रिया होती है? (2016)
(a) प्रकाशीय अभिक्रिया
(b) अप्रकाशीय अभिक्रिया
(c) (a) और (b) दोनों अभिक्रियाएँ
(d) इनमें से कोई नहींउत्तर: (b) अप्रकाशीय अभिक्रिया
व्याख्या: हरित लवक के तरल भाग को स्ट्रोमा कहते हैं। यहाँ प्रकाश पर निर्भर न करने वाली, कार्बन डाइऑक्साइड के स्थिरीकरण से ग्लूकोज बनाने की अभिक्रिया होती है।प्रश्न 6.
प्रकाश-संश्लेषण क्रिया का अन्तिम उत्पाद है - (2011)
(a) प्रोटीन
(b) वसा
(c) मण्ड
(d) खनिज लवणउत्तर: (c) मण्ड
व्याख्या: प्रकाश-संश्लेषण से प्राप्त ग्लूकोज का अतिरिक्त भाग पौधे में स्टार्च (मण्ड) के रूप में संचित हो जाता है, जो एक जटिल कार्बोहाइड्रेट है।प्रश्न 7.
पादपों में वायु प्रदूषण कम करने वाली प्रक्रिया है - (2013, 14)
(a) श्वसन
(b) प्रकाश-संश्लेषण
(c) वाष्पोत्सर्जन
(d) प्रोटीन संश्लेषणउत्तर: (b) प्रकाश-संश्लेषण
व्याख्या: प्रकाश-संश्लेषण के दौरान पौधे वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड (एक प्रमुख ग्रीनहाउस गैस) ग्रहण करते हैं और ऑक्सीजन मुक्त करते हैं, जिससे वायु प्रदूषण कम होता है।प्रश्न 8.
आहारनाल की C के आकार की संरचना है - (2015, 16)
(a) आमाशय
(b) ग्रहणी
(c) ग्रसनी
(d) कृमिरूप परिशेषिकाउत्तर: (b) ग्रहणी
व्याख्या: छोटी आंत का प्रारंभिक, लगभग 25 सेमी लंबा भाग ग्रहणी (Duodenum) होता है, जो 'C' के आकार में मुड़ा होता है और आमाशय से जुड़ा रहता है।प्रश्न 9.
मनुष्य में ग्रासनली की लम्बाई होती है - (2018)
(a) 5-8 सेमी
(b) 25-30 सेमी
(c) 1.5 मीटर
(d) 15 फीटउत्तर: (b) 25-30 सेमी
व्याख्या: ग्रासनली (Esophagus) एक पेशीय नली है जो गले से आमाशय तक भोजन पहुँचाती है। एक वयस्क मनुष्य में इसकी लंबाई लगभग 25-30 सेंटीमीटर होती है।प्रश्न 10.
मनुष्यों में लार ग्रन्थियों की संख्या होती है - (2012, 13, 14)
(a) दो जोड़ी
(b) तीन जोड़ी
(c) चार जोड़ी
(d) पाँच जोड़ी।उत्तर: (b) तीन जोड़ी
व्याख्या: मनुष्य के मुख में लार बनाने वाली तीन जोड़ी मुख्य ग्रंथियाँ होती हैं: पैरोटिड (कान के पास), सबमैंडिबुलर (जबड़े के नीचे) और सबलिंगुअल (जीभ के नीचे)।प्रश्न 11.
कृमिरूप परिशेषिका ........... का भाग है। (2013, 17)
(a) छोटी आँत
(b) अग्न्याशय
(c) बड़ी आँत (कोलन)
(d) ग्रासनलीउत्तर: (c) बड़ी आँत (कोलन)
व्याख्या: कृमिरूप परिशेषिका (Appendix) बड़ी आंत के प्रारंभिक भाग सीकम (Caecum) से जुड़ी एक छोटी, कृमि के आकार की थैलीनुमा संरचना है।प्रश्न 12.
मनुष्य में कृन्तक या छेदक दाँतों की संख्या होती है - (2010)
(a) आठ
(b) चार
(c) छह
(d) बारहउत्तर: (a) आठ
व्याख्या: वयस्क मनुष्य में कुल 32 दाँत होते हैं। इनमें से सबसे आगे के नुकीले दाँत कृन्तक (Incisors) होते हैं, जिनकी संख्या प्रत्येक जबड़े में 4 (ऊपर-नीचे मिलाकर कुल 8) होती है। ये भोजन को काटने का काम करते हैं।प्रश्न 13.
मनुष्य के प्रत्येक जबड़े में चर्वणक दन्तों की संख्या होती है। (2015)
(a) 2
(b) 4
(c) 6
(d) 8उत्तर: (c) 6
व्याख्या: चर्वणक दाँत (Molars) दाढ़ के आकार के होते हैं जो भोजन को पीसते हैं। एक वयस्क में प्रत्येक जबड़े में 6 चर्वणक दाँत होते हैं (तीन जोड़ी), जिससे कुल 12 चर्वणक दाँत हो जाते हैं।प्रश्न 14.
ग्रासनलीद्वार पर लटकी हुई पत्ती के समान कार्टिलेजी रचना कहलाती है - (2011, 14)
(a) एपीफैरिंक्स
(b) एपीग्लोटिस
(c) एल्वियोलाई
(d) श्लेष्मावरणउत्तर: (b) एपीग्लोटिस
व्याख्या: एपीग्लोटिस (Epiglottis) एक पत्ती के आकार का उपास्थि (कार्टिलेज) का ढक्कन है, जो ग्रासनली के प्रवेश द्वार पर लगा होता है। यह निगलने के समय श्वासनली को ढककर भोजन के फेफड़ों में जाने से रोकता है।प्रश्न 15.
निम्न में से किसके द्वारा पित्तरस का निर्माण होता है ? (2014, 15)
(a) अग्न्याशय
(b) वृषण
(c) यकृत
(d) पित्ताशयउत्तर: (c) यकृत
व्याख्या: पित्त रस (Bile juice) का निर्माण यकृत (Liver) में होता है। इसे संग्रह करने के लिए पित्ताशय (Gall bladder) का उपयोग होता है, जहाँ से यह आवश्यकता पड़ने पर ग्रहणी में स्रावित होता है।प्रश्न 16.
यकृत स्रावित करता है - (2018)
(a) लार
(b) जठर रस
(c) पित्त रस
(d) अग्न्याशयिक रसउत्तर: (c) पित्त रस।
व्याख्या: यकृत (Liver) शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है, जो पित्त रस का स्राव करती है। पित्त रस वसा के पाचन में मदद करता है और यह क्षारीय होने के कारण आमाशय से आए अम्लीय भोजन को उदासीन भी करता है।प्रश्न 17.
आहारनाल के पेशीय संकुचन को कहते हैं - (2014)
(a) पाचन
(b) क्रमाकुंचन
(c) परिसंचरण
(d) अवशोषणउत्तर: (b) क्रमाकुंचन
व्याख्या: आहारनाल की चिकनी पेशियों के लहरदार संकुचन और शिथिलन को क्रमाकुंचन (Peristalsis) कहते हैं। यह क्रिया भोजन को मुख से आमाशय तक और आगे पूरी आंत में धकेलती रहती है।प्रश्न 18.
जठर रस स्रावित होता है - (2018)
(a) अग्न्याशय में
(b) पित्ताशय में
(c) आमाशय में
(d) यकृत मेंउत्तर: (c) आमाशय में
व्याख्या: आमाशय की भीतरी दीवार में स्थित ग्रंथियों से जठर रस (Gastric juice) स्रावित होता है। इसमें हाइड्रोक्लोरिक अम्ल, पेप्सिन एंजाइम आदि होते हैं जो प्रोटीन के पाचन में सहायक होते हैं।प्रश्न 19.
जठर रस में निम्नलिखित में से एक नहीं पाया जाता है - (2009)
(a) पेप्सिन
(b) रेनिन
(c) ट्रिप्सिन
(d) जठर लाइपेजउत्तर: (c) ट्रिप्सिन
व्याख्या: ट्रिप्सिन (Trypsin) एक प्रोटीन पाचक एंजाइम है जो अग्न्याशय (Pancreas) द्वारा स्रावित होता है, न कि आमाशय के जठर रस में पाया जाता है। जठर रस में पेप्सिन, रेनिन (शिशुओं में) और जठर लाइपेज पाए जाते हैं।प्रश्न 20.
एमाइलेज एन्जाइम क्रिया करता है - (2012)
(a) प्रोटीन्स पर
(b) कार्बोहाइड्रेट पर
(c) वसा पर
(d) लवणों परउत्तर: (b) कार्बोहाइड्रेट पर।
व्याख्या: एमाइलेज (Amylase) एंजाइम जटिल कार्बोहाइड्रेट (जैसे स्टार्च) को सरल शर्करा (माल्टोज) में तोड़ने का कार्य करता है। यह लार और अग्न्याशयिक रस दोनों में पाया जाता है।प्रश्न 21.
वह एन्जाइम जो सुक्रोज को ग्लूकोज तथा फ्रक्टोज में बदलता है, है (2009)
(a) सुक्रेज
(b) लैक्टेज
(c) लाइपेज
(d) माल्टेजउत्तर: (a) सुक्रेज
व्याख्या: सुक्रेज (Sucrase) या इन्वर्टेज एंजाइम, डिसैकराइड सुक्रोज (चीनी) को उसके घटक मोनोसैकराइड्स- ग्लूकोज और फ्रक्टोज में हाइड्रोलाइज कर देता है।प्रश्न 22.
वसा में घुलनशील विटामिन है - (2010)
(a) थायमीन
(b) रेटीनॉल
(c) एस्कॉर्बिक एसिड
(d) उपर्युक्त में से कोई नहींउत्तर: (b) रेटीनॉल
व्याख्या: रेटीनॉल (Retinol) विटामिन A का रासायनिक नाम है। विटामिन A, D, E और K वसा में घुलनशील विटामिन हैं, जबकि विटामिन B-कॉम्प्लेक्स और C जल में घुलनशील हैं।प्रश्न 23.
ट्रिप्सिन पाचन में सहायता करता है - (2010)
(a) कार्बोहाइड्रेट
(b) प्रोटीन
(c) वसा
(d) प्रोटीन और वसा दोनोंउत्तर: (b) प्रोटीन
व्याख्या: ट्रिप्सिन (Trypsin) एक प्रोटीयोलाइटिक एंजाइम है जो अग्न्याशय द्वारा स्रावित होता है। यह प्रोटीन और पेप्टोन को छोटे पेप्टाइड्स में तोड़ने का कार्य करता है।प्रश्न 24.
स्टिएप्सिन एंजाइम क्रिया करता है - (2014)
(a) प्रोटीन पर
(b) स्टार्च पर
(c) वसा पर
(d) लवणों परउत्तर: (c) वसा पर
व्याख्या: स्टिएप्सिन (Steapsin), जिसे पैंक्रियाटिक लाइपेज भी कहते हैं, अग्न्याशयिक रस में पाया जाने वाला एक एंजाइम है। यह वसा (लिपिड) को फैटी एसिड और ग्लिसरॉल में तोड़ता है।प्रश्न 25.
निम्न में से विटामिन्स का कौन-सा जोड़ा जल में घुलनशील है? (2017)
(a) विटामिन A तथा B
(b) विटामिन B तथा C
(c) विटामिन C तथा D
(d) विटामिन D तथा Bउत्तर: (b) विटामिन B तथा C
व्याख्या: विटामिन B-कॉम्प्लेक्स (B1, B2, B6, B12 आदि) और विटामिन C (एस्कॉर्बिक अम्ल) जल में घुलनशील विटामिन हैं। शरीर इनका अतिरिक्त भाग मूत्र के साथ बाहर निकाल देता है।प्रश्न 26.
किस विटामिन की कमी से स्कर्वी रोग होता है? (2012)
(a) B
(b) C
(c) A
(d) Dउत्तर: (b) C
व्याख्या: विटामिन C (एस्कॉर्बिक अम्ल) की कमी से स्कर्वी (Scurvy) रोग होता है। इस रोग में मसूड़ों से खून आना, जोड़ों में दर्द, थकान और त्वचा पर चकत्ते जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।प्रश्न 27.
विटामिन C का अच्छा स्रोत है-- (2015)
(a) अण्डा
(b) मछली
(c) गेहूँ
(d) संतराउत्तर: (d) संतरा
व्याख्या: विटामिन C खट्टे फलों जैसे संतरा, नींबू, मौसंबी, आंवला, अमरूद और हरी पत्तेदार सब्जियों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।प्रश्न 28.
बेरी-बेरी रोग किस विटामिन की कमी से होता है? (2016)
(a) विटामिन B1
(b) विटामिन B2
(c) विटामिन B3
(d) विटामिन B5उत्तर: (a) विटामिन B1
व्याख्या: विटामिन B1 (थायमिन) की कमी से बेरी-बेरी (Beri-Beri) रोग होता है। इस रोग में तंत्रिका तंत्र और हृदय प्रभावित होते हैं, जिससे पैरों में सूजन, दर्द, थकान और हृदय की कमजोरी हो सकती है।प्रश्न 29.
सन्तुलित आहार में उपयुक्त मात्रा में विद्यमान होते हैं -
(a) प्रोटीन
(b) खनिज-लवण तथा विटामिन
(c) वसा तथा कार्बोहाइड्रेट
(d) ये सभी तत्त्वउत्तर: (d) ये सभी तत्त्व
व्याख्या: एक संतुलित आहार वह है जिसमें शरीर की सभी आवश्यकताओं के लिए उचित मात्रा में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन, खनिज लवण, रुक्षांश (फाइबर) और जल सभी तत्व मौजूद हों।प्रश्न 30.
व्यक्ति को सन्तुलित आहार ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि इससे -
(a) ऊर्जा प्राप्त होती है
(b) भूख मिट जाती है
(c) आहार सम्बन्धी समस्त आवश्यकताएँ पूरी होती हैं
(d) शरीर मोटा हो जाता हैउत्तर: (c) आहार सम्बन्धी समस्त आवश्यकताएँ पूरी होती हैं।
व्याख्या: संतुलित आहार का मुख्य उद्देश्य केवल भूख मिटाना या ऊर्जा देना नहीं, बल्कि श1. मनुष्य में वृक्क एक्टोपिक होता है।
यह कथन सही है। एक्टोपिक का अर्थ है 'सामान्य स्थान से हटकर'। मनुष्य में वृक्क (किडनी) उदर गुहा के पृष्ठ भाग में, रीढ़ की हड्डी के दोनों ओर स्थित होते हैं। यह उनका सामान्य स्थान नहीं है, इसलिए उन्हें एक्टोपिक अंग कहा जाता है।2. हमारे शरीर में पाचन का अधिकांश भाग कहाँ होता है?
हमारे शरीर में पाचन का अधिकांश भाग छोटी आंत में होता है। यहीं पर अग्न्याशय (पैंक्रियास) और यकृत (लिवर) से आए पाचक रस भोजन के साथ मिलते हैं और जटिल खाद्य पदार्थों का सरल अणुओं में पूर्ण रूप से पाचन होता है।3. पादप में जाइलम तथा फ्लोएम के कार्य लिखिए।
जाइलम के कार्य: जाइलम ऊतक का मुख्य कार्य पौधे की जड़ों द्वारा अवशोषित जल और खनिज लवणों को पौधे के सभी भागों जैसे तने, पत्तियों, फूलों आदि तक पहुँचाना है।
फ्लोएम के कार्य: फ्लोएम ऊतक का मुख्य कार्य पत्तियों में प्रकाश-संश्लेषण द्वारा निर्मित भोजन (शर्करा) को पौधे के विभिन्न भागों जैसे जड़ों, तने, फलों आदि तक पहुँचाना है।4. स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ कौन-कौन सी हैं? उनके रासायनिक समीकरण लिखिए।
स्वपोषी पोषण (प्रकाश-संश्लेषण) के लिए निम्नलिखित परिस्थितियाँ आवश्यक हैं:- प्रकाश: सूर्य का प्रकाश ऊर्जा का स्रोत है।
- क्लोरोफिल: हरे पौधों की पत्तियों में उपस्थित हरा वर्णक जो प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित करता है।
- कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂): वायुमंडल से प्राप्त होती है।
- जल (H₂O): मिट्टी से जड़ों द्वारा अवशोषित किया जाता है।
रासायनिक समीकरण:
कार्बन डाइऑक्साइड + जल ⟶ प्रकाश की उपस्थिति में क्लोरोफिल द्वारा ⟶ ग्लूकोज + ऑक्सीजन
6CO₂ + 12H₂O ⟶ C₆H₁₂O₆ + 6O₂ + 6H₂O5. वाष्पोत्सर्जन की परिभाषा दीजिए।
वाष्पोत्सर्जन वह प्रक्रिया है जिसमें पौधे अपने वायवीय भागों (मुख्यतः पत्तियों के रंध्रों से) से जल का वाष्प के रूप में हानि करते हैं। यह प्रक्रिया पौधों में जल के अवशोषण और संवहन में मदद करती है तथा पत्तियों को ठंडा रखती है।6. मानव में दोहरा परिसंचरण से आप क्या समझते हैं? यह क्यों आवश्यक है?
मानव में दोहरा परिसंचरण का अर्थ है कि रक्त हृदय से होकर दो अलग-अलग परिपथों में प्रवाहित होता है:- फुफ्फुसीय परिसंचरण: हृदय से रक्त फेफड़ों तक जाता है (ऑक्सीजन लेने के लिए) और वापस हृदय में आता है।
- सिस्टमिक परिसंचरण: हृदय से ऑक्सीजन युक्त रक्त शरीर के सभी अंगों तक जाता है और वापस डीऑक्सीजनेटेड रक्त हृदय में लौटता है।
7. पादप में प्रकाश-संश्लेषण के लिए आवश्यक कच्ची सामग्री पौधा कहाँ से प्राप्त करता है?
पादप प्रकाश-संश्लेषण के लिए आवश्यक कच्ची सामग्री निम्न स्रोतों से प्राप्त करता है:- कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂): वायुमंडल से, पत्तियों के रंध्रों द्वारा।
- जल (H₂O): मिट्टी से, जड़ों द्वारा अवशोषित होकर जाइलम वाहिनियों के माध्यम से पत्तियों तक पहुँचता है।
- क्लोरोफिल: पत्तियों के हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट) में स्वयं संश्लेषित होता है।
- प्रकाश: सूर्य के प्रकाश से।
8. स्वपोषी एवं परपोषी में अंतर स्पष्ट कीजिए।
स्वपोषी परपोषी ये जीव स्वयं सरल पदार्थों से अपना भोजन बनाते हैं। ये जीव दूसरे जीवों पर निर्भर रहकर भोजन प्राप्त करते हैं। उदाहरण: सभी हरे पौधे, कुछ बैक्टीरिया। उदाहरण: सभी जंतु, कवक, अधिकांश बैक्टीरिया। इनमें प्रकाश-संश्लेषण या रसायन-संश्लेषण की क्षमता होती है। इनमें भोजन स्वयं बनाने की क्षमता नहीं होती। 9. मनुष्य के मुखगुहा (आहारनाल) का स्वच्छ नामांकित चित्र बनाइए।
[छात्रों के लिए निर्देश: यहाँ एक स्वच्छ नामांकित चित्र बनाना है। नीचे दिए गए भागों को सही स्थान पर दर्शाएँ।]
मानव मुखगुहा के प्रमुख भाग:
1. ओष्ठ (होंठ)
2. दंतपंक्ति (दाँत)
3. जिह्वा (जीभ)
4. तालु
5. लार ग्रंथियों की नलिकाएँ
6. ग्रसनी (गले) का प्रवेश द्वार
कृपया अपनी नोटबुक में इन सभी भागों को दर्शाते हुए एक साफ-सुथरा चित्र बनाएँ और प्रत्येक भाग का नाम लिखें।10. उत्सर्जन क्या है? मानव उत्सर्जन तंत्र के विभिन्न अंगों के नाम लिखिए।
उत्सर्जन वह जैविक प्रक्रिया है जिसमें जीव के शरीर से चयापचय (मेटाबोलिज्म) के दौरान उत्पन्न हानिकारक एवं विषैले पदार्थों (जैसे यूरिया, अमोनिया, यूरिक अम्ल) को बाहर निकाला जाता है।
मानव उत्सर्जन तंत्र के प्रमुख अंग:- वृक्क (किडनी) - (दो)
- मूत्रवाहिनी (यूरेटर) - (दो)
- मूत्राशय (ब्लैडर)
- मूत्रमार्ग (यूरेथ्रा)
नोट: त्वचा (पसीने के माध्यम से), फेफड़े (CO₂ के रूप में) और यकृत भी उत्सर्जन में सहायक भूमिका निभाते हैं।11. मानव हृदय का स्वच्छ नामांकित चित्र बनाइए।
[छात्रों के लिए निर्देश: यहाँ मानव हृदय का स्वच्छ नामांकित चित्र बनाना है। नीचे दिए गए भागों को सही स्थान पर दर्शाएँ।]
मानव हृदय के प्रमुख भाग:
1. बायाँ अलिंद
2. बायाँ निलय
3. दायाँ अलिंद
4. दायाँ निलय
5. महाधमनी (एऑर्टा)
6. फुफ्फुसीय धमनी
7. फुफ्फुसीय शिरा
8. महाशिरा (वेना केवा)
9. त्रिकपर्दी वाल्व
10. द्विकपर्दी वाल्व
कृपया अपनी नोटबुक में हृदय का बाहरी तथा आंतरिक संरचना दर्शाते हुए एक स्पष्ट चित्र बनाएँ और सभी भागों को नामांकित करें।12. वृक्काणु (नेफ्रॉन) की संरचना एवं कार्यविधि का वर्णन कीजिए।
वृक्काणु (नेफ्रॉन) वृक्क की कार्यात्मक एवं संरचनात्मक इकाई है। प्रत्येक वृक्क में लगभग दस लाख नेफ्रॉन होते हैं।
संरचना: एक नेफ्रॉन के मुख्य भाग हैं:- बोमन संपुट: एक कप के आकार की संरचना जिसमें केशिका गुच्छ (ग्लोमेरुलस) होता है।
- प्रवाही नलिका: यह तीन भागों में बँटी होती है - समीपस्थ संवलित नलिका, हेनले का लूप तथा दूरस्थ संवलित नलिका।
- संग्राहक नलिका: यह मूत्र को वृक्क की पेल्विस में एकत्र करती है।
- अतिसूक्ष्म निस्यंदन: ग्लोमेरुलस में रक्त का दबाव उत्पन्न होता है, जिससे प्लाज्मा का द्रव (जल, यूरिया, ग्लूकोज, लवण) बोमन संपुट में छन जाता है।
- पुनःअवशोषण: प्रवाही नलिका से उपयोगी पदार्थ जैसे ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, जल और आवश्यक लवण रक्त में वापस अवशोषित कर लिए जाते हैं।
- स्रावण: कुछ अपशिष्ट पदार्थ सीधे नलिका में स्रावित किए जाते हैं।
- इस प्रक्रिया के बाद शेष द्रव ही मूत्र के रूप में संग्राहक नलिका द्वारा एकत्र किया जाता है।
13. पाचन के बाद अवशोषण क्या है?
पाचन की प्रक्रिया के बाद, भोजन के सरल अणु (जैसे ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, वसीय अम्ल) आहारनाल की दीवारों से गुजरकर रक्त या लसीका में पहुँचते हैं। इस प्रक्रिया को अवशोषण कहते हैं। यह प्रक्रिया मुख्य रूप से छोटी आंत में होती है, जिसकी आंतरिक सतह अंगुली जैसे असंख्य प्रवर्धों (विलाई) से ढकी होती है जो अवशोषण क्षेत्रफल को बहुत बढ़ा देती है।14. मनुष्य में दोहरा परिसंचरण का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
मनुष्य में दोहरा परिसंचरण का तात्पर्य है कि रक्त हृदय के माध्यम से एक पूर्ण चक्र में दो बार प्रवाहित होता है। इसमें दो अलग परिपथ शामिल हैं:- फुफ्फुसीय परिसंचरण: दायें निलय से डीऑक्सीजनेटेड रक्त फेफड़ों की धमनियों द्वारा फेफड़ों तक जाता है। फेफड़ों में ऑक्सीजन लेकर यह रक्त फेफड़ों की शिराओं द्वारा बाएं अलिंद में वापस आता है।
- सिस्टमिक परिसंचरण: बाएं निलय से ऑक्सीजन युक्त रक्त महाधमनी द्वारा शरीर के सभी अंगों तक पहुँचता है। अंगों से डीऑक्सीजनेटेड रक्त महाशिराओं द्वारा दायें अलिंद में वापस आता है।
15. मनुष्य के आहारनाल के विभिन्न भागों के नाम लिखिए।
मनुष्य के आहारनाल (पाचन तंत्र) के प्रमुख भाग निम्नलिखित हैं:- मुखगुहा (मुँह)
- ग्रसनी
- ग्रासनली (घेघा)
- आमाशय (पेट)
- छोटी आंत (ग्रहणी, मध्यांत्र, क्षुद्रांत्र)
- बड़ी आंत (अंधांत्र, कोलन, मलाशय)
- गुदा
सहायक ग्रंथियाँ: लार ग्रंथियाँ, यकृत (जिगर) और अग्न्याशय (पैंक्रियास) भी पाचन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।16. हमारे शरीर में वसा का पाचन कैसे होता है? इस प्रक्रम में यकृत की भूमिका का वर्णन कीजिए।
हमारे शरीर में वसा का पाचन निम्न चरणों में होता है:- मुखगुहा में वसा का कोई पाचन नहीं होता।
- आमाशय में गैस्ट्रिक लाइपेज एंजाइम थोड़ी मात्रा में वसा का पाचन शुरू करता है।
- मुख्य पाचन छोटी आंत में होता है। यकृत द्वारा स्रावित पित्त रस वसा के बड़े गोलिकाओं को छोटे-छोटे गोलिकाओं में तोड़ देता है (इमल्सीफिकेशन)। इससे एंजाइमों के लिए क्रिया सतह बढ़ जाती है।
- अग्न्याशय से आए लाइपेज एंजाइम इन छोटे वसा गोलिकाओं पर क्रिया करके उन्हें वसीय अम्ल और ग्लिसरॉल में बदल देते हैं।
- यकृत पित्त रस का निर्माण करता है जो वसा के इमल्सीफिकेशन के लिए आवश्यक है।
- पित्त रस क्षारीय होता है, जो आमाशय से आए अम्लीय काइम को उदासीन करके अग्न्याशय एवं आंत के एंजाइमों के कार्य के लिए उपयुक्त वातावरण बनाता है।
- यकृत अवशोषित पोषक तत्वों के चयापचय में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
प्रश्न 1. मनुष्य में वृक्क एक तंत्र का भाग है जो सम्बन्धित है-
(a) पोषण
(b) श्वसन
(c) उत्सर्जन
(d) परिवहनउत्तर: (c) उत्सर्जन मनुष्य के वृक्क (गुर्दे) उत्सर्जन तंत्र का मुख्य अंग हैं। इनका प्रमुख कार्य रक्त से अपशिष्ट पदार्थों, जैसे यूरिया और अतिरिक्त लवणों व पानी को छानकर मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकालना है। यह प्रक्रिया शरीर के आंतरिक वातावरण को संतुलित रखने में सहायता करती है।
प्रश्न 2. पादप में जाइलम उत्तरदायी है-
(a) जल का वहन
(b) भोजन का वहन
(c) अमीनो अम्ल का वहन
(d) ऑक्सीजन का वहनउत्तर: (a) जल का वहन पादपों में जाइलम एक संवहनी ऊतक है जो मुख्य रूप से जड़ों द्वारा अवशोषित जल एवं खनिज लवणों का वहन पत्तियों तक करता है। यह ऊतक मृत कोशिकाओं से बना होता है और जल के परिवहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
प्रश्न 3. स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक है-
(a) कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल
(b) क्लोरोफिल
(c) सूर्य का प्रकाश
(d) उपरोक्त सभीउत्तर: (d) उपरोक्त सभी स्वपोषी पोषण (प्रकाश संश्लेषण) के लिए तीनों कारक अनिवार्य हैं: कार्बन डाइऑक्साइड और जल कच्चे पदार्थ हैं, क्लोरोफिल प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित करता है, और सूर्य का प्रकाश ऊर्जा का स्रोत है। इन सबके संयोग से पौधे अपना भोजन स्वयं बनाते हैं।
प्रश्न 4. पायरुवेट के विखंडन से यह कार्बन डाइऑक्साइड, जल तथा ऊर्जा देता है और यह क्रिया होती है-
(a) कोशिकाद्रव्य
(b) माइटोकॉन्ड्रिया
(c) हरित लवक
(d) केन्द्रकउत्तर: (b) माइटोकॉन्ड्रिया पायरुवेट का पूर्ण विखंडन कोशिका के माइटोकॉन्ड्रिया नामक कोशिकांग में होता है। यहाँ ऑक्सीजन की उपस्थिति में पायरुवेट कार्बन डाइऑक्साइड, जल और प्रचुर मात्रा में ऊर्जा (ATP) में परिवर्तित हो जाता है। इस प्रक्रिया को कोशिकीय श्वसन कहते हैं।
प्रश्न 5. हमारे शरीर में वसा का पाचन कैसे होता है? यह प्रक्रम कहाँ होता है?
उत्तर: हमारे शरीर में वसा का पाचन मुख्य रूप से छोटी आंत में होता है। इसकी प्रक्रिया निम्नलिखित चरणों में पूरी होती है:
- मुखगुहा: यहाँ लार में वसा को तोड़ने वाला कोई एंजाइम नहीं होता, केवल यांत्रिक पीसन होता है।
- आमाशय (पेट): गैस्ट्रिक लाइपेज एंजाइम थोड़ी मात्रा में वसा का पाचन शुरू करता है, लेकिन यह मुख्य स्थल नहीं है।
- छोटी आंत (मुख्य स्थल): यह वसा पाचन का प्राथमिक स्थान है।
- यकृत से स्रावित पित्त रस छोटी आंत में आता है। पित्त रस में लवण होते हैं जो बड़े वसा के गोलिकाओं को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ देते हैं (इमल्सीफिकेशन)। इससे एंजाइमों के लिए क्रिया का क्षेत्रफल बढ़ जाता है।
- अग्न्याशय (पैंक्रियास) से स्रावित लाइपेज एंजाइम इन छोटे वसा कणों पर क्रिया करके उन्हें वसा अम्ल (फैटी एसिड) और ग्लिसरॉल में विघटित कर देता है।
- इन simpler अणुओं को तब छोटी आंत की दीवारों द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है।
प्रश्न 6. भोजन के पाचन में लार की क्या भूमिका है?
उत्तर: भोजन के पाचन में लार निम्नलिखित महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाती है:
- यांत्रिक भूमिका: लार भोजन को नम और चिकना बनाती है, जिससे उसे चबाने, निगलने और आहारनाल में आसानी से खिसकाने में मदद मिलती है।
- रासायनिक भूमिका: लार में उपस्थित एंजाइम टायलिन (सैलिवरी एमाइलेज) स्टार्च (जटिल कार्बोहाइड्रेट) का आंशिक पाचन शुरू कर देता है। यह इसे एक सरल शर्करा, माल्टोज में बदलना प्रारंभ कर देता है।
- सफाई एवं सुरक्षा: लार मुंह को साफ रखती है, हानिकारक बैक्टीरिया को धोती है और मुंह के pH को नियंत्रित करने में मदद करती है। इसमें कुछ एंटीबैक्टीरियल गुण भी होते हैं।
प्रश्न 7. स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ कौन-सी हैं और उसके उपोत्पाद क्या हैं?
उत्तर: स्वपोषी पोषण (प्रकाश संश्लेषण) के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ:
- प्रकाश: सूर्य का प्रकाश ऊर्जा का स्रोत है।
- क्लोरोफिल: हरे रंग का वर्णक जो प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित करता है।
- कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂): वायुमंडल से प्राप्त होती है, कार्बन का स्रोत है।
- जल (H₂O): मिट्टी से जड़ों द्वारा अवशोषित होता है, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का स्रोत है।
प्रक्रिया के उपोत्पाद (By-products):
प्रकाश संश्लेषण की मुख्य रासायनिक अभिक्रिया है:
6CO₂ + 6H₂O + प्रकाश ऊर्जा → C₆H₁₂O₆ (ग्लूकोज) + 6O₂
इस अभिक्रिया से निम्नलिखित उपोत्पाद प्राप्त होते हैं:- ऑक्सीजन गैस (O₂): यह प्रक्रिया का प्रमुख उपोत्पाद है, जो जल के विघटन से मुक्त होती है और वातावरण में छोड़ी जाती है।
- जल वाष्प: कुछ मात्रा में जल वाष्प भी उत्सर्जित हो सकती है।
प्रश्न 8. वायवीय तथा अवायवीय श्वसन में क्या अंतर हैं? कुछ जीवों के नाम लिखिए जिनमें अवायवीय श्वसन होता है।
उत्तर: वायवीय और अवायवीय श्वसन में अंतर:
आधार वायवीय श्वसन अवायवीय श्वसन ऑक्सीजन की आवश्यकता ऑक्सीजन की उपस्थिति आवश्यक है। ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है। स्थान कोशिका का माइटोकॉन्ड्रिया। कोशिका का कोशिकाद्रव्य (साइटोप्लाज्म)। ग्लूकोज का पूर्ण विखंडन होता है। नहीं होता, आंशिक विखंडन होता है। उत्पाद कार्बन डाइऑक्साइड, जल और प्रचुर ऊर्जा (ATP)। यीस्ट में: एथिल अल्कोहल + CO₂ + कम ऊर्जा।
मांसपेशियों में: लैक्टिक अम्ल + कम ऊर्जा।ऊर्जा मुक्ति अधिक मात्रा में (36-38 ATP अणु प्रति ग्लूकोज)। बहुत कम मात्रा में (2 ATP अणु प्रति ग्लूकोज)। अवायवीय श्वसन करने वाले कुछ जीव:
- यीस्ट (खमीर) – किण्वन द्वारा एथेनॉल उत्पन्न करता है।
- कुछ जीवाणु – जैसे लैक्टोबैसिलस (दही बनाने वाले), क्लॉस्ट्रीडियम।
- परजीवी कृमि – जैसे टेपवर्म, जो आंतों में ऑक्सीजन की कमी में रहते हैं।
- मानव की तनावग्रस्त मांसपेशियाँ – जब ऑक्सीजन की आपूर्ति कम हो जाती है तो लैक्टिक अम्ल बनाती हैं।
प्रश्न 9. गैसों के अधिकतम विनिमय के लिए कूपिकाएँ किस प्रकार अभिकल्पित हैं?
उत्तर: फेफड़ों में स्थित कूपिकाएँ (एल्वियोली) गैसों के अधिकतम विनिमय के लिए निम्नलिखित विशेषताओं के कारण अत्यंत कुशलता से अभिकल्पित हैं:
- विशाल पृष्ठीय क्षेत्रफल: करोड़ों कूपिकाएँ होती हैं, जो मिलकर एक टेनिस कोर्ट (लगभग 70-100 वर्ग मीटर) के बराबर सतह क्षेत्र प्रदान करती हैं, जिससे गैस विनिमय का क्षेत्र अधिकतम हो जाता है।
- पतली भित्ति: कूपिकाओं की भित्ति केवल एक कोशिका मोटी होती है। इसी प्रकार, उनके चारों ओर केशिकाओं की भित्ति भी बहुत पतली होती है। यह पतली झिल्ली गैसों (ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड) के विसरण को तेज और आसान बनाती है।
- रुधिर आपूर्ति का विस्तृत जाल: प्रत्येक कूपिका रुधिर केशिकाओं के घने जाल से घिरी रहती है, जो रक्त और वायु के बीच निरंतर गैस विनिमय सुनिश्चित करती है।
- नम सतह: कूपिकाओं की भीतरी सतह नम होती है, जो गैसों के विसरण के लिए आवश्यक है क्योंकि गैसें नम झिल्ली में आसानी से घुल जाती हैं।
प्रश्न 10. हमारे शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी के क्या परिणाम हो सकते हैं?
उत्तर: हीमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं में पाया जाने वाला लौहयुक्त प्रोटीन है जो फेफड़ों से ऑक्सीजन को शरीर के सभी ऊतकों तक पहुँचाता है। इसकी कमी (एनीमिया या रक्ताल्पता) के गंभीर परिणाम हो सकते हैं:
- ऑक्सीजन की कमी (हाइपोक्सिया): शरीर के ऊतकों और अंगों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती, क्योंकि हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन का वाहक है।
- थकान और कमजोरी: ऊर्जा उत्पादन के लिए ऑक्सीजन आवश्यक है, इसलिए शरीर सुस्त और थका हुआ महसूस करता है।
- सांस फूलना: हल्का काम करने या चलने पर भी सांस फूलने लगती है, क्योंकि शरीर अधिक ऑक्सीजन प्राप्त करने के लिए तेज सांस लेने का प्रयास करता है।
- त्वचा का पीलापन: हीमोग्लोबिन की कमी से त्वचा और आँखों में पीलापन (पीलिया जैसा) आ सकता है।
- हृदय पर अतिरिक्त दबाव: ऊतकों तक पर्याप्त ऑक्सीजन पहुँचाने के लिए हृदय को तेजी से और अधिक मेहनत से धड़कना पड़ता है, जिससे हृदय रोग का खतरा बढ़ सकता है।
- रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी: शरीर की संक्रमणों से लड़ने की क्षमता कमजोर हो जाती है।
- बच्चों में विकास अवरुद्ध: बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है।
प्रश्न 11. मनुष्य में दोहरा परिसंचरण की व्याख्या कीजिए। यह क्यों आवश्यक है?
उत्तर: दोहरा परिसंचरण: मनुष्य में रक्त हृदय से होकर प्रति चक्र में दो बार गुजरता है, इसलिए इसे दोहरा परिसंचरण कहते हैं। इसमें दो अलग-अलग परिपथ होते हैं:
- फुफ्फुसीय परिसंचरण (Pulmonary Circulation): इस परिपथ में दाएँ निलय से अशुद्ध रक्त फेफड़ों की धमनी द्वारा फेफड़ों में जाता है। वहाँ यह ऑक्सीजन लेकर और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़कर शुद्ध हो जाता है। यह शुद्ध रक्त फेफड़ों की शिराओं द्वारा बाएँ आलिंद में वापस आता है।
- सिस्टमिक परिसंचरण (Systemic Circulation): इस परिपथ में बाएँ निलय से शुद्ध रक्त महाधमनी द्वारा शरीर के सभी अंगों व ऊतकों में पहुँचाया जाता है। ऊतकों से अशुद्ध रक्त शिराओं द्वारा एकत्र होकर दाएँ आलिंद में वापस आता है।
दोहरा परिसंचरण क्यों आवश्यक है?
- ऑक्सीजन युक्त और विहीन रक्त का पृथक्करण: यह प्रणाली ऑक्सीजन युक्त (शुद्ध) और ऑक्सीजन रहित (अशुद्ध) रक्त को मिलने से रोकती है, जिससे रक्त की दक्षता बनी रहती है।
- उच्च दबाव पर रक्त का संचार: फेफड़ों से लौटने के बाद रक्त को पुनः हृदय (बाएँ निलय) से पंप किया जाता है। इससे शरीर के विभिन्न अंगों तक रक्त को उच्च दबाव के साथ पहुँचाया जा सकता है, जिससे पोषक तत्व और ऑक्सीजन की आपूर्ति तेज और कारगर होती है।
- शारीरिक सक्रियता के अनुकूल: यह प्रणाली उच्च ऊर्जा आवश्यकता वाले गर्म रक्तधारी प्राणियों (जैसे मनुष्य) के लिए आवश्यक है, क्योंकि यह ऊतकों को लगातार अधिक ऑक्सीजन पहुँचाने का कार्य करती है।
प्रश्न 12. जाइलम तथा फ्लोएम में पदार्थों के वहन में क्या अंतर है?
उत्तर: पादपों में जाइलम और फ्लोएम संवहनी ऊतक हैं जो पदार्थों के परिवहन का कार्य करते हैं, लेकिन दोनों के कार्य और वहन के पदार्थों में मूलभूत अंतर है:
आधार जाइलम (Xylem) फ्लोएम (Phloem) वहित पदार्थ जल और घुले हुए खनिज लवण। पत्तियों में निर्मित भोजन (सुक्रोज, अमीनो अम्ल आदि)। दिशा एकदिशीय वहन – केवल जड़ से पत्तियों की ओर (ऊपर की ओर)। द्विदिशीय वहन – पत्तियों से जड़ तक और जड़ से नई कलियों/फलों तक (ऊपर-नीचे दोनों)। वहन का साधन मुख्यतः वाष्पोत्सर्जन खिंचाव (Transpirational Pull) और जड़ दाब। सक्रिय वहन – ATP ऊर्जा का उपयोग करके। इसमें स्रोत (Source) से सिंक (Sink) की ओर भोजन का परिवहन होता है। ऊतक की संरचना मुख्यतः मृत कोशिकाओं (ट्रैकीड्स और वाहिनिकाओं) से बना होता है। जीवित कोशिकाओं (चालनी नलिकाओं और सहचर कोशिकाओं) से बना होता है। प्रश्न 13. उत्सर्जी उत्पाद से छुटकारा पाने के लिए पादप किन विधियों का उपयोग करते हैं?
उत्तर: पादपों में जंतुओं जैसा विशिष्ट उत्सर्जन तंत्र नहीं होता। वे निम्नलिखित विधियों से अपने उत्सर्जी उत्पादों से छुटकारा पाते हैं:
- वाष्पोत्सर्जन द्वारा: अतिरिक्त जल को पत्तियों के रंध्रों (स्टोमेटा) से जलवाष्प के रूप में उत्सर्जित कर देते हैं।
- संचयन द्वारा: कई अपशिष्ट पदार्थों को हानिरहित रूप में परिवर्तित करके पौधे के विभिन्न भागों में जमा कर लेते हैं।
- पत्तियों में: कुछ अपशिष्ट पत्तियों में जमा हो जाते हैं, जो पत्तियों के झड़ने के साथ ही पौधे से अलग हो जाते हैं।
- बीजों और फलों में: कुछ रासायनिक पदार्थ (जैसे टैनिन, रेजिन, गोंद) बीजों या फलों में संग्रहित हो जाते हैं।
- तने की छाल में: कुछ पेड़ों में अपशिष्ट छाल में जमा होते हैं, जो छाल के उतरने पर निकल जाते हैं।
- मृदा में स्रावित करके: कुछ पौधे अपने अपशिष्ट पदार्थ जड़ों द्वारा आसपास की मिट्टी में स्रावित कर देते हैं।
- पुनः उपयोग द्वारा: पौधे कुछ अपशिष्ट पदार्थों का पुनः उपयोग कर लेते हैं। उदाहरण के लिए, प्रकाश संश्लेषण के दौरान उत्पन्न ऑक्सीजन को श्वसन के लिए उपयोग कर सकते हैं, और श्वसन से निकली कार्बन डाइऑक्साइड को प्रकाश संश्लेषण के लिए।
प्रश्न 1. मनुष्य में वृक्क एक तंत्र का भाग है जो सम्बन्धित है-
उत्तर: (ग) उत्सर्जन के साथ
मनुष्य में वृक्क (गुर्दे) उत्सर्जन तंत्र का मुख्य अंग हैं। यह तंत्र शरीर से हानिकारक नाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थों (जैसे यूरिया, यूरिक अम्ल) को रक्त से छानकर मूत्र के रूप में बाहर निकालने का कार्य करता है। इस प्रकार यह शरीर के तरल पदार्थों का संतुलन और रक्त की शुद्धि करता है।
प्रश्न 2. पादप में जाइलम उत्तरदायी है-
उत्तर: (क) जल का वहन
पादपों में जाइलम एक संवहनी ऊतक है जो मुख्य रूप से जड़ों द्वारा अवशोषित जल एवं खनिज लवणों को पत्तियों तक पहुँचाने का कार्य करता है। यह वहन ऊपर की ओर होता है। जाइलम की नलिकाएँ मृत कोशिकाओं की बनी होती हैं जो एक सतत मार्ग बनाती हैं।
प्रश्न 3. स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक है-
उत्तर: (ख) क्लोरोफिल
स्वपोषी पोषण वह प्रक्रिया है जिसमें हरे पादप अपना भोजन स्वयं सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में तैयार करते हैं। इस प्रक्रिया (प्रकाश संश्लेषण) के लिए क्लोरोफिल (हरित लवक) अत्यंत आवश्यक है क्योंकि यह वर्णक सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा को ग्रहण करके रासायनिक ऊर्जा में बदलता है, जिसका उपयोग कार्बन डाइऑक्साइड और जल से कार्बोहाइड्रेट बनाने में होता है।
प्रश्न 4. पायरुवेट के विखंडन से यह कोशिका के किस भाग में होता है?
उत्तर: (क) कोशिका द्रव्य
श्वसन की प्रक्रिया में ग्लूकोज का आंशिक विखंडन कोशिका द्रव्य में होकर पायरुवेट बनाता है। इसके बाद पायरुवेट का आगे का विखंडन ऑक्सीजन की उपलब्धता पर निर्भर करता है। यदि ऑक्सीजन उपलब्ध है तो यह माइटोकॉन्ड्रिया में पूर्णतः ऑक्सीकृत होकर कार्बन डाइऑक्साइड, जल और अधिक ऊर्जा देता है। यदि ऑक्सीजन नहीं है (अवायवीय श्वसन), तो पायरुवेट का विखंडन कोशिका द्रव्य में ही होकर लैक्टिक अम्ल या एथेनॉल जैसे पदार्थ बनाता है।
प्रश्न 5. हमारे शरीर में वसा का पाचन कैसे होता है? यह प्रक्रिया कहाँ होती है?
उत्तर:
हमारे शरीर में वसा का पाचन निम्नलिखित चरणों में होता है:
- मुख: यहाँ केवल वसा का यांत्रिक पीसन होता है, कोई रासायनिक पाचन नहीं।
- छोटी आंत: यह वसा पाचन का मुख्य स्थल है। यकृत से स्रावित पित्त रस वसा के बड़े ग्लोब्यूल्स को छोटे-छोटे ग्लोब्यूल्स में तोड़ देता है (इमल्सीफिकेशन), जिससे उनका सतही क्षेत्रफल बढ़ जाता है।
- अग्न्याशय से स्रावित लाइपेज एंजाइम इन छोटे वसा कणों पर क्रिया करके उन्हें फैटी अम्ल और ग्लिसरॉल में विघटित कर देता है।
- इन सरल अणुओं को छोटी आंत की दीवार द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है।
प्रश्न 6. भोजन के पाचन में लार की क्या भूमिका है?
उत्तर:
लार मुख में स्थित लार ग्रंथियों से स्रावित होती है और भोजन के पाचन में निम्नलिखित महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है:
- कार्बोहाइड्रेट पाचन का प्रारंभ: लार में उपस्थित एंजाइम टायलिन (सैलाइवरी एमाइलेज) स्टार्च (एक जटिल कार्बोहाइड्रेट) को माल्टोज नामक सरल शर्करा में बदलना शुरू कर देता है।
- निगलने में सहायता: लार भोजन को नम और चिकना बनाती है, जिससे उसे चबाना और निगलना आसान हो जाता है।
- सफाई एवं सुरक्षा: यह मुख को साफ रखती है और लाइसोजाइम एंजाइम के कारण हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करने में मदद करती है।
- स्वाद में सहायक: लार भोजन के घुलनशील घटकों को घोलती है, जिससे स्वाद कलिकाएँ उसका स्वाद ले पाती हैं।
प्रश्न 7. स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ कौन-सी हैं और उसके उपोत्पाद क्या हैं?
उत्तर:
स्वपोषी पोषण (प्रकाश संश्लेषण) के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ:
- प्रकाश: सूर्य का प्रकाश ऊर्जा का स्रोत है।
- क्लोरोफिल: हरे पादपों में उपस्थित यह हरा वर्णक प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित करता है।
- कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂): वायुमंडल से प्राप्त होती है, कार्बन का स्रोत है।
- जल (H₂O): मिट्टी से जड़ों द्वारा अवशोषित होता है, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का स्रोत है।
- उपयुक्त तापमान: एंजाइमों की क्रिया के लिए अनुकूल ताप (आमतौर पर 20-35°C)।
प्रक्रिया के उपोत्पाद (By-products):
प्रकाश संश्लेषण की मुख्य रासायनिक अभिक्रिया है:
6CO₂ + 12H₂O → C₆H₁₂O₆ (ग्लूकोज) + 6O₂ + 6H₂Oइस अभिक्रिया का प्राथमिक उपोत्पाद ऑक्सीजन गैस (O₂) है, जो वायुमंडल में मुक्त होती है और जीवों के श्वसन के लिए आवश्यक है। कुछ जल भी उपोत्पाद के रूप में निकलता है।
प्रश्न 8. वायवीय एवं अवायवीय श्वसन में क्या अंतर हैं? कुछ जीवों के नाम लिखिए जिनमें अवायवीय श्वसन होता है।
उत्तर:
आधार वायवीय श्वसन अवायवीय श्वसन ऑक्सीजन की आवश्यकता ऑक्सीजन की उपस्थिति आवश्यक है। ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है। स्थान कोशिका द्रव्य और माइटोकॉन्ड्रिया में। केवल कोशिका द्रव्य में। अंतिम उत्पाद कार्बन डाइऑक्साइड, जल और अधिक ऊर्जा (ATP)। पौधों/यीस्ट में एथेनॉल + CO₂; जंतुओं की मांसपेशियों में लैक्टिक अम्ल। कम ऊर्जा मिलती है। ऊर्जा मुक्ति प्रति ग्लूकोज अणु अधिक ऊर्जा (लगभग 36-38 ATP) मुक्त होती है। प्रति ग्लूकोज अणु बहुत कम ऊर्जा (केवल 2 ATP) मुक्त होती है। पूर्णता ग्लूकोज का पूर्ण ऑक्सीकरण होता है। ग्लूकोज का अपूर्ण ऑक्सीकरण होता है। अवायवीय श्वसन करने वाले कुछ जीव:
- यीस्ट (खमीर) – इसमें किण्वन द्वारा एथेनॉल बनता है।
- कुछ जीवाणु (जैसे लैक्टोबैसिलस, मीथेनोजन्स)।
- परजीवी कृमि (जैसे टेपवर्म) जो आंत में रहते हैं।
- मनुष्य की तीव्र गति से सिकुड़ती मांसपेशियों में ऑक्सीजन की कमी होने पर अस्थायी रूप से लैक्टिक अम्ल बनता है।
प्रश्न 9. गैसों के अधिकतम विनिमय के लिए कूपिकाएँ किस प्रकार अभिकल्पित हैं?
उत्तर:
फेफड़ों में स्थित कूपिकाएँ (एल्वियोली) गैस विनिमय के लिए निम्नलिखित विशेषताओं के कारण अत्यधिक कुशल हैं:
- विशाल पृष्ठीय क्षेत्रफल: लाखों कूपिकाएँ होने के कारण इनका संयुक्त पृष्ठीय क्षेत्रफल बहुत अधिक (लगभग 80 वर्ग मीटर) होता है, जिससे गैस विनिमय की दर बढ़ जाती है।
- पतली भित्ति: कूपिकाओं की भित्ति केवल एक कोशिका मोटी होती है, जिससे ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का विसरण आसानी से हो जाता है।
- रुधिर वाहिकाओं का जाल: प्रत्येक कूपिका रक्त केशिकाओं के सघन जाल से घिरी रहती है, जिससे गैसों का आदान-प्रदान सीधे रक्त से हो सके।
- आर्द्र सतह: कूपिकाओं की भीतरी सतह नम होती है, जिससे गैसें घुलकर आसानी से विसरित हो सकें।
- विशेष कोशिकाएँ: टाइप-II कोशिकाएँ सर्फैक्टेंट नामक पदार्थ स्रावित करती हैं जो कूपिकाओं के फटने या चिपकने से बचाता है और उन्हें स्थिर रखता है।
प्रश्न 10. हमारे शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी के क्या प्रभाव पड़ सकते हैं?
उत्तर:
हीमोग्लोबिन लाल रक्त कणिकाओं में उपस्थित लौहयुक्त प्रोटीन है जो फेफड़ों से ऑक्सीजन को शरीर के सभी ऊतकों तक पहुँचाता है। इसकी कमी (एनीमिया या रक्ताल्पता) के निम्नलिखित हानिकारक प्रभाव पड़ सकते हैं:
- ऑक्सीजन की कमी (हाइपोक्सिया): शरीर के ऊतकों और अंगों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती, जिससे उनकी कार्यक्षमता घट जाती है।
- थकान एवं कमजोरी: ऊर्जा उत्पादन कम होने के कारण व्यक्ति हमेशा थका हुआ और कमजोर महसूस करता है।
- सांस फूलना: थोड़ा सा शारीरिक परिश्रम करने पर ही सांस फूलने लगती है क्योंकि शरीर अधिक ऑक्सीजन की पूर्ति के लिए तेजी से सांस लेने लगता है।
- त्वचा का पीलापन: रक्त में लालिमा कम होने के कारण त्वचा और आँखों के नीचे पीलापन दिखाई देने लगता है।
- चक्कर आना एवं सिरदर्द: मस्तिष्क को पर्याप्त ऑक्सीजन न मिलने के कारण चक्कर आना, सिरदर्द और एकाग्रता में कमी आती है।
- हृदय पर अतिरिक्त दबाव: ऑक्सीजन की मांग पूरी करने के लिए हृदय को तेजी से धड़कना पड़ता है, जिससे लंबे समय में हृदय रोग हो सकता है।
- रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी: शरीर की संक्रमण से लड़ने की क्षमता कमजोर हो जाती है।
प्रश्न 11. मनुष्य में दोहरा परिसंचरण क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
मनुष्य में दोहरा परिसंचरण (डबल सर्कुलेशन) का तात्पर्य है कि रक्त हृदय से होकर प्रत्येक चक्र में दो बार गुजरता है – एक बार फेफड़ों के चक्र (पल्मोनरी) में और एक बार शरीर के चक्र (सिस्टेमिक) में। यह व्यवस्था निम्न कारणों से अत्यंत महत्वपूर्ण है:
- ऑक्सीजन युक्त और विहीन रक्त का पृथक्करण: हृदय के चार कक्ष (दो अलिंद और दो निलय) ऑक्सीजन युक्त रक्त और ऑक्सीजन रहित रक्त को मिलने से रोकते हैं, जिससे शुद्ध रक्त ही शरीर के विभिन्न अंगों को आपूर्ति होती है।
- उच्च दबाव पर रक्त का प्रवाह: रक्त को पूरे शरीर में पहुँचाने के लिए उच्च दबाव की आवश्यकता होती है। फेफड़ों के चक्र के बाद रक्त पुनः हृदय (बाएँ निलय) में लौटता है, जो इसे एक बार फिर पंप करके शरीर में भेजता है। इससे शरीर के अंगों तक रक्त पर्याप्त दबाव के साथ पहुँच पाता है।
- ऊर्जा दक्षता में वृद्धि: यदि रक्त सीधे फेफड़ों से शरीर में जाता तो उसका दबाव कम हो जाता और अंगों तक रक्त पहुँचाने में कठिनाई होती। दोहरा परिसंचरण इस समस्या को दूर करता है और ऊर्जा की बचत करता है।
- शरीर की उच्च चयापचय दर को बनाए रखना: गर्म रक्त वाले स्तनधारियों और पक्षियों को शरीर का ताप बनाए रखने और उच्च स्तरीय गतिविधियों के लिए लगातार अधिक ऑक्सीजन की आपूर्ति चाहिए। दोहरा परिसंचरण इस आवश्यकता को कुशलतापूर्वक पूरा करता है।
प्रश्न 12. जाइलम तथा फ्लोएम में पदार्थों के वहन में क्या अंतर है?
उत्तर:
आधार जाइलम (Xylem) फ्लोएम (Phloem) वहित पदार्थ जल और घुले हुए खनिज लवण। पत्तियों में तैयार भोजन (सुक्रोज, अमीनो अम्ल आदि)। वहन की दिशा सदैव एकदिशीय – जड़ों से पत्तियों की ओर (ऊपर की ओर)। द्विदिशीय – पत्तियों से भोजन का वहन जड़ों, फलों, फूलों, वृद्धि वाले भागों आदि की ओर हो सकता है। वहन का साधन मुख्यतः वाष्पोत्सर्जन खिंचाव (Transpiration Pull), जड़ दाब और केशिकत्व। स्रोत-श्रोत सिद्धांत (Source-Sink Theory) के अनुसार सक्रिय वहन। ऊर्जा की आवश्यकता निष्क्रिय प्रक्रिया, ऊर्जा की आवश्यकता नहीं। सक्रिय प्रक्रिया, ATP ऊर्जा की आवश्यकता होती है। ऊतक की कोशिकाएँ मुख्यतः मृत कोशिकाएँ (ट्रैकीड्स और वाहिनिकाएँ)। td>जीवित कोशिकाएँ (चालनी नलिकाएँ और सहचर कोशिकाएँ)।प्रश्न 13. फुफ्फुस में कूपिकाओं की तथा वृक्क में वृक्काणु (नेफ्रॉन) की रचना तथा क्रिया-विधि की तुलना कीजिए।
उत्तर:
तुलना का बिंदु फेफड़ों की कूपिका (Alveolus) वृक्क का वृक्काणु (Nephron) संरचना गुब्बारेनुमा, पतली भित्ति वाली थैली जो रक्त केशिकाओं के जाल से घिरी रहती है। लंबी, कुंडलित नलिका जिसके मुख्य भाग हैं – बोमन संपुट, प्रोक्सिमल कुंडलित नलिका, हेनले का लूप, डिस्टल कुंडलित नलिका और संग्राहक नलिका। मुख्य कार्य गैसों का विनिमय – रक्त से CO₂ निकालना और O₂ लेना। रक्त का छानना और मूत्र निर्माण – अपशिष्ट पदार्थों को हटाना और जल-लवण संतुलन बनाए रखना। कार्य विधि विसरण (Diffusion) द्वारा। ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड सांद्रता के अंतर के कारण पतली झिल्ली से आर-पार हो जाती हैं। अतिसूक्ष्म निस्यंदन, पुनःअवशोषण और स्रवण द्वारा। बोमन संपुट में रक्त का दबाव से छनना, फिर नलिकाओं में उपयोगी पदार्थों का पुनःअवशोषण और हानिकारक पदार्थों का स्रवण होता है। अंतिम उत्पाद ऑक्सीजन युक्त रक्त और निकलने वाली CO₂ युक्त वायु। मूत्र, जिसमें यूरिया, अतिरिक्त लवण और जल होता है। महत्व श्वसन तंत्र का क्रियात्मक इकाई, शरीर को ऑक्सीजन प्रदान करती है। उत्सर्जन तंत्र की क्रियात्मक इकाई, शरीर को विषैले पदार्थों से मुक्त करती है। प्रश्न 1. मनुष्य में वृक्क एक तंत्र का भाग है जो सम्बन्धित है-
(क) पोषण
(ख) श्वसन
(ग) उत्सर्जन
(घ) परिवहनउत्तर: (ग) उत्सर्जन
वृक्क (गुर्दे) मनुष्य के उत्सर्जन तंत्र का मुख्य अंग हैं। इनका कार्य रक्त से अपशिष्ट पदार्थों, जैसे यूरिया और अतिरिक्त लवण व पानी को छानकर मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकालना है। यह शरीर के तरल पदार्थों का संतुलन बनाए रखने में भी सहायता करते हैं।प्रश्न 2. पादप में जाइलम उत्तरदायी है-
(क) जल का वहन
(ख) भोजन का वहन
(ग) अमीनो अम्ल का वहन
(घ) ऑक्सीजन का वहनउत्तर: (क) जल का वहन
पादपों में जाइलम एक संवहनी ऊतक है जो मुख्य रूप से जड़ों द्वारा अवशोषित जल एवं खनिज लवणों को पत्तियों तथा पौधे के अन्य भागों तक पहुँचाने का कार्य करता है। यह एकतरफा वहन (जड़ से पत्तियों की ओर) करता है।प्रश्न 3. स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक है-
(क) कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल
(ख) क्लोरोफिल
(ग) सूर्य का प्रकाश
(घ) उपर्युक्त सभीउत्तर: (घ) उपर्युक्त सभी
स्वपोषी पोषण (प्रकाश संश्लेषण) वह प्रक्रिया है जिसमें हरे पौधे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में, क्लोरोफिल की सहायता से कार्बन डाइऑक्साइड और जल से अपना भोजन (ग्लूकोज) स्वयं बनाते हैं। इसलिए कार्बन डाइऑक्साइड, जल, क्लोरोफिल और सूर्य का प्रकाश – ये चारों ही इस प्रक्रिया के लिए अनिवार्य हैं।प्रश्न 4. पायरुवेट के विखंडन से यह कार्बन डाइऑक्साइड, जल तथा ऊर्जा देता है और यह क्रिया होती है-
(क) कोशिकाद्रव्य
(ख) माइटोकॉन्ड्रिया
(ग) हरित लवक
(घ) केन्द्रकउत्तर: (ख) माइटोकॉन्ड्रिया
कोशिकीय श्वसन की प्रक्रिया में, ग्लूकोज का आंशिक विखंडन कोशिकाद्रव्य में होकर पायरुवेट बनाता है। इस पायरुवेट का पूर्ण ऑक्सीकरण (विखंडन) माइटोकॉन्ड्रिया नामक कोशिकांग में होता है, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड, जल और अधिक मात्रा में ऊर्जा (ATP) प्राप्त होती है।प्रश्न 5. मनुष्य का वहन तंत्र क्या है?
उत्तर: मनुष्य का वहन तंत्र (परिवहन तंत्र) एक संवहनी तंत्र है जिसमें हृदय, रक्त और रक्त वाहिनियाँ (धमनियाँ, शिराएँ और केशिकाएँ) शामिल हैं। इसका मुख्य कार्य शरीर के सभी कोशिकाओं तक ऑक्सीजन, पोषक तत्व, हॉर्मोन आदि पहुँचाना और वहाँ से कार्बन डाइऑक्साइड व अन्य अपशिष्ट पदार्थों को हटाकर उत्सर्जन अंगों तक ले जाना है। यह तंत्र शरीर के तापमान व pH के संतुलन को बनाए रखने में भी सहायक होता है।
प्रश्न 6. रक्त के थक्का जमने में कौन सा तत्व सहायक होता है?
उत्तर: रक्त के थक्का जमने (Coagulation) की प्रक्रिया में प्लेटलेट्स (Platelets) और प्लाज्मा में उपस्थित प्रोटीन (जैसे फाइब्रिनोजन) मुख्य भूमिका निभाते हैं। चोट लगने पर प्लेटलेट्स घाव स्थान पर इकट्ठे होकर एक अस्थायी प्लग बनाते हैं और साथ ही रासायनिक सिग्नल देते हैं। इन सिग्नलों से फाइब्रिनोजन प्रोटीन, फाइब्रिन के रेशों में बदल जाता है जो एक जाल बनाकर रक्त कोशिकाओं को फँसा लेता है, जिससे एक स्थायी थक्का बन जाता है और रक्तस्राव रुक जाता है।
प्रश्न 7. मनुष्य में दोहरा परिसंचरण क्यों होता है? समझाइए।
उत्तर: मनुष्य में दोहरा परिसंचरण इसलिए होता है क्योंकि उसका हृदय चार कक्षों (दो आलिंद और दो निलय) में विभाजित है। इस प्रणाली में रक्त हृदय से होकर प्रत्येक चक्र में दो बार गुजरता है:
1. फुफ्फुसीय परिसंचरण: दाएँ निलय से अशुद्ध रक्त फेफड़ों तक जाता है, वहाँ ऑक्सीजन लेकर शुद्ध होकर बाएँ आलिंद में वापस आता है।
2. सामान्य परिसंचरण: बाएँ निलय से शुद्ध रक्त महाधमनी द्वारा शरीर के सभी भागों में पहुँचता है, कोशिकाओं को ऑक्सीजन देकर अशुद्ध हो जाता है और फिर दाएँ आलिंद में वापस आता है।
लाभ: इससे ऑक्सीजनित और विऑक्सीजनित रक्त अलग-अलग रहते हैं, जिससे शरीर की कोशिकाओं को अधिक ऑक्सीजन की आपूर्ति हो पाती है, जो उच्च ऊर्जा आवश्यकताओं और शरीर के तापमान को नियंत्रित रखने के लिए जरूरी है।प्रश्न 8. हृदय के कार्य बताइए।
उत्तर: हृदय एक पंप की तरह कार्य करने वाला पेशीय अंग है। इसके प्रमुख कार्य हैं:
1. रक्त का संचार: हृदय के नियमित संकुचन और शिथिलन (धड़कन) से रक्त को पूरे शरीर में पंप किया जाता है।
2. ऑक्सीजनित एवं विऑक्सीजनित रक्त का पृथक्करण: हृदय के बाएँ और दाएँ भाग ऑक्सीजनयुक्त (शुद्ध) और ऑक्सीजनरहित (अशुद्ध) रक्त को मिलने से रोकते हैं, जिससे दक्षता बढ़ती है।
3. रक्तचाप बनाए रखना: हृदय के पंप करने के दबाव से रक्त वाहिनियों में एक निश्चित रक्तचाप बना रहता है, जिससे रक्त सभी अंगों तक आसानी से पहुँच पाता है।
4. पोषक तत्वों और हॉर्मोनों का वितरण: रक्त के माध्यम से पोषक तत्व, हॉर्मोन आदि शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचाए जाते हैं।
5. अपशिष्ट पदार्थों का संग्रह: हृदय रक्त को उत्सर्जन अंगों (जैसे गुर्दे, फेफड़े) तक पहुँचाता है, जहाँ से अपशिष्ट बाहर निकाले जाते हैं।प्रश्न 9. पादपों में गैसों का विनिमय किस प्रकार होता है?
उत्तर: पादपों में गैसों का विनिमय मुख्यतः पर्णरंध्रों (Stomata) और वातरंध्रों (Lenticels) के माध्यम से होता है।
1. पर्णरंध्र: ये पत्तियों की सतह पर, विशेषकर निचली सतह पर पाए जाने वाले सूक्ष्म छिद्र होते हैं। इनके खुलने और बंद होने को रक्षक कोशिकाएँ नियंत्रित करती हैं। प्रकाश संश्लेषण के दौरान पौधे इन्हीं रंध्रों के माध्यम से वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड लेते हैं और ऑक्सीजन बाहर निकालते हैं।
2. श्वसन के दौरान (दिन या रात), पौधे ऑक्सीजन लेते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं, यह विनिमय भी पर्णरंध्रों द्वारा होता है।
3. वातरंध्र: ये पुराने तनों और जड़ों की बाहरी परत पर पाए जाने वाले छोटे छिद्र होते हैं। ये कोशिकाओं के बीच रिक्त स्थान बनाकर गैसों के आदान-प्रदान में सहायता करते हैं, खासकर उन भागों में जहाँ पर्णरंध्र नहीं होते।प्रश्न 10. उत्सर्जन क्या है? इसके प्रमुख उत्सर्जी पदार्थ कौन-कौन से हैं?
उत्तर: उत्सर्जन वह जैविक प्रक्रिया है जिसमें जीवों के शरीर में चयापचय (मेटाबोलिज्म) के दौरान बने हानिकारक या अतिरिक्त अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकाला जाता है।
प्रमुख उत्सर्जी पदार्थ एवं उनके स्रोत:
1. यूरिया: प्रोटीन के उपापचय से यकृत में बनता है। यह मुख्य नाइट्रोजनी अपशिष्ट है जो मूत्र के माध्यम से बाहर निकलता है।
2. अमोनिया: यह अत्यंत विषैला पदार्थ है, जो प्रोटीन के विघटन से बनता है। मछली आदि जलचर इसे सीधे बाहर निकालते हैं, जबकि स्तनधारी इसे यकृत में यूरिया में बदल देते हैं।
3. यूरिक अम्ल: पक्षियों, सरीसृपों और कीटों का मुख्य नाइट्रोजनी अपशिष्ट है। यह श्वेत, अर्ध-ठोस पदार्थ के रूप में निकलता है और जल में कम घुलनशील होता है।
4. कार्बन डाइऑक्साइड: कोशिकीय श्वसन का मुख्य अपशिष्ट, जो फेफड़ों या क्लोम (गिल्स) द्वारा बाहर निकाला जाता है।
5. अतिरिक्त लवण एवं जल: शरीर में लवणों और जल का संतुलन बनाए रखने के लिए इनकी अतिरिक्त मात्रा भी पसीने और मूत्र के रूप में उत्सर्जित होती है।
6. पित्त वर्णक (बिलीरुबिन): यह यकृत में टूटी हुई लाल रक्त कोशिकाओं के अपघटन से बनता है और मल के साथ बाहर निकलता है।1. मनुष्य में वृक्क एक तंत्र का भाग है जो सम्बन्धित है-
A. पोषण B. श्वसन C. उत्सर्जन D. परिवहन उत्तर: C. उत्सर्जन
वृक्क (गुर्दे) मनुष्य के उत्सर्जन तंत्र का मुख्य अंग हैं। इनका कार्य रक्त से विषैले अपशिष्ट पदार्थों, जैसे यूरिया और अतिरिक्त लवणों व पानी को छानकर मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकालना है।2. पादप में जाइलम उत्तरदायी है-
A. जल का वहन B. भोजन का वहन C. अमीनो अम्ल का वहन D. ऑक्सीजन का वहन उत्तर: A. जल का वहन
पादपों में जाइलम एक संवहन ऊतक है जो मुख्य रूप से जड़ों द्वारा अवशोषित जल एवं खनिज लवणों को पत्तियों तक पहुँचाता है। यह वहन ऊपर की ओर (जड़ से पत्ती तक) होता है।3. स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक है-
A. कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल B. क्लोरोफिल C. सूर्य का प्रकाश D. उपरोक्त सभी उत्तर: D. उपरोक्त सभी
स्वपोषी पोषण (प्रकाश संश्लेषण) के लिए तीनों कारक अनिवार्य हैं: कार्बन डाइऑक्साइड और जल कच्चे पदार्थ हैं, क्लोरोफिल प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित करता है, और सूर्य का प्रकाश ऊर्जा का स्रोत है। इन सबके संयोग से पौधे अपना भोजन स्वयं बनाते हैं।4. वायवीय श्वसन के दौरान पैदा होता है-
A. कार्बन डाइऑक्साइड B. जल C. ऊर्जा D. उपरोक्त सभी उत्तर: D. उपरोक्त सभी
वायवीय श्वसन में ऑक्सीजन की उपस्थिति में ग्लूकोज का पूर्ण ऑक्सीकरण होता है। इस प्रक्रिया के अंत में कार्बन डाइऑक्साइड गैस, जल और प्रचुर मात्रा में ऊर्जा (ATP के रूप में) उत्पन्न होती है।5. हमारे शरीर में प्रोटीन का पाचन कहाँ प्रारम्भ होता है?
उत्तर: हमारे शरीर में प्रोटीन का पाचन आमाशय (Stomach) में प्रारम्भ होता है। आमाशय की भित्ति से गैस्ट्रिक रस स्रावित होता है, जिसमें पेप्सिन एंजाइम और हाइड्रोक्लोरिक अम्ल होता है। पेप्सिन एंजाइम प्रोटीन को छोटे पेप्टाइड्स में तोड़ना शुरू कर देता है।
6. पित्त रस का क्या कार्य है?
उत्तर: पित्त रस यकृत (Liver) में बनता है और पित्ताशय (Gall Bladder) में संग्रहित रहता है। इसके दो प्रमुख कार्य हैं:
- वसा का पायसीकरण: यह बड़ी वसा की बूंदों को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ देता है, जिससे वसा पर एंजाइमों की क्रिया का क्षेत्रफल बढ़ जाता है और पाचन आसान हो जाता है।
- अम्लीय माध्यम को क्षारीय बनाना: यह आमाशय से आए अम्लीय भोजन को क्षारीय बनाता है, ताकि आंत में कार्य करने वाले एंजाइम सक्रिय हो सकें।
7. उत्सर्जन क्या है? मानव उत्सर्जन तंत्र के अंगों के नाम लिखिए।
उत्तर:
- उत्सर्जन: शरीर की विभिन्न जैविक क्रियाओं (चयापचय) के दौरान उत्पन्न हानिकारक एवं विषैले नाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थों (जैसे यूरिया, अमोनिया, यूरिक अम्ल) को शरीर से बाहर निकालने की प्रक्रिया को उत्सर्जन कहते हैं।
- मानव उत्सर्जन तंत्र के अंग: मुख्य अंग एक जोड़ी वृक्क (Kidneys) है। अन्य सहायक अंगों में मूत्रवाहिनी (Ureters), मूत्राशय (Urinary Bladder) और मूत्रमार्ग (Urethra) शामिल हैं। त्वचा और फेफड़े भी कुछ उत्सर्जी पदार्थ निकालते हैं।
8. मानव हृदय का नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर: मानव हृदय का एक सरल नामांकित चित्र नीचे दिया गया है।
मानव हृदय (चित्रात्मक प्रतिनिधित्व)
महाशिरा (सुपीरियर वेना केवा) | V +---------------------------+ | दायाँ अलिन्द (Right Atrium) | +------------+----------------+ | त्रिवलनी वाल्व (Tricuspid Valve) V +------------+----------------+ | दायाँ निलय (Right Ventricle)| +------------+----------------+ | अर्धचन्द्राकार वाल्व (Pulmonary Valve) V फुफ्फुसीय धमनी (Pulmonary Artery) --> फेफड़ों की ओर फुफ्फुसीय शिरा (Pulmonary Vein) <-- फेफड़ों से | V +---------------------------+ | बायाँ अलिन्द (Left Atrium) | +------------+----------------+ | द्विवलनी वाल्व (Bicuspid/Mitral Valve) V +------------+----------------+ | बायाँ निलय (Left Ventricle) | +------------+----------------+ | अर्धचन्द्राकार वाल्व (Aortic Valve) V महाधमनी (Aorta) --> सम्पूर्ण शरीर की ओरनोट: यह एक रेखाचित्र का सैद्धांतिक प्रतिनिधित्व है। विस्तृत चित्र के लिए पाठ्यपुस्तक देखें।
9. मनुष्य में दोहरा परिसंचरण से आप क्या समझते हैं? क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
- दोहरा परिसंचरण: मनुष्य में रक्त हृदय से दो बार गुजरकर एक चक्र पूरा करता है, इसे दोहरा परिसंचरण कहते हैं। यह दो सर्किटों से मिलकर बना होता है:
- फुफ्फुसीय परिसंचरण: हृदय (दायाँ निलय) → फेफड़े → हृदय (बायाँ अलिन्द)। इसमें रक्त ऑक्सीजन लेने फेफड़ों में जाता है।
- सिस्टमिक परिसंचरण: हृदय (बायाँ निलय) → सम्पूर्ण शरीर → हृदय (दायाँ अलिन्द)। इसमें ऑक्सीजनयुक्त रक्त शरीर के सभी भागों में पहुँचाया जाता है।
- आवश्यकता: यह व्यवस्था इसलिए आवश्यक है क्योंकि इससे ऑक्सीजनयुक्त और अशुद्ध रक्त अलग-अलग रहते हैं। इससे रक्त को उच्च दबाव पर पंप किया जा सकता है, जिससे ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की आपूर्ति शरीर की ऊँची चयापचय दर और ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए तेज और कुशल हो जाती है।
10. हरे पादप में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया लिखिए।
उत्तर: हरे पादपों में प्रकाश संश्लेषण की रासायनिक अभिक्रिया निम्नलिखित है:
रासायनिक समीकरण:कार्बन डाइऑक्साइड + जल ⟶ सूर्य के प्रकाश व क्लोरोफिल की उपस्थिति में ⟶ ग्लूकोज + ऑक्सीजन + जल
6CO2 + 12H2O ⟶ C6H12O6 + 6O2 + 6H2O
सरल शब्दों में: पौधे सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा को क्लोरोफिल की सहायता से अवशोषित करते हैं। वे वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड और मिट्टी से जल लेकर इस ऊर्जा का उपयोग करके ग्लूकोज (भोजन) का निर्माण करते हैं। इस प्रक्रिया में ऑक्सीजन गैस उप-उत्पाद के रूप में निकलती है।प्रश्न 18. श्वासोच्छ्वास तथा श्वसन में अन्तर कीजिए। (2011, 13)
श्वासोच्छ्वास श्वसन 1. यह एक भौतिक क्रिया है जिसमें शरीर वायुमंडल से ऑक्सीजन ग्रहण करता है तथा कार्बन डाइऑक्साइड का बहि:क्षेपण करता है। 1. यह एक जैव-रासायनिक क्रिया है जिसमें कोशिकाओं के अंदर ग्लूकोज का ऑक्सीकरण होता है, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड, जल और ऊर्जा (ATP) उत्पन्न होती है। 2. यह क्रिया कोशिकाओं के बाहर (श्वसन अंगों जैसे फेफड़ों में) होती है। 2. यह क्रिया कोशिकाओं के अन्दर (कोशिकाद्रव्य एवं माइटोकॉण्ड्रिया में) होती है। 3. इसमें एन्जाइम्स की आवश्यकता नहीं होती है। 3. इसमें विभिन्न एन्जाइम्स की आवश्यकता होती है। 4. इस क्रिया में सीधे तौर पर ऊर्जा उत्पन्न नहीं होती है। 4. इस क्रिया का मुख्य उद्देश्य ऊर्जा (ATP) का उत्पादन करना है। 5. इसमें श्वसनांगों (जैसे नाक, श्वासनली, फेफड़े) की आवश्यकता होती है। 5. इसमें श्वसनांगों की आवश्यकता नहीं होती है; यह प्रत्येक जीवित कोशिका में होता है। प्रश्न 19. कोशिकीय श्वसन को परिभाषित कीजिए तथा उसकी रूप-रेखा बनाइए। (2017)
कोशिकीय श्वसन की परिभाषा: यह वह जैव-रासायनिक प्रक्रम है जिसमें जीवित कोशिकाओं के अंदर भोजन (मुख्यतः ग्लूकोज) का ऑक्सीजन की उपस्थिति या अनुपस्थिति में विघटन होता है, जिससे कोशिका के कार्यों के लिए ऊर्जा (ATP) मुक्त होती है।
रूप-रेखा:
(उपरोक्त चित्र में कोशिकीय श्वसन की प्रक्रिया दर्शाई गई है।)
मुख्य चरण:
- ग्लाइकोलाइसिस (Glycolysis): यह कोशिका के कोशिकाद्रव्य में होता है। इसमें एक अणु ग्लूकोज (6-C) का विघटन होकर दो अणु पाइरुविक अम्ल (3-C) बनते हैं। इस चरण में थोड़ी मात्रा में ATP और NADH बनती है। यह चरण ऑक्सीजन की उपस्थिति या अनुपस्थिति दोनों में हो सकता है।
- क्रेब्स चक्र (Krebs Cycle): यदि ऑक्सीजन उपलब्ध है (वायवीय श्वसन), तो पाइरुविक अम्ल माइटोकॉण्ड्रिया में प्रवेश करता है। वहाँ क्रेब्स चक्र में इसका पूर्ण ऑक्सीकरण होकर कार्बन डाइऑक्साइड, जल और अधिक मात्रा में ATP, NADH, FADH₂ बनते हैं।
- इलेक्ट्रॉन परिवहन श्रृंखला (ETC): यह भी माइटोकॉण्ड्रिया में होता है। इसमें ग्लाइकोलाइसिस और क्रेब्स चक्र से प्राप्त NADH और FADH₂ के इलेक्ट्रॉनों के स्थानांतरण से बहुत अधिक मात्रा में ATP का संश्लेषण होता है।
- अवायवीय श्वसन (Anaerobic Respiration): यदि ऑक्सीजन अनुपस्थित है, तो पाइरुविक अम्ल का विघटन कोशिकाद्रव्य में ही होता है। यीस्ट जैसे जीवों में यह एथिल ऐल्कोहॉल और CO₂ में बदलता है (किण्वन), जबकि मानव मांसपेशियों में लैक्टिक अम्ल बनता है। इससे बहुत कम ATP प्राप्त होती है।
प्रश्न 20. मानव रक्त की संरचना व कार्यों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। (2017, 18) या रुधिर के चार कार्य बताइए। (2009, 13)
मानव रक्त की संरचना: रक्त एक तरल संयोजी ऊतक है जिसमें दो मुख्य भाग होते हैं:
- प्लाज्मा (Plasma): यह रक्त का हल्का पीला, तरल भाग है जो कुल रक्त का लगभग 55% होता है। इसमें लगभग 90% जल तथा 10% घुलनशील पदार्थ (प्रोटीन, हॉर्मोन, लवण, पोषक तत्व, अपशिष्ट पदार्थ आदि) होते हैं।
- रक्त कणिकाएँ (Blood Cells): ये प्लाज्मा में तैरती रहती हैं और कुल रक्त का लगभग 45% भाग बनाती हैं। ये तीन प्रकार की होती हैं:
- लाल रक्त कणिकाएँ (RBCs): इनमें हीमोग्लोबिन होता है जो ऑक्सीजन का परिवहन करता है। इनका जीवनकाल लगभग 120 दिन होता है।
- श्वेत रक्त कणिकाएँ (WBCs): ये शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता का काम करती हैं, रोगाणुओं से लड़ती हैं।
- प्लेटलेट्स (Platelets): ये रक्त का थक्का बनाने में सहायता करती हैं ताकि चोट लगने पर अत्यधिक रक्तस्राव न हो।
रक्त के कार्य:
- श्वसन गैसों का परिवहन: लाल रक्त कणिकाओं में मौजूद हीमोग्लोबिन फेफड़ों से ऑक्सीजन लेकर शरीर के सभी ऊतकों तक पहुँचाता है और ऊतकों से कार्बन डाइऑक्साइड वापस फेफड़ों तक लाता है।
- पोषक तत्वों का वितरण: पाचन तंत्र से अवशोषित ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, वसा अम्ल, विटामिन और खनिज प्लाज्मा द्वारा शरीर की प्रत्येक कोशिका तक पहुँचाए जाते हैं।
- अपशिष्ट पदार्थों का निष्कासन: चयापचय से उत्पन्न हानिकारक नाइट्रोजनी अपशिष्ट (जैसे यूरिया) को रक्त वृक्क (किडनी) तक पहुँचाता है, जहाँ से ये मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकल जाते हैं।
- रोग प्रतिरोधक क्षमता: श्वेत रक्त कणिकाएँ (WBCs) बैक्टीरिया, वायरस आदि रोगाणुओं पर आक्रमण करके उन्हें नष्ट करती हैं और शरीर को संक्रमण से बचाती हैं।
- शरीर के तापमान का नियमन: रक्त शरीर के गर्म भागों से गर्मी लेकर ठंडे भागों तक पहुँचाता है, जिससे पूरे शरीर का तापमान सामान्य (लगभग 37°C) बना रहता है।
- हॉर्मोन्स का परिवहन: अंतःस्रावी ग्रंथियों द्वारा स्रावित हॉर्मोन्स (जैसे इंसुलिन) रक्त के माध्यम से ही लक्षित अंगों तक पहुँचते हैं और शरीर के विभिन्न कार्यों को नियंत्रित करते हैं।
प्रश्न 21. हीमोग्लोबिन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2014, 18) या हीमोग्लोबिन कहाँ पाया जाता है? इसका मुख्य कार्य बताइए। (2018)
हीमोग्लोबिन: हीमोग्लोबिन लाल रक्त कणिकाओं (RBCs) में पाया जाने वाला एक लौह-युक्त प्रोटीन (आयरन प्रोटीन) है। यह लाल रंग का होता है, जिसके कारण रक्त का रंग लाल दिखाई देता है।
संरचना: इसके प्रत्येक अणु में चार भाग होते हैं:
- चार हीम समूह (Heme Groups): प्रत्येक हीम समूह के केंद्र में एक लौह (आयरन) का परमाणु (Fe²⁺) होता है जो ऑक्सीजन से बंध बनाता है।
- चार ग्लोबिन प्रोटीन श्रृंखलाएँ (Globin Protein Chains)।
मुख्य कार्य:
- ऑक्सीजन का परिवहन: यह हीमोग्लोबिन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। फेफड़ों में ऑक्सीजन की उच्च सांद्रता पर, हीमोग्लोबिन का आयरन ऑक्सीजन से बंध बनाकर ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाता है। यह ऑक्सीहीमोग्लोबिन रक्त के माध्यम से शरीर के विभिन्न ऊतकों तक पहुँचता है, जहाँ ऑक्सीजन की कम सांद्रता पर यह बंध टूट जाता है और ऑक्सीजन कोशिकाओं को मुक्त कर दी जाती है।
- कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन: हीमोग्लोबिन कार्बन डाइऑक्साइड का एक छोटा भाग (लगभग 20-25%) भी ग्लोबिन प्रोटीन भाग से जुड़कर फेफड़ों तक पहुँचाने में सहायता करता है।
महत्व: हीमोग्लोबिन की कमी से एनीमिया (रक्ताल्पता) रोग हो जाता है, जिसमें शरीर की कोशिकाओं को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और व्यक्ति थकान, कमजोरी और सांस फूलने जैसे लक्षण अनुभव करता है।
प्रश्न 22. रुधिर और लसीका में अन्तर स्पष्ट कीजिए। (2013, 14, 15, 16)
क्र. सं. रुधिर (Blood) लसीका (Lymph) 1. यह गहरे लाल रंग का तरल संयोजी ऊतक है। यह रंगहीन या हल्के पीले रंग का तरल संयोजी ऊतक है। 2. रुधिर में लाल रुधिर कणिकाएँ (RBCs) पायी जाती हैं, जिनमें हीमोग्लोबिन होता है। लसीका में लाल रुधिर कणिकाएँ नहीं पायी जाती हैं। 3. रुधिर में प्रोटीन्स (फाइब्रिनोजन आदि) अधिक मात्रा में पायी जाती हैं। लसीका में प्रोटीन्स अपेक्षाकृत बहुत कम मात्रा में पायी जाती हैं। 4. रुधिर में श्वेत रक्त कणिकाएँ (WBCs) कम संख्या में होती हैं। लसीका में श्वेत रक्त कणिकाएँ (विशेषकर लिम्फोसाइट्स) अधिक संख्या में पायी जाती हैं। 5. रुधिर का प्रवाह हृदय के पंप करने के कारण धमनियों और शिराओं में तेज गति से होता है। लसीका का प्रवाह धीमी गति से होता है और यह लसीका वाहिनियों में ऊतकों के दबाव के कारण बहता है। 6. रुधिर में ऑक्सीजन की मात्रा अधिक होती है (धमनी रक्त में)। लसीका में ऑक्सीजन की मात्रा कम होती है। 7. रुधिर का मुख्य कार्य गैसों, पोषक तत्वों और अपशिष्ट पदार्थों का परिवहन करना है। लसीका का मुख्य कार्य ऊतक द्रव्य का संतुलन बनाए रखना, वसा का अवशोषण करना और रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करना है। प्रश्न 23, घमनी तथा शिरा को परिभाषित कीजिए। (2016, 17)
उत्तर:
धमनियाँ वे रक्त वाहिकाएँ हैं जो हृदय से ऑक्सीजन युक्त रक्त को शरीर के विभिन्न अंगों और ऊतकों तक ले जाती हैं। ये मोटी, लचीली दीवारों वाली होती हैं ताकि हृदय के पम्प करने के दबाव को सह सकें।
शिराएँ वे रक्त वाहिकाएँ हैं जो शरीर के विभिन्न अंगों से अशुद्ध (कार्बन डाइऑक्साइड युक्त) रक्त को वापस हृदय में लाती हैं। इनकी दीवारें पतली होती हैं और इनमें वाल्व होते हैं जो रक्त के केवल एक दिशा (हृदय की ओर) में बहने को सुनिश्चित करते हैं।*** प्रश्न 24. धघमनी और शिरा में अन्तर स्पष्ट कीजिए। (2009, 1, 12, 14) या धमनी और शिरा में चार मुख्य अन्तर बताइए। (2011, 14, 15, 16)
उत्तर:
क्रमांक धमनी (Artery) शिरा (Vein) 1. ये हृदय से रक्त को शरीर के विभिन्न अंगों की ओर ले जाती हैं। ये शरीर के विभिन्न अंगों से रक्त को वापस हृदय की ओर लाती हैं। 2. इनमें रक्त हृदय के पम्प करने के कारण उच्च दबाव के साथ तेज गति से बहता है। इनमें रक्त का प्रवाह धीमी गति और कम दबाव के साथ होता है। 3. इनकी भित्तियाँ (दीवारें) मोटी, मजबूत और अधिक लचीली होती हैं। इनकी भित्तियाँ पतली और कम लचीली होती हैं। 4. इनकी गुहा (लुमेन) संकरी होती है और खाली होने पर भी ये पिचकती नहीं हैं। इनकी गुहा चौड़ी होती है और खाली होने पर ये पिचक जाती हैं। 5. फुफ्फुसीय धमनी को छोड़कर, सभी धमनियाँ शुद्ध (ऑक्सीजन युक्त) रक्त ले जाती हैं। फुफ्फुसीय शिरा को छोड़कर, सभी शिराएँ अशुद्ध (ऑक्सीजन रहित) रक्त ले जाती हैं। 6. इनमें वाल्व (कपाट) नहीं पाए जाते हैं। इनमें रक्त के प्रवाह को एक ही दिशा में रोकने के लिए वाल्व (कपाट) पाए जाते हैं। 7. इनका रंग हल्का लाल या गुलाबी होता है और ये प्रायः शरीर की गहराई में स्थित होती हैं। इनका रंग गहरा लाल या नीला-बैंगनी दिखाई देता है और ये त्वचा के नीचे सतह के पास स्थित होती हैं। *** प्रश्न 25. लसिका परिवहन के कार्यों का उल्लेख कीजिए। (2015)
उत्तर:
लसिका (लिम्फ) परिवहन के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं:- यह कोशिकाओं और रक्त के बीच पोषक तत्वों (जैसे ग्लूकोज, अमीनो अम्ल), गैसों, हॉर्मोन्स और एंजाइमों के आदान-प्रदान के लिए एक माध्यम का कार्य करता है।
- यह ऊतकों से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य हानिकारक उत्सर्जी पदार्थों को वापस रक्त प्रवाह में लाता है।
- आंतों की दीवारों में स्थित लसिका केशिकाएँ (लैक्टील्स) वसा अम्ल और ग्लिसरॉल जैसे पचे हुए वसीय पदार्थों का अवशोषण करती हैं।
- लसिका द्रव्य कोमल अंगों के चारों ओर एक कुशन का कार्य करके उन्हें आघात से बचाता है।
- यह कोशिकाओं के चारों ओर जलीय वातावरण बनाए रखकर परासरणी सन्तुलन बनाए रखने में सहायता करता है।
- लसिका ग्रंथियों (लिम्फ नोड्स) में लिम्फोसाइट्स नामक श्वेत रक्त कणिकाओं का निर्माण होता है, जो रोगाणुओं (जीवाणुओं) से शरीर की रक्षा करते हैं।
*** प्रश्न 26. रुधिर वाहिनियाँ किसे कहते हैं? इनके प्रकार लिखिए। (2017)
उत्तर:
शरीर में रक्त के परिवहन के लिए जो नलिकाएँ (ट्यूब) कार्य करती हैं, उन्हें रुधिर वाहिनियाँ कहते हैं। ये तीन प्रकार की होती हैं:- धमनियाँ (Arteries): ये हृदय से रक्त को शरीर के सभी भागों तक ले जाती हैं। इनकी दीवारें मोटी और लचीली होती हैं।
- शिराएँ (Veins): ये शरीर के विभिन्न भागों से रक्त को वापस हृदय में लाती हैं। इनकी दीवारें पतली होती हैं और इनमें रक्त का प्रवाह कम दबाव पर होता है।
- केशिकाएँ (Capillaries): धमनियाँ अंगों में पहुँचकर बारीक-बारीक शाखाओं में विभाजित हो जाती हैं, जिन्हें केशिकाएँ कहते हैं। इनकी दीवार केवल एक कोशिका मोटी होती है, जिससे ऑक्सीजन, पोषक तत्व और अपशिष्ट पदार्थों का आदान-प्रदान आसानी से हो पाता है। केशिकाएँ बाद में मिलकर शिराओं का निर्माण करती हैं।
*** प्रश्न 27. पादपों में फ्लोएम द्वारा भोज्य पदार्थों के स्थानान्तरण को समझाइए। (2014) या मुंच परिकल्पना क्या है? उचित चित्रों के माध्यम से स्पष्ट कीजिए। (2018)
उत्तर:
पौधों में पत्तियों द्वारा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में तैयार किए गए भोज्य पदार्थों (जैसे शर्करा) को पौधे के अन्य भागों जैसे जड़ों, तनों, फूलों और फलों तक पहुँचाने का कार्य फ्लोएम ऊतक करता है। यह स्थानान्तरण घुलनशील अवस्था में होता है और मुख्य रूप से ऊपर से नीचे की ओर (पत्तियों से जड़ों की ओर) होता है, हालाँकि आवश्यकता पड़ने पर यह विपरीत दिशा में भी हो सकता है।
मुंच परिकल्पना (Munch Hypothesis): इस परिकल्पना के अनुसार, भोज्य पदार्थों का स्थानान्तरण परासरण दाब के अंतर के कारण होता है।- पत्तियों की कोशिकाओं (स्रोत) में लगातार शर्करा का निर्माण होता रहता है, जिससे उनकी सान्द्रता और परासरण दाब अधिक हो जाता है।
- जड़ों या भंडारण वाले भागों (सिंक) में भोज्य पदार्थों का उपयोग या संचय होता रहता है, जिससे वहाँ की सान्द्रता और परासरण दाब कम रहता है।
(यहाँ एक नामांकित चित्र होगा जो पत्तियों (स्रोत) से जड़ों (सिंक) की ओर फ्लोएम में भोज्य पदार्थों के प्रवाह को दर्शाएगा।)
*** प्रश्न 28. मूलदाब किसे कहते हैं तथा इसका क्या महत्त्व है? नामांकित चित्र की सहायता से मूलदाब दर्शाइए। (2012) या पौधों में जल संवहन का सचित्र वर्णन कीजिए। (2013) या नामांकित चित्र द्वारा मूलदाब के प्रदर्शन का वर्णन कीजिए। (2015)
उत्तर:
मूलदाब (Root Pressure): जड़ों की कॉर्टेक्स कोशिकाओं द्वारा सक्रिय रूप से आयनों को अवशोषित करने के कारण, जड़ों के जाइलम में जल का एक धक्का (दाब) उत्पन्न होता है। इस दाब को मूलदाब कहते हैं। यह दाब जल को जाइलम वाहिकाओं में धकेलता है और इसे तने में कुछ ऊँचाई तक चढ़ाने में सहायता करता है।
महत्त्व: मूलदाब छोटे पौधों और रात के समय जब वाष्पोत्सर्जन कम होता है, तब जल के ऊपर चढ़ने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालाँकि, यह लम्बे वृक्षों में जल को शीर्ष तक पहुँचाने का एकमात्र या प्रमुख कारक नहीं है।
प्रदर्शन (मूलदाब प्रयोग):- एक स्वस्थ, पत्तीदार पौधे (जैसे बरसीम) को गमले से सावधानीपूर्वक निकालकर उसकी जड़ों को पानी से साफ कर लें।
- तने को जड़ के पास से काट दें, ताकि जड़ वाला भाग अलग हो जाए।
- इस जड़ वाले हिस्से को एक रबर ट्यूब की सहायता से एक मैनोमीटर (दाब मापक यंत्र) से जोड़ दें। मैनोमीटर में पारा भरा होता है।
- जड़ों को पानी वाले बीकर में रख दें।
- कुछ समय बाद देखेंगे कि मैनोमीटर में पारा का स्तर बढ़ने लगता है। यह वृद्धि जड़ों द्वारा उत्पन्न दाब (मूलदाब) के कारण होती है, जो जल को जाइलम में धकेलता है और पारे के स्तर को ऊपर उठाता है।
(यहाँ एक नामांकित चित्र होगा जो जड़ों को मैनोमीटर से जोड़कर मूलदाब प्रदर्शन के प्रयोग को दर्शाएगा।)
प्रश्न 1. मनुष्य में वृक्क एक तंत्र का भाग है जो सम्बन्धित है-
A. पोषण
B. श्वसन
C. उत्सर्जन
D. परिवहनउत्तर: C. उत्सर्जन
वृक्क (गुर्दे) मनुष्य के उत्सर्जन तंत्र का मुख्य अंग हैं। इनका कार्य रक्त से अपशिष्ट पदार्थों, जैसे यूरिया और अतिरिक्त लवण व पानी को छानकर मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकालना है। यह शरीर में जल व लवणों का संतुलन भी बनाए रखता है।
प्रश्न 2. पादप में जाइलम उत्तरदायी है-
A. जल का वहन
B. भोजन का वहन
C. अमीनो अम्ल का वहन
D. ऑक्सीजन का वहनउत्तर: A. जल का वहन
पादपों में जाइलम एक संवहन ऊतक है जो मुख्य रूप से जड़ों द्वारा अवशोषित जल और उसमें घुलनशील खनिज लवणों को पौधे के सभी भागों जैसे तने, पत्तियों और फूलों तक पहुँचाता है। यह ऊतक मृत कोशिकाओं से बना होता है जो एक नलिका के रूप में कार्य करता है।
प्रश्न 3. स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक है-
A. कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल
B. क्लोरोफिल
C. सूर्य का प्रकाश
D. उपरोक्त सभीउत्तर: D. उपरोक्त सभी
स्वपोषी पोषण (प्रकाश संश्लेषण) के लिए तीन मुख्य घटकों की आवश्यकता होती है: कार्बन डाइऑक्साइड और जल कच्चे पदार्थ के रूप में, क्लोरोफिल वर्णक के रूप में जो प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित करता है, और सूर्य का प्रकाश ऊर्जा के स्रोत के रूप में। इन सभी के संयोग से पौधे अपना भोजन स्वयं बनाते हैं।
प्रश्न 4. पायरुवेट के विखंडन से यह कार्बन डाइऑक्साइड, जल तथा ऊर्जा देता है और यह क्रिया होती है-
A. कोशिका द्रव्य
B. माइटोकॉन्ड्रिया
C. हरित लवक
D. केन्द्रकउत्तर: B. माइटोकॉन्ड्रिया
पायरुवेट का पूर्ण विखंडन (वायवीय श्वसन) जिसमें कार्बन डाइऑक्साइड, जल और अधिक मात्रा में ऊर्जा (ATP) मुक्त होती है, कोशिका के माइटोकॉन्ड्रिया नामक कोशिकांग में होता है। माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का शक्ति गृह कहा जाता है।
प्रश्न 5. हमारे शरीर में वसा का पाचन कैसे होता है? यह किस अंग में संपन्न होता है?
उत्तर:
हमारे शरीर में वसा का पाचन निम्नलिखित चरणों में होता है:
- मुख गुहा: यहाँ केवल वसा का यांत्रिक पाचन (चबाना) होता है, रासायनिक पाचन नहीं।
- छोटी आंत: यह वसा पाचन का मुख्य स्थल है। यकृत (लीवर) से स्रावित पित्त रस वसा के बड़े ग्लोब्यूल्स को छोटी-छोटी बूंदों में तोड़ देता है (इमल्सीफिकेशन), जिससे उनका सतही क्षेत्रफल बढ़ जाता है। इसके बाद अग्न्याशय (पैंक्रियास) से स्रावित लाइपेज एंजाइम इन छोटी वसा बूंदों पर क्रिया करके उन्हें फैटी अम्ल और ग्लिसरॉल में विघटित कर देता है।
इस प्रकार, वसा का रासायनिक पाचन मुख्य रूप से छोटी आंत में संपन्न होता है।
प्रश्न 6. भोजन के पाचन में लार की क्या भूमिका है?
उत्तर:
लार (सलाइवा) मुख गुहा में स्थित लार ग्रंथियों द्वारा स्रावित होती है और भोजन के पाचन में निम्नलिखित महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाती है:
- कार्बोहाइड्रेट का पाचन: लार में उपस्थित टायलिन (सैलाइवरी एमाइलेज) एंजाइम स्टार्च (जटिल कार्बोहाइड्रेट) को माल्टोज (एक सरल शर्करा) में बदलना शुरू कर देता है।
- निगलने में सहायता: लार भोजन को नम और चिकना बनाती है, जिससे उसे चबाना और निगलना आसान हो जाता है। यह भोजन के टुकड़ों को एक साथ बांधकर एक नरम गोला (बोलस) बनाती है।
- मुख की सफाई: यह मुख गुहा को साफ रखने और बैक्टीरिया के विकास को रोकने में मदद करती है।
- स्वाद का अनुभव: लार भोजन के घुलनशील घटकों को घोलती है, जिससे स्वाद कलिकाएं उसका स्वाद महसूस कर पाती हैं।
प्रश्न 7. स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ कौन-सी हैं और उसके उपोत्पाद क्या हैं?
उत्तर:
स्वपोषी पोषण (प्रकाश संश्लेषण) के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ:
- प्रकाश: सूर्य का प्रकाश ऊर्जा का स्रोत है।
- क्लोरोफिल: हरे पौधों के हरित लवक में पाया जाने वाला हरा वर्णक जो प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित करता है।
- कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂): वायुमंडल से प्राप्त होती है, कार्बन का स्रोत है।
- जल (H₂O): मिट्टी से जड़ों द्वारा अवशोषित होता है, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का स्रोत है।
प्रकाश संश्लेषण के उपोत्पाद (By-products):
- इस प्रक्रिया का मुख्य उपोत्पाद ऑक्सीजन गैस (O₂) है, जो वायुमंडल में मुक्त होती है और जीवों के श्वसन के लिए आवश्यक है।
- इसके अलावा, इस प्रक्रिया में जल भी उत्पन्न होता है, लेकिन यह पौधे द्वारा उपयोग किया जाता है या वाष्पोत्सर्जन द्वारा बाहर निकलता है।
प्रकाश संश्लेषण की समग्र अभिक्रिया इस प्रकार है:
कार्बन डाइऑक्साइड + जल → सूर्य के प्रकाश और क्लोरोफिल की उपस्थिति में → ग्लूकोज + ऑक्सीजनप्रश्न 8. वायवीय तथा अवायवीय श्वसन में क्या अन्तर हैं? कुछ जीवों के नाम लिखिए जिनमें अवायवीय श्वसन होता है।
उत्तर:
वायवीय और अवायवीय श्वसन में अंतर:
आधार वायवीय श्वसन अवायवीय श्वसन ऑक्सीजन की आवश्यकता ऑक्सीजन की उपस्थिति में होता है। ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है। स्थान कोशिका द्रव्य और माइटोकॉन्ड्रिया में। केवल कोशिका द्रव्य में। ग्लूकोज का पूर्ण विखंडन होता है। नहीं होता, आंशिक विखंडन होता है। अंतिम उत्पाद कार्बन डाइऑक्साइड और जल। यीस्ट में: एथिल अल्कोहल और CO₂।
मांसपेशियों में: लैक्टिक अम्ल।ऊर्जा मुक्ति अधिक मात्रा में (36-38 ATP अणु)। बहुत कम मात्रा में (2 ATP अणु)। अवायवीय श्वसन करने वाले कुछ जीव:
- यीस्ट (खमीर) कवक
- कुछ जीवाणु (जैसे लैक्टोबैसिलस)
- परजीवी कृमि (जैसे टेपवर्म)
- कुछ मिट्टी के जीवाणु
प्रश्न 9. गैसों के अधिकतम विनिमय के लिए कूपिकाएँ किस प्रकार अभिकल्पित हैं?
उत्तर:
फेफड़ों में स्थित कूपिकाएँ (एल्वियोली) गैसों के अधिकतम विनिमय के लिए निम्नलिखित विशेषताओं के कारण अत्यधिक कुशलता से अभिकल्पित (डिज़ाइन) हैं:
- विशाल सतह क्षेत्र: दोनों फेफड़ों में लाखों कूपिकाएँ होती हैं, जो एकत्रित रूप से लगभग 80 वर्ग मीटर का विशाल सतह क्षेत्र प्रदान करती हैं, जो गैस विनिमय के लिए पर्याप्त है।
- पतली भित्ति: कूपिकाओं की भित्ति केवल एक कोशिका मोटी होती है। इसके अलावा, इनके चारों ओर रक्त केशिकाओं की भित्ति भी बहुत पतली होती है। यह दोनों पतली परतें गैसों (ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड) के आसानी से विसरण में सहायक होती हैं।
- रक्त आपूर्ति का समृद्ध जाल: प्रत्येक कूपिका रक्त केशिकाओं के घने जाल से घिरी रहती है, जो लगातार रक्त की आपूर्ति सुनिश्चित करता है और गैस विनिमय की दर को बढ़ाता है।
- नम सतह: कूपिकाओं की भीतरी सतह नम होती है, जो गैसों के घुलने और विसरण में सहायता करती है।
- वायु और रक्त के बीच सांद्रता प्रवणता: कूपिका में ऑक्सीजन का उच्च सांद्रण और रक्त में निम्न सांद्रण होता है (और CO₂ के लिए इसका उल्टा), जो विसरण के लिए आवश्यक प्रवणता बनाए रखता है।
प्रश्न 10. हमारे शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी के क्या परिणाम हो सकते हैं?
उत्तर:
हीमोग्लोबिन लाल रक्त कणिकाओं में पाया जाने वाला लौहयुक्त प्रोटीन है जो फेफड़ों से ऑक्सीजन को शरीर के सभी ऊतकों तक पहुँचाता है। इसकी कमी से निम्नलिखित गंभीर परिणाम हो सकते हैं:
- रक्ताल्पता (एनीमिया): हीमोग्लोबिन की कमी को ही एनीमिया कहा जाता है। इससे रक्त की ऑक्सीजन वहन क्षमता कम हो जाती है।
- थकान और कमजोरी: ऊतकों और कोशिकाओं को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती, जिससे शरीर में ऊर्जा का उत्पादन कम हो जाता है। इससे व्यक्ति हमेशा थका हुआ और कमजोर महसूस करता है।
- सांस फूलना: शरीर ऑक्सीजन की कमी को पूरा करने के लिए श्वसन दर बढ़ा देता है, जिससे थोड़ा सा काम करने या चलने पर भी सांस फूलने लगती है।
- त्वचा का पीला पड़ना: रक्त में लाल रंग हीमोग्लोबिन के कारण ही होता है। इसकी कमी से त्वचा, नाखून और आँखों के अंदर का भाग पीला दिखाई देने लगता है।
- चक्कर आना और सिरदर्द: मस्तिष्क को पर्याप्त ऑक्सीजन न मिलने के कारण चक्कर आना, सिरदर्द और एकाग्रता में कमी हो सकती है।
- हृदय पर अतिरिक्त दबाव: ऑक्सीजन की मांग पूरी करने के लिए हृदय को तेजी से और अधिक मेहनत से धड़कना पड़ता है, जिससे हृदय पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
- शारीरिक और मानसिक विकास में बाधा: बच्चों में हीमोग्लोबिन की लंबे समय तक कमी रहने से उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है।
प्रश्न 11. मनुष्य में दोहरा परिसंचरण की व्याख्या कीजिए। यह क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
दोहरा परिसंचरण: मनुष्य में हृदय चार कक्षों (दो आलिंद और दो निलय) वाला होता है। रक्त पूरे शरीर में दो अलग-अलग परिपथों से होकर प्रवाहित होता है और हृदय से दो बार गुजरता है, इसीलिए इसे दोहरा परिसंचरण कहते हैं। यह दो प्रकार का होता है:
- फुफ्फुसीय परिसंचरण: यह हृदय और फेफड़ों के बीच होता है। दाएं निलय से अशुद्ध रक्त फेफड़ों की धमनी द्वारा फेफड़ों में जाता है, वहाँ ऑक्सीजन लेकर शुद्ध हो जाता है और फुफ्फुसीय शिरा द्वारा बाएं आलिंद में वापस आता है।
- सिस्टमिक परिसंचरण: यह हृदय और शरीर के अन्य सभी अंगों के बीच होता है। बाएं निलय से शुद्ध रक्त महाधमनी द्वारा पूरे शरीर के ऊतकों में पहुँचता है, वहाँ से अशुद्ध रक्त शिराओं द्वारा दाएं आलिंद में वापस आता है।
दोहरा परिसंचरण आवश्यक क्यों है?
यह इसलिए आवश्यक है क्योंकि यह ऑक्सीजन युक्त और ऑक्सीजन रहित रक्त को पूरी तरह अलग रखता है। इससे शरीर के ऊतकों को अधिक ऑक्सीजन युक्त रक्त मिलता है, जो उनकी उच्च ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जरूरी है। यह शुद्ध और अशुद्ध रक्त के मिश्रण को रोककर शरीर की दक्षता को बढ़ाता है और शरीर के तापमान को नियंत्रित रखने में भी मदद करता है।
प्रश्न 12. जाइलम तथा फ्लोएम में पदार्थों के वहन में क्या अन्तर है?
उत्तर:
पौधों में जाइलम और फ्लोएम संवहन ऊतक हैं जो पदार्थों के वहन का कार्य करते हैं, लेकिन दोनों के कार्य और वहन किए जाने वाले पदार्थों में मूलभूत अंतर है:
आधार जाइलम (Xylem) फ्लोएम (Phloem) वहन की दिशा एकदिशीय (Unidirectional) – केवल जड़ से पत्तियों की ओर (ऊपर की ओर)। द्विदिशीय (Bidirectional) – पत्तियों से जड़ की ओर और जड़ से पत्तियों की ओर दोनों तरफ। वहित पदार्थ मुख्य रूप से जल और घुलनशील खनिज लवण। मुख्य रूप से भोजन (ग्लूकोज, सुक्रोज, अमीनो अम्ल आदि)। वहन का कारण मुख्य रूप से वाष्पोत्सर्जन खिंचाव (Transpiration Pull) और जड़ दाब। स्रोत से सिंक की ओर दाब प्रवणता के कारण (सक्रिय वहन)। ऊतक की प्रकृति मुख्यतः मृत कोशिकाओं से बना होता है। जीवित कोशिकाओं से बना होता है। अन्य कार्य पौधे को यांत्रिक सहारा देता है। पौधे के विभिन्न भागों के बीच पोषक तत्वों का वितरण करता है। प्रश्न 13. उत्सर्जी उत्पाद से बचने के लिए पादप किन विधियों का उपयोग करते हैं?
उत्तर:
पादपों में जंतुओं जैसा विकसित उत्सर्जन तंत्र नहीं होता, फिर भी वे अपने उपापचयी उत्सर्जी उत्पादों से निम्नलिखित विधियों से बचते हैं या उनका निपटान करते हैं:
- संचयन: कई पौधे अपशिष्ट पदार्थों को अपने ऊतकों में ही जमा कर लेते हैं। उदाहरण के लिए, रबर के पौधे में लेटेक्स, कॉफी और चाय के पौधे में कैफीन, तम्बाकू में निकोटिन आदि कोशिका रिक्तिकाओं में जमा हो जाते हैं। पुरानी पत्तियों में अपशिष्ट जमा हो जाते हैं, जो पत्तियों के झड़ने के साथ ही पौधे से अलग हो जाते हैं।
- स्रावण: कुछ पौधे अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकाल देते हैं। जैसे गोंद और रेजिन का स्राव तने से होता है। नीम और यूकेलिप्टस जैसे पौधों की पत्तियों से तेलों का स्राव होता है।
- परिवर्तन: पौधे कुछ अपशिष्ट पदार्थों को कम हानिकारक रूप में बदल देते हैं। उदाहरण के लिए, कैल्शियम ऑक्सेलेट को कैल्शियम ऑक्सेलेट क्रिस्टल के रूप में जमा कर लिया जाता है, जो पौधे के लिए कम विषैला होता है।
- पुनः उपयोग: पौधे कुछ उपापचयी उत्पादों का पुनः उपयोग कर लेते हैं। जैसे, श्वसन में उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड का प्रकाश संश्लेषण में उपयोग हो जाता है।
- वाष्पोत्सर्जन द्वारा: अतिरिक्त जल और कुछ गैसीय पदार्थ स्टोमेटा (रंध्र) द्वारा वाष्पोत्सर्जन की क्रिया में बाहर निकल जाते हैं।
प्रश्न 3.
पाचन से क्या तात्पर्य है? इसमें कौन-कौन से पाचक रस भाग लेते हैं? पचे हुए भोजन के अवशोषण तथा स्वांगीकरण की क्रिया का वर्णन कीजिए। (2011, 12, 13)
या पाचन किसे कहते हैं? मुँह से लेकर कोशिका में अवशोषित होने तक भोजन में जो परिवर्तन होते हैं, उनका चरणबद्ध वर्णन कीजिए। या पाचन किसे कहते हैं? आमाशयिक (जठर रस) रस (गैस्ट्रिक जूस) तथा अग्रयाशयिक रस (पैन्क्रियाटिक जूस) में पाये जाने वाले एन्जाइम्स की कार्यिकी समझाइए। (2010, 11) मुख से लेकर आमाशय तक होने वाली पाचन क्रिया को प्रभावित करने वाले विकरों (एन्जाइम्स) के कार्यों का उल्लेख कीजिए। (2016)
उत्तर: पाचन का अर्थ: पाचन वह जैविक प्रक्रम है जिसमें जटिल, अघुलनशील भोज्य पदार्थों को सरल, घुलनशील अवस्था में परिवर्तित किया जाता है। यह परिवर्तन विभिन्न पाचक रसों में उपस्थित एंजाइमों की सहायता से होता है, ताकि इन पोषक तत्वों को आंतों की दीवारों द्वारा रक्त में अवशोषित किया जा सके और फिर शरीर की कोशिकाओं तक पहुँचाया जा सके।
पाचन में भाग लेने वाले पाचक रस: निम्नलिखित पाचक रस पाचन क्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं:
- लार (Saliva): मुख ग्रंथियों से स्रावित होता है।
- जठर रस (Gastric Juice): आमाशय की भित्ति में स्थित जठर ग्रंथियों से स्रावित होता है।
- अग्न्याशयिक रस (Pancreatic Juice): अग्न्याशय (Pancreas) ग्रंथि से स्रावित होता है।
- पित्त रस (Bile Juice): यकृत (Liver) में बनकर पित्ताशय में संग्रहित होता है।
- आंत्र रस (Intestinal Juice): छोटी आंत की दीवारों में स्थित ग्रंथियों से स्रावित होता है।
पचे हुए भोजन का अवशोषण एवं स्वांगीकरण:
1. अवशोषण (Absorption): पाचन की समाप्ति के बाद, सरल घुलनशील पोषक तत्व (जैसे ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, वसीय अम्ल, ग्लिसरॉल आदि) छोटी आंत की दीवारों द्वारा अवशोषित कर लिए जाते हैं। छोटी आंत की आंतरिक सतह अंगुलियों जैसे असंख्य प्रवर्धों से ढकी होती है, जिन्हें दीर्घरोम (Villi) कहते हैं। ये दीर्घरोम अवशोषण का क्षेत्रफल बहुत बढ़ा देते हैं। अवशोषित पोषक तत्व रक्त वाहिनियों और लसीका वाहिनियों में प्रवेश कर जाते हैं।
- ग्लूकोज और अमीनो अम्ल सीधे रक्त केशिकाओं में चले जाते हैं।
- वसीय अम्ल और ग्लिसरॉल लसीका वाहिनियों में अवशोषित होते हैं, जो बाद में रक्त प्रवाह में मिल जाते हैं।
2. स्वांगीकरण (Assimilation): अवशोषण के बाद का चरण स्वांगीकरण है। इसमें रक्त द्वारा विभिन्न अंगों और ऊतकों तक पहुँचाए गए पोषक तत्वों का उपयोग होता है।
- ग्लूकोज कोशिकाओं में श्वसन के लिए ऊर्जा के स्रोत के रूप में प्रयोग किया जाता है। अतिरिक्त ग्लूकोज यकृत में ग्लाइकोजन के रूप में संचित हो जाता है।
- अमीनो अम्ल का उपयोग नई कोशिकाओं के निर्माण, टूट-फूट की मरम्मत और विभिन्न प्रोटीन्स व एंजाइमों के संश्लेषण के लिए होता है।
- वसीय अम्ल और ग्लिसरॉल का उपयोग कोशिका झिल्ली के निर्माण और ऊर्जा संचय के लिए होता है।
मुख से कोशिका तक भोजन के परिवर्तन के चरण:
1. मुखगुहा (Buccal Cavity):
- भोजन दाँतों द्वारा चबाया और पीसा जाता है (यांत्रिक पाचन)।
- लार ग्रंथियों से स्रावित लार भोजन को नम और चिकना बनाती है, जिससे निगलने में सहायता मिलती है।
- लार में उपस्थित एंजाइम टायलिन (Amylase) स्टार्च (मंड) का आंशिक पाचन करके माल्टोज शर्करा में बदलना शुरू कर देता है।
2. आमाशय (Stomach):
- आमाशय की दीवारों से जठर रस स्रावित होता है, जिसमें हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl), पेप्सिन और रेनिन एंजाइम होते हैं।
- HCl भोजन को अम्लीय बनाता है, हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करता है और पेप्सिनोजन को सक्रिय पेप्सिन में बदलता है।
- पेप्सिन प्रोटीनों को पेप्टोन्स और पेप्टाइड्स में तोड़ता है।
- रेनिन (शिशुओं में) दूध के प्रोटीन कैसीन को जमाता है, ताकि उसका पाचन आसान हो सके।
- भोजन यहाँ 3-5 घंटे रहकर अर्धतरल पदार्थ काइम (Chyme) में बदल जाता है।
3. ग्रहणी (Duodenum - छोटी आंत का प्रारंभिक भाग):
- यहाँ पित्त रस और अग्न्याशयिक रस काइम में मिलते हैं।
- पित्त रस (यकृत से) वसा के बड़े ग्लोब्यूल्स को छोटे-छोटे ग्लोब्यूल्स में तोड़कर इमल्सीफाई करता है, जिससे लाइपेज एंजाइम की क्रिया आसान हो जाती है। यह अम्लीय काइम को क्षारीय भी बनाता है।
- अग्न्याशयिक रस के प्रमुख एंजाइम और उनके कार्य:
- ट्रिप्सिन: प्रोटीन, पेप्टोन्स को पॉलीपेप्टाइड्स और अमीनो अम्ल में तोड़ता है।
- एमाइलेज (Amylopsin): अवशिष्ट स्टार्च को माल्टोज में बदलता है।
- लाइपेज: इमल्सीफाइड वसा को वसीय अम्ल और ग्लिसरॉल में परिवर्तित करता है।
4. शेष छोटी आंत (Ileum):
- यहाँ आंत्र रस में उपस्थित एंजाइम (जैसे माल्टेज, लैक्टेज, सुक्रेज, इरेप्सिन आदि) पाचन की अंतिम क्रियाएँ पूरी करते हैं।
- माल्टोज → ग्लूकोज
- लैक्टोज → ग्लूकोज + गैलेक्टोज
- सुक्रोज → ग्लूकोज + फ्रक्टोज
- पॉलीपेप्टाइड्स → अमीनो अम्ल
- इस प्रकार भोजन पूर्णतः पचकर सरल अवशोषण योग्य अणुओं में बदल जाता है, जिनका अवशोषण यहीं दीर्घरोमों द्वारा होता है।
5. कोशिका (Cell): रक्त के माध्यम से पोषक तत्व कोशिकाओं तक पहुँचते हैं और स्वांगीकरण के द्वारा कोशिका की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उपयोग में लाए जाते हैं।
प्रश्न 4.
श्वसन किसे कहते हैं? ऊर्जा का इससे क्या सम्बन्ध है? (2012)
उत्तर: श्वसन:
श्वसन वह जैव-रासायनिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा जीवित कोशिकाएँ भोजन (मुख्य रूप से ग्लूकोज) का ऑक्सीजन की उपस्थिति में ऑक्सीकरण करके ऊर्जा प्राप्त करती हैं। इस क्रिया में ग्लूकोज जैसे जटिल पदार्थ टूटकर सरल पदार्थ—कार्बन डाइऑक्साइड, जल और ऊर्जा—में बदल जाते हैं।श्वसन का समीकरण:
C6H12O6 + 6O2 → 6CO2 + 6H2O + ऊर्जा (ATP के रूप में)ऊर्जा से सम्बन्ध:
श्वसन का मुख्य उद्देश्य ऊर्जा का उत्पादन करना है। यह ऊर्जा ATP (एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट) नामक अणु में संचित होती है, जिसे कोशिका की "ऊर्जा मुद्रा" कहा जाता है। शरीर की सभी जैविक क्रियाएँ—जैसे पाचन, संकुचन, तंत्रिका आवेग का संचरण, नई कोशिकाओं का निर्माण आदि—के लिए आवश्यक ऊर्जा ATP से ही प्राप्त होती है। इस प्रकार, श्वसन वह प्रक्रिया है जो भोजन में संचित रासायनिक ऊर्जा को कोशिकाओं के उपयोग योग्य ऊर्जा (ATP) में परिवर्तित करती है।प्रश्न 5.
मनुष्य के श्वसन अंगों को नामांकित चित्र बनाकर उनके कार्यों का वर्णन कीजिए। (2013)
या
मनुष्य के श्वसन तन्त्र की संरचना का वर्णन नामांकित चित्र बनाकर कीजिए। (2013)उत्तर: मनुष्य के श्वसन अंग (श्वसन तंत्र):
मनुष्य का श्वसन तंत्र निम्नलिखित अंगों से मिलकर बना है, जिनके कार्य इस प्रकार हैं—- नासिका एवं नासा मार्ग: यह वायु के प्रवेश का प्राथमिक मार्ग है। नासिका में बाल और श्लेष्मा होते हैं जो हवा से धूल, कीटाणुओं आदि को छानते हैं। नासिका गुहा हवा को गर्म और नम भी बनाती है।
- ग्रसनी: यह नासा मार्ग और मुख गुहा के पीछे स्थित एक क्रॉसरोड है जो वायु को स्वर यंत्र की ओर और भोजन को आहार नाल की ओर निर्देशित करती है।
- कंठ या स्वर यंत्र: इसे 'आवाज़ की पेटी' भी कहते हैं। यहाँ स्वर रज्जु होते हैं जो ध्वनि उत्पन्न करते हैं। इसमें एक ढक्कन (एपिग्लॉटिस) होता है जो निगलने के समय श्वासनली को बंद करके भोजन को अन्नप्रणाली में जाने देता है।
- श्वासनली: यह एक लगभग 10-12 सेमी लंबी नली है जिसकी दीवार में 'C' आकार की उपास्थि के छल्ले होते हैं। ये छल्ले नली को हमेशा खुला रखते हैं ताकि साँस लेने में कोई रुकावट न हो। श्वासनली वायु को ब्रांकाई में पहुँचाती है।
- ब्रांकाई एवं ब्रांकिओल्स: श्वासनली सीने में जाकर दो शाखाओं (दाएँ व बाएँ ब्रांकाई) में बँट जाती है, जो क्रमशः दाएँ और बाएँ फेफड़े में जाती हैं। ये ब्रांकाई आगे चलकर पतली-पतली नलिकाओं (ब्रांकिओल्स) में विभाजित हो जाती हैं।
- फेफड़े: ये वक्ष गुहा में स्थित दो स्पंजी, लचीले अंग हैं। ब्रांकिओल्स के अंत में अंगूर के गुच्छे जैसी संरचनाएँ होती हैं, जिन्हें वायुकोष्ठक या एल्विओली कहते हैं। एल्विओली की दीवारें रक्त केशिकाओं से घिरी रहती हैं। यहीं पर वायु से ऑक्सीजन रक्त में तथा रक्त से कार्बन डाइऑक्साइड वायु में विसरित होती है। यही वास्तविक गैसों का आदान-प्रदान है।
- पसलियाँ एवं मध्यपट: ये श्वसन की क्रिया में सहायक हैं। साँस लेते समय पसलियाँ ऊपर उठती हैं और मध्यपट नीचे की ओर सपाट होता है, जिससे वक्ष गुहा का आयतन बढ़ जाता है और फेफड़ों में हवा भर जाती है। साँस छोड़ते समय विपरीत क्रिया होती है।
नामांकित चित्र के लिए नोट: छात्र किसी भी मानक विज्ञान पुस्तक में दिए गए मानव श्वसन तंत्र के स्पष्ट चित्र का अध्ययन करें और नासिका, ग्रसनी, स्वरयंत्र, श्वासनली, ब्रांकाई, फेफड़े एवं वायुकोष्ठक (एल्विओली) को नामांकित करके चित्र बनाएँ। प्रश्न 6.
मनुष्य के हृदय की आन्तरिक संरचना एवं क्रिया-विधि का वर्णन कीजिए। (2011, 12, 13)
या मनुष्य के हृदय की आन्तरिक संरचना का चित्रों की सहायता से वर्णन कीजिए। (2013, 17)
या मनुष्य के हृदय की आन्तरिक संरचना का स्वच्छ नामांकित चित्र बनाइए। (2016)उत्तर:
मनुष्य के हृदय की आन्तरिक संरचना:
मनुष्य का हृदय एक पेशीय अंग है जो वक्ष गुहा में, दोनों फेफड़ों के बीच, डायाफ्राम के ऊपर और थोड़ा बाईं ओर स्थित होता है। यह एक दोहरी झिल्ली वाली थैली, जिसे हृदयावरण (पेरीकार्डियम) कहते हैं, के अंदर सुरक्षित रहता है। इन दोनों झिल्लियों के बीच एक द्रव भरा रहता है जो हृदय को बाहरी झटकों से बचाता है।
हृदय की दीवार विशेष प्रकार की अनैच्छिक पेशियों, हृदय पेशियों, से बनी होती है। हृदय के अंदर चार कक्ष होते हैं:
- दायाँ अलिन्द (Right Atrium): यह ऊपरी दाएं भाग में स्थित है। इसमें शरीर से अशुद्ध रक्त लाने वाली दो बड़ी शिराएँ – उपरि महाशिरा (Superior Vena Cava) और निम्न महाशिरा (Inferior Vena Cava) – खुलती हैं।
- बायाँ अलिन्द (Left Atrium): यह ऊपरी बाएं भाग में स्थित है। इसमें फेफड़ों से शुद्ध रक्त लाने वाली फुफ्फुस शिराएँ (Pulmonary Veins) खुलती हैं।
- दायाँ निलय (Right Ventricle): यह निचले दाएं भाग में स्थित है। इसकी दीवार पतली होती है। यह अशुद्ध रक्त को फेफड़ों की ओर फुफ्फुस धमनी (Pulmonary Artery) के माध्यम से पंप करता है।
- बायाँ निलय (Left Ventricle): यह निचले बाएं भाग में स्थित है। इसकी दीवार सबसे मोटी और मजबूत होती है क्योंकि इसे पूरे शरीर में रक्त पंप करने के लिए अधिक दबाव बनाना पड़ता है। यह शुद्ध रक्त को महाधमनी (Aorta) के माध्यम से शरीर के विभिन्न भागों में भेजता है।
कपाट (Valves): हृदय में विशेष कपाट होते हैं जो रक्त के प्रवाह को केवल एक ही दिशा में होने देते हैं, पीछे की ओर नहीं जाने देते।
- त्रिवलनी कपाट (Tricuspid Valve): दाएं अलिन्द और दाएं निलय के बीच स्थित होता है।
- द्विवलनी कपाट (Bicuspid/Mitral Valve): बाएं अलिन्द और बाएं निलय के बीच स्थित होता है।
- अर्द्धचन्द्राकार कपाट (Semilunar Valves): ये दो कपाट होते हैं – एक फुफ्फुसीय कपाट जो दाएं निलय और फुफ्फुस धमनी के बीच होता है, और दूसरा महाधमनी कपाट जो बाएं निलय और महाधमनी के बीच होता है।
हृदय की कार्य-विधि:
हृदय एक अद्भुत पंप की तरह कार्य करता है जो निरंतर और लयबद्ध तरीके से सिकुड़ता (सिस्टोल) और फैलता (डायस्टोल) रहता है। इस पूरी प्रक्रिया को हृदय स्पंदन चक्र कहते हैं।
- अलिन्द सिस्टोल: सबसे पहले दोनों अलिन्द सिकुड़ते हैं। इससे अलिन्दों में भरा रक्त (दाएं में अशुद्ध और बाएं में शुद्ध) संबंधित निलयों में चला जाता है।
- निलय सिस्टोल: अलिन्दों के सिकुड़ने के तुरंत बाद दोनों निलय शक्तिशाली रूप से सिकुड़ते हैं। दायां निलय अशुद्ध रक्त को फुफ्फुस धमनी के जरिए फेफड़ों में भेजता है और बायां निलय शुद्ध रक्त को महाधमनी के जरिए पूरे शरीर में पंप करता है।
- हृदय डायस्टोल: सिकुड़ने के बाद पूरा हृदय फैलता (आराम करता) है। इस फैलाव के दौरान अलिन्द फिर से रक्त से भरने लगते हैं – दायां अलिन्द शिराओं से अशुद्ध रक्त और बायां अलिन्द फेफड़ों से शुद्ध रक्त प्राप्त करता है। यह चक्र लगातार चलता रहता है।
एक स्वस्थ वयस्क व्यक्ति का हृदय विश्राम की अवस्था में लगभग 70 से 80 बार प्रति मिनट धड़कता है। यह कार्य जीवन भर बिना रुके चलता रहता है।
प्रश्न 1. मनुष्य में वृक्क एक तंत्र का भाग है जो सम्बन्धित है-
(क) पोषण
(ख) श्वसन
(ग) उत्सर्जन
(घ) परिवहनउत्तर: (ग) उत्सर्जन
वृक्क (गुर्दे) मनुष्य के उत्सर्जन तंत्र का मुख्य अंग हैं। इनका कार्य रक्त से अपशिष्ट पदार्थों, जैसे यूरिया और अतिरिक्त लवणों व पानी को छानकर मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकालना है।प्रश्न 2. पादप में जाइलम उत्तरदायी है-
(क) जल का वहन
(ख) भोजन का वहन
(ग) अमीनो अम्ल
(घ) ऑक्सीजनउत्तर: (क) जल का वहन
पादपों में जाइलम एक संवहनी ऊतक है जो मुख्य रूप से जड़ों द्वारा अवशोषित जल एवं खनिज लवणों को पत्तियों तक पहुँचाने का कार्य करता है।प्रश्न 3. स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक है-
(क) कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल
(ख) क्लोरोफिल
(ग) सूर्य का प्रकाश
(घ) उपरोक्त सभीउत्तर: (घ) उपरोक्त सभी
स्वपोषी पोषण (प्रकाश संश्लेषण) के लिए तीनों कारक अनिवार्य हैं: कार्बन डाइऑक्साइड और जल कच्चे पदार्थ हैं, क्लोरोफिल प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित करता है, और सूर्य का प्रकाश ऊर्जा का स्रोत है।प्रश्न 4. पायरुवेट के विखंडन से यह कार्बन डाइऑक्साइड, जल तथा ऊर्जा देता है और यह क्रिया होती है-
(क) कोशिका द्रव्य
(ख) माइटोकॉन्ड्रिया
(ग) हरित लवक
(घ) केन्द्रकउत्तर: (ख) माइटोकॉन्ड्रिया
पायरुवेट का पूर्ण विखंडन (क्रेब्स चक्र) माइटोकॉन्ड्रिया में होता है, जिसमें कार्बन डाइऑक्साइड, जल और अधिक मात्रा में ऊर्जा (ATP) उत्पन्न होती है।प्रश्न 5. हमारे शरीर में वसा का पाचन कैसे होता है? यह प्रक्रम कहाँ होता है?
उत्तर: वसा का पाचन छोटी आंत में होता है। यकृत से स्रावित पित्त रस वसा को छोटे-छोटे गोलिकाओं (इमल्सीफिकेशन) में तोड़ देता है, जिससे उनका सतही क्षेत्र बढ़ जाता है। इसके बाद अग्न्याशय से आने वाला लाइपेज एंजाइम इन वसा गोलिकाओं को वसा अम्ल और ग्लिसरॉल में परिवर्तित कर देता है, जो आंत की दीवारों द्वारा अवशोषित हो जाते हैं।
प्रश्न 6. भोजन के पाचन में लार की क्या भूमिका है?
उत्तर: लार मुख ग्रंथियों से स्रावित होती है और इसकी निम्नलिखित भूमिकाएँ हैं:
- कार्बोहाइड्रेट का आंशिक पाचन: लार में उपस्थित एंजाइम टायलिन (एमाइलेज) स्टार्च को माल्टोज शर्करा में बदलना शुरू कर देता है।
- नमी प्रदान करना: यह भोजन को नम व चिकना बनाती है, जिससे निगलने में आसानी होती है।
- सफाई एवं सुरक्षा: यह मुँह को साफ रखती है और कुछ जीवाणुओं को नष्ट करने में मदद करती है।
प्रश्न 7. स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ कौन-सी हैं और उसके उपोत्पाद क्या हैं?
उत्तर: स्वपोषी पोषण (प्रकाश संश्लेषण) की आवश्यक परिस्थितियाँ एवं उपोत्पाद निम्न हैं:
- आवश्यक परिस्थितियाँ:
- प्रकाश: सूर्य का प्रकाश ऊर्जा का स्रोत है।
- क्लोरोफिल: हरे रंग का वर्णक जो प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित करता है।
- कार्बन डाइऑक्साइड: वायु से प्राप्त होती है।
- जल: मिट्टी से जड़ों द्वारा अवशोषित किया जाता है।
- उपोत्पाद: इस प्रक्रिया के मुख्य उत्पाद ग्लूकोज (भोजन) और ऑक्सीजन गैस हैं। ऑक्सीजन वातावरण में मुक्त होती है, जो जीवों के श्वसन के लिए आवश्यक है।
प्रश्न 8. वायवीय तथा अवायवीय श्वसन में क्या अन्तर हैं? कुछ जीवों के नाम लिखिए जिनमें अवायवीय श्वसन होता है।
उत्तर: वायवीय और अवायवीय श्वसन में अंतर:
आधार वायवीय श्वसन अवायवीय श्वसन ऑक्सीजन की उपस्थिति ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती। स्थान कोशिका द्रव्य और माइटोकॉन्ड्रिया में। केवल कोशिका द्रव्य में। उत्पाद कार्बन डाइऑक्साइड, जल और अधिक ऊर्जा (ATP)। इथेनॉल/लैक्टिक अम्ल और कम ऊर्जा। उदाहरण अधिकांश पौधे और जंतु। यीस्ट, कुछ जीवाणु, मानव पेशी कोशिकाएँ (अधिक परिश्रम के समय)।
अवायवीय श्वसन करने वाले कुछ जीव: यीस्ट (खमीर), कुछ प्रकार के जीवाणु (जैसे लैक्टोबैसिलस), परजीवी कृमि (जैसे टेपवर्म)।प्रश्न 9. गैसों के अधिकतम विनिमय के लिए कूपिकाएँ किस प्रकार अभिकल्पित हैं?
उत्तर: फेफड़ों में गैसों के अधिकतम विनिमय के लिए कूपिकाएँ (एल्विओली) निम्नलिखित विशेषताओं से अभिकल्पित हैं:
- विशाल सतह क्षेत्र: करोड़ों कूपिकाएँ होने के कारण इनका कुल सतह क्षेत्र बहुत अधिक (लगभग 80 वर्ग मीटर) होता है, जिससे गैस विनिमय की दर बढ़ जाती है।
- पतली भित्ति: इनकी भित्ति केवल एक कोशिका मोटी होती है, जिससे ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का आसानी से विसरण हो जाता है।
- रुधिर वाहिकाओं का जाल: प्रत्येक कूपिका रक्त केशिकाओं के घने जाल से घिरी रहती है, जो गैसों के तेजी से अवशोषण और परिवहन को सुनिश्चित करती है।
- नम सतह: कूपिकाओं की भीतरी सतह नम होती है, जिससे गैसों का विसरण आसानी से हो पाता है।
प्रश्न 10. मानव में दोहरा परिसंचरण की व्याख्या कीजिए। यह क्यों आवश्यक है?
उत्तर: मानव में दोहरा परिसंचरण का अर्थ है कि रक्त हृदय से होकर प्रति चक्कर में दो बार गुजरता है – एक बार फेफड़ों के चक्कर (पल्मोनरी परिसंचरण) के लिए और एक बार शरीर के बाकी हिस्सों (सिस्टेमिक परिसंचरण) के लिए।
- पल्मोनरी परिसंचरण: दायाँ निलय अशुद्ध रक्त को फेफड़ों की धमनी के माध्यम से फेफड़ों में भेजता है, जहाँ रक्त ऑक्सीजन लेता है और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ता है। ऑक्सीजनित रक्त फिर फेफड़ों की शिराओं द्वारा बाएँ आलिंद में लौटता है।
- सिस्टेमिक परिसंचरण: बायाँ निलय इस ऑक्सीजनित रक्त को महाधमनी के माध्यम से पूरे शरीर की कोशिकाओं तक पहुँचाता है। कोशिकाओं से अशुद्ध रक्त शिराओं द्वारा वापस दाएँ आलिंद में आता है।
प्रश्न 11. उत्सर्जी उत्पाद से बचने के लिए पादप किन विधियों का उपयोग करते हैं?
उत्तर: पादप उत्सर्जी उत्पादों से निपटने के लिए जंतुओं जैसा विशेष उत्सर्जन तंत्र नहीं रखते, बल्कि निम्नलिखित विधियों का उपयोग करते हैं:
- संचयन: कई अपशिष्ट पदार्थों जैसे रेजिन, गोंद, टैनिन आदि को पत्तियों की कोशिकाओं, छाल या पुरानी जाइलम ऊतक में जमा कर देते हैं। पत्तियों के झड़ने के साथ ये अपशिष्ट पौधे से अलग हो जाते हैं।
- परिवर्तन: कुछ अपशिष्ट पदार्थ उपयोगी बन जाते हैं। उदाहरण के लिए, प्रकाश संश्लेषण में उत्पन्न अतिरिक्त ऑक्सीजन श्वसन के लिए उपयोगी है और वातावरण में मुक्त होती है।
- स्रावण: कुछ पौधे अपशिष्ट पदार्थों को विशेष संरचनाओं (जैसे दूधिया रस वाहिनियों) में स्रावित कर देते हैं या बाहर निकाल देते हैं।
- पुनः उपयोग: कुछ नाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थों का पुनः उपयोग प्रोटीन संश्लेषण आदि में कर लिया जाता है।
प्रश्न 12. मनुष्य में उत्सर्जन तंत्र के अंगों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: मनुष्य के उत्सर्जन तंत्र के मुख्य अंग एवं उनके कार्य निम्न हैं:
- वृक्क (गुर्दे): ये मुख्य उत्सर्जी अंग हैं। ये रक्त से यूरिया, अतिरिक्त लवण व पानी को छानकर मूत्र बनाते हैं। प्रत्येक वृक्क में लाखों नेफ्रॉन (छनन इकाई) होते हैं।
- मूत्रवाहिनी: ये पतली नलिकाएँ हैं जो प्रत्येक वृक्क से मूत्र को मूत्राशय तक ले जाती हैं।
- मूत्राशय: यह एक थैलीनुमा संरचना है जो मूत्र को एकत्रित करके रखती है।
- मूत्रमार्ग: यह नलिका मूत्राशय से मूत्र को शरीर के बाहर निकालने का मार्ग प्रदान करती है।
- अन्य अंग: त्वचा (पसीने के माध्यम से), फेफड़े (कार्बन डाइऑक्साइड और जलवाष्प निकालकर) और यकृत भी उत्सर्जन में सहायक होते हैं।
प्रश्न 9.
वाष्पोत्सर्जज से आप क्या समझते हैं? इसका क्या महत्त्व है? (2012, 13, 14, 15, 16, 17, 18)
या वाष्पोत्सर्जन के चार प्रमुख महत्त्व बताइए। (2016)
उत्तर:
वाष्पोत्सर्जन: यह वह जैविक प्रक्रिया है जिसमें पौधे अपने वायवीय भागों (जैसे पत्तियों, तनों) से अतिरिक्त जल को जलवाष्प के रूप में वातावरण में छोड़ते हैं। यह प्रक्रिया मुख्य रूप से पत्तियों पर स्थित सूक्ष्म रंध्रों (स्टोमेटा) के माध्यम से होती है।
वाष्पोत्सर्जन का महत्त्व: इसे पौधों के लिए एक 'आवश्यक बुराई' कहा जाता है क्योंकि इससे पौधे का जल निकलता है, फिर भी इसके निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण लाभ हैं -
- अतिरिक्त जल का निष्कासन: पौधे जड़ों द्वारा जितना जल अवशोषित करते हैं, उसका केवल एक छोटा भाग उपयोग में आता है। शेष अतिरिक्त जल वाष्पोत्सर्जन द्वारा बाहर निकल जाता है, जिससे पौधे के शरीर में जल का संतुलन बना रहता है।
- खनिज लवणों का अवशोषण: वाष्पोत्सर्जन के कारण पौधे में एक 'चूषण दाब' उत्पन्न होता है। यह दाब जड़ों से पत्तियों तक जल के निरंतर प्रवाह को बनाए रखता है। इस जल प्रवाह के साथ ही मृदा से घुले हुए आवश्यक खनिज लवण भी पौधे के सभी भागों तक पहुँचते रहते हैं।
- तापमान का नियमन: जल के वाष्पीकरण के लिए ऊष्मा की आवश्यकता होती है। जब पत्तियों से जल वाष्पित होता है, तो वह आसपास की ऊष्मा को ले लेता है। इससे पत्तियों का तापमान कम हो जाता है और पौधा गर्मी में झुलसने से बच जाता है।
- जल का समान वितरण: वाष्पोत्सर्जन द्वारा उत्पन्न चूषण दाब पौधे के सभी भागों में जल के समान वितरण में सहायता करता है, जिससे दूरस्थ कोशिकाओं तक भी पोषक तत्व पहुँच पाते हैं।
प्रश्न 10.
पौधों में वाष्पोत्सर्जन कितने प्रकार से होता है? रंध्रीय वाष्पोत्सर्जन क्रिया-विधि का सचित्र वर्णन कीजिए। (2017) या वाष्पोत्सर्जन की क्रिया में स्टोमेट की क्या भूमिका है? चित्र द्वारा समझाइए। (2016)
या नामांकित चित्र की सहायता से पर्णरन्ध्रों (51011419) के खुलने तथा बन्द होने की क्रिया-विधि का वर्णन कीजिए। (2012, 16) या रन्ध्र (स्टोमेटा) का स्वच्छ एवं नामांकित चित्र बनाइए। (2013)
या रब्ध्र की रचना तथा कार्य का सचित्र वर्णन कीजिए। पौधों में इनकी क्या उपयोगिता है? (2014, 18)
या रन्ध्र का नामांकित चित्र बनाइए तथा द्वार (गार्ड) कोशिकाओं का वर्णन कीजिए। (2015)
उत्तर:
पौधों में वाष्पोत्सर्जन मुख्यतः तीन प्रकार से होता है -
- रंध्रीय वाष्पोत्सर्जन: पत्तियों पर उपस्थित रंध्रों (स्टोमेटा) के माध्यम से होने वाला वाष्पोत्सर्जन। यह सबसे अधिक (लगभग 80-90%) होता है।
- उपत्वचीय वाष्पोत्सर्जन: पौधे की बाहरी सतह (उपत्वचा या एपिडर्मिस) के माध्यम से होने वाला वाष्पोत्सर्जन।
- वातरंध्रीय वाष्पोत्सर्जन: तनों पर उपस्थित वातरंध्रों (लेंटिसेल्स) के माध्यम से होने वाला वाष्पोत्सर्जन।
रंध्रीय वाष्पोत्सर्जन की क्रिया-विधि:
[यहाँ रंध्र (स्टोमेटा) का नामांकित चित्र बनाना है]
चित्र में निम्नलिखित भाग दर्शाएँ:
1. द्वार कोशिकाएँ (Guard Cells)
2. रंध्र छिद्र (Stomatal Pore)
3. सहायक कोशिकाएँ (Subsidiary Cells)
4. क्लोरोप्लास्ट (Chloroplast)
5. एपिडर्मल कोशिकाएँ (Epidermal Cells)रंध्र की संरचना एवं कार्य: रंध्र दो वृक्काकार द्वार कोशिकाओं से बना होता है, जिनके बीच एक छिद्र होता है। इन द्वार कोशिकाओं में क्लोरोप्लास्ट पाए जाते हैं।
रंध्र के खुलने एवं बंद होने की क्रिया:
- रंध्र का खुलना: प्रकाश संश्लेषण के दौरान द्वार कोशिकाओं में ग्लूकोज का निर्माण होता है। इससे कोशिका में परासरण दाब बढ़ जाता है और बाहर से जल प्रवेश करता है। जल से भर जाने पर द्वार कोशिकाएँ फूलकर मुड़ जाती हैं, जिससे बीच का छिद्र खुल जाता है। इससे वाष्पोत्सर्जन और वायु-विनिमय होता है।
- रंध्र का बंद होना: रात्रि में या जल की कमी होने पर, द्वार कोशिकाओं में ग्लूकोज का स्तर कम हो जाता है। परासरण दाब घटने से कोशिका से जल बाहर निकल जाता है। इससे द्वार कोशिकाएँ सिकुड़कर सीधी हो जाती हैं और छिद्र बंद हो जाता है। इससे पौधे का जल संरक्षित होता है।
उपयोगिता: रंध्र पौधों के लिए वाष्पोत्सर्जन का मुख्य स्थल होने के साथ-साथ वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड के प्रवेश और ऑक्सीजन के निष्कासन का मार्ग भी हैं। ये पौधे की जल संतुलन एवं गैस विनिमय की प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं।
जैव प्रक्रम - अध्याय 6
1. पौधों में वाष्पोत्सर्जन क्या है? इसके दो महत्त्व बताइए।
उत्तर: वाष्पोत्सर्जन वह क्रिया है जिसमें पौधे अपने वायवीय भागों (मुख्यतः पत्तियों के रंध्रों से) से जल वाष्प के रूप में उत्सर्जित करते हैं। यह एक भौतिक एवं जैव रासायनिक प्रक्रिया है।
दो महत्त्व:
1. जल का अवशोषण एवं परिवहन: वाष्पोत्सर्जन द्वारा पैदा हुआ 'खिंचाव' (सक्शन प्रेशर) जड़ों से पत्तियों तक जल के निरंतर परिवहन में सहायक होता है।
2. तापमान का नियमन: जल के वाष्पीकरण के लिए आवश्यक ऊष्मा पौधे के शरीर से ली जाती है, जिससे पत्तियों व तनों का तापमान नियंत्रित रहता है और वे गर्मी में झुलसने से बचते हैं।2. पौधों में जल का परिवहन किस प्रकार होता है? संक्षेप में समझाइए।
उत्तर: पौधों में जल का परिवहन जड़ों से लेकर पत्तियों तक जाइलम ऊतक के माध्यम से होता है। यह प्रक्रिया मुख्यतः निम्नलिखित बलों के कारण संपन्न होती है:
(क) मूल दाब: जड़ की कोशिकाओं में आयनों के सक्रिय परिवहन के कारण उत्पन्न परासरण दाब, जल को मृदा से जड़ों में धकेलता है।
(ख) केशिकत्व: जाइलम की संकरी नलिकाओं (वाहिनिकाओं एवं वाहिकाओं) में जल स्वयं ही ऊपर चढ़ जाता है।
(ग) वाष्पोत्सर्जन खिंचाव: यह सबसे प्रमुख बल है। पत्तियों से वाष्पोत्सर्जन के कारण एक खिंचाव (टेन्शन) पैदा होता है, जो जल के स्तंभ को निरंतर ऊपर की ओर खींचता रहता है। जल के अणु एक-दूसरे से ससंजक बल द्वारा जुड़े रहते हैं और जाइलम की भित्ति से आसंजक बल द्वारा, जिससे यह स्तंभ टूटता नहीं है।3. पर्णरन्ध्र के खुलने एवं बन्द होने की क्रिया-विधि समझाइए।
उत्तर: पर्णरन्ध्र के खुलने और बंद होने की क्रिया दो द्वार कोशिकाओं (गार्ड सेल्स) की स्फीति (फुलाव) पर निर्भर करती है, जो उनके आंतरिक परासरण दाब में परिवर्तन से नियंत्रित होती है।
रन्ध्र खुलने की क्रिया: जब प्रकाश संश्लेषण प्रारंभ होता है, तो द्वार कोशिकाओं में पोटैशियम आयनों (K⁺) का सक्रिय परिवहन होता है। इन आयनों की सांद्रता बढ़ने से कोशिका का परासरण दाब बढ़ जाता है। इसके कारण पास की सहायक कोशिकाओं से जल परासरण द्वारा द्वार कोशिकाओं में प्रवेश करता है। जल आने से द्वार कोशिकाएँ स्फीत हो जाती हैं। इनकी भित्ति बाहरी की तुलना में आंतरिक भाग में मोटी होती है, इसलिए फूलने पर ये बाहर की ओर मुड़ जाती हैं और बीच का रन्ध्र खुल जाता है।
रन्ध्र बंद होने की क्रिया: जब प्रकाश कम होता है या पौधे में जल की कमी होती है, तो द्वार कोशिकाओं से पोटैशियम आयन बाहर चले जाते हैं। इससे कोशिका का परासरण दाब कम हो जाता है और जल बाहर निकल जाता है। जल निकलने से द्वार कोशिकाएँ श्लथ (फ्लैसिड) हो जाती हैं, जिससे वे एक-दूसरे के पास आ जाती हैं और रन्ध्र बंद हो जाता है।4. वाष्पोत्सर्जन की दर को प्रभावित करने वाले कारकों के नाम लिखिए।
उत्तर: वाष्पोत्सर्जन की दर को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं:
1. प्रकाश की तीव्रता: प्रकाश बढ़ने से रंध्र खुलते हैं, अतः वाष्पोत्सर्जन बढ़ जाता है।
2. तापमान: तापमान बढ़ने से वाष्पीकरण की दर बढ़ती है, इसलिए वाष्पोत्सर्जन भी बढ़ जाता है।
3. वायु की गति: तेज हवा चलने से पत्ती की सतह के आस-पास की संतृप्त वायु हट जाती है, जिससे वाष्पोत्सर्जन बढ़ता है।
4. वायु में आर्द्रता: वायु में जलवाष्प की मात्रा (आर्द्रता) अधिक होने पर वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है।
5. मृदा में जल की उपलब्धता: मृदा में जल की कमी होने पर पौधा रंध्र बंद कर देता है, जिससे वाष्पोत्सर्जन कम हो जाता है।5. बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)
i. पौधों में जल का परिवहन किसके द्वारा होता है?
A. फ्लोएम
B. जाइलम
C. रंध्र
D. जड़ रोम
उत्तर: B. जाइलमii. वाष्पोत्सर्जन की क्रिया में कौन-सी गैस निकलती है?
A. ऑक्सीजन
B. कार्बन डाइऑक्साइड
C. जलवाष्प
D. नाइट्रोजन
उत्तर: C. जलवाष्पiii. पर्णरन्ध्र के खुलने और बंद होने का नियंत्रण किसके द्वारा होता है?
A. सहायक कोशिकाएँ
B. द्वार कोशिकाएँ
C. पर्णमध्य कोशिकाएँ
D. एपिडर्मल कोशिकाएँ
उत्तर: B. द्वार कोशिकाएँiv. निम्नलिखित में से कौन वाष्पोत्सर्जन की दर को बढ़ाता है?
A. उच्च आर्द्रता
B. निम्न तापमान
C. तेज वायु
D. मृदा में जल की कमी
उत्तर: C. तेज वायु
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