Bihar Board Class 10th Science (विज्ञान) Chapter 15 हमारा पर्यावरण) Solutions
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प्रश्न 1.
क्या कारण है कि कुछ पदार्थ जैव निम्नीकरणीय होते हैं और कुछ अजैव निम्नीकरणीय?
उत्तर:
पदार्थों के जैव निम्नीकरणीय या अजैव निम्नीकरणीय होने का मुख्य कारण उनकी रासायनिक संरचना है। जैव निम्नीकरणीय पदार्थ (जैसे फलों के छिलके, कागज, लकड़ी) प्राकृतिक स्रोतों से आते हैं और इन्हें बैक्टीरिया, कवक जैसे सूक्ष्मजीव आसानी से तोड़कर सरल पदार्थों में बदल देते हैं। दूसरी ओर, अजैव निम्नीकरणीय पदार्थ (जैसे प्लास्टिक, काँच, धातु) मानव-निर्मित होते हैं और इनकी जटिल संरचना के कारण सूक्ष्मजीव इन्हें विघटित नहीं कर पाते, इसलिए ये पर्यावरण में लंबे समय तक बने रहते हैं।
प्रश्न 2.
ऐसे दो तरीके सुझाइए जिनमें जैव निम्नीकरणीय पदार्थ पर्यावरण को प्रभावित करते हैं।
उत्तर:
जैव निम्नीकरणीय पदार्थ पर्यावरण को निम्नलिखित तरीकों से प्रभावित कर सकते हैं:
- प्रदूषण और बीमारियाँ: इन पदार्थों के सड़ने-गलने से दुर्गंध और हानिकारक गैसें (जैसे मीथेन, हाइड्रोजन सल्फाइड) उत्पन्न होती हैं, जो वायु प्रदूषण का कारण बनती हैं और स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा कर सकती हैं।
- जल प्रदूषण: यदि इनका निपटान ठीक से न किया जाए, तो ये जल स्रोतों में मिलकर पानी को दूषित कर सकते हैं, जिससे जलीय जीवन प्रभावित होता है और पानी पीने योग्य नहीं रहता।
प्रश्न 3.
ऐसे दो तरीके बताइए जिनमें अजैव निम्नीकरणीय पदार्थ पर्यावरण को प्रभावित करते हैं।
उत्तर:
अजैव निम्नीकरणीय पदार्थ पर्यावरण को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं:
- दीर्घकालिक प्रदूषण: ये पदार्थ सैकड़ों वर्षों तक पर्यावरण में अपरिवर्तित रहते हैं, जिससे भूमि और जल निकायों में जमा होकर स्थायी प्रदूषण फैलाते हैं।
- पारिस्थितिक असंतुलन: ये पदार्थ प्राकृतिक पोषक चक्रों में बाधा डालते हैं। उदाहरण के लिए, प्लास्टिक की थैलियाँ मिट्टी की गुणवत्ता को खराब करती हैं और जानवरों द्वारा निगल लेने पर उनकी मृत्यु का कारण बन सकती हैं, जिससे खाद्य श्रृंखला प्रभावित होती है।
प्रश्न 1.
पोषी स्तर क्या हैं? एक आहार श्रृंखला का उदाहरण दीजिए तथा इसमें विभिन्न पोषी स्तर बताइए।
उत्तर:
किसी पारिस्थितिक तंत्र में ऊर्जा के प्रवाह के क्रम में भोजन के लिए एक-दूसरे पर निर्भर जीवों के विभिन्न चरणों को पोषी स्तर कहते हैं।
आहार श्रृंखला का उदाहरण: घास → टिड्डा → मेंढक → साँप → बाज
इसमें पोषी स्तर:
- प्रथम पोषी स्तर: घास (उत्पादक)
- द्वितीय पोषी स्तर: टिड्डा (प्राथमिक उपभोक्ता/शाकाहारी)
- तृतीय पोषी स्तर: मेंढक (द्वितीयक उपभोक्ता/मांसाहारी)
- चतुर्थ पोषी स्तर: साँप (तृतीयक उपभोक्ता/मांसाहारी)
- पंचम पोषी स्तर: बाज (शीर्ष/अंतिम उपभोक्ता)
प्रश्न 2.
पारितंत्र में अपमार्जकों की क्या भूमिका है?
उत्तर:
अपमार्जक (जैसे कवक और बैक्टीरिया) प्रकृति के सफाईकर्मी हैं। इनकी प्रमुख भूमिकाएँ हैं:
- जैविक कचरे का विघटन: ये मृत पौधों और जानवरों के शरीर तथा अन्य जैव निम्नीकरणीय कचरे को सड़ा-गला कर सरल अकार्बनिक पदार्थों (जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, पानी, खनिज) में तोड़ देते हैं।
- पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण: इस प्रक्रिया से मिट्टी में पोषक तत्व वापस मिल जाते हैं, जिन्हें पौधे फिर से उपयोग कर सकते हैं। इस प्रकार ये पारिस्थितिक तंत्र में पोषक चक्र को बनाए रखने और संतुलन स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
प्रश्न 1.
ओजोन क्या है तथा यह किसी पारितंत्र को किस प्रकार प्रभावित करती है?
उत्तर:
ओजोन (O3) ऑक्सीजन गैस (O2) का एक अपररूप है, जिसका प्रत्येक अणु ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से मिलकर बना होता है। यह वायुमंडल के समताप मंडल (स्ट्रैटोस्फीयर) में एक पतली परत के रूप में पाई जाती है।
पारितंत्र पर प्रभाव: ओजोन परत सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (UV) किरणों को अवशोषित कर लेती है। ये किरणें मनुष्यों में त्वचा कैंसर, मोतियाबिंद और प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर कर सकती हैं। पौधों की वृद्धि को रोक सकती हैं और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र (जैसे फाइटोप्लांकटन) को नुकसान पहुँचा सकती हैं। इस प्रकार, ओजोन परत पृथ्वी पर जीवन के लिए एक सुरक्षात्मक आवरण का काम करती है और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को स्थिर रखने में मदद करती है।
प्रश्न 2,
आप कचरा निपठान की समस्या कम करने में क्या योगदान कर सकते हैं? किन्हीं दो तरीकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
हम निम्नलिखित तरीकों से कचरा निपटान की समस्या कम करने में योगदान दे सकते हैं:
- कचरे का पृथक्करण और पुनर्चक्रण: हमें घर पर ही कचरे को अलग-अलग करना चाहिए – सूखा कचरा (प्लास्टिक, काँच, धातु) और गीला कचरा (खाद्य अपशिष्ट)। सूखे कचरे को पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) के लिए भेजा जा सकता है और गीले कचरे से खाद (कम्पोस्ट) बनाई जा सकती है।
- कम उपयोग और पुन: उपयोग: हमें प्लास्टिक के उपयोग को कम करना चाहिए। बाजार जाते समय कपड़े के थैले का प्रयोग करना चाहिए। पुरानी वस्तुओं (जैसे बोतलें, डिब्बे) को फेंकने के बजाय उनका पुन: उपयोग करना चाहिए। इससे अजैव निम्नीकरणीय कचरे की मात्रा कम होगी।
प्रश्न 1.
निम्न में से कौन-से समूहों में केवल जैव निम्नीकरणीय पदार्थ हैं? (क) घास, पुष्प तथा चमड़ा
(ख) घास, लकड़ी तथा प्लास्टिक
(ग) फलों के छिलके, केक एवं नींबू का रस
(घ) केक, लकड़ी एवं घास
उत्तर:
(ग) फलों के छिलके, केक एवं नींबू का रस
स्पष्टीकरण: इस समूह के सभी पदार्थ प्राकृतिक स्रोतों से आते हैं और सूक्ष्मजीवों द्वारा आसानी से विघटित हो सकते हैं। अन्य विकल्पों में प्लास्टिक (अजैव निम्नीकरणीय) या चमड़ा (जो प्रसंस्करण के बाद अजैव निम्नीकरणीय हो सकता है) जैसे पदार्थ शामिल हैं।
प्रश्न 2.
निम्न में से कौन आहार श्रृंखला का निर्माण करते हैं? (क) घास, गेहूँ तथा आम
(ख) घास, बकरी तथा मानव
(ग) बकरी, गाय तथा हाथी
(घ) घास, मछली तथा बकरी
उत्तर:
(ख) घास, बकरी तथा मानव
स्पष्टीकरण: एक वास्तविक आहार श्रृंखला में ऊर्जा का प्रवाह उत्पादक (घास) से प्राथमिक उपभोक्ता (बकरी) और फिर द्वितीयक उपभोक्ता (मानव) की ओर होता है। अन्य विकल्पों में या तो केवल उत्पादक हैं, या केवल उपभोक्ता हैं, या फिर क्रम सही नहीं है (मछली सीधे घास नहीं खाती)।
प्रश्न 3,
निम्न में से कौन पर्यावरण-मित्र व्यवहार कहलाते हैं?
(क) बाजार जाते समय सामान के लिए कपड़े का थैला ले जाना
(ख) कार्य समाप्त हो जाने पर लाइट (बल्ब) तथा पंखे का स्विच बंद करना
(ग) माँ द्वारा स्कूटर से विद्यालय छोड़ने के बजाय तुम्हारा विद्यालय तक पैदल जाना
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी
स्पष्टीकरण: सभी क्रियाएँ पर्यावरण के अनुकूल हैं। कपड़े का थैला प्लास्टिक के उपयोग को कम करता है, बिजली बंद करने से ऊर्जा की बचत होती है, और पैदल चलने से वाहनों के प्रदूषण में कमी आती है।
प्रश्न 4.
क्या होगा यदि हम एक पोषी स्तर के सभी जीवों को समाप्त कर दें (मार डालें)?
उत्तर:
यदि हम किसी एक पोषी स्तर (जैसे सभी शाकाहारी) के जीवों को समाप्त कर दें, तो इसका पूरे पारिस्थितिक तंत्र पर विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा:
- खाद्य श्रृंखला टूट जाएगी: उस पोषी स्तर पर निर्भर शिकारी जीव भोजन के अभाव में मरने लगेंगे।
- असंतुलन पैदा होगा: जिस पोषी स्तर का भोजन वे जीव करते थे (जैसे पौधे), उनकी संख्या अनियंत्रित रूप से बढ़ जाएगी, जिससे पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ जाएगा।
- ऊर्जा प्रवाह रुक जाएगा: पारिस्थितिक तंत्र में ऊर्जा का प्रवाह एक पोषी स्तर से दूसरे में रुक जाएगा, जिससे पूरा तंत्र अस्त-व्यस्त हो सकता है।
प्रश्न 5.
क्या किसी पोषी स्तर के सभी सदस्यों को हटाने का प्रभाव भिन्न-भिन्न पोषी स्तरों के लिए अलग-अलग होगा? क्या किसी पोषी स्तर के जीवों को पारितंत्र को प्रभावित किए बिना हटाना संभव है?
उत्तर:
पहले भाग का उत्तर: हाँ, प्रभाव भिन्न-भिन्न पोषी स्तरों के लिए अलग-अलग हो सकता है, लेकिन अंततः यह पूरे तंत्र को प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए, यदि सभी उत्पादक (पौधे) हटा दिए जाएँ, तो पूरी खाद्य श्रृंखला ढह जाएगी क्योंकि ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत ही समाप्त हो जाएगा। यदि शीर्ष शिकारी हटा दिए जाएँ, तो शाकाहारियों की संख्या बहुत बढ़ सकती है, जिससे वनस्पति का अत्यधिक दोहन होगा।
दूसरे भाग का उत्तर: नहीं, किसी भी पोषी स्तर के जीवों को पारिस्थितिक तंत्र को प्रभावित किए बिना हटाना संभव नहीं है। पारिस्थितिक तंत्र एक जटिल जाल है जहाँ सभी जीव आपस में जुड़े हुए हैं। एक घटक को हटाने से खाद्य जाल में गड़बड़ी होती है, जिससे आबादी में उतार-चढ़ाव और पारिस्थितिक असंतुलन पैदा होता है।
प्रश्न 6.
जैविक आवर्धन (Biological Magnification) क्या है? क्या पारितंत्र के विभिन्न स्तरों पर जैविक आवर्धन का प्रभाव भी भिन्न-भिन्न होगा?
उत्तर:
जैविक आवर्धन वह प्रक्रिया है जिसमें खाद्य श्रृंखला में प्रवेश करने वाले हानिकारक रसायन (जैसे कीटनाशक DDT, भारी धातु) का सांद्रण प्रत्येक successive पोषी स्तर पर बढ़ता जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ये रसायन जीवों के शरीर के ऊतकों में जमा हो जाते हैं और उपापचय (मेटाबॉलिज्म) द्वारा पूरी तरह नष्ट नहीं होते।
हाँ, इसका प्रभाव भिन्न-भिन्न पोषी स्तरों पर अलग-अलग होता है। निचले पोषी स्तर के जीवों (जैसे पौधे, छोटी मछलियाँ) में इन रसायनों की सांद्रता कम होती है। लेकिन जैसे-जैसे हम खाद्य श्रृंखला में ऊपर की ओर बढ़ते हैं, शीर्ष उपभोक्ताओं (जैसे बड़ी मछलियाँ, मनुष्य, चील) के शरीर में इन हानिकारक रसायनों की मात्रा सबसे अधिक हो जाती है, जिससे उन्हें गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ (जैसे प्रजनन संबंधी दोष, कैंसर) हो सकती हैं।
YT 7.
हमरे द्वारा उत्पादित अजैव निम्नीकरणीय कचरे से कौन-सी समस्याएं उत्पन्न होती हैं?
उत्तर:
अजैव निम्नीकरणीय कचरा (प्लास्टिक, पॉलीथीन, काँच, धातु के स्क्रैप) निम्नलिखित गंभीर समस्याएँ उत्पन्न करता है:
- भूमि प्रदूषण: यह कचरा लैंडफिल साइट्स में सैकड़ों वर्षों तक जमा रहता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता कम होती है और भूमि बंजर हो जाती है।
- जल प्रदूषण: नदियों, तालाबों और समुद्रों में फेंका गया यह कचरा जल को दूषित करता है, जलीय जीवों (मछलियाँ, कछुए आदि) को नुकसान पहुँचाता है और पीने के पानी के स्रोतों को खराब करता है।
- वायु प्रदूषण: इन कचरों को जलाने से विषैली गैसें (जैसे डाइऑक्सिन) वातावरण में फैलती हैं, जो साँस की बीमारियों का कारण बनती हैं।
- जानवरों के लिए खतरा: जानवर इन कचरों को भोजन समझकर खा लेते हैं, जिससे उनकी आँतों में रुकावट हो सकती है और अक्सर उनकी मृत्यु हो जाती है।
प्रश्न 8.
यदि हमारे द्वारा उत्पादित सारा कचरा जैव निम्नीकरणीय हो तो क्या इनका हमारे पर्यावरण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा?
उत्तर:
नहीं, ऐसा नहीं है। यदि सारा कचरा जैव निम्नीकरणीय भी हो, तब भी इसका पर्यावरण पर प्रभाव पड़ेगा, बशर्ते कि इसका उचित प्रबंधन न किया जाए।
- अत्यधिक मात्रा में कचरा: यदि बहुत अधिक मात्रा में जैव निम्नीकरणीय कचरा एक स्थान पर जमा हो जाए, तो सूक्ष्मजीव इसे तुरंत विघटित नहीं कर पाते। इससे दुर्गंध, कीटों का प्रकोप और भूमि प्रदूषण हो सकता है।
- जल प्रदूषण: यह कचरा नालियों को बंद कर सकता है और सड़कों पर पानी भरने का कारण बन सकता है। यदि यह जल स्रोतों में मिल जाए, तो पानी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है, जिससे जलीय जीव मरने लगते हैं (यूट्रोफिकेशन)।
- ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन: इस कचरे के सड़ने से मीथेन जैसी शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस निकलती है, जो जलवायु परिवर्तन में योगदान देती है।
इसलिए, जैव निम्नीकरणीय कचरे का भी वैज्ञानिक तरीके से निपटान (जैसे कम्पोस्टिंग) आवश्यक है।
प्रश्न 9,
ओज़ोन परत की क्षति हमारे लिए चिंता का विषय क्यों है? इस क्षति को सीमित करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं?
ओजोन परत की क्षति हमारे लिए अत्यंत चिंता का विषय है क्योंकि यह परत सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (UV) किरणों को पृथ्वी पर आने से रोकती है। यदि इसकी क्षति अधिक होती है तो अधिक-से-अधिक पराबैंगनी विकिरणें पृथ्वी पर आएँगी जो हमारे लिए निम्न प्रकार से हानिकारक प्रभाव डालती हैं -
- इनका प्रभाव त्वचा पर पड़ता है जिससे त्वचा के कैंसर की संभावना बढ़ जाती है।
- पौधों में वृद्धि दर कम हो जाती है।
- ये सूक्ष्म जीवों तथा अपघटकों को मारती हैं इससे पारितंत्र में असंतुलन उत्पन्न हो जाता है।
- ये पौधों में पिगमेंटों को नष्ट करती हैं।
ओजोन परत की क्षति कम करने के उपाय -
- एरोसोल तथा क्लोरोफ्लोरो कार्बन (CFC) यौगिक का कम-से-कम उपयोग करना।
- सुपर सोनिक विमानों का कम-से-कम उपयोग करना।
- संसार में नाभिकीय विस्फोटों पर नियंत्रण करना।
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल जैसे समझौतों को लागू करना जो ओजोन परत को नुकसान पहुँचाने वाले रसायनों के उत्पादन और उपयोग को रोकते हैं।
बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
पर्यावरण के कितने घटक होते हैं?
(a) एक
(b) दो
(८) तीन
(4) चार
प्रश्न 2.
निम्न में से पारितन्त्र के प्रमुख घटक हैं -
(9) जैविक घटक
(७) अजैविक घटक
(८) () व (1) दोनों
(५) इनमें से कोई नहीं
प्रश्न 3.
पृथ्वी के चारों ओर स्थित गैसीय आवरण को कहते हैं -
(a) स्थलमण्डल
(0०) जलमण्डल
(८) () व (1) दोनों
(१) वायुमण्डल
प्रश्न 4.
अमोनियम आयन को नाइट्रेट में बदलने की क्रिया को कहते हैं -
(9) अमोनीकरण
(७) नाइट्रीकरण
(८) विनाइट्रीकरण
(५) इनमें से कोई नहीं
प्रश्न 5.
मिट्टी में उपस्थित नाइट्रेट तथा अमोनिया को स्वतन्त्र नाइट्रोजन में बदलने की क्रिया को कहते हैं -
(9) विनाइट्रीकरण
(७) नाइट्रीकरण
(८) अमोनीकरण
(५) इनमें से कोई नहीं
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
पारितन्त्र में कौन-कौन से घटक हैं? पारितन्त्र में आप खरगोश को कहाँ रखेंगे?
पारितन्त्र में मुख्यत: दो प्रकार के घटक होते हैं- जैवीय घटक (सजीव, जैसे पौधे, जंतु) तथा अजैवीय घटक (निर्जीव, जैसे प्रकाश, तापमान, जल, मिट्टी)। खरगोश एक जैवीय घटक है। यह शाकाहारी होता है और पौधों को खाता है, इसलिए इसे प्राथमिक उपभोक्ता की श्रेणी में रखा जाता है।
प्रश्न 2.
जैव समुदाय तथा अजैव वातावरण के पारस्परिक सम्बन्धों का वर्णन कीजिए।
जैव समुदाय (सभी जीव) और अजैव वातावरण (निर्जीव घटक) एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं और लगातार पदार्थों व ऊर्जा का आदान-प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए, पौधे (जैव) सूर्य के प्रकाश, कार्बन डाइऑक्साइड और मिट्टी के खनिज (अजैव) का उपयोग कर भोजन बनाते हैं। जंतु इस भोजन को खाते हैं। जीवों की मृत्यु के बाद, अपघटक (जैसे बैक्टीरिया, कवक) उनके शरीर के जटिल कार्बनिक पदार्थों को सरल अजैव पदार्थों में तोड़ देते हैं, जो फिर से मिट्टी में मिलकर पौधों द्वारा उपयोग किए जाते हैं। इस प्रकार यह चक्र चलता रहता है।
प्रश्न 3.
हरे पौधों को उत्पादक क्यों कहा जाता है? कुकुरमुत्ता ऊर्जा कैसे प्राप्त करता है?
हरे पौधों में क्लोरोफिल होता है, जिसकी सहायता से वे सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा का उपयोग करके अकार्बनिक पदार्थों (जल, कार्बन डाइऑक्साइड) से अपना कार्बनिक भोजन (शर्करा) स्वयं बनाते हैं। चूंकि वे पारिस्थितिक तंत्र के लिए भोजन का उत्पादन करते हैं, इसलिए उन्हें उत्पादक कहा जाता है।
कुकुरमुत्ता एक कवक है। इसमें क्लोरोफिल नहीं होता, इसलिए यह अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकता। यह मृतजीवी होता है और मृत पौधों व जंतुओं के कार्बनिक पदार्थों का विघटन करके उनसे पोषण व ऊर्जा प्राप्त करता है।
प्रश्न 4.
जन्तु स्वपोषी क्यों नहीं होते?
स्वपोषी होने के लिए क्लोरोफिल जैसे वर्णक की आवश्यकता होती है, जो प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा का उपयोग करके भोजन बनाने में सहायक होता है। जंतुओं (यूग्लीना को छोड़कर) के शरीर में क्लोरोफिल नहीं पाया जाता। इसलिए, जंतु अपना भोजन स्वयं नहीं बना पाते और भोजन के लिए प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से पौधों या अन्य जंतुओं पर निर्भर रहते हैं। इसीलिए उन्हें परपोषी कहा जाता है।
प्रश्न 5.
बैक्टीरिया तथा कवक का पारितन्त् में क्या कार्य है?
या
किन््हीं दो अपघटकों के नाम लिखिए और स्पष्ट कीजिए कि ये किस प्रकार हमारे लिए लाभदायक हैं?
बैक्टीरिया तथा कवक पारितन्त्र में अपघटक का कार्य करते हैं। ये सूक्ष्मजीव मृत पौधों और जंतुओं के शरीर तथा अन्य कार्बनिक कचरे (जैसे गिरी हुई पत्तियाँ) को तोड़कर सरल अकार्बनिक पदार्थों (जैसे खनिज) में बदल देते हैं। यह प्रक्रिया हमारे लिए लाभदायक है क्योंकि इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और पोषक तत्व पुनः पारिस्थितिक तंत्र में लौट आते हैं, जिन्हें पौधे फिर से अवशोषित कर सकते हैं। इस प्रकार ये जीव प्रकृति में पदार्थों के चक्र को बनाए रखने में मदद करते हैं।
प्रश्न 6.
किन-किन प्रमुख स्त्रोतों से कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न होकर वायुमण्डल में पहुँचती है?
कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल में निम्नलिखित प्रमुख स्रोतों से पहुँचती है:
- श्वसन: सभी जीवधारी (पौधे व जंतु) श्वसन क्रिया के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं।
- दहन (जलना): जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोल), लकड़ी आदि के जलने से।
- अपघटन: सूक्ष्मजीवों द्वारा मृत कार्बनिक पदार्थों के अपघटन के दौरान।
- प्राकृतिक स्रोत: ज्वालामुखी विस्फोट, प्राकृतिक गैस निकलना आदि।
- कार्बोनेट चट्टानों का अपक्षय: चूना पत्थर जैसी चट्टानों के धीरे-धीरे टूटने-फूटने की प्रक्रिया में भी कार्बन डाइऑक्साइड निकल सकती है।
प्रश्न 7.
पौधे नाइट्रोजन को किस रुप में ग्रहण करते हैं?
वायुमंडल में बहुतायत में उपस्थित नाइट्रोजन गैस (N₂) का सीधा उपयोग पौधे नहीं कर सकते। पौधे नाइट्रोजन को मिट्टी से घुलनशील यौगिकों के रूप में, मुख्यतः नाइट्रेट (NO₃⁻) और अमोनियम (NH₄⁺) आयनों के रूप में, अपनी जड़ों द्वारा अवशोषित करते हैं।
प्रश्न 8.
दो नाइट्रोजनकारी जीवाणुओं के नाम लिखिए।
नाइट्रोजन चक्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले दो नाइट्रोजनकारी जीवाणु हैं:
- नाइट्रोसोमोनास (Nitrosomonas): यह जीवाणु अमोनिया (NH₃) को नाइट्राइट (NO₂⁻) में बदलने का कार्य करता है।
- नाइट्रोबैक्टर (Nitrobacter): यह जीवाणु नाइट्राइट (NO₂⁻) को नाइट्रेट (NO₃⁻) में परिवर्तित कर देता है, जिसे पौधे आसानी से ग्रहण कर सकते हैं।
प्रश्न 9.
जैव आवर्धन क्या है? अजैव विकृतीय रसायन द्वारा जैव आवर्धन किस प्रकार होता है?
जैव आवर्धन वह प्रक्रिया है जिसमें खाद्य श्रृंखला के प्रत्येक पोषी स्तर पर हानिकारक रसायनों (जैसे DDT, पारा) की सांद्रता लगातार बढ़ती जाती है।
अजैव विकृतीय रसायन (जैसे DDT) जो प्राकृतिक रूप से विघटित नहीं होते, मिट्टी या जल में मिल जाते हैं। छोटे जीव (जैसे प्लवक) इन्हें ग्रहण कर लेते हैं। जब इन छोटे जीवों को बड़े जीव खाते हैं, तो यह रसायन उनके शरीर में संचित हो जाता है। इस तरह, खाद्य श्रृंखला में ऊपर जाने पर प्रत्येक जीव के शरीर में इन रसायनों की मात्रा पिछले स्तर के जीव की तुलना में कई गुना अधिक हो जाती है। शीर्ष उपभोक्ता (जैसे मनुष्य, बाज) के शरीर में इनकी मात्रा सबसे अधिक और हानिकारक स्तर तक पहुँच जाती है।
प्रश्न 10.
प्रदूषक किसे कहते हैं?
वह कोई भी पदार्थ (ठोस, तरल, गैस) या ऊर्जा (जैसे ध्वनि, ताप) जो पर्यावरण में मिलकर वायु, जल या मिट्टी के प्राकृतिक गुणों (भौतिक, रासायनिक या जैविक) में अवांछित परिवर्तन लाता है और जीवों के लिए हानिकारक होता है, प्रदूषक कहलाता है। उदाहरण: कार्बन मोनोऑक्साइड, प्लास्टिक, कीटनाशक, औद्योगिक कचरा आदि।
प्रश्न 11.
प्रदूषण की परिभाषा लिखिए।
प्रदूषण वह स्थिति है जब वायु, जल तथा भूमि में हानिकारक पदार्थ (प्रदूषक) इकट्ठा हो जाते हैं और उनकी मात्रा इतनी अधिक हो जाती है कि प्राकृतिक पर्यावरण में प्रतिकूल परिवर्तन आ जाते हैं, जिससे मनुष्य सहित सभी जीवों के स्वास्थ्य, कल्याण और पर्यावरणीय संतुलन पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
प्रश्न 12.
पर्यावरणीय प्रदूषण क्या होता है? मानव के लिए हानिकर अजैव निम्नीकरणीय तीन प्रदूषकों के नाम लिखिए।
वायु, जल तथा भूमि में उन अवांछित अत्यधिक पदार्थों का एकत्रित हो जाना, जिनसे प्राकृतिक पर्यावरण में प्रतिकूल परिवर्तन आ जाते हैं, पर्यावरणीय प्रदूषण कहलाता है।
अजैव निम्नीकरणीय प्रदूषक वे प्रदूषक हैं जो प्राकृतिक रूप से विघटित नहीं होते या बहुत धीमी गति से विघटित होते हैं और पर्यावरण में लंबे समय तक बने रहते हैं। मानव के लिए हानिकर तीन ऐसे प्रदूषक हैं:
- कीटनाशी तथा पीड़कनाशी (जैसे DDT, BHC)
- प्लास्टिक (विशेषकर एकल-उपयोग वाला प्लास्टिक)
- रेडियोऐक्टिव अपशिष्ट पदार्थ
लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न.
जीवमण्डल की परिभाषा दीजिए। जीवमण्डल के कौन-से तीन प्रमुख भाग हैं?
जीवमण्डल पृथ्वी का वह संकरी परत है जहाँ जीवन पनपता है। यह स्थलमण्डल, जलमण्डल तथा वायुमण्डल के उन भागों से मिलकर बना है जहाँ जीवधारी पाए जाते हैं। जीवमण्डल में ऊर्जा तथा पदार्थों का निरन्तर आदान-प्रदान जैविक तथा अजैविक घटकों के मध्य होता रहता है। जीवमण्डल का विस्तार लगभग 14-15 किमी होता है। वायुमण्डल में 7-8 किमी ऊपर तक तथा समुद्र में 6-7 किमी गहराई तक जीवधारी पाए जाते हैं।
जीवमण्डल के तीन प्रमुख भाग निम्नलिखित हैं -
- स्थलमण्डल (Lithosphere): पृथ्वी का ठोस बाहरी आवरण, जिसमें चट्टानें, मिट्टी और महाद्वीप शामिल हैं।
- जलमण्डल (Hydrosphere): पृथ्वी पर उपस्थित सभी जल स्रोत, जैसे महासागर, नदियाँ, झीलें, हिमनद और भूमिगत जल।
- वायुमण्डल (Atmosphere): पृथ्वी के चारों ओर फैली गैसों की परतें, जो जीवन के लिए आवश्यक गैसें (जैसे ऑक्सीजन, नाइट्रोजन) प्रदान करती हैं और हानिकारक विकिरणों से रक्षा करती हैं।
प्रश्न 2. निम्नलिखित में अन्तर लिखिए -
1. उत्पादक तथा उपभोक्ता
2. स्थलमण्डल तथा वायुमण्डल
3. पारिस्थितिक तन्त्र तथा जीवोम
4. समष्टि तथा समुदाय।
| क्र.सं. | उत्पादक (Producer) | उपभोक्ता (Consumer) |
|---|---|---|
| 1. | उत्पादकों (हरे पौधों) में पर्णहरिम (क्लोरोफिल) होता है, जिसकी सहायता से वे प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। | उपभोक्ताओं (जन्तुओं) में पर्णहरिम नहीं होता, इसलिए वे अपना भोजन सीधे या परोक्ष रूप से पौधों से प्राप्त करते हैं। |
| 2. | ये सूर्य के प्रकाश की गतिज ऊर्जा को भोजन के रूप में रासायनिक स्थितिज ऊर्जा में बदलकर संचित करते हैं। | ये भोज्य पदार्थों में संचित स्थितिज ऊर्जा को अपनी जैविक क्रियाओं के लिए गतिज ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं। |
| 3. | उत्पादक केवल एक ही प्रकार के होते हैं, जो स्वपोषी होते हैं। | उपभोक्ता अनेक प्रकार के होते हैं, जैसे- प्राथमिक (शाकाहारी), द्वितीयक (मांसाहारी) एवं तृतीयक (शीर्ष मांसाहारी)। |
| 4. | उदाहरण: सभी हरे पौधे, शैवाल, कुछ जीवाणु। | उदाहरण: गाय, शेर, मनुष्य, मेढक, कीट आदि सभी जन्तु। |
| क्र.सं. | स्थलमण्डल (Lithosphere) | वायुमण्डल (Atmosphere) |
|---|---|---|
| 1. | यह पृथ्वी का ठोस बाहरी आवरण है, जिसमें चट्टानें, मृदा, रेत, खनिज आदि शामिल हैं। | यह पृथ्वी के चारों ओर का गैसों का आवरण है, जिसमें विभिन्न गैसें मिश्रित रहती हैं। |
| 2. | यह समुद्र तल के ऊपर के स्थल भाग और समुद्र तल के नीचे की ठोस परतों से मिलकर बनता है। | यह समुद्र तल से लगभग 1000 किलोमीटर की ऊँचाई तक फैला हुआ है। |
| 3. | स्थलमण्डल की केवल ऊपरी मृदा परत ही पौधों के लिए पोषक प्रदान करके जीवन का आधार बनती है। | वायुमण्डल के केवल निचले 7-8 किमी (क्षोभमण्डल) में ही ऑक्सीजन, तापमान आदि के कारण जीवन सम्भव है। |
| 4. | महत्व: पौधों को आधार व खनिज प्रदान करता है। कृषि, निर्माण आदि का आधार है। | महत्व: जीवों को श्वसन के लिए ऑक्सीजन, पौधों को CO₂ प्रदान करता है। सूर्य की हानिकारक किरणों से बचाता है। |
| क्र.सं. | पारिस्थितिक तन्त्र (Ecosystem) | जीवोम या बायोम (Biome) |
|---|---|---|
| 1. | यह जैविक एवं अजैविक घटकों की एक क्रियाशील इकाई है, जहाँ वे आपस में अन्योन्यक्रिया करते हैं। | यह एक विशाल भौगोलिक क्षेत्र है, जिसकी अपनी विशिष्ट जलवायु, वनस्पति और जीव होते हैं। |
| 2. | पारितन्त्र बायोम से छोटी इकाई है। अनेक पारितन्त्र मिलकर एक बायोम बनाते हैं। | बायोम पारितन्त्र से बड़ी एवं उच्च स्तर की जैविक इकाई है। एक बायोम में कई पारितन्त्र हो सकते हैं। |
| 3. | पृथ्वी पर एक ही स्थान पर अनेक पारितन्त्र (जैसे तालाब, आसपास का जंगल) एक साथ हो सकते हैं। | पृथ्वी पर कुल मिलाकर केवल 8-10 प्रमुख बायोम ही हैं, जो विशाल क्षेत्रों में फैले हैं। |
| 4. | उदाहरण: एक तालाब, एक वन, एक घास का मैदान, एक खेत। | उदाहरण: टुण्ड्रा, टैगा (शंकुधारी वन), उष्णकटिबंधीय वर्षा वन, मरुस्थल, समुद्री बायोम। |
| क्र.सं. | समष्टि (Population) | समुदाय (Community) |
|---|---|---|
| 1. | किसी निश्चित क्षेत्र में रहने वाले एक ही जाति के सभी सदस्यों के समूह को समष्टि कहते हैं। | किसी निश्चित क्षेत्र में रहने वाली विभिन्न जातियों की सभी समष्टियों के समूह को समुदाय कहते हैं। |
| 2. | समष्टि के सभी सदस्य आपस में लैंगिक जनन करके उर्वर संतति उत्पन्न कर सकते हैं। | समुदाय के सदस्य भिन्न-भिन्न जातियों के होते हैं, इसलिए वे आपस में लैंगिक जनन नहीं कर सकते। |
| 3. | इसका अध्ययन जनसंख्या घनत्व, वृद्धि दर, आयु संरचना आदि के संदर्भ में किया जाता है। | इसका अध्ययन जातियों की विविधता, पारस्परिक निर्भरता एवं अन्योन्यक्रिया के संदर्भ में किया जाता है। |
| 4. | उदाहरण: एक तालाब में रहने वाली सभी रोहू मछलियाँ, एक खेत में उगे सभी गेहूँ के पौधे। | उदाहरण: एक वन में रहने वाले सभी पेड़, पौधे, जानवर, सूक्ष्मजीव। एक तालाब में रहने वाली सभी मछलियाँ, पौधे, कीड़े, जीवाणु। |
प्रश्न 3. हरे पौधों द्वारा सूर्य-प्रकाश ऊर्जा को किस प्रकार की ऊर्जा में रूपान्तरित किया जाता है? उस प्रक्रम का भी नाम लिखिए जिसके द्वारा हरी वनस्पतियाँ सौर ऊर्जा को ग्रहण कर उसको जैव उपयोगी ऊर्जा में रूपान्तरित करती हैं।
हरे पौधे सूर्य के प्रकाश की गतिज ऊर्जा को रासायनिक स्थितिज ऊर्जा में रूपान्तरित करते हैं। यह रासायनिक ऊर्जा भोजन (जैसे ग्लूकोज) के रूप में संचित हो जाती है।
वह प्रक्रिया जिसके द्वारा हरी वनस्पतियाँ सौर ऊर्जा को ग्रहण कर जैव उपयोगी ऊर्जा में बदलती हैं, प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) कहलाती है।
प्रकाश संश्लेषण की अभिक्रिया:
6CO2 + 12H2O सूर्य का प्रकाश / क्लोरोफिल→ C6H12O6 + 6O2 + 6H2O
(कार्बन डाइऑक्साइड) (जल) (ग्लूकोज) (ऑक्सीजन) (जल)
इस प्रक्रिया में पौधे कार्बन डाइऑक्साइड और जल लेकर, सूर्य के प्रकाश और पर्णहरिम (क्लोरोफिल) की उपस्थिति में ग्लूकोज का निर्माण करते हैं। इस तरह सौर ऊर्जा, रासायनिक ऊर्जा के रूप में संचित हो जाती है, जिसका उपयोग पौधे स्वयं और उन पर निर्भर सभी जीव करते हैं।
प्रश्न 4. कीटनाशक DDT के प्रयोग को हतोत्साहित किया जा रहा है क्योंकि यह मानव शरीर में पाया गया है। किस प्रकार यह रसायन शरीर के अन्दर प्रवेश करता है?
DDT (डाइक्लोरो डाइफेनिल ट्राइक्लोरोइथेन) एक खतरनाक कीटनाशक है जो अजैव निम्नीकरणीय (Non-biodegradable) है। यह पर्यावरण में बहुत लंबे समय तक विषैला प्रभाव बनाए रखता है। यह मानव शरीर में निम्नलिखित तरीकों से प्रवेश करता है:
- खाद्य श्रृंखला द्वारा (Through Food Chain): जब खेतों में DDT का छिड़काव किया जाता है, तो यह मिट्टी और जल स्रोतों में मिल जाता है।
- पौधे अपनी जड़ों के माध्यम से मिट्टी और पानी से DDT को अवशोषित कर लेते हैं।
- शाकाहारी जन्तु (जैसे गाय, बकरी) इन दूषित पौधों को खाते हैं, और DDT उनके शरीर की वसा में जमा हो जाता है।
- जब मनुष्य या दूसरे मांसाहारी जन्तु (जैसे मछली, मुर्गी) इन दूषित जन्तुओं का मांस, दूध या अंडे खाते हैं, तो DDT उनके शरीर में पहुँच जाता है।
इस प्रकार खाद्य आवर्धन (Biological Magnification) के कारण DDT खाद्य श्रृंखला के प्रत्येक स्तर पर सांद्रित होता जाता है और शीर्ष उपभोक्ता (मनुष्य) के शरीर में सबसे अधिक मात्रा में पहुँचकर गंभीर बीमारियों (कैंसर, लीवर खराब) का कारण बनता है।
प्रश्न 5. निम्नलिखित को उदाहरण सहित समझाइए
1. अम्ल वर्षा
2. ओजोन की न्यूनता
1. अम्ल वर्षा (Acid Rain):
जब वायु में मौजूद प्रदूषक गैसें जैसे सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) और नाइट्रोजन के ऑक्साइड (NOx) वर्षा के जल (H₂O) के साथ मिलकर रासायनिक अभिक्रिया करती हैं, तो वे क्रमशः सल्फ्यूरिक अम्ल (H₂SO₄) और नाइट्रिक अम्ल (HNO₃) बनाती हैं। यह अम्लीकृत जल वर्षा, हिम या कोहरे के रूप में पृथ्वी पर गिरता है, इसे ही अम्ल वर्षा कहते हैं।
कारण: ये हानिकारक गैसें मुख्य रूप से कोयला, पेट्रोलियम जलाने वाले उद्योगों, वाहनों और ताप विद्युत गृहों से निकलती हैं।
दुष्प्रभाव (उदाहरण सहित):
- पौधों व मृदा को नुकसान: अम्ल वर्षा मिट्टी की अम्लता बढ़ा देती है, जिससे पौधों की जड़ें पोषक तत्व अवशोषित नहीं कर पातीं और वे नष्ट हो जाते हैं।
- भवनों का क्षरण: यह संगमरमर (ताजमहल जैसी इमारतों) और धातुओं को खराब कर देती है, उनकी चमक और मजबूती कम कर देती है।
- जलीय जीवन पर प्रभाव: झीलों और नदियों का पानी अम्लीय हो जाने से मछलियों और अन्य जलीय जीवों के अंडे नहीं फूट पाते, जिससे उनकी संख्या कम हो जाती है।
2. ओजोन की न्यूनता (Ozone Depletion):
पृथ्वी के वायुमण्डल की स्ट्रैटोस्फीयर परत में ओजोन (O₃) गैस की एक सुरक्षात्मक परत होती है, जिसे ओजोन परत कहते हैं। यह परत सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (UV) किरणों को अवशोषित करके हमें उनके दुष्प्रभावों से बचाती है।
मानव निर्मित रसायनों, विशेषकर क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) के कारण इस ओजोन परत का क्षरण हो रहा है, इसे ही ओजोन की न्यूनता या ओजोन छिद्र कहते हैं। CFCs का उपयोग प्रशीतक (फ्रिज, एयर कंडीशनर), एरोसॉल स्प्रे और फोम बनाने में होता था।
दुष्प्रभाव (उदाहरण सहित):
- त्वचा कैंसर: UV-B किरणों के सीधे संपर्क में आने से मनुष्यों में त्वचा कैंसर (मेलेनोमा) का खतरा बहुत बढ़ जाता है।
- मोतियाबिंद: आँखों की रोशनी कमजोर होना और मोतियाबिंद की समस्या बढ़ जाती है।
- प्रतिरक्षा तंत्र कमजोर होना: शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है।
- पारिस्थितिकी असंतुलन: प्लवक (प्लैंकटन) जैसे सूक्ष्म जलीय जीव नष्ट हो जाते हैं, जो समुद्री खाद्य श्रृंखला का आधार हैं। इससे मछली उत्पादन प्रभावित होता है।
हमारा पर्यावरण
1. हमारे पर्यावरण के घटक कौन-कौन से हैं ?
हमारे पर्यावरण के मुख्य घटक दो प्रकार के होते हैं:
(क) जैविक घटक: ये सभी सजीव प्राणी हैं, जैसे- मनुष्य, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, सूक्ष्मजीव आदि। ये एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं और खाद्य श्रृंखला बनाते हैं।
(ख) अजैविक घटक: ये सभी निर्जीव तत्व हैं, जैसे- हवा, पानी, मिट्टी, प्रकाश, तापमान, खनिज आदि। ये जैविक घटकों के जीवन के लिए आवश्यक आधार प्रदान करते हैं।
2. खाद्य श्रृंखला क्या है ? विभिन्न जीवों के नाम लिखिए जो विभिन्न पोषी स्तर बनाते हैं।
खाद्य श्रृंखला ऊर्जा के प्रवाह का वह क्रम है जिसमें एक जीव दूसरे जीव को खाता है और स्वयं किसी अन्य जीव द्वारा खाया जाता है। यह पारिस्थितिक तंत्र में ऊर्जा और पोषक तत्वों के स्थानांतरण का मार्ग दिखाती है।
उदाहरण: घास → टिड्डा → मेंढक → साँप → बाज
इस श्रृंखला में विभिन्न पोषी स्तर इस प्रकार हैं:
प्रथम पोषी स्तर (उत्पादक): घास (पौधे) – ये सूर्य के प्रकाश का उपयोग करके अपना भोजन स्वयं बनाते हैं।
द्वितीय पोषी स्तर (प्राथमिक उपभोक्ता): टिड्डा – यह घास खाता है।
तृतीय पोषी स्तर (द्वितीयक उपभोक्ता): मेंढक – यह टिड्डे को खाता है।
चतुर्थ पोषी स्तर (तृतीयक उपभोक्ता): साँप – यह मेंढक को खाता है।
पंचम पोषी स्तर (शीर्ष उपभोक्ता): बाज – यह साँप को खाता है।
3. खाद्य जाल क्या है ?
खाद्य जाल विभिन्न खाद्य श्रृंखलाओं का एक जटिल जाल होता है जो आपस में जुड़े होते हैं। प्रकृति में, एक ही जीव कई अलग-अलग खाद्य श्रृंखलाओं का हिस्सा हो सकता है। जब कई खाद्य श्रृंखलाएँ परस्पर जुड़ जाती हैं, तो वह एक जाल का निर्माण करती हैं, जिसे खाद्य जाल कहते हैं। यह पारिस्थितिक तंत्र में ऊर्जा प्रवाह की वास्तविक जटिलता को दर्शाता है।
उदाहरण: एक चूहा अनाज और फल दोनों खा सकता है। उस चूहे को साँप, बिल्ली और उल्लू जैसे कई शिकारी खा सकते हैं। इस तरह, अनाज और फल से शुरू होने वाली अलग-अलग श्रृंखलाएँ आपस में मिलकर एक जाल बना देती हैं।
4. पारितंत्र में अपघटकों की क्या भूमिका है ?
अपघटक (जैसे कवक और जीवाणु) पारितंत्र के अत्यंत महत्वपूर्ण घटक हैं। इनकी प्रमुख भूमिकाएँ हैं:
(क) मृत जैविक पदार्थों का विघटन: ये मरे हुए पौधों, जानवरों और उनके अपशिष्टों को सड़ा-गला कर सरल अकार्बनिक पदार्थों में तोड़ देते हैं।
(ख) पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण: विघटन की प्रक्रिया के दौरान, मृत जीवों में मौजूद कार्बन, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस जैसे पोषक तत्व मिट्टी में वापस मिल जाते हैं, जिन्हें पौधे फिर से अवशोषित कर सकते हैं।
(ग) पर्यावरण की स्वच्छता: ये प्रकृति के सफाईकर्मी की तरह काम करते हैं और पर्यावरण को मृत अवशेषों से मुक्त रखते हैं।
(घ) ऊर्जा मुक्त करना: विघटन की प्रक्रिया में ऊर्जा भी मुक्त होती है, जो पारितंत्र में फैल जाती है।
5. ओजोन परत क्या है और यह किस प्रकार हानिकारक है ?
ओजोन परत: यह वायुमंडल की स्ट्रैटोस्फीयर परत में पाई जाने वाली ओजोन (O₃) गैस की एक सुरक्षात्मक परत है। यह परत सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (UV) किरणों को पृथ्वी पर आने से रोकती है, जिससे जीवों का संरक्षण होता है।
ओजोन परत का हानिकारक होना: ओजोन परत स्वयं में हानिकारक नहीं है, बल्कि इसका क्षय या पतला होना हानिकारक है। क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) जैसे रसायनों के कारण ओजोन परत में छिद्र हो गया है। इसके परिणामस्वरूप:
1. पृथ्वी पर हानिकारक पराबैंगनी किरणों की मात्रा बढ़ जाती है।
2. इससे त्वचा कैंसर, मोतियाबिंद जैसे रोग हो सकते हैं।
3. प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो सकती है।
4. समुद्री प्लवकों और फसलों को नुकसान पहुँच सकता है।
6. क्या होगा यदि हम एक खाद्य श्रृंखला में से एक जीव को हटा दें ?
यदि हम किसी खाद्य श्रृंखला से एक जीव को हटा दें, तो पूरा पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ सकता है।
(क) यदि उत्पादक (पौधे) हटाए जाएँ: पूरी श्रृंखला टूट जाएगी क्योंकि ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत ही समाप्त हो जाएगा, जिससे सभी उपभोक्ता भूखे मर जाएँगे।
(ख) यदि कोई उपभोक्ता हटाया जाए: उदाहरण के लिए, यदि मेंढक (द्वितीयक उपभोक्ता) हटा दिए जाएँ, तो टिड्डों (प्राथमिक उपभोक्ता) की संख्या बहुत बढ़ जाएगी, जिससे फसलों को भारी नुकसान होगा। साथ ही, साँप (तृतीयक उपभोक्ता) को भोजन नहीं मिलेगा और उनकी संख्या घटने लगेगी।
(ग) यदि शीर्ष उपभोक्ता हटाया जाए: तो उसके शिकार (जैसे साँप) की संख्या अनियंत्रित होकर बढ़ जाएगी, जो अपने से नीचे के स्तर के जीवों (जैसे मेंढक) को अधिक मात्रा में खाने लगेंगे। इससे पूरे पारितंत्र में असंतुलन पैदा हो जाएगा।
7. क्या होता है जब हम पारितंत्र में अपशिष्ट उत्पन्न करते हैं ?
जब हम पारितंत्र में अपशिष्ट उत्पन्न करते हैं, तो इसके गंभीर दुष्परिणाम होते हैं:
(क) प्रदूषण: अपशिष्ट वायु, जल और मृदा प्रदूषण का कारण बनता है। प्लास्टिक, रसायन और विषैले पदार्थ पर्यावरण को दूषित करते हैं।
(ख) जैव आवर्धन: हानिकारक रसायन (जैसे कीटनाशक) खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर जाते हैं और प्रत्येक पोषी स्तर पर उनकी सांद्रता बढ़ती जाती है। शीर्ष उपभोक्ताओं के शरीर में ये रसायन अत्यधिक मात्रा में जमा हो जाते हैं, जो उनके लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं।
(ग) पारितंत्र का असंतुलन: अपशिष्ट से कई लाभदायक सूक्ष्मजीव और अन्य जीव मर सकते हैं, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र की कार्यप्रणाली बाधित होती है।
(घ) स्वास्थ्य समस्याएँ: प्रदूषित हवा और पानी से मनुष्यों और जानवरों में अनेक बीमारियाँ फैलती हैं।
8. क्या आप अपने आस-पास के क्षेत्र में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए कुछ उपाय सुझा सकते हैं ?
हाँ, ठोस अपशिष्ट के प्रबंधन के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:
(क) कचरे का पृथक्करण: घरों और सार्वजनिक स्थानों पर कचरे को शुरू में ही अलग-अलग करना चाहिए – जैविक (सब्जी के छिलके), पुनर्चक्रण योग्य (कागज, प्लास्टिक, कांच, धातु) और हानिकारक (बैटरी, दवाई)।
(ख) कम्पोस्टिंग: रसोई और बगीचे के जैविक कचरे को कम्पोस्ट खाद में बदला जा सकता है, जो पौधों के लिए उत्तम खाद का काम करती है।
(ग) पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) को बढ़ावा: कागज, प्लास्टिक, कांच आदि को रीसाइकिल कर नए उत्पाद बनाए जा सकते हैं। इससे कचरा कम होगा और संसाधनों की बचत होगी।
(घ) पुन: उपयोग: पुरानी वस्तुओं जैसे बोतलें, डिब्बे, कपड़ों आदि का सृजनात्मक तरीके से दोबारा उपयोग करना चाहिए।
(ङ) कचरा कम करना: कम पैकेजिंग वाली वस्तुएँ खरीदें, कपड़े के थैले का प्रयोग करें और एक बार उपयोग होने वाले प्लास्टिक (डिस्पोजेबल) से बचें।
(च) सामुदायिक भागीदारी: स्वच्छता अभियान चलाकर और लोगों को जागरूक करके कचरा प्रबंधन को प्रभावी बनाया जा सकता है।
बहुविकल्पीय प्रश्न
1. निम्नलिखित में से कौन प्राकृतिक पारितंत्र है ?
(A) तालाब
(B) फसल क्षेत्र
(C) बगीचा
(D) ईंट भट्ठा
उत्तर: (A) तालाब
तालाब एक प्राकृतिक पारितंत्र है क्योंकि यह बिना मानवीय हस्तक्षेप के प्रकृति द्वारा स्वयं बनता है और इसमें जैविक व अजैविक घटकों का स्वाभाविक संतुलन होता है। फसल क्षेत्र, बगीचा और ईंट भट्ठा मानव निर्मित या कृत्रिम पारितंत्र हैं।
2. निम्नलिखित में से कौन-सा अपघटक है ?
(A) घास
(B) शेर
(C) कवक
(D) बकरी
उत्तर: (C) कवक
कवक (फंजाई) एक अपघटक है जो मृत पौधों और जानवरों के अवशेषों को सड़ा-गला कर सरल पदार्थों में तोड़ देता है। घास उत्पादक है, शेर और बकरी उपभोक्ता हैं।
3. निम्नलिखित में से कौन पर्यावरण-मित्र व्यवहार नहीं है ?
(A) बाजार जाते समय कपड़े का थैला ले जाना
(B) कार में अकेले यात्रा करना
(C) लाइट बंद करके कमरा छोड़ना
(D) पानी की टंकी का ढक्कन लगाना
उत्तर: (B) कार में अकेले यात्रा करना
कार में अकेले यात्रा करना पर्यावरण-मित्र व्यवहार नहीं है क्योंकि इससे प्रति व्यक्ति ईंधन की खपत अधिक होती है और वायु प्रदूषण बढ़ता है। सार्वजनिक परिवहन या कारपूलिंग करना अधिक पर्यावरण-हितैषी विकल्प होगा। अन्य सभी विकल्प संसाधनों की बचत और प्रदूषण कम करने में सहायक हैं।
4. निम्नलिखित में से कौन-सा बायोडिग्रेडेबल पदार्थ है ?
(A) डी. डी. टी.
(B) एल्युमीनियम
(C) प्लास्टिक
(D) कपास
उत्तर: (D) कपास
कपास एक बायोडिग्रेडेबल (जैव निम्नीकरणीय) पदार्थ है क्योंकि यह प्राकृतिक रेशा है और मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव इसे आसानी से विघटित कर देते हैं। डी.डी.टी. (कीटनाशक), एल्युमीनियम और प्लास्टिक गैर-बायोडिग्रेडेबल पदार्थ हैं जो पर्यावरण में लंबे समय तक बने रहते हैं और प्रदूषण फैलाते हैं।
5. निम्नलिखित में से कौन-सा ट्रॉफिक स्तर में मानव का स्थान है ?
(A) प्रथम
(B) द्वितीय
(C) तृतीय
(D) ये सभी
उत्तर: (D) ये सभी
मनुष्य एक सर्वभक्षी प्राणी है, अर्थात वह पौधे और जानवर दोनों खाता है। इसलिए, मनुष्य विभिन्न खाद्य श्रृंखलाओं में अलग-अलग पोषी स्तरों पर पाया जा सकता है। जब वह सीधे पौधे (सब्जी, फल, अनाज) खाता है तो वह द्वितीय पोषी स्तर (प्राथमिक उपभोक्ता) पर होता है। जब वह शाकाहारी जानवर (मुर्गी, मछली) खाता है तो तृतीय पोषी स्तर (द्वितीयक उपभोक्ता) पर और जब वह मांसाहारी जानवर खाता है तो और ऊँचे स्तर पर हो सकता है।
प्रश्न 10.
रेडियोधर्मी प्रदूषण पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
रेडियोधर्मी प्रदूषण पर्यावरण में रेडियोधर्मी पदार्थों की उपस्थिति के कारण होता है। ये पदार्थ अल्फा, बीटा और गामा किरणों जैसे विकिरण उत्सर्जित करते हैं जो जीवों के लिए अत्यंत हानिकारक होते हैं। यह प्रदूषण प्राकृतिक स्रोतों जैसे कि कुछ चट्टानों से भी हो सकता है, लेकिन मुख्य रूप से यह मानवीय गतिविधियों जैसे परमाणु विस्फोट, आणविक परीक्षण, परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से दुर्घटना, रेडियोधर्मी कचरे का अनुचित निपटान और चिकित्सा एवं औद्योगिक उपयोग से फैलता है। यह विकिरण जीवित कोशिकाओं के डीएनए को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे कैंसर, आनुवंशिक विकार और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। इस प्रदूषण को रोकने के लिए परमाणु सामग्री के सुरक्षित उपयोग, कचरे के उचित प्रबंधन और सख्त नियमों का पालन आवश्यक है।
प्रश्न 2.
खाद्य-श्रृंखला से आप क्या समझते हैं? खाद्य-श्रृंखला तथा खाद्य-जाल में कया अन्तर है? उचित उदाहरणों की सहायता से समझाइए।
उत्तर:
खाद्य-श्रृंखला: किसी पारिस्थितिक तंत्र में विभिन्न जीव एक-दूसरे को खाकर अपनी ऊर्जा की आवश्यकता पूरी करते हैं। एक जीव द्वारा दूसरे जीव को खाने और फिर उस जीव के तीसरे जीव द्वारा खाए जाने की इस क्रमबद्ध प्रक्रिया को खाद्य-श्रृंखला कहते हैं। इसमें ऊर्जा का प्रवाह हमेशा एक ही दिशा में होता है - सूर्य से उत्पादक (हरे पौधे), फिर विभिन्न स्तर के उपभोक्ताओं और अंत में अपघटकों की ओर। खाद्य-श्रृंखला के प्रत्येक चरण को पोषी स्तर कहते हैं।
उदाहरण:
- स्थलीय तंत्र: घास → टिड्डा → मेंढक → साँप → बाज
- जलीय तंत्र: शैवाल (पादप प्लवक) → छोटी मछली → बड़ी मछली → मगरमच्छ
खाद्य-जाल: प्रकृति में खाद्य-श्रृंखलाएँ अक्सर अलग-थलग नहीं होतीं। एक ही पारिस्थितिक तंत्र में कई खाद्य-श्रृंखलाएँ आपस में जुड़ी होती हैं क्योंकि अधिकांश जीव एक से अधिक प्रकार के भोजन पर निर्भर करते हैं। इन अनेक परस्पर जुड़ी हुई खाद्य-श्रृंखलाओं के जाल को ही खाद्य-जाल कहते हैं। यह तंत्र की जटिलता और स्थिरता को दर्शाता है।
खाद्य-श्रृंखला और खाद्य-जाल में अंतर:
| क्र. सं. | खाद्य-श्रृंखला | खाद्य-जाल |
|---|---|---|
| 1. | यह एक सरल, सीधी और रैखिक संरचना है जिसमें ऊर्जा एक जीव से दूसरे जीव में स्थानांतरित होती है। | यह एक जटिल संरचना है जो कई खाद्य-श्रृंखलाओं के आपस में जुड़ने से बनती है। |
| 2. | इसमें ऊर्जा का प्रवाह केवल एक ही पथ से होता है। | इसमें ऊर्जा का प्रवाह कई पथों से होकर गुजरता है। |
| 3. | इसमें जीवों की संख्या और प्रकार सीमित होते हैं। | इसमें जीवों की संख्या और प्रकार बहुत अधिक होते हैं। |
| 4. | उत्पादक, उपभोक्ता और अपघटक के बीच संबंध एक सीधी कड़ी के रूप में होता है। | उत्पादक, उपभोक्ता और अपघटक के बीच संबंध जाल के समान होता है। |
| 5. | उदाहरण: घास → खरगोश → लोमड़ी | उदाहरण: एक ही घास को टिड्डा और खरगोश दोनों खा सकते हैं। टिड्डे को मेंढक और चिड़िया खा सकते हैं, और खरगोश को लोमड़ी और बाज खा सकते हैं। यह सभी संबंध मिलकर एक जाल बनाते हैं। |
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Chapter 2 अम्ल, क्षारक एवं लवण)
Chapter 3 धातु एवं अधातु)
Chapter 4 कार्बन एवं इसके यौगिक)
Chapter 5 तत्वों का आवर्त वर्गीकरण)
Chapter 6 जैव प्रक्रम)
Chapter 7 नियंत्रण एवं समन्वय)
Chapter 8 जीव जनन कैसे करते है)
Chapter 9 अनुवांशिकता एवं जैव विकास)
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Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार)
Chapter 12 विद्युत)
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